Sunday, May 29, 2022
किसान
Friday, May 6, 2022
Press statement
Saturday, March 19, 2022
द कश्मीर फाइल्स
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=3230278547184990&id=1955495977996593
*‘द कश्मीर फ़ाइल्स’: कश्मीरी पण्डितों की त्रासदी दिखाने की आड़ में मुस्लिमों और वामपन्थियों के ख़िलाफ़ नफ़रत को चरम पर ले जाने का हिन्दुत्ववादी हथकण्डा*
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✍🏾 आनन्द सिंह
उत्तर प्रदेश सहित 4 राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा की जीत के बाद संघ परिवार की समूची फ़ासिस्ट मशीनरी अब विवेक अग्निहोत्री की फ़िल्म ‘द कश्मीर फ़ाइल्स’ को प्रचारित करने में जुट गयी है। फ़िल्म रिलीज़ होने के अगले ही दिन प्रधानमंत्री मोदी ने फ़िल्म के निर्माता,निर्देशक और मुख्य कलाकारों से मुलाक़ात की। यही नहीं, फ़िल्म चर्चा में बनी रहे इसलिए मोदी ने भाजपा की एक बैठक में फ़िल्म को बदनाम करने की साज़िश का भी ज़िक्र किया। गृहमंत्री अमित शाह ने भी फ़िल्म की टीम से मुलाक़ात की। भाजपा शासित प्रदेशों ने फ़िल्म को टैक्स-फ्री कर दिया है ताकि फ़िल्म को ज़्यादा से ज़्यादा लोग देखें। तमाम शहरों के सिनेमा हॉलों में संघ परिवार के कार्यकर्ता और उसके लग्गू-भग्गू फ़िल्म प्रदर्शन को हिन्दुत्ववादी ज़हरीली नफ़रती राजनतिक प्रोपागैण्डा में तब्दील कर रहे हैं। स्पष्ट है कि यह सब एक सोची-समझी रणनीति के तहत किया जा रहा है जिसका समाज पर वैसा ही असर होने वाला है जैसा नाज़ी जर्मनी में ‘द इटर्नल ज्यू’ जैसी यहूदी-विरोधी प्रोपागैण्डा फ़िल्मों का हुआ था।
कश्मीर मसले के इतिहास के तमाम पहलुओं से वाक़िफ़ किसी भी व्यक्ति को यह आसानी से समझ में आ सकता है कि फ़िल्म में आधे सच और सफ़ेद झूठ का शातिराना ढंग से मिश्रण करते हुए कश्मीरी पण्डितों की हत्याओं और पलायन की त्रासदी को कश्मीर समस्या के पूरे सन्दर्भ से काटकर एक स्वतंत्र समस्या के रूप में पेश किया गया है। लेकिन इस फ़िल्म का सबसे ख़तरनाक पहलू यह है कि इसमें कश्मीरी पण्डितों की त्रासदी दिखाने की आड़ में संघ परिवार के मुस्लिम-विरोधी और कम्युनिज़्म-विरोधी एजेण्डा को बेहद नंगे और भोंडे रूप में सामने लाया गया है जो कम ऐतिहासिक व राजनीतिक चेतना के किसी भी व्यक्ति के भीतर कश्मीर समस्या के बारे में कोई विवेक पैदा करने की बजाय नफ़रत और ग़ुस्सा पैदा करने का काम करता है।
फ़िल्म को देखने के बाद सिनेमा हॉल से बाहर निकले लोगों की प्रतिक्रिया को भी सोशल मीडिया पर प्रचारित करके नफ़रत और ग़ुस्से को और ज़्यादा तूल दिया जा रहा है। ऐसी ज़्यादातर प्रतिक्रियाओं में लोगों को फ़िल्म देखने के बाद रोते हुए और भावनात्मक टिप्पणी करते हुए दिखाया जा रहा है। फ़िल्म का मक़सद ही यही है कि कश्मीरी पण्डितों की त्रासदी दिखाकर लोगों को नकारात्मक भावना और ग़ुस्से से भर दिया जाये। लेकिन अगर कोई व्यक्ति कश्मीरी पण्डितों की त्रासदी के कारणों को जानने की जिज्ञासा के साथ फ़िल्म देखने