Friday, May 1, 2026

1मई, 2020 (पुरानी पोस्ट

1मई, 2020 (पुरानी पोस्ट)

                     आज मजदूर दिवस है, सभी दोस्तों को मजदूर दिवस की बधाई! और हमें यह ध्यान रखना है देश का 80 फ़ी सदी तबका मजदूर है, क्योंकि खेती करने वाली आबादी बेशक किसान कहलाती है लेकिन करते तो ताउम्र मजदूरी ही हैं! जो व्यक्ति/संस्था मजदूर-किसान का नहीं, वो हिंदुस्तान का नहीं!

                     लेकिन दक्षिण हरियाणा, विशेष तौर से चरखी दादरी, बाढ़ड़ा, लोहारु, महेंद्रगढ़, नारनौल, तोशाम, भिवानी, जींद आदि क्षेत्रों के लिए इस दिन का महत्व मजदूर दिवस के अलावा भी है!

     प्रथम मई,1911 को माननीय चौधरी निहाल सिंह तक्षक जी का जन्म हुआ था! चौधरी साहब ने 1936 में रामजस कॉलेज दिल्ली से विश्व विद्यालय में 2nd position लेते हुए अपनी ग्रेजुएशन पूरी की थी; एक असाधारण उपलब्धि! उस समय चरखी दादरी जिला होता था तथा इसमें 184 गांव थे, लेकिन नवाबी राज होने के कारण शिक्षा के लिए कोई प्रबंध नहीं थे! पूरे जिले में मात्र 3 मिडिल स्कूल व एक हाई स्कूल था! चौधरी साहब ने 1 अक्टूबर 1936 को बिरला एजुकेशन ट्रस्ट पिलानी में बतौर निदेशक (तत्कालीन इंस्पेक्टर) पदभार ग्रहण किया! उस समय इस ट्रस्ट के आधीन 17 पाठशालाएं कार्यरत थी और सभी राजस्थान में थी!
           चौधरी साहब ने इस क्षेत्र को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया,  दिसंबर 6,1936 को इमलोटा में पहला स्कूल शुरू किया तथा 31 दिसंबर 1946 तक के अपने कार्यकाल में 311 स्कूल खोले ! जनवरी 1947 को जींद रियासत की पहली पॉपुलर सरकार में वे शिक्षा एवम स्वास्थ्य विभाग के मंत्री बने, इस दौरान 50 नये स्कूल खोले !

        देश की आजादी के बाद वे हमारे पहले शिक्षा एवं स्वास्थ्य मंत्री बने, इस दौरान दौरान 150 नये स्कूल खोले तथा स्वयं के द्वारा स्थापित सभी बिरला स्कूलों का सरकारीकरण किया, उनमें कार्यरत सभी कर्मचारियों को पिछली सेवा सहित सरकारी सेवा में लिया! उस समय स्कूल भवन के लिये ग्रामीणों के पास धन का अभाव था, चौधरी साहब स्वयं ग्रामीणों को लेकर पूले (झुण्डे) कटवाकर छप्पर डलवाते तथा उसी में स्कूल शुरू कर देते थे ! फिर शिक्षा अभाव के कारण अध्यापक नहीं मिलते थे फिर कम पढ़े लिखे नौजवानों को नियुक्त करके उन्हें भी पढ़ाकर अध्यापक बनाते थे! लोगों में पढ़ने के प्रति रुझान बनाने के लिए उनसे door to door संपर्क करते थे! तथाकथित निम्न जाति के अध्यापक से ऊंची जाति के अभिभावक अपने बच्चों को नहीं पढ़ाते थे, फिर चौधरी साहब उन्हे मनाते थे !अध्यापक को 8 रुपये महीना मिलता था बाद में 17 रुपये कर दिया था!ठीक पढ़े लिखे अध्यापक ज्यादा वेतन की मांग करते थे, तो वे स्वयं बोरी लेकर गांव से अन्न इकठ्ठा करके, उसे बेचकर उन अध्यापकों को अतिरिक्त देते थे 1 प्रत्येक स्कूल की monitoring करना बड़ा ही दुष्कर कार्य था 1 सड़कें नहीं थी तो यातायात के साधन भी नहीं थे 1 चौधरी साहब ऊंट पर चलते हुए एक स्कूल से दूसरे स्कूल जाते थे, उन्होने कभी भी जेठ की लू, सावन की बरसात व माघ, पौ की सर्दी की परवाह नहीं की!

        एक ही जूनून था कि हर गांव को शिक्षित करना और उन्होंने अपने मिशन में सफलता भी  पाई!  

