Wednesday, January 22, 2014

अपनी मर्जी से नहीं आया इस दुनिया में
 मैं तो आपका पता नहीं
जाऊंगा भी अपनी मर्जी से नहीं दुनिया से
पर आपका पता नहीं 
आज का दौर हमको कहाँ लेजा रहा यारो ॥
बताओ तो सही नहीं समझ पा रहा यारो ॥
प्यार मोहब्बत नहीं बची मार काट छाई
मानवता के रिस्तों पे बाजार छा रहा यारो ॥ 

म्हारा स्वास्थ्य ढांचा


म्हारा स्वास्थ्य ढांचा
दो करोड़ तरेपन लाख जनसँख्या म्हारी बताई रै ॥
हजार छोरयां पर आठ सौ उनासी छोरी दिखाई रै ॥
सी एच सी आज तलक एक सौ पैंसठ बना पाये
दो सौ तरेपन चाहियें अठासी नंबर कम बताये
किसे बी सी एच सी मैं पूरे स्पेस्लिस्ट नहीं लगाये
सबने मुफ्त इलाज के जमकै विज्ञापन छपवाये
किलोई सी एच सी मैं कदे ना पूरी टीम या पायी रै ॥
 पॉंच स्पेस्लिस्ट सी एच सी मैं होने जरूर बताये रै
सर्जन फिजिसियन जरूरी पैमाने यही सुझाये रै
शिशु विशेषज्ञ घना जरूरी सारे कै रूक्के पड़वाये रै
महिला रोग विशेषज्ञ के भी खाने इसमैं  दिखाये रै
बेहोशी विशेषज्ञ नै भूले  स्कीम कै बेड़ी लगाई रै ॥
बेहोशी के डाक्टर बिना कोए अप्रेसन करै कैसे
डाक्टर पावैगा सी एच सी मैं मरीज कै जरै कैसे
डाक्टर पा बी जावै तो बी बिना दवाई पेट भरै कैसे
सीएम् की मुफ्त योजना स्कीम ऐसे मैं पार तिरै कैसे
विशेषज बहोत कम सैं या बात जावै छिपाई रै ॥
जिले के अस्पतालां मैं भी मरीज घने धक्के पावैं सैं
कई जिलयां मैं औजार पड़े पड़े आज जंग खावै सैं
पिते की पथरी आले ये  बिना सर्जन खड़े लखावै सैं
लाचारी मैं इलाज मरीज ये प्राइवेट पै करवावै सैं
कहै रणबीर सिंह गरीब की शामत कसूत आयी रै ॥

Saturday, January 18, 2014

भारत का मुक्तिसंग्राम

भारत का मुक्तिसंग्राम
ब्रिटिश साम्राजियों और उनके सेवक इतिहासकारों ने भारतीय जनता के इन गौरवमय संग्रामों पर यथाशक्ति पर्दा डालने की कोशिश  की । साम्राजियों को भारत भूमि से मार भगाने की चेष्टा कार्नर वाले भारतीय वीरों को उन्होंने डकैत लूटेरा हत्यारा आदि कहकर दुनिया की नजर में गिराने की कोइ भी कोशिश  उठा न रखी । उनकी दृष्टि में फरेब , दगाबाजी ,खुली लूट और डकैती का रास्ता अपना कर भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की बुनियाद मजबूत करने वाले क्लाइव , वारेन हेस्टिंग्स , डलहौजी जैसे लोग महँ पुरुष थे , लेकिन उनकी लूट खसोट के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व करने वाले मजनूशाह , तीतूमीर , दूदू मियाँ ,पायस्सी राजा , वेलू थंपी , तीरथ सिंह , सिद्धू और कानू , नाना साहिब , लख्मीबाई , तातिया टोपे , मोलवी अहमदशाह , कुंवर सिंह , और अमरसिंह , राम सिंह कूका ,वासुदेव बलवंत फड़के , टिकेंद्रजीत , बिरसा मुंडा आदि अपराधी थे । मिथ्या , कुत्सा और कुप्रचार के इस परदे को फाड़ फेंकने की जिम्मेदारी भारत के इतिहासकारों की है । 