जाएगा तो उसे निराशा ही हाथ लगेगी। फ़िल्म में कश्मीरी पण्डितों की समस्या और त्रासदी को भारत की आज़ादी के बाद पैदा हुई कश्मीर समस्या और त्रासदी के एक अंग के रूप में दिखाने की बजाय उसे एक स्वतंत्र समस्या के रूप में पेश किया गया है। फ़िल्म में इसका कोई ज़िक्र नहीं मिलता कि किस प्रकार आज़ादी के बाद कश्मीरियों ने इस्लाम के आधार पर बने पाकिस्तान में न मिलने का फैसला किया था। कश्मीर में रायशुमारी कराने के वायदे से भारतीय राज्य के मुकरने, उसकी ज़ोर-ज़बर्दस्ती और ग़ैर-लोकतांत्रिक आचरण की वजह से कश्मीर समस्या लगातार उलझती चली गयी जिसका नतीजा कश्मीर घाटी की मुस्लिम आबादी में लगातार बढ़ते अलगाव के रूप में सामने आया। फ़िल्म में इसका भी कोई हवाला नहीं मिलता है कि कश्मीरी मुस्लिम आबादी के बीच भारत की राज्यसत्ता से बढ़ते अलगाव के बावजूद 1980 के दशक के उत्तरार्द्ध से पहले कश्मीरी पण्डित अल्पसंख्यक आबादी के ख़िलाफ़ पूर्वाग्रह भले ही हों लेकिन नफ़रत और हिंसा जैसे हालात नहीं थे। ऐसे हालात पैदा करने में 1980 के दशक में घटी कुछ अहम राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय घटनाओं की भूमिका थी।
11 फ़रवरी 1984 को भारतीय और पाकिस्तानी क़ब्ज़े वाले समूचे कश्मीर की आज़ादी की माँग को लेकर सशस्त्र संघर्ष के हिमायती लोकप्रिय नेता मक़बूल बट को तिहाड़ जेल में फाँसी दे दी गयी थी जिसने कश्मीरी युवाओं में असंतोष बढ़ाने का काम किया। जुलाई 1984 में इंदिरा गाँधी ने फारूख़ अब्दुल्ला की सरकार को बरख़ास्त कर दिया जिससे घाटी में एक बार फिर असन्तोष बढ़ने लगा। श्रीनगर में 72 दिनों तक कर्फ्यू लगा रहा। लेकिन 1986 में फारूख अब्दुल्ला ने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के साथ समझौता किया और वे एक बार फिर मुख्यमंत्री बने। मार्च 1987 में जम्मू एवं कश्मीर विधानसभा का चुनाव सम्पन्न हुआ जिसमें नेशनल कान्फ्रेंस और कांग्रेस ने गठबन्धन बनाया। इन चुनावों में बड़े पैमाने पर धाँधली हुई। विपक्षी मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट (एमयूएफ) की कश्मीर घाटी में ज़बरदस्त लोकप्रियता होने के बावजूद चुनावी धाँधली की वजह से उसे विधानसभा में सीटें नहीं मिल पायीं। इन चुनावों में धाँधली के बाद कश्मीरी युवाओं की बड़ी आबादी को चुनावी प्रक्रिया से भरोसा उठ गया और बड़ी संख्या में युवाओं ने बन्दूकें थामी। इसके बाद से ही कश्मीर में सशस्त्र संघर्ष प्रभावी रूप में सामने आया। ग़ौरतलब है कि जिन नेताओं ने बाद में आतंकवाद की राह पर जाने का फैसला किया उनमें से अधिकांश ने 1987 के चुनावों में हिस्सा लिया था और चुनावी धाँधली की वजह से उनका मोहभंग हुआ। 1986 में गठित इस्लामिक स्टूडेंट्स लीग के चार प्रमुख सदस्यों – अब्दुल हमीद शेख, अश्फ़ाक माज़िद वानी, जावेद अहमद मीर और यासीन मलिक – जिन्हें हाजी ग्रुप कहा जाता था, ने एमयूएफ के समर्थन में चुनाव प्रचार किया था। यहाँ तक कि हिजबुल मुजाहिद्दीन का मुखिया सैयद सलाहुद्दीन जिसका असली नाम मोहम्मद यूसुफ शाह है, ने भी एमयूएफ़ के उम्मीदवार के रूप में 1987 के चुनाव में भागीदारी की थी। 