      सन् 1941 में में महान आर्य समाजी स्वामी स्वतंत्रतानंद जी लोहारु में आर्य समाज की स्थापना करने के लिए आये तो नवाब ने उन पर आक्रमण करा दिया तथा स्वामी जी को लहू लुहान हालात में दिल्ली के अस्पताल में भर्ती कराया गया! चौधरी निहाल सिंह तक्षक जो स्वयं आर्य समाजी थे ने डंके की चोट पर लोहारु में आर्य समाज की स्थापना की तथा 1946 तक प्रधान रहे ! लोहारु नवाब ने अपनी रियासत में शिक्षा पर प्रतिबंध लगा रखा था फिर भी चौधरी साहब ने 12 गांवों में यज्ञशालाएं स्थापित करके शिक्षण कार्य शुरू किया! यह अत्यंत महत्वपूर्ण व दुष्कर कार्य उन्होने महाराजा जींद द्वारा पेश किये गये तहसीलदार व लेफ्टिनेन्ट के पदों को ठुकरा कर किया !
         शिक्षा के जनक चौधरी निहाल सिंह तक्षक जी के जन्म दिन पर उन्हे कृतज्ञ हरियाणा वासियों की विनम्र श्रद्धाजंलि!

   (साभार : श्री रमेश कुमार तक्षक )

            One of the Greatest Leaders , Social Reformers, Educationists n  a very Sensitive human , Sh Nihal Singh Takshk will always be remembered for his Immense Contribution in making Basic Education available to the Masses !
     You will continue to rule our Hearts, Sir!
      Thnx,  Sanjeev Guddu Taxak, Praveen Taxak ,  Bijender Singh Sangwan , संजीव गोदारा अधिवक्ता, Ramesh Takshak , for organising Functions to spread awareness about this great Son of Soil! Please keep it up! My Salute to you all for making the people of the State aware of the immense Contribution of the Great leader in spreading Education in Haryana during those days!

(Photo/Hindi text courtesy:  Ramesh Takshak)

Saturday, April 18, 2026

रामधन सिंह जी

किसान-पुत्र महान् कृषि वैज्ञानिक डा. रामधन सिंह जी ने गुणवत्ता में सर्वोत्तम गेंहू C306, बासमती-370 ईजाद करके 1925-45 में दुनिया को हरितक्रांति की राह दिखाई!

जिस महान् मानव के कारण दुनिया के 100 करोड़ लोग भूखे मरने से बचे (1960 के दशक में) उनको जानें........!!!

जी ,मैं बात कर रहा हूँ "हरित क्रांति" के अग्रदूत विश्व-विख्यात कृषि वैज्ञानिक डॉ. रामधन सिंह हुड्डा जी की।

1 मई 1891 में रोहतक जिले के किलोई गांव में साधारण किसान के घर इस असाधारण बालक ने जन्म लिया। लंदन में कैंब्रिज विश्वविद्यालय से प्राकृतिक विज्ञान और कृषि में Ph.D करने के बाद 1925 में Punjab Agriculture College and Research Institute ,Layallpur(Punjab) में प्रिंसिपल लगे। 1947 में रिटायरमेंट तक वहीं रहकर भारत ही नहीं, दुनिया के लिए नई नई किस्में इज़ाद की गेहूं, जौ, धान, दाल, गन्ना की।

Canada और Mexico ने सबसे पहले इनकी गेहूं C-591 अपनाई और पैदावार के रिकॉर्ड बनाये।

C-217,C-228, 250, 253, 273, 281 और C-285, C-518 उनकी मुख्य गेहूं varieties हैं।

जिस C-306 गेहूं को सबसे स्वादिष्ट माना जाता है उसे डॉ. रामधन सिंह जी ने ईज़ाद किया था। संसार में मशहूर बासमती चावल 370 और Jhona 349 भी डॉ. रामधन जी की ही देन हैं।

उनके योगदान का अंदाजा यों लगा सकते हो, जिसको Mexico से नोबल पुरस्कार विजेता डॉ. Norman E Borlog 1963 में डॉक्टर रामधन सिंह जी से Sonipat उनके घर पर मिलने आए और रामधन सिंह जी के पैर छू कर कहें - आपने संसार को बेहतर किस्में देकर 100 करोड़ लोगों को भूखे मरने से बचा लिया - और खुशी से रो दिए।

1965 में लाल बहादुर शास्त्री जी ने डॉ. रामधन सिंह जी को किसी भी राज्य के Governor बनने के लिए कहा था लेकिन डॉक्टर रामधन सिंह जी ने कहा राज्यपाल बनने से ज्यादा भला मैं वैज्ञानिक के तौर पर कर सकता हूँ देश का। और उन्होंने ऐसा किया भी।

