1947 में विभाजन के दौरान पाकिस्तान से भारत (विशेषकर दिल्ली, पंजाब और हरियाणा) आए पंजाबी समुदाय ने भारी विस्थापन और हिंसा झेली। ये मुख्य रूप से हिंदू और सिख थे, जो अपनी जमीन-जायदाद छोड़कर आए थे। इस समुदाय ने भारत में आकर कड़ी मेहनत से खुद को स्थापित किया, व्यापार, संस्कृति और शिक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दिया। [1, 2, 3, 4]
पाकिस्तान से आए पंजाबी समुदाय के बारे में मुख्य बातें:
विस्थापन और पुनर्वास: 1947 के विभाजन के बाद लाखों हिंदू और सिख पंजाबी परिवार पाकिस्तान के पंजाब प्रांत (जैसे लाहौर, रावलपिंडी, मुल्तान, सियालकोट) से भारत आए। इन्होनें भारत में नए सिरे से अपना जीवन शुरू किया।
समुदाय की संरचना: भारत आने वाले अधिकांश पंजाबी हिंदू और सिख थे, जो मुख्य रूप से पाकिस्तान में शहरी व्यापार और खेती में संलग्न थे।
सामाजिक-आर्थिक योगदान: इस समुदाय ने भारत में आजीविका के लिए व्यापार, शिक्षा, और कृषि में कड़ी मेहनत की। दिल्ली और उत्तर भारत के व्यावसायिक परिदृश्य को बदलने में इस समुदाय का बड़ा हाथ माना जाता है।
संस्कृति और भाषा: पाकिस्तान से आए पंजाबियों की भाषा पंजाबी (शाहमुखी और गुरुमुखी लिपि) थी। भारतीय पंजाब में आने के बाद, वे भारतीय पंजाबी संस्कृति का अभिन्न अंग बन गए, लेकिन उनकी यादों में अभी भी अपना पुराना वतन, संस्कृति और सूफी परंपराएं जीवित हैं।
पाकिस्तान में पंजाबी (वर्तमान): पाकिस्तान में रहने वाले पंजाबी अब मुख्य रूप से मुस्लिम हैं (लगभग 97%)। वे पाकिस्तान का सबसे बड़ा जातीय समूह हैं, जो मुख्य रूप से खेती (ज़मीनदार समूहों) और कारीगरी (मोइन्स) में लगे हुए हैं। [1, 2, 3, 4, 5]
यह समुदाय आज भारत की प्रगति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
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रोहतक को हरियाणा का दिल कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। कभी-कभी इसे हरियाणा की राजनीतिक राजधानी भी कह दिया जाता है। यह हरियाणा के अति प्राचीन नगरों में से एक है। यह कितना पुराना है, इसका कोई ठोस प्रमाण अभी तक नहीं है। महाभारत में जब नकुल, राजसूय के समय विजय करता हुआ इधर आता है तो वह रोहतक को विजय करता है। इससे यह प्रमाणित होता है कि महाभारत काल में रोहतक का अस्तित्व था। कुछ लोगों का मानना है कि महाराज हरिशन्नद्र के पुत्र रोहताश ने पश्चिम विजय करते समय इसे बसाया था। यह स्थान पुष्पपुर (पेशावर) तथा शाकल (स्यालकोट) के रास्ते में पड़ता था। इसे रोहताश ने बसाया था। इसी कारण इसका नाम रोहताशगढ़ था, जो बाद में रोहतक हो गया। कुछ विद्वान इसे सही नहीं मानते । रोहतक जिले के गजेटियर के अनुसार यहां पर रोहेड़ा के पेड़ अधिक थे। रोहेड़ा को संस्कृत भाषा में रोहितक कहा जाता है। इसके आसपास रोहेड़ा के पेड़ों की अधिकता के कारण यह रोहितक कहलाया जो बाद में रोहतक हो गया। यही नाम आज तक चला आता है।
पंजाबी समुदायः
आजादी के दौर में पाकिस्तान से भारत आए लोग ज्यादातर पंजाब, हरियाणा और कुछ उत्तर प्रदेश के क्षेत्र में आकर बसे ।