1987 के चुनावों में भारी धाँधली के बाद कश्मीर में जो जनउभार देखने को आया उसके पीछे पिछले 40 सालों का कुशासन, आर्थिक बदहाली, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार भी प्रमुख कारण थे। 1988 में बिजली की दरों में वृद्धि के खि़लाफ़ प्रदर्शन के दमन से कश्मीर घाटी की जनता में ज़बरदस्त आक्रोश देखने को आया। उसी साल मकबूल बट की बरसी पर पुलिस ने कश्मीरी आज़ादी के समर्थकों पर अन्धाधुन्ध गोलियाँ चलायीं। यही वह दौर था जब पाकिस्तान ने अफ़गानिस्तान में अमेरिका की मदद से सोवियत संघ के ख़िलाफ़ लड़ाई में प्रशिक्षित मुजाहिद्दीनों को कश्मीर में जेहाद के लिए भेजना शुरू किया और कश्मीर की आज़ादी के संघर्ष को इस्लामिक कट्टरपन्थी रंग देने की कुटिल चाल चली जिसने कश्मीर की आज़ादी के संघर्ष को नुक़सान पहुँचाने के अलावा अल्पसंख्यक कश्मीरी पण्डितों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने में प्रमुख भूमिका अदा की।
इस सन्दर्भ के बिना 1989-90 में हुई कश्मीरी पण्डितों की हत्याओं और उसके बाद हुए उनके पलायन को समझा ही नहीं जा सकता है। लेकिन ‘द कश्मीर फ़ाइल्स’ का मक़सद यह समझाना नहीं बल्कि लोगों की रगों में नफ़रत का ज़हर फैलाना है। इसीलिए इस फ़िल्म में कश्मीर के इस समकालीन इतिहास को पूरी तरह से ग़ायब कर दिया गया और इतिहास के नाम पर चयनित ढंग से कश्मीर के प्राचीन इतिहास के गौरव और मध्यकालीन सामन्ती मुस्लिम शासकों की बर्बरता के क़िस्से सुनाये गये हैं जिनका वर्तमान कश्मीर समस्या और कश्मीरी पण्डितों के पलायन से कोई रिश्ता नहीं है और जो संघ की शाखाओं से उधार लिये गये हैं। यह पूरा ब्योरा संघ के ‘हिन्दू ख़तरे में है’ और ‘इस्लाम है ही कट्टर’ के प्रोपागैण्डा के अनुरूप है।
फ़िल्म में समूची कश्मीरी मुस्लिम आबादी को एक एकाश्मी समूह के रूप में दिखाया गया है, सभी कश्मीरी मुस्लिम किरदार या तो कश्मीरी पण्डितों के ख़ून के प्यासे हैं या उनकी सम्पत्ति हड़पने के लिए लालायित हैं या उनकी महिलाओं पर बुरी नज़र रखते हैं। मुस्लिम बच्चे पाकिस्तान क्रिकेट टीम के समर्थक हैं, मुस्लिम महिलाएँ राशन डिपो पर पूरे अनाज पर क़ब्ज़ा कर लेती हैं ताकि पण्डितों को राशन न मिले। मुस्लिम पड़ोसी पण्डितों के भागने का इन्तज़ार करते हैं ताकि उनकी सम्पत्ति पर क़ब्ज़ा कर सकें। मौलवी की बुरी नज़र पण्डित महिलाओं पर रहती है। हालाँकि 1990 में जब पण्डितों के ख़िलाफ़ नफ़रत अपने चरम पर थी तब कश्मीरी मुस्लिम आबादी ऐसे लोगों की मौजूदगी और इस प्रकार की चन्द घटनाओं से इन्कार नहीं किया जा सकता है क्योंकि ऐसी घटनाओं के कुछ संस्मरण मौजूद हैं, लेकिन उस दौर के जितने भी संस्मरण, रिपोर्टें मौजूद हैं जिनमें कश्मीरी पण्डितों के भी संस्मरण शामिल हैं वे यह भी बताते हैं कि तमाम कश्मीरी मुस्लिमों ने पण्डितों को बचाया भी था और वे नहीं चाहते थे कि पण्डित घाटी छोड़कर जाएँ। लेकिन ‘द कश्मीर फ़ाइल्स’ में ऐसा एक भी मुस्लिम किरदार नहीं मौजूद है जो पण्डितों के पलायन से दुखी हो। कारण साफ़ है कि ऐसे किरदार के होने से नफ़रत का असर थोड़ा कम हो जाता।