सांस्कृतिक साम्राज्यवाद की एक प्रमुख परियोजना है संस्कृति

सांस्कृतिक साम्राज्यवाद की एक प्रमुख परियोजना है संस्कृति
सांस्कृतिक साम्राज्यवाद पर विदेशों  की अंग्रेजी पुस्तकों और पत्रिकाओं में इधर काफी लिखा जा रहा है। लेकिन हमारे यहां इसकी चर्चा बहुत कम हो रही है। यहां तक की संस्कृति पर बात करने का ठेका मानो एक खास तरह की राजनीति करने वालों ने ले रखा है और वे जिस तरह इस पर बात करते हैं , उससे लगता है कि संस्कृति प्राचीन काल की कोई चीज है, जो धर्म से जुड़ी होती है, जैसे हिन्दू संस्कृति  या मुस्लिम संस्कृति। इस तरह देखें तो ,हमारे यहां संस्कृति को समझना समझाना ही मुश्किल  है, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद को समझना समझाना तो दूर की बात है। इसलिए सबसे पहले यह जानना जरुरी है कि आखिर संस्कृति  है क्या?
असल में देखें तो संस्कृति की कोई एक सर्वमान्य परिभाषा  नहीं  है। अलग अलग लोग अलग अलग अर्थों में संस्कृति की बात करते हैं। पुराने जमाने में कहीं इसको खेती-बाड़ी से जोड़कर समझाा जाता था, जिसके कारण ‘एग्रीक्लचर’ और ‘हार्टीक्लचर’ जैसे 'शब्द आज तक चल रहे हैं, तो कहीं इसको मनुष्य   के संस्कार और परिस्कार  के रुप में समझा जाता था। लेकिन जब आप सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के संदर्भ में संस्कृति को समझना चाहेंगे , तो आपको इसे आधुनिक अर्थों में देखना पड़ेगा और पूंजीवाद के विकास के संदर्भ में , औद्योगिक क्रान्ति के संदर्भ में, उपनिवेशवाद के संदर्भ में और पूंजीवाद की विरोधी विचारधाराओं के संदर्भ में समझना पड़ेगा। कहा जाता है कि आधुनिक अर्थों में संस्कृति की चर्चा पश्चिमी  देशों  में शुरु हुई और तब शुरु हुई ,जब समाज में पूंजीपति और सर्वहारा नाम के दो नये वर्ग पैदा हुए। पूंजीपति वर्ग के शासन से पहले समाज पर सामंती शासन था। सामंती शासकों का जीवन और रहन सहन जिस तरह का था ,पूंजीवादी शासकों का जीवन और रहन सहन उससे भिन्न था । सामंती शासक सभ्यता और संस्कृति के मामलों में खुद को पूंजीवादी शासकों से बहुत उंचा समझते थे , वे अपने साहित्य ,संगीत , कला वगैरह की लंबी परंपराओं पर गर्व करते हुए नये पूंजीपति वर्ग को नीची नजर से देखते थे, जिसके पास कोई ऐसी परंपराएं नहीं थी। इस तरह संस्कृति  का एक रुप तो यह हुआ, जिसे अंग्रेजी में ‘माडर्न कल्चर’ या ‘बुर्जुआ कल्चर’ कहते हैं।
अब सवाल उठता है जो दूसरा नया वर्ग बना -सर्वहारा उसके संदर्भ में क्या सोचा जाये ? उसके संदर्भ में यह है कि उसके पास तो साहित्य, संगीत , कला वगैरह के लिए फुर्सत का वक्त नहीं था। यहां तक कि शिक्षा भी मयसर नहीं थी। इसलिए वह घटिया चीजों से अपना मनोरंजन करता था। लेकिन वह समाज का बहुत ही बड़ा  वर्ग था और पूंजीपति वर्ग, जो हर चीज से मुनाफा कमाने की ताक में रहता है, यह ताड़ गया कि इस वर्ग के लिए घटिया और सस्ते  मनोरंजन की चीजों का उत्पादन किया जाए, तो वे चीजें खूब बिकेंगी। उधर नई टेक्नोलॉजी ने बड़े पैमाने पर ऐसी चीजों का उत्पादन संभव बना दिया था- प्रेस के जरिए ,रेडियो के जरिए, फिल्मों के जरिए और बाद में टेलीवीजन के जरिए। इससे वह चीज पैदा हुई , जिसे ‘मास कल्चर’ कहते हैं। ‘मास कल्चर’ में जो ‘मास’ शब्द है, उसके दो अर्थ होते हैं-एक तो ‘मासेज’ यानि आम जनता वाला, कि आम जनता के लिए सस्ते मनोरंजन की जो चीजें होती हैं, वे ‘ मास कल्चर’ हैं और दूसरा अर्थ ‘मास प्रोडक्सन ’ वाला, यानी वे चीजें बड़े भारी पैमाने पर पैदा की जाती हैं- जैसे एक अखबार, जिसे लाखों लोग पढ़ते हैं। या एक रेडियो-प्रोग्राम , जिसे लाखों लोग सुनते हैं। या एक फिल्म, जिसे लाखों लोग देखते हैं। इसकी तीसरा अर्थ यह भी हो सकता है कि ‘ मासेज’ यानी जनता की संस्कुति ‘ क्लासेज’ यानी शासक वर्गों की संस्कृति से अलग है और घटिया दरजे की है। लेकिन इन सभी अर्थों में संस्कृति का संबंध पूंजीवाद से है चाहे उसे आधुनिक संस्कृति कहा जाए या बुर्जुआ संस्कृति , ‘मास कल्चर’ कहा जाए या ‘क्लास कल्चर’ ।
मगर एक और बात देखने को मिलती है कि आधुनिक यानी पूंजीवादी युग में भी संस्कृति को केवल वर्गों के संदर्भ में नहीं देखा समझा जाता। उसे जगहों के संदर्भ में भी समझा जाता है- जैसे भारतीय संस्कृति, यूरोपीय संस्कृति। फिर उसे धर्मों या संप्रदायों के संदर्भ में भी देखा समझा जाता है- जैसे हिन्दू संस्कृति, मुस्लिम संस्कृति। मानवतावादी लोग इन सब कोटियों और विभाजनों से उपर की एक सार्वभौमिक मानवीय संस्कृति की बात करते हैं।
जो लोग संस्कृतिकर्मी भी हैं और वैज्ञानिक भी उनक सामने सवाल खड़ा होता है कि क्या विज्ञान संस्कृति का अंग नहीं है? देखने में आता है कि विज्ञान पर किसी भी देश  का ठप्पा नहीं लगा होता यह भारतीय विज्ञान है या पाकिस्तानी विज्ञान है, यह अमरीकी विज्ञान है या फ्रांसिसी विज्ञान है। विज्ञान की कोई नई खोज किसी भी देश  में हुई हो, कोई नया सिद्धान्त किसी भी देश  के वैज्ञानिक ने दिया हो , उसे सभी देशों  के वैज्ञानिक मान लेते हैं तो फिर संस्कृति को जगहों के संदर्भ में क्यों समझाा जाता है?
अगर हम देखें तो कहने को तो विज्ञान को भी जगहों से जोड़ा जाता है- जैसे भारतीय विज्ञान, यूरोपीय विज्ञान, पूर्वी विज्ञान या पश्चिमी  विज्ञान - लेकिन यह भी सही है कि विज्ञान के क्षेत्र में वास्तव में ऐसा विभाजन नहीं होता, जैसा संस्कृति के क्षेत्र में किया जाता है।संस्कृति के क्षेत्र में कुछ समय पहले यह  कहा गया कि हम एक संस्कुति को दूसरी संस्कृति के संदर्भ में ही समझ सकते हैं। ऐसा मानने वाले लोग संस्कृतियों में भेद करना जरुरी समझते हैं, जैसे हिन्दू संस्कृति और मुस्लिम संस्कृति, या पूरब की संस्कृति और पश्चिम  की संस्कृति। लेकिन यह बात बहुत अजीब सी लगने वाली है। इसपर विस्तार से चर्चा की आवष्यकता लगती है।