1961 में पाकिस्तान ने डॉ रामधन सिंह जी को राष्ट्रपति गोल्ड मैडल से सम्मानित किया और वह यह सम्मान पाने वाले पहले भारतीय बने।

17 अप्रैल 1977 को डॉ रामधन सिंह जी इस संसार को अलविदा कह गए लेकिन सबको जिंदा रहने के लिए अथाह अनाज भंडार दे गए।

हम क्यों नही जन्मदिन मनाते उनका?खाते हैं 306, 370 और चूसते हैं गन्ना 312 जिनका?सबको बताएं महान् किसान पुत्र की महान् देन दुनिया को।

डॉ रामधन सिंह जी अमर हैं।

आज (17 अप्रैल)  उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें शत शत नमन 🙏

पंजाबी समुदाय

1947 में विभाजन के दौरान पाकिस्तान से भारत (विशेषकर दिल्ली, पंजाब और हरियाणा) आए पंजाबी समुदाय ने भारी विस्थापन और हिंसा झेली। ये मुख्य रूप से हिंदू और सिख थे, जो अपनी जमीन-जायदाद छोड़कर आए थे। इस समुदाय ने भारत में आकर कड़ी मेहनत से खुद को स्थापित किया, व्यापार, संस्कृति और शिक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दिया। [1, 2, 3, 4]

पाकिस्तान से आए पंजाबी समुदाय के बारे में मुख्य बातें:

विस्थापन और पुनर्वास: 1947 के विभाजन के बाद लाखों हिंदू और सिख पंजाबी परिवार पाकिस्तान के पंजाब प्रांत (जैसे लाहौर, रावलपिंडी, मुल्तान, सियालकोट) से भारत आए। इन्होनें भारत में नए सिरे से अपना जीवन शुरू किया।

समुदाय की संरचना: भारत आने वाले अधिकांश पंजाबी हिंदू और सिख थे, जो मुख्य रूप से पाकिस्तान में शहरी व्यापार और खेती में संलग्न थे।

सामाजिक-आर्थिक योगदान: इस समुदाय ने भारत में आजीविका के लिए व्यापार, शिक्षा, और कृषि में कड़ी मेहनत की। दिल्ली और उत्तर भारत के व्यावसायिक परिदृश्य को बदलने में इस समुदाय का बड़ा हाथ माना जाता है।

संस्कृति और भाषा: पाकिस्तान से आए पंजाबियों की भाषा पंजाबी (शाहमुखी और गुरुमुखी लिपि) थी। भारतीय पंजाब में आने के बाद, वे भारतीय पंजाबी संस्कृति का अभिन्न अंग बन गए, लेकिन उनकी यादों में अभी भी अपना पुराना वतन, संस्कृति और सूफी परंपराएं जीवित हैं।

पाकिस्तान में पंजाबी (वर्तमान): पाकिस्तान में रहने वाले पंजाबी अब मुख्य रूप से मुस्लिम हैं (लगभग 97%)। वे पाकिस्तान का सबसे बड़ा जातीय समूह हैं, जो मुख्य रूप से खेती (ज़मीनदार समूहों) और कारीगरी (मोइन्स) में लगे हुए हैं। [1, 2, 3, 4, 5]

यह समुदाय आज भारत की प्रगति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।


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रोहतक को हरियाणा का दिल कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। कभी-कभी इसे हरियाणा की राजनीतिक राजधानी भी कह दिया जाता है। यह हरियाणा के अति प्राचीन नगरों में से एक है। यह कितना पुराना है, इसका कोई ठोस प्रमाण अभी तक नहीं है। महाभारत में जब नकुल, राजसूय के समय विजय करता हुआ इधर आता है तो वह रोहतक को विजय करता है। इससे यह प्रमाणित होता है कि महाभारत काल में रोहतक का अस्तित्व था। कुछ लोगों का मानना है कि महाराज हरिशन्नद्र के पुत्र रोहताश ने पश्चिम विजय करते समय इसे बसाया था। यह स्थान पुष्पपुर (पेशावर) तथा शाकल (स्यालकोट) के रास्ते में पड़ता था। इसे रोहताश ने बसाया था। इसी कारण इसका नाम रोहताशगढ़ था, जो बाद में रोहतक हो गया। कुछ विद्वान इसे सही नहीं मानते । रोहतक जिले के गजेटियर के अनुसार यहां पर रोहेड़ा के पेड़ अधिक थे। रोहेड़ा को संस्कृत भाषा में रोहितक कहा जाता है। इसके आसपास रोहेड़ा के पेड़ों की अधिकता के कारण यह रोहितक कहलाया जो बाद में रोहतक हो गया। यही नाम आज तक चला आता है।
          पंजाबी समुदायः
आजादी के दौर में पाकिस्तान से भारत आए लोग ज्यादातर पंजाब, हरियाणा और कुछ उत्तर प्रदेश के क्षेत्र में आकर बसे ।
भारत आए इस हिन्दू समुदाय को प्रायः पंजाबी समुदाय के नाम से पुकारा जाता है। कहीं कहीं इन्हें रिफ्यूजी भी कहा जाता था। इनमें जाति व्यवस्था कम और गोत्र व्यवस्था अधिक है। पंजाबी समुदाय में एक गोत्र छोड़कर विवाह करते हैं। ये कट्टर सनातनी हैं, कहीं-कहीं आर्य समाज का भी प्रभाव है। आर्य समाज का प्रभाव हवन तक ही सीमित है। पंजाबी समुदाय पाकिस्तान से आते ही मुसलमानों द्वारा खाली किए स्थानों पर बसाया गया था। यह समुदाय गाँव में भी बसा और रोहतक शहर में भी। रोहतक का गांधी कैंप और बड़ा बाजार इनका क्षेत्र था। 
    कैंप में रहने वाले लोगों के भी अलग अलग स्तर थे। एक महिला किसी घर में काम करके लस्सी दो तीन किलो ले जाती और कैंप में और पानी डालकर एक एक गिलास लोगों को पीने के लिए बेचती और अपने घर का गुजारा करती। खास बात उसने बताई कि हमारे तबकों में महिलाएं घूंघट नहीं करती।
     हमारे विद्यार्थी जीवन में डॉ खोसला, डॉ ओ पी मोहन , कृष्ण लाल भयाना ने काफी प्रभावित किया।
   इसी प्रकार मेडिकल में एक दुकानदार की चाय की दुकान थी। उससे हमारी जानकारी बढ़ी तो हमने उसके परिवार के बारे पूछा। उसने बताया 7 सदस्यों का परिवार है। एक दिन मैं उसके घर उससे मिलने गया तो देखा एक ही कमरा है उनका रहने के लिए। एक तरफ एक बड़ा पलंग है उसके नीचे एक खाट है और उसके नीचे एक खटोला है।
     अपनी मेहनत के दम पे इन लोगों ने सरवाइव किया और आज ज्यादातर बेहतर जीवन व्यतीत कर रहे हैं ।
गाँव में बसे लोगों के पास जमीनें थीं। अब ज्यादा लोगों ने गाँव की कृषि योग्य जमीन बेचकर शहर में रहना आरम्भ कर दिया है। यह समुदाय घोर परिश्रमी है। इनकी शादी खर्चीली होती है। सुन्दर भवन, मकानों में रहने के शौकीन हैं। 1947 में इन्होंने घोर गरीबी और कमजोर आर्थिक अवस्था देखी थी। परन्तु आजकल रोहतक के 40 प्रतिशत व्यापार पर इन्हीं का कब्जा है। पूरा किला रोड और शौरी क्लॉथ मार्केट पर इनका प्रबल प्रभाव है। वहाँ पर प्रतिदिन लाखों रुपये का लेन-देन होता है। सब्जी मंडी और अनाज मंडी में भी संख्या काफी है। रोहतक के दूध और खोए के व्यवसाय में इनकी 80 प्रतिशत भागेदारी है। रोहतक शहर और कलानौर में डेरी व्यवसाय में इनका महत्वपूर्ण योगदान है। यह समुदाय शिक्षा के प्रति सचेत है। यह वर्ग पूर्ण साक्षर समाज कहा जा सकता है। ज्ञान, विज्ञान, इतिहास समाज सुधार और शिक्षा के प्रचार-प्रसार में इस समाज का बहुत ज्यादा योगदान है। रोहतक के परम्परागत स्वभाव को बहुत प्रभावित किया है। खान-पान, रहन-सहन, भाषा, वेश भूषा और विवाह-शादी, हर क्षेत्र में घुल मिल गए हैं। पिछले कुछ समय से इस समाज के एक हिस्से में अलगाववाद, जातीयता की गंध आने लगी है। भाषावाद पर अधिक जोर दिया जा रहा है। व्यापार, सरकारी सेवाक्षेत्र, दुकानदारी, स्वरोजगार पर ज्यादा ध्यान है। गाँव में कहीं-कहीं कृषि कार्य भी कर लेते हैं। सेना व पुलिस में इस समुदाय की भागेदारी बहुत कम है। पुलिस में हैं भी, तो अधिकारी वर्ग ही है।

Thursday, February 5, 2026

अटल

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Will fail Fighting and not surrendering

I will rather die standing up, than live life on my knees:

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