फ़िल्म में निहायत ही शातिराना ढंग से यह सच्चाई भी पूरी तरह से छिपा दी गयी है कि जिस दौर में कश्मीरी पण्डितों पर हमले हो रहे थे उस समय तमाम कश्मीरी मुस्लिमों को भी निशाना बनाया गया था जिनमें नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस के नेताओं के अलावा मीरवाइज़ मोहम्मद फ़ारूख़ जैसे कई नरमपन्थी अलगाववादी नेता और आम कश्मीरी मुस्लिम भी शामिल थे। पाकिस्तानपरस्त इस्लामिक कट्टरपन्थियों के निशाने पर वे सभी लोग थे कश्मीर के पाकिस्तान में मिलने मिलने का विरोध कर रहे थे, चाहे वो भारत के नज़रिये से विरोध कर रहे हों या कश्मीर की आज़ादी के नज़रिये से। आतंकवाद के दौर में कश्मीरी पण्डितों से कई गुना ज़्यादा कश्मीरी मुस्लिमों की मौतें हुईं। लेकिन अगर विवेक अग्निहोत्री इस सच्चाई को अगर दिखाने लग जाते तो मुस्लिमों के ख़िलाफ़ नफ़रत कैसे फैला पाते और कश्मीर समस्या को हिन्दू बनाम मुस्लिम की लड़ाई के रूप में कैसे दिखा पाते!
फ़िल्म के एक दृश्य में जेएनयू में जब प्रो. राधिका मेनन कश्मीर में भारतीय सेना द्वारा किये गये ज़ुल्म की चर्चा करते हुए कश्मीर में पायी गयी 7000 से भी ज़्यादा गुमनाम कब्रों का हवाला देती है तो फ़िल्म का मुख्य किरदार कृष्णा फौरन बोल पड़ता है कि ‘व्हाट अबाउट बट मज़ार’? जब प्रो. पूछती है कि बट मज़ार क्या है तो वह बताता है कि जहाँ एक लाख कश्मीरी हिन्दुओं का डल लेक में डुबोकर मार डाला गया। इतने लोग मरे कि सिर्फ़ उनके जनेऊ से ही 7 बड़े टीले बन गए थे। यह दृश्य व्हाटअबाउटरी की टिपिकल संघी शैली का उदाहरण है। इसमें बड़ी ही चालाकी से आज के कश्मीर में हुए ज़ुल्म के बरक्स मध्यकाल की किसी घटना को रख दिया जाता है और उसका समय जानबूझकर नहीं बताया जाता ताकि दर्शकों को ऐसा लगे कि आधुनिक कश्मीर में पण्डितों के साथ ऐसी घटना घटी हो और उनका दिल कश्मीरी मुस्लिमों के प्रति नफ़रत से भर उठे।
फ़िल्म में धूर्ततापूर्ण तरीक़े से यह सच्चाई भी छिपायी गयी है कि जिस दौर में कश्मीरी पण्डितों के साथ सबसे घृणित अपराध हुए उस समय दिल्ली में वी.पी.सिंह की सरकार थी जो भाजपा के समर्थन के बिना एक दिन भी नहीं चल सकती थी। लेकिन भाजपा ने कश्मीरी पण्डितों पर होने वाले ज़ुल्मों के मुद्दे पर सरकार से समर्थन वापस नहीं लिया। फ़िल्म में उस दौर को कुछ इस तरह से प्रस्तुत किया गया है मानो उस समय राजीव गाँधी की कांग्रेसी सरकार हो। यह भी दिखाता है कि फ़िल्मकार का मक़सद सच दिखाना नहीं बल्कि संघ परिवार का प्रोपागैण्डा फैलाना है।