भारत आए इस हिन्दू समुदाय को प्रायः पंजाबी समुदाय के नाम से पुकारा जाता है। कहीं कहीं इन्हें रिफ्यूजी भी कहा जाता था। इनमें जाति व्यवस्था कम और गोत्र व्यवस्था अधिक है। पंजाबी समुदाय में एक गोत्र छोड़कर विवाह करते हैं। ये कट्टर सनातनी हैं, कहीं-कहीं आर्य समाज का भी प्रभाव है। आर्य समाज का प्रभाव हवन तक ही सीमित है। पंजाबी समुदाय पाकिस्तान से आते ही मुसलमानों द्वारा खाली किए स्थानों पर बसाया गया था। यह समुदाय गाँव में भी बसा और रोहतक शहर में भी। रोहतक का गांधी कैंप और बड़ा बाजार इनका क्षेत्र था।
कैंप में रहने वाले लोगों के भी अलग अलग स्तर थे। एक महिला किसी घर में काम करके लस्सी दो तीन किलो ले जाती और कैंप में और पानी डालकर एक एक गिलास लोगों को पीने के लिए बेचती और अपने घर का गुजारा करती। खास बात उसने बताई कि हमारे तबकों में महिलाएं घूंघट नहीं करती।
हमारे विद्यार्थी जीवन में डॉ खोसला, डॉ ओ पी मोहन , कृष्ण लाल भयाना ने काफी प्रभावित किया।
इसी प्रकार मेडिकल में एक दुकानदार की चाय की दुकान थी। उससे हमारी जानकारी बढ़ी तो हमने उसके परिवार के बारे पूछा। उसने बताया 7 सदस्यों का परिवार है। एक दिन मैं उसके घर उससे मिलने गया तो देखा एक ही कमरा है उनका रहने के लिए। एक तरफ एक बड़ा पलंग है उसके नीचे एक खाट है और उसके नीचे एक खटोला है।
अपनी मेहनत के दम पे इन लोगों ने सरवाइव किया और आज ज्यादातर बेहतर जीवन व्यतीत कर रहे हैं ।
गाँव में बसे लोगों के पास जमीनें थीं। अब ज्यादा लोगों ने गाँव की कृषि योग्य जमीन बेचकर शहर में रहना आरम्भ कर दिया है। यह समुदाय घोर परिश्रमी है। इनकी शादी खर्चीली होती है। सुन्दर भवन, मकानों में रहने के शौकीन हैं। 1947 में इन्होंने घोर गरीबी और कमजोर आर्थिक अवस्था देखी थी। परन्तु आजकल रोहतक के 40 प्रतिशत व्यापार पर इन्हीं का कब्जा है। पूरा किला रोड और शौरी क्लॉथ मार्केट पर इनका प्रबल प्रभाव है। वहाँ पर प्रतिदिन लाखों रुपये का लेन-देन होता है। सब्जी मंडी और अनाज मंडी में भी संख्या काफी है। रोहतक के दूध और खोए के व्यवसाय में इनकी 80 प्रतिशत भागेदारी है। रोहतक शहर और कलानौर में डेरी व्यवसाय में इनका महत्वपूर्ण योगदान है। यह समुदाय शिक्षा के प्रति सचेत है। यह वर्ग पूर्ण साक्षर समाज कहा जा सकता है। ज्ञान, विज्ञान, इतिहास समाज सुधार और शिक्षा के प्रचार-प्रसार में इस समाज का बहुत ज्यादा योगदान है। रोहतक के परम्परागत स्वभाव को बहुत प्रभावित किया है। खान-पान, रहन-सहन, भाषा, वेश भूषा और विवाह-शादी, हर क्षेत्र में घुल मिल गए हैं। पिछले कुछ समय से इस समाज के एक हिस्से में अलगाववाद, जातीयता की गंध आने लगी है। भाषावाद पर अधिक जोर दिया जा रहा है। व्यापार, सरकारी सेवाक्षेत्र, दुकानदारी, स्वरोजगार पर ज्यादा ध्यान है। गाँव में कहीं-कहीं कृषि कार्य भी कर लेते हैं। सेना व पुलिस में इस समुदाय की भागेदारी बहुत कम है। पुलिस में हैं भी, तो अधिकारी वर्ग ही है।

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