Friday, January 17, 2014

सांस्कृतिक साम्राज्यवाद

सांस्कृतिक साम्राज्यवाद
आज का  नव उदारवादी भूमंडलीकरण एक नए ढंग का साम्राज्यवाद है । पुराना साम्राज्यवाद अपने विस्तार और उपनिवेशों में अपने स्थायीत्व के लिए संस्कृति का इस्तेमाल तो करता था , लेकिन वह मुख्य रूप से आर्थिक तथा राजनीतिक साम्राज्यवाद ही होता था । हालाँकि पुरानी साम्राज्यवादी शक्तियां दुसरे देशों  में घुसने , उन पर कब्जा करने और लम्बे समय तक उन पर शासन करने के लिए संस्कृति को माध्यम बनाती थीं । फिर भी वे मुख्यतौर पर अपनी आर्थिक राजनितिक और सैनिक शक्ति पर निर्भर करती थीं । संस्कृति का इस्तेमाल वे अपनी संस्कृति को श्रेष्ठ या एकमात्र संस्कृति बताने के लिए , अपने उपनिवेशों को सांस्कृतिक दृष्टि से दरिद्र या पिछड़ा हुआ बताकर उन पर अपनी धाक  ज़माने के लिए , उन पर अपने शासन को उचित और आवश्यक ठहराने के लिये , उन्हें मानसिक रूप से अपना दास बनाने के लिए , उनके प्रतिरोध को समाप्त या कमजोर करने के लिए , उनकी विभिन्न संस्कृतियों के बीच कायम सहयोग और सौहार्द की जगह पारस्परिक विद्वेष पैदा करने के लिए तथा उन्हें आपस में लड़ा कर अपना उलू सीधा करने के लिए करती थीं । इन सब बातों को हम भारतीय ब्रिटिश  साम्राज्यवाद के अंतर्गत रहने के अपने अनुभव से अच्छी तरह जानते हैं । आज का साम्राज्यवाद भी संस्कृति का इस्तेमाल लगभग इसी तरह और प्रायः इन्हीं उदेश्यों के लिए करता है । फर्क यह है कि पहले का साम्राज्यवाद यह काम अपने उपनिवेशों में करता था , आज भूमंडलीय स्तर पर करता है ।
आज का  साम्राज्यवाद अमरीकी नेतृत्व में सारी दुनिया को तथाकथित विकसित और समृद्ध देशों का उपनिवेश बनाना चाहने वाला नया  साम्राज्यवाद  है । उसकी इस इच्छा और तदनुरूप अपनाई गयी रीति नीति को ही हम भूमंडलीकरण के रूप में क्रियान्वित होते देख रहे हैं । पुराने  साम्राज्यवाद के आर्थिक , राजनीतिक और सैनिक पक्ष उसके साँस्कृतिक पक्ष  से जयादा प्रमुख होते थे । लेकिन आज उसका संस्कृतिक पक्ष उनसे अधिक महत्वपूर्ण नहीं तो कम से कम उनके बराबर  का ही महत्व पूर्ण पक्ष बन गया है । आज की
साम्राज्यवादी शक्तियां अखिल भूमण्डल पर शासन करना तो चाहती हैं , लेकिन जानती हैं कि ऐसा कर पाने में वे केवल आर्थिक , राजनीतिक और सैनिक  वर्चस्व के बल पर समर्थ नहीं हो सकती ।  इसके लिए उन्हें स्वयं को दुनिया के लिए सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य बनाना होगा । यही कारण  है कि संस्कृति आज इतनी महत्वपूर्ण हो उठी है कि एक ओर सांस्कृतिक साम्राज्यवाद कायम करने की जी तोड़ कोशिशें की जा रही हैं, तो दूसरी ओर दुनिया भर में ऐसी कोशिशों का विरोध और प्रतिरोध किया जा रहा है ।

पुराने  साम्राज्यवाद और आज के  साम्राज्यवाद में एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण फर्क यह है कि प्रोद्योगिकी के अभूतपूर्व विकास ने --- सामरिक प्रद्योगिकी के विकास से भी अधिक सूचना और संचार की प्रद्योगिकी के विकास ने -- तथा उस प्रद्योगिकी पर  साम्राज्यवादी देशों के नियंत्रण ने दुनिया में एक ऐसी नयी परिस्थिति पैदा कर दी है कि संस्कृति स्वयं एक बहुत बड़ा भूमंडलीय उद्योग और व्यापार बन गयी है । प्रिंट मीडिया हों या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ,साहित्य हो या सिनेमा , ज्ञान और मनोरंजन के समस्त क्षेत्रों में सांस्कृतिक वर्चस्व की एक विश्व् व्यापी लड़ाई छिड़ गयी है । इस लड़ाई में "सब जायज है " और " सब चलता है " की नितांत अंधी और अनैतिक "नीति " के अधर पर सत्य को असत्य से , ज्ञान को अज्ञान से , सूचना को गलत सूचना से , प्रेम को घृणा से , मनुष्यता को बर्बरता से और संस्कृति को अपसंस्कृति से अपदस्थ किया जा रहा है । इस प्रकार संस्कृति  साम्राज्यवाद के आर्थिक राजनीतिक तथा सैनिक पक्षों के साथ बहुत गहराई से और बहुत व्यापक रूप में जुड़ गयी है ।
अतः सांस्कृतिक  साम्राज्यवाद आज की दुनिया में चिंता का एक बड़ा कारण तथा चिंतन का एक बड़ा विषय बन गया है । तथाकथित पहली दुनिया तथाकथित तीसरी दुनिया पर अपना सांस्कृतिक  साम्राज्य कायम के लिए ज्ञान ,विज्ञानं ,कला , साहित्य ,सूचना और मनोरंजन के समस्त साधनों तथा माध्यमों का इस्तेमाल अत्याधुनिक प्रोद्योगिकी के साथ कर रही है । लेकिन तीसरी दुनिया भी हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठी है । उसमें सांस्कृतिक  साम्राज्यवाद के विरुद्ध प्रयास किये जा रहे हैं । हम भी सांस्कृतिक  साम्राज्यवाद की चपेट में हैं , लेकिन हम भी उसके विरुद्ध संघर्ष कर रहे हैं । जाहिर है कि हमारे साधन सिमित हैं और इस दिशा में किये जाने  वाले सचेत एवं सगठित प्रयासों का अभाव है ।  इस आभाव की पूर्ती के लिए जरूरी है कि हम सांस्कृतिक  साम्राज्यवाद को समझें और इसके विरुद्ध जन चेतना जगाएं ।







Thursday, January 16, 2014

bahut andhara hai

अब तो चुप्पी को मिटाओ बहुत अँधेरा है ॥
आम से जन तक तो आओ बहुत अँधेरा है ॥
चमक उठेंगी आम की बत्तिया एक बार
दर्द का गीत तो  सुनाओ बहुत अँधेरा है ॥
गम की नगरी के दिन लड़ने वाले अब
रौशनी की बत्ती जलाओ बहुत अँधेरा है ॥
कई रात थी ऐसी कि सूझे न हाथ को हाथ
सबको साथ जोड़ते जाओ बहुत अँधेरा है ॥
आम नहीं तो क्या आप का आप तो हैं यारो
खुल करके मुस्कराओ बहुत अँधेरा है ॥
पापों का हिसाब मांगो उनसे खुलकर के
आप को रोजाना बताओ बहुत अँधेरा है ॥

Tanhayee se baten kee hain

हमने तन्हाई में सच्चाई से बातें की हैं ॥
अपनी सोयी हुई अच्छाई से बातें की हैं ॥
अपने भारत की बदलेगी दशा और दिशा
इसकी नयी सी परछाई से बातें की हैं ॥
उनके दर से खामोश हूँ लानत है मुझे
सपनों में उस आतमताई से बातें की हैं ॥
रंग बदल रहा अब ढंग बदल रहा यारो
तरूणों की इस अंगड़ाई से बातें की हैं ॥
खामोश रह कर बहुत सहा हमने यारो
अब नए ढंग की रूबाई से बातें की हैं ॥ 

Tuesday, January 14, 2014

बसंत पंचमी के मौके पर

बसंत पंचमी के मौके पर
एक किसान सर छोटू राम को याद करता है

एक बै हट कै आज्य छोटूराम किसान तनै आज बुलावै  सै ॥
सन चालीस का कमेरा तनै आज बी उतना ए तै चाहवै सै ॥
म्हणत लगन पक्का इरादा थारे मैं गुण पूरी मिकदार मैं
गढ़ी सांपला मैं पैदा होकै थमनै देखि गरीबी परिवार मैं
जिक्र हुया थारा संसार मैं छोटूराम किसे कानून बनावै सै ॥
धरती कुड़क ना होवै किसानी थामनै कानून इसा बनाया
गोड्यां ताहिं कर्जे मैं धँसरे थे थामनै आकै आजाद कराया
एक बै साँस उलगा सा आया वो खरना आज बी गुण गावै सै ॥
खूब जतन  करे हमनै ऊबड़ खाबड़ खेत संवारे फेर दखे
भाखड़ा डेम का बिजली पानी होगे वारे के न्यारे फेर दखे
दस तैं बीस मणे  गीहूँ म्हारे फेर दखे म्हणत रंग ल्यावै सै ॥
खाद बीज ले कर्जे पै म्हणत तैं खेत क्यार म्हारे लहलागे रै
फसल ले जिब मण्डी पहोंच्या भा  कति तले नै ये आगे रै
बहोत किसान फांसी खागे रै रणबीर नहीं झूठ बहकावे सै ॥

कैसे जांचें

कैसे जांचें
कैसे जांचें कि कौन अच्छा है क्या  सिस्टम खस्ता है ॥
सबकी अपनी अपनी ढपली विकास का वही रस्ता है ॥
जनता के बल पर ऊँचाई पाने वाले हरेक बादल को
मौसम रूख बदले तो फिर पानी पानी होना पड़ता है ॥
जनता का विश्वास बार बार टूटता है यहाँ पर फिर से
कमाल की बात है कि यह बार बार से देखो उठता है ॥
आंधी आती है बड़े बड़े पेड़ उखड़ जाते हैं यहाँ पे यारो
कई बार पत्ता भी हिलता है तो दिल कांपने लगता है ॥
मेरे अंदर एक मुखालिफ था जो मुझसे भी लड़ता था
अब या तो वह चुप ही रहता है या हाँ में हाँ करता है ॥
जनता ने इतिहास रचे हैं वो ये जानते हैं बखूबी ये
इसीलिए हमको वो बरगलाने का प्रपंच रचता है ॥

Monday, January 13, 2014

khli hath

रोज खली हाथ जब घर लौट कर जाता हूँ मैं
मुस्कुरा देते है बच्चे और मर जाता हूँ मैं
राजेश रेड्डी

जहाँ में कोई हमें प्यार के काबिल नहीं मिलता
कोई दिल से नहीं मिलता , किसी से दिल नहीं मिलता
दास चतुर्वेदी 

अच्छा हुआ

दूर तक फैला नहीं मोदी का धुआं अच्छा हुआ ॥
आज सिमट आई आप में आंधियां अच्छा हुआ ॥
रंग ले ही आई जनता की खुशियां अच्छा हुआ ॥
अब होंश में आने लगा सारा जहाँ अच्छा हुआ ॥
क्या कहर होता अगर वो आता लाल किले पे
झुक गया खुद ही जमीं पर आसमाँ अच्छा हुआ ॥
उतर चढाव देखे पिछले दस बरसों में हमने जो
जिंदगी गुजरी इन्ही के दरमियाँ अच्छा हुआ ॥
दिल कि बातें कहना इतना आसान नहीं होता
बोलने लगी हैं अब तो ख़ामोशियाँ अच्छा हुआ ॥
जनता की कहीं आँधी आई सबको ही झकझोरा
याद तो आया उनको हमारा मकाँ अच्छा हुआ ॥ 
सावधानी तो बरतेगी जनता कदम कदम पर
लिखेगी खुद ही ये अपनी दास्ताँ अच्छा हुआ ॥ 

आज का सच


आज का सच 
जनता आम आदमी शब्दों से वर्गों को जा रहा छिपाया ॥ 
पोस्ट मोडरेनिज्म का शब्द माडरन के बाद है आया ॥ 
कितना ही छिपा लो सच इतिहास गवाही दे रहा है 
कमेरे वर्ग ने ही संसार को हमेशा नया रास्ता दिखाया ॥ 
अब तो कमेरा वर्ग हाशिये पे मध्यम वर्ग ही आगे है 
कितना अच्छा हो गर कमेरा जाये अपने साथ बिठाया ॥ 
वर्ना यह लड़ाई मुकाम पे शायद ही पहुँच पाये यारो 
यदि गरीब किसान को इसकी धुरी नहीं गया बनाया ॥ 
शातिर है शासक बहुत यारो कम करके मत आंको 
वर्ग चेतना कुंठित करने का  फिर नया औजार चलाया ॥ 
ठीक है कमेरे के पास साधन नहीं उसकी टक्कर के 
फिर भी इतिहास गवाह हर अवरोध को तोड़ गिराया ॥ 
आप से जन तक का सफ़र कमेरा पूरा करेगा ही 
रणबीर सच यही देखो जाता कितना घुमाया फिराया ॥ 

Sunday, January 12, 2014

ummeed

आग अपने सीने में दबाये रखो यारो ॥
आप से आस तुम लगाये रखो यारो ॥
 जिससे कम हो जाये दुःख परिवार के
कुछ न कुछ धंधा तो चलाये रखो यारो ॥
आसान नहीं है अब पहुँचना उन तक
पर पहुँचने की जतन बनाये रखो यारो ॥
जनता असल में ही जाग रही है आज
इसलिए  इधर उधर फंसाये रखो यारो ॥
जुल्म की रात बेशक लम्बी कितनी
कटेगी आस की बत्ती जलाये रखो यारो ॥


baat pate kee

आप में बहुत कुछ छिपा है / जनता पर मयश्शर है कि वह क्या पाना चाहती है और क्या नहीं । उसी तरह से जनता को अपना एजेंडा आप के सामने रखना चाहिए ।

हरयाणा में भी  जनता को अपना चुनाव घो"षना पत्र बनाने की जरूरत है । हरयाणा के बुद्धिजीवीयों का फर्ज बनता है कि हरयाणा कि जनता के इस काम में वे जनता की मदद करें ।


परिवार हमारे समाज व्यवस्था की रीढ़ है । इसके जनतांत्रिक सवरूप को विकसित करना आवश्यक है यदि इसे यह रीढ़ बनाये रखना है तो । सहनशीलता, संवेदनशीलता कर्तव्य भावना आदि का होना बहुत जरूरी हो गया है । 

दिल के सौ सौ टुकड़े

कितनों ही के सर से साया जाता है
जब एक पीपल काट गिराया जाता है
धरती खुद भी खा जाती है फसलों को
चिड़ियों पर इल्जाम लगाया जाता है
प्यासों से हमदर्दी रक्खी जाती है
बादल अपने घर बरसाया जाता है
आज ही उसके दर पे डेरा डालोगे
पहले कुछ दिन आया जाया जाता है
आज शखसियत आवाजों के ताबे हो
बेमकसद भी शोर मचाया जाता है
झूठे सच्चे ख़्वाब ख़रीदे जाते हैं
पीढ़ी पीढ़ी कर्ज चुकाया जाता है
दिल के सौ सौ टुकड़े जब हो जाते हैं
तब थोडा -सा दर्द कमाया जाता है
'जफ़र' गोरखपुरी 

अच्छा दिखाई दे

देखें करीब से भी तो अच्छा दिखाई दे
एक आदमी तो शहर में ऐसा दिखाई दे
अब भीख मांगने के तरीके बदल गए
लाजिम नहीं कि हाथ में कासा दिखाई दे
नैज़े पे रखके और मेरा सर बुलंद कर
दुनिया को एक चिराग तो जलता दिखाई दे
दिल में तेरे ख्याल की बनती है एक धनक
सूरज सा आईने से गुजरता दिखाई दे
चल जिंदगी की जोत जगाये अजब नहीं
लाशों के दरमियाँ  कोई रस्ता दिखाई दे
हर शै मेरे बदन की 'जफ़र ' कत्ल हो चुकी
एक दर्द की किरण है कि जिन्दा दिखाई दे
"जफ़र गोरखपुरी "

fursat

फुर्सत मिले तो तुम कभी मेरे भी भीत्तर देखना
पथरों पर सिर पटकता एक समंदर देखना
धुप मिटटी खाद पानी ने जिसे धोखा दिया
सब्ज धरती पर तड़पता तुम वो बंजर देखना ----

aaj ka daur

आज का दौर
किनारे पर बैठे हुए क्या जानें तमाशाई
डूबकर के हम समझे दरिया की गहराई
निकल ए मेरे दोस्त ख्वाबों से बाहर को
दीवार से आंगन में अब धूप उतर आई
बादल की परछाई में मत गुम हो जाना
सच आज अपनी शक्ल है पहचान पाई
ये जुल्म भी देखे हैं तारीख दर तारीख
मगर हार कर  नहीं गर्दन कभी झुकाई
इतिहास याद है जुल्मों का हमको यारो
अब हिसाब मांगेगी जनता ली अंगड़ाई

Thursday, January 9, 2014

parivar

क्या ऐसे परिवार की कल्पना की जा सकती है जो अपने गठन, निर्माण और परिचालन में कहीं अधिक लोकतांत्रिक, समतावादी, रागात्मक और प्रेम भरा होगा, जिसमें स्त्री को मनुष्य का गरिमापूर्ण दर्जा मिलेगा और बच्चों के पालन-पोषण में अत्याचार, क्रूरता और इजारेदारी का हिस्सा खतम हो जाएगा। 

Tuesday, January 7, 2014

BAAT PATE KEE


बात पते की 
घनी तेजी न पकड़ै 
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जैसे ही मुख्यमंत्री बने, वैसे ही बिजली का बिल आधा कर दिया और जरूरतमंद परिवारों को 5 हजार लीटर पानी देने का वादा पूरा कर दिया। यही नहीं एक टीवी चैनल द्वारा स्टिंग ऑपरेशन के तुरंत बाद केजरीवाल ने घूसखोर अध‍िकारी को सस्पेंड कर दिया। अब तक केजरीवाल 800 से ज्यादा ट्रांसफर कर चुके हैं। लेकिन अब तक केजरीवाल सरकार में जितना काम हुआ है उससे कहीं ज्यादा उसका ढोल पीटा गया है। ढोल केजरीवाल नहीं बल्कि उनके साथी पीट रहे हैं। अगर राजनीति की भाषा में कहें तो आप की सरकार में काम कम और हर चीज का प्रोपोगैंडा ज्यादा हो रहा है। दिल्ली में आगे क्या करें, क्या नहीं, यह जानना है, तो हमारी सलाह केजरीवाल को है कि वो 

बात पते की 
जै केजरीवाल नै असल मैं कुछ करकै दिखाना सै तो एक कसूता आजमाया औड़ नुस्खा हाजिर सै 
भारत में इतिहास रचने वाले राजा विक्रमादित्य और जलाल-उद-दीन अकबर को पढ़ें। इन दोनों शासकों में एक समानता थी। दोनों ही दिन में दरबार में आम आदमी से दूरी बना कर निष्पक्ष होकर निर्णय लेते थे और रात को वेश बदल कर आम आदमी के घर जाकर रोटी खाते थे और उनकी समस्याएं सुनते थे।

बात पते की
जिस समाज में कुछ वर्गों के लोग जो चाहें वह सब कुछ कर सकें और बाकी वह सब भी न कर सकें जो उन्हें करना चाहिए , उस समाज के अपने गुण होते होंगे , लेकिन उनमें स्व्तंत्रता  शामिल नहीं होगी । अगर इंसानों के अनुरूप जीने की सुविधा कुछ लोगों तक ही सिमित है , तब जिस सुविधा को आमतौर पर स्वतंत्रता कहा जाता है , उसे विशेषाधिकार कहना उचित है ।
डॉ भीम राव आंबेडकर 

SAFDAR HASHMI




dalit mukti sangram





दलित वर्ग के सन्दर्भ में मुक्ति संग्राम दो शक्तियों के विरुद्ध है । ये शक्तियां हैं --ब्राह्मणवादी और पूंजीवादी । आंबेडकर ने कहा था कि इस देश में मजदूर वर्ग के दो शत्रु हैं -- ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद । उनके आलोचक, जिसमें समाजवादी मुख्य रूप से थे , ब्राह्मणों को मजदूरों के रूप में  समझने में असफल हो गए थे \
यदि उनहोंने इस शत्रु को समझ लिया होता तो उनकी जंग कमजोर नहीं पड़ती और मजदूर एकता कभी की हो गयी होती । आंबेडकर ने कहा था कि ब्राह्मणवाद ब्राह्मण समुदाय के विशेषधिकारों या उनकी सत्ता का नाम नहीं है बल्कि इसका अर्थ स्वतन्त्रता , समानता और भ्रातृत्व की भावना को नकारना है । और इस अर्थ में उन्होंने कहा कि यह सभी वर्गों में मौजूद है और यहाँ तक कि मजदूर वर्ग में भी ब्राह्मणवाद मौजूद है । उनहोंने कहा कि यह बड़ा शत्रु है जिसने आर्थिक अवसरों के क्षेत्र को प्रभावित किया है 

Monday, January 6, 2014

AAP KO AAM ADAMI KI REQUEST

AAP KO AAM ADAMI KI REQUEST
"Our callous attitude leading to wastage of precious resources , especially food materials, is proverbial. It is reported that India , the world's second largest producer of fruits and vegitables, throws away fresh produce worth 1,3000 crore every year because of the country's inadequade number of cold storage facilities and refrigerated transport".(The New Indian Express , 2 December 2013) This also shows how far the country has to go as regards development of adequate infrastructure . This situation has to change. We can change and build an India efficient and strong in all respects provided we all work together with optimism, pride and dtermination. Let us take a vow to do so as the New Year downs.! It is an appeal to you all(Aap) by Aam.

With pretext of New year

With pretext of New year
The year 2013 , marked by a lot of happenings --pleasant and unpleasant , good and bad, inspiring as well as depressing--is giving place to a brand new year. Let us hope that it begins on a positive and cheerful note. Let the year be a healthy and prosperous one!
The passing away at the age of 95  of Nelson Mandela , the towering South African leader and an iconic world statesman , was mourned deeply across the world.
"At least four things are vital to reboot India.
The first is environment. We need to mind climate change , clean up soil, water and revive forests. Everything else will be irrelevent .
The second is human development. The quality and quantity of education in the country is woeful. 26 percent of Indians are still illiterate. The government record of public health is equally abysmal. Health expenditure is $ 43 per capita compared to $ 87 in Sri Lanka. Just 2% of the GDP.
The third is infrastructure. There is no hope of sustained economic growth, human development and good governance. A country with such a terrible public transport, energy supply ,sewage system and electronic communication cannot deliver a descent life.
 Finally , there is weak Indian State. A strong state is one that has decision making, implementation, regulatory and adjudicatory and enforcement capacity," says Reimagining India ' report published by Mc Kinsey ,(Times of India, 14, December 2013)

Monday, December 23, 2013

स्वास्थ्य की संकल्पना

स्वास्थ्य की संकल्पना
अब समझ में आया होगा कि स्वास्थ्य का मतलब केवल बीमारी न होना ही नहीं है । स्वास्थ्य की परिभाषा ,"बीमारी का इलाज करना ही स्वस्थ होना है " इस संकुचित विचार से भी परे है । दूसरे शब्दों में कहा जाये तो केवल डाक्टरों द्वारा दी गयी दवाईयां लेकर ही हम स्वस्थ नहीं हो सकते । व्यापक परिप्रेक्ष्य में स्वास्थ्य को " केवल बीमारी का न होना ही नहीं बल्कि एक संम्पूर्ण शारीरिक , मानसिक , सामाजिक , और अध्यात्मिक तंदरूस्ती " के रूप में परिभाषित किया जाता है ।  सही मायने में "स्वास्थ्य " पाना है तो स्वास्थ्य के इन घटकों का पूर्ण विकास करना और उसका संतुलन बनाये रखना चाहिए ।
         यह सभी तत्व हर समय बहुविध कारणों से प्रभावित रहते हैं ।  इसलिए स्वास्थ्य भी एक परिवर्त्तनात्मक  संकल्पना है जो हर पल बदलती रहती है । हर समय हमारा स्वास्थ्य भी निरंतर बनता बिगड़ता रहता है ।
      स्वास्थ्य को पृथकतः कार्यान्वित नहीं किया जा सकता ।  स्वास्थ्य को शिक्षा , सामाजिक , आर्थिक , सांस्कृतिक , पर्यावरण , कृषि ,परिवहन , ग्रामीण और शहरी विकास तथा ऐसे अनेक घटकों से जोड़ा जाना चाहिए ।  वस्तुतः सभी क्षेत्र स्वास्थ्य विकास से जुड़े हुए हैं । ऐसा कोई भी विकासात्मक घटक नहीं है जो स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ न हो ।  इस  संदर्भ में , स्वास्थ्य को " सामाजिक -आर्थिक  विकास के उदेश्य के रूप में ही नहीं बल्कि माध्यम के रूप में भी " देखा जाता है । इसलिए व्यक्तिगत और समुदाय के स्तर पर , स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहने से समुदाय के जीवन स्तर में अप्रतयक्ष वृद्धि  होती है ।
        बीमारी की रोकथाम और स्वास्थ्य को बढ़ावा देने से संबंधित विज्ञानं के सिद्धांत और कार्यान्वयन को हम स्वास्थ्य की इस मूल संकल्पना के कारन अच्छी तरह समझ सकते हैं । यह विज्ञानं आज रोकथाम और  सामाजिक स्वास्थ्य , समुदाय का स्वास्थ्य या सार्वजानिक स्वास्थ्य के रूप में अभिव्यक्त किया जाता है  

सार्वजानिक स्वास्थ्य का परिचय

सार्वजानिक स्वास्थ्य का परिचय
"मनुष्य अपनी शुरुआत की आधी जिंदगी में "दौलत " कमाने के लिए "स्वास्थ्य " खर्च करता है ;परन्तु बाद की आधी जिंदगी में अपना स्वास्थ्य दोबारा पाने हेतु अपनी सारी दौलत खर्च करता है "।
मनुष्य प्राणी का यह तात्विक विचार इस बात पर जोर देता है कि स्वास्थ्य , अर्थपूर्ण जीवन बसर करने का एक महत्वपूर्ण घटक है । यह भी एक सामान्य अनुभव है कि जब भी हमारा स्वास्थ्य बिगड़ता है तब व्यक्तिगत स्तर पर , हमारा दैनदिन कार्य और जीवन प्रभावित होता है ।
महामारी के दौरान बड़ी संख्या में लोग बीमार पद सकते हैं , अतः पूरे जनसमूह का या समुदाय का जीवन स्तर , बड़े पैमाने पर घाट सकता है । उसी तरह , अस्वस्थ्य या बीमारी का बारम्बार सामना करने से भी समुदाय या जनसमूह का जीवन स्तर बड़े पैमाने पर घाट सकता है । गरीबी , भीड़ , सवच्छ पेयजल की कमी , उचित स्वछता का अभाव , निजी स्वस्छता के प्रति लापरवाही आदि इसके कारण  हो सकते हैं । यह बातें शायद व्यक्ति के नियंत्रण से परे हों परन्तु संगठित प्रयास और वैज्ञानिक तकनीक के उपयोग के जरिये हम बड़े पैमाने पर कम कर सकते हैं । इसलिए वैज्ञानिक अर्थ में स्वास्थ्य की संकल्पना को समझना  अत्यावश्यक है । 

बिजली का हक़

बिजली का हक़ 
१. बिजली महंगी करके किसानों , गरीबों और आम जनता से बिजली छीनना बंद किया जाये । किसानों को रियायती बिजली और गरीबों को एक बती सुविधा देनी होंगी । 
२. विद्युत् मंडल के साथ खिलवाड़ नहीं किया जाये । सबको बिजली पहुँचाने व् देने का काम सरकार का काम है जिसे सर कार   पूरा करे । 
३. बिजली का निजीकरण धोखा है । इसको बंद किया जाये । 
४. ठेकेदारी सिस्टम तुरंत से बंद किया जाये । 
५. कर्मचारिओं को काम की जिम्मेवारी सुनिश्चित की जाये । 

खेती और किसान की रक्षा

खेती और किसान की रक्षा 
१. खेती की उपज को विदेशों से मंगवाना बंद करो 
२. किसानों को उपज का सही दाम देना ही होगा । 
३. खाद , बीज , दवाई , पानी , बिजली के दाम कम किये जाएँ । 
४. खेती में विदेशी कम्पनियों की घुसपैठ हम बर्दाश्त नहीं करेंगे । 
५. किसानों का कर्जा माफ़ करना होगा । किसान के कर्ज पर 
चक्रविर्धि ब्याज लेना गलत है । 
जब तक बड़े बड़े सेठों और पूंजीपतियों से अरबों रुपये के कर्जों
 की वसूली नहीं होती , 
सरकार को किसानों और गरीबों से कर्जे वसूली करने 
का कोई हक़ नहीं है । 
६. खेती की जमीन बांधों और कारखानों के लिए छींनना बंद करो । 

विदेशी गुलामी का विरोध

विदेशी गुलामी का विरोध 
१. भारत के लोग वैश्वीकरण , उदारीकरण और निजीकरण की नीति को नामंजूर करते हैं 
२. हम देश को फिर से विदेशियों का गुलाम नहीं बनने देंगे । 
३. हम मांग करते हैं कि भारत ,विश्व व्यापार संगठन से बाहर आये और देश के किसानों , मजदूरों , मछुआरों , कारीगरों , छोटे उद्योगों को बचाया जाये । 
४. हम देश में विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक की घुसपैठ का विरोध करते हैं । 
५. हम देश के जंगलों में विश्व बैंक की घुसपैठ का विरोध करते हैं 
६. हम मधयप्रदेश की तरह देश में अंध विश्वास के खिलाफ कानून की मांग करते हैं । 

BHAWANI PARSHAD MISHRA


साधारणतया  मौन अच्छा है 
          किन्तु मनन के लिए 
जब शोर हो चारों ओर 
           सत्य के हनन के लिए 
तब तुम्हें अपनी बात 
            ज्वलन्त शब्दों में कहनी चाहिए 
सिर कटाना पड़े या न पड़े 
            तैयारी तो उसकी होनी चाहिए 

*भवानी प्रसाद मिश्र *

Sunday, December 22, 2013

आज का खिलाड़ी


आज का खिलाड़ी
कार्पोरेट सेक्टर ही आज के दिन हिंदुस्तान का सबसे बड़ा खिलाड़ी है । केजरीवाल की आप उसकी एक बाजू है और बी जे पी दूसरी बाजू । कौनसी बाजू से कौनसा काम लिया जाता  है वह अब शीघ्र ही सामने आने वाला है 

Saturday, December 21, 2013

santras hai

जिस तरफ डालो नजर सैलाब का संत्रास है
बाढ़ में डूबे शजर हैं नीलगूँ आकाश है
सामने की झाड़ियों से जो उलझ कर रह गई
वह किसी डूबे हुए इंसान की इक लाश है
साँप लिपटे हैं बबूलों की कटीली शाख से
सिरफिरों को जिंदगी में किस कदर विश्वास है
कितनी वहशतनाक है सरजू की पाकीजा कछार
मीटरों लहरें उछलतीं हश्र का आभास है
आम चर्चा है बशर ने दी है कुदरत को शिकस्त
कूवते इंसानियत का राज इस जा फाश है.
sarokarnama  से साभार .

BHUKH

भूख वो मुद्दा है जिसकी चोट के मारे हुए
कितने युसुफ बेकफन अल्लाह के प्यारे हुए
हुस्न की मासुमियत की जद में रोटी आ गई
चांदनी की छांव में भी फूल अंगारे हुए
मां की ममता बाप की शफ्कत गरानी खा गई
इसके चलते दो दिलों के बीच बंटवारे हुए
बाहरी रिश्तों में अब वो प्यार की खुशबू नहीं
तल्खियों से जिन्दगी के हाशिए खारे हुए
जीस्त का हासिल यही हक के लिए लड़ते रहो
खुदकुशी मंजिल नहीं ऐ जीस्त से हारे हुए

अदम गोंडवी की एक और गजल

अदम गोंडवी की एक और गजल
जितने हरामखोर थे कुर्बो-ज्वार में
परधान बन के आ गए अगली कतार में
दीवार फाँदने में यूं जिनका रिकार्ड था
वे चौधरी बनें हैं उमर के उतार में
फौरन खजूर  छाप के परवान चढ़ गई
जो भी जमीन के पट्टे में जो दे रहे आप
यो रोटी का टुकड़ा है मियादी बुखार में
जब दस मिनट की पूजा में घंटों गुजार दैं
समझों कोई गरीब फंसा है शिकार में

ADAM GONDAVEE--SAU MEIN SE SATAR

सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है
दिल पे रख के हाथ कहिए देश क्या आजाद है
कोठियों से मुल्क के मेआर को मत आंकिए
असली हिन्दुस्तान तो फुटपाथ पे आबाद है
जिस शहर में मुंतजिम अंधे हो जल्वागाह के
उस शहर में रोशनी की बात बेबुनियाद है
ये नई पीढ़ी पे मबनी है वहीं जज्मेंट दे
फल्सफा गांधी का मौजूं है कि नक्सलवाद है
यह गजल मरहूम मंटों की नजर है, दोस्तों
जिसके अफसाने में ‘ठंडे गोश्त’ की रुदाद है

ADAM GONDAVEE


अदम गोंडवी की एक गजल 
वेद में जिनका हवाला हाशिये पर भी नहीं
वे अभागों आस्था, विश्वास लेकर क्या करें
लोकरंजन हो जहां शम्बूक- वध की आड़ में
उस व्यवस्था का घृणित इतिहास लेकर क्या करें
गर्म रोटी की महक पागल बना देती मुझे
पारलौकिक प्यार का मधुमास लेकर क्या करें
देखने को दें उन्हें अल्लाह कम्प्यूटर की आंख
सोचने को कोई बाबा बाल्टी वाला रहे
एक जनसेवक को दुनियों में ‘अदम’ क्या चाहिए
चार छह चमचे रहें, माइक रहे, माला रहे

Thursday, December 19, 2013

BITTER TRUTH

कडुआ सच 
मेरे दादा जी की शादी मेरी दादी से कर दी गयी 
उनकी कोई देखा दाखि नहीं थी बस पडदादा गए 
शादी पक्की करके ही लोटे थे और एक दिन सात
फेरे दिवा दिए और घर बस गया २० प्रतिशत भी 
हमारे दादा दादी की रुचियाँ एक जैसी नहीं थी 
बहुत  बार लड़ते देखा उनको प्यार की बातें तो 
करते कभी नहीं देखा डांट मारते थे हमपर दोनों 
मेरे माता पिता की शादी भी मेरे गाँव के दो लोग 
दादा के साथ गए और हाँ करके ही लोटे वे  लोग 
माता पिता भी गाँव के बाहर नौकरी पर शहरों में 
रहे मेरी माँ घाघरा पहनकर  होशियार पुर गयी
टेशन पर पुलिश वाले को शक हुआ की मेरा पिता 
किसी गाँव की लड़की को भगा कर लेजा रहा है 
बताया तो समझा वह मगर माँ ने एकदम सलवार 
पहन ली और घाघरे को हमेशा हमेशा के लिए भूली 
उनके प्यार के कारण हम सात भाई बहन पैदा हुए 
चार बहनें और एक भाई जिन्दा है एक भाई और  
एक बहन चल बसे मैं सबसे छोटा घर में  फिर मेरी
शादी हुई लड़की देखी खतों किताबत की और शादी
 हो गयी `````````````````````
मेरे माँ बाप के प्यार के कारण मैं पैदा हुआ इसमें 
मेरी कोई भूमिका नहीं थी मगर पैदा होने के बाद 
क्या मैं वही सब करूँ जो मेरे माँ बाप कहते हैं या 
मेरा भी कोई अलग वजूद है यही है मेरा सवाल आज 
६४  साल की उमर में ```````````````````````` !
मेरे बेटे और पुत्र वधु की अपनी कोई हैसियत है भी 
नहीं या वो प्रोटो कोपी की तरह हमारा अनुशरण करेँ 
अपनी इच्छाओं का गला घोंटकर!
या हमें खुस होना चाहिए अपने उनके अस्तित्व के 
विकास पर ! यदि हाँ तो फिर आज प्यार पर इतनी 
मारा मारी क्यों ?
आज   की जरूरत हम  नहीं जानते 
अपनी शकल को भी नहीं पहचानते 
मशीन  बन गया है आज   इंसान 
इस सचाई को भी नहीं मानते
 
रणबीर 


KYA THEEK

क्या ठीक है कया गलत है कौन समझाए 
क्या  करें  क्या ना करें ये कौन बतलाये 
सही काम करके ही जीना चाहता हूँ मैं 
कहीं भी सही काम तो नहीं पाता  हूँ मैं 
सर पकड़ कर एक तरफ बैठ जाता हूँ मैं 
सोचता हूँ कोई आकर मुझे उठाये---------
काले काम काले धंधे बुला रहे हैं 
इनमे कई लोग बेंतहा कमा  रहे हैं 
मुझे भी यही रास्ता दिखा रहे हैं 
डर लगता   है मुझको  कोई ढाढस बंधवाये ------
मेरे जैसे बहुत काले अंधेरो में खो गए 
गलत रहो के आदि बहुत साथी हो गए 
परिवार भी बस दो चार बार रो गए 
बिना काले के हमारा पेट कैसे भर पाए -----

Wednesday, December 18, 2013

MAHARI PARAMPARA

पहले ज़माने में शादी से पहले लड़का देखने के लिए और सगाई के लिए नाई जाता  था | वह जो फिनाल कर देता था वाह पत्थर की लकीर  थी | यह महान परंपरा थी हमारी | तीन तीन दिन की बारात होती थी | गाँव में बारात चार पाँच जगह रूकती थी | शादी वाले के घर के आलावा कई दूसरे परिवार एक एक रोटी बारात की करते थे | सो सवा सौ बाराती जाते थे |घडी सइकिल और बहुत सा दहेज़ देने का रिवाज था | कई कई साल बीत जाते थे पति को पत्नी का मुंह देखे हुए |चढ़ी रात आना और मुंह अंधेरे चले जाना यही रिवाज था हमारा, यही परंपरा थी हमारी |पहले नानी का गोत्र भी छोड़ते थे साथ  ही दादी का गोत्र तो छोड़ते ही थे |और भी बहुत सारी परंपरा गिनवाई जा सकती हैं  शादियों के सम्बन्ध में जो निभाई जाती रही हैं |  गाँव फलां  के खेड़े के गोत  की दूसरे गाँव की उसी गोत की लड़की उस फलां  गाँव के दूसरे गोत के लडके से शादी नहीं कर सकती जबकि फलां  गाँव के खेड़े के गोत का लड़का दूसरे गाँव की अपने गाँव के दूसरे गोत से सम्बन्ध रखने वाली से शादी कर सकता है | इसे अंग्रेजी में मजोर्टीजम  की ताकत कहते हैं |कितनी महान परंपरा थी हमारी | खेड़े के गोत का बोलबाला था |इसमें तो जीन का मामला भी नहीं था |  | मगर समचाना ने खेड़े के गोत की परंपरा को बहुत पहले धत्ता बता दिया था |कब ? शायद किसी को मालूम नहीं | आगली और पाछालियाँ  की तील ३०-३० या ४० -४० बहु को ससुराल वालों की ले जानी होती थी| एक पंचायत १९११ में बरोना में हुई जिसका मुद्दा था गामाँ   आल्यां  की शिक्षा का |और भी कई मुद्दे रहे होंगे जिनका मनै  घना सा बेरा कोन्या | फेर एक पंचायत और सिसाना गाँव मैं सन ६० के आले दवाले हुई और इसने हमारी सारी परम्पराओं को तार तार कर दिया | तीन दिन का ब्याह डेढ़ दिन का कर दिया | बारातियों की संख्या पांच और एक रुपये की  सगाई से लेकर विदाई तक के सारे वाने एक रुपये के  कर दिए | बहोते भुंडा काम करया इस पंचायत नै | शायद नानी का गोत ना छोडन की बात भी इसे पंचायत मैं हुई हो!फेर गरीब लोगों को इससे बहोत राहत मिली थी हालाँकि बहुत सी परम्पराएँ धाराशाई  हो गयी थी या कर दी गयी थी |आज फेर ५०-६० साल के बाद एक संकट आया सै शादी के मामलों पर | बहुत से सवाल उठे रहे हैं।  देखो क्या होता है ?
   

अमीरों का भगवान

अमीरों का भगवान 
दीन  धरम अर पुन कर्म यु देख लिया भगवान॥ 
एक भगवान दुनिया कहवै मैं कहता दो भगवान॥ 
साचा मानस नौकरी मैं दो दिन ना टिक पावै 
होज्या साहब नाराज काम मैं कई खोट बतावै 
करदे रिपोर्ट ख़राब चौबीस घंटे का नोटिस पावै  
उलटी मिली ना नौकरी जय सच ना छोड़ी जावै
मजबूरी मैं खड्या लखावै नीचे लीले असमान ||
बालक पालण खातिर दर दर ठोकर खानी पड़जयां
सत्य वफ़ा तप सब धरनी एक ठिकाणी पड़जयां
साच पै अड़या रहै तै रेल तले नाड़ धिकानी पड़जयां 
साचे मानस नै साच की कीमत घनी चुकानी  पड़जयां
साच की उठाई अर्थी इसका होवै बहोत घना अपमान ||
माट्टी गेल्याँ होज्या माट्टी फेर पसीना खूब बहावै  
ठेठ पोह के मिहने मैं भी वो खेत मैं पानी ल्यावै
काली नागन बंधे उप्पर या पड़ी पड़ी फ़न ठावै 
मेहनत करकै छिक्ले फल फेर भी नहीं थ्यावै 
तेरा राम जी क्यूं तेरी गेल्याँ पड़रया सोचै नै किसान ||  
चोर ज़ार लुटेरों की यो म्हारा राम करै रखवाली
पग पग उप्पर झूठ रचावै करै छेक खावै जिस थाली 
घाट ये तोलें टैक्स  बचावैं करैं कार घनी कुढाली  
राम की आड लेके नै इन्ने घनी ए  लूट मचाली  
करीं छल रात दिन तान कै राम नाम की छान||
 
 
 

beer's shared items

Will fail Fighting and not surrendering

I will rather die standing up, than live life on my knees:

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