वी.पी. सिंह की सरकार 2 दिसम्बर 1989 में सत्ता में आयी थी और 8 दिसम्बर को कश्मीरी मिलिटेंट्स ने उस सरकार में गृहमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद की बेटी रूबिया सईद का अपहरण कर लिया था। भारत सरकार ने गृहमंत्री की बेटी को छोड़ने की एवज में 5 मिलिटेंट्स को रिहा किया था जिसके बाद से कश्मीर घाटी में मिलिटेंट्स का बोलबाला हो गया था और कश्मीरी पण्डितों की हत्याओं में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई थी। 18 जनवरी 1990 को फ़ारूख़ अब्दुल्ला की सरकार इस्तीफ़ा देती है और कश्मीर में दूसरी बार राज्यपाल के पद पर कुख्यात जगमोहन को नियुक्त किया जाता है। कई कश्मीरी पण्डित समेत तमाम पत्रकारों और विश्लेषकों का यह मानना है कि जगमोहन ने स्वयं कश्मीरी पण्डितों को घाटी छोड़ने के लिए कहा और उनके पलायन के लिए गाड़ियाँ तक मुहैया करायीं ताकि उन्हें घाटी में निर्ममता से सुरक्षा बलों का इस्तेमाल करने का बहाना मिल जाये। हालाँकि यह व्याख्या विवादास्पद है लेकिन इतना तो तय है कि जगमोहन के कार्यकाल में कश्मीरी पण्डितों को सुरक्षित माहौल नहीं मिल पाया जिसकी वजह से पण्डितों को पलायन होने पर मजबूर होना पड़ा। उस समय जम्मू व कश्मीर में तैनात वरिष्ठ नौकरशाह वजाहत हबीबुल्लाह ने लिखा है कि घाटी के कई मुस्लिमों ने उनसे कश्मीरी पण्डितों के पलायन को रोकने की गुहार लगायी थी जिसके बाद उन्होंने जगमोहन से आग्रह किया था कि वे दूरदर्शन के प्रसारण के माध्यम से कश्मीरी पण्डितों को घाटी न छोड़ने के लिए कहें। लेकिन जगमोहन ने ऐसा करने की बजाय यह घोषणा की कि अगर कश्मीरी पण्डित घाटभ् छोड़ते हैं तो उनका इन्तज़ाम शरणार्थी शिविर में किया जाएगा और सरकारी कर्मचारियों को उनकी तनख़्वाहें मिलती रहेंगी। फ़िल्म में पण्डितों को घाटी में सुरक्षा का आश्वासन देने की बजाय उनके पलायन को बढ़ावा देने में जगमोहन की भूमिका पर भी पूरी तरह से पर्दा डाला गया है। इसी तरह फ़िल्म में 19 जनवरी 1990 को श्रीनगर में कश्मीरी पण्डितों पर हुए हमलों और उनके ख़िलाफ़ नफ़रत से भरी नारेबाज़ी को विस्तार से दिखाया है लेकिन इस सच्चाई को छिपा दिया है कि उसके दो दिन बाद ही श्रीनगर के गौकदल पुल के पास सीआरपीएफ़ की अँधाधुँध गोलीबारी में 50 से अधिक कश्मीरियों की जान चली गयी थी जिसके बाद से घाटी का माहौल और ख़राब हो गया था।
मुस्लिमों के अलावा ‘द कश्मीर फ़ाइल्स’ द्वारा प्रसारित नफ़रत का दूसरा प्रमुख निशाना वामपन्थी हैं। फ़िल्म में पल्लवी जोशी ने जेएनयू की एक प्रो. राधिका मेनन का किरदार निभाया है। पल्लवी जोशी ने अपने एक इण्टरव्यू में कहा है कि इस किरदार को उन्होंने इस कदर निभाया है कि लोग उससे बेइन्तहाँ नफ़रत करें। इस प्रोफ़ेसर को देश के ख़िलाफ़ काम करने वाले एक कुटिल व्यक्ति के रूप में पेश किया गया है जो अपने छात्रों का ‘ब्रेनवाश’ करके उन्हें भारत के ख़िलाफ़ काम करने के लिए प्रेरित करती है। वह अपनी खुली कक्षा में कश्मीर की आज़ादी की बात करती है और उसके छात्र भारत के टुकड़े करने के नारे लगाते हैं। यह 2016 में जेएनयू प्रकरण का संघी कैरिकेचर है जिसे विवेक अग्निहोत्री ने बेशर्मी के साथ दिखाया है।
इतना ही नहीं फ़िल्म में संघ परिवार द्वारा फैलाये जा रहे ‘वामपन्थी-जेहादी गँठजोड़’ के फ़र्जी नरेटