हरद्वारी लाल का जन्म 1910 में तब रोहतक और अब झज्जर जिले के छारा गाँव के एक साधारण किसान परिवार में हुआ था।
हरद्वारी लाल ने दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफन कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और 1934 में पंजाब सिविल सेवा में शामिल हुए। उन्होंने थानेसर में तहसीलदार और मजिस्ट्रेट जैसे पदों पर कार्य किया, लेकिन प्रशासन की कार्यप्रणाली से मोहभंग होने के कारण अक्टूबर 1951 में इस्तीफा दे दिया। राजनीति में उनका प्रवेश 1952 में सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर भिवानी से चुनाव लड़कर हुआ, हालांकि वे उस समय हार गए थे।
उस समय पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों के साथ उनके मतभेदों ने काफी सुर्खियां बटोरीं। मुख्यमंत्री बंसी लाल की उन्होंने तीखी आलोचना की और उनके विरुद्ध "ए मैड चीफ मिनिस्टर" (A Mad Chief Minister) नामक पुस्तिका लिखी। भजन लाल के खिलाफ भी उन्होंने "भजन लाल: हरियाणा एंड एरिया ऑफ डार्कनेस" जैसी बेबाक पुस्तक लिखी। चौधरी देवीलाल के साथ भी उनके उतार-चढ़ाव भरे राजनीतिक संबंध रहे।
5 बार विधायक बने हरद्वारी लाल
हरद्वारी लाल ने अपना पहला विधानसभा चुनाव 1952 में भिवानी निर्वाचन क्षेत्र से सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर लड़ा था, लेकिन इसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
वे पहली बार 1962 में बहादुरगढ़ विधानसभा क्षेत्र से एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित हुए। उन्होंने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया और फिर से 1965 में बहादुरगढ़ सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।
हरियाणा राज्य बनने के बाद हुए 1967 के पहले आम चुनाव में उन्होंने फिर से बहादुरगढ़ से कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की।
1972 के चुनाव में उन्होंने बहादुरगढ़ क्षेत्र से एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। आंकड़ों के अनुसार, उन्होंने 13,331 मत प्राप्त किए और अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी, कांग्रेस के राम चंद्र (जिन्हें 11,532 मत मिले) को हराया।
8 जनवरी 1975 को हरद्वारी लाल को हरियाणा विधानसभा द्वारा सदन की अवमानना के आरोप में निष्कासित (Expelled) कर दिया गया था। उन्होंने इस निर्णय को अदालत में चुनौती दी और ऐतिहासिक कानूनी जीत हासिल की।
आपातकाल की प्रताड़ना और जेल से छूटने के बाद 1977 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने एक बार फिर स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में बादली सीट से जीत दर्ज की।
पहली बार 1977 में बादली हलका बनकर तैयार हुआ और यहां पर चुनाव लड़ने के लिए बतौर आजाद उम्मीदवार हरद्वारी लाल उतरे। इससे पहले हरद्वारी लाल बहादुरगढ से चुनाव लगातार लड़ते आ रहे थे। जैसे ही बादली विधानसभा बनी और उनका पैतृक गांव छारा भी इसमें जोड़ा गया तो उन्होंने मन बना लिया कि यहीं से चुनाव लड़ेंगे। तब लोगों ने उन्हें चुनाव में उतरने से मना कर दिया। लेकिन उन्होंनेे बच्चे की तरह जिद पकड़ ली कि वे इसी सीट से चुनाव लड़ेंगे। चुनाव से पहले वे गांव छारा के ही जोहड़ में कूद गए और बोले कि जब तक गांव वाले वोट देने का वादा नहीं करेंगे वे बाहर नहीं आएंगे।
जाेहड़ में उतरने का असर ये हुआ कि वर्ष 1977 के विधानसभा चुनाव में उन्हें बादली हलके के लोगों ने सहयोग दिया। बादली से ही उदय सिंह दलाल उनके सामने जनता पार्टी से मात्र 387 वोटों से हार गए।
हालांकि उसी वर्ष (1977) उन्होंने महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक के कुलपति का पद संभालने के लिए विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था।
1984 के लोकसभा चुनाव में हरद्वारी लाल ने हरियाणा की रोहतक लोकसभा सीट से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) के प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा। इस चुनाव में उन्हें 2,16,294 मत प्राप्त हुए और उन्होंने लोक दल (LKD) के प्रत्याशी स्वरूप सिंह को 30,931 मतों के अंतर से पराजित किया। स्वरूप सिंह को 1,85,363 मत मिले थे। इस प्रकार हरद्वारी लाल ने पहली बार रोहतक लोकसभा सीट से विजय प्राप्त की।
1989 के लोकसभा चुनाव में हरद्वारी लाल ने एक बार फिर रोहतक लोकसभा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा। इस बार उन्हें 2,01,238 मत प्राप्त हुए, लेकिन जनता दल के उम्मीदवार चौधरी देवी लाल ने 3,90,243 मत हासिल कर उन्हें 1,89,005 मतों के बड़े अंतर से पराजित कर दिया।
1991 में हरद्वारी लाल ने अपने राजनीतिक जीवन का अंतिम विधानसभा चुनाव लड़ा। इस चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, जिसके बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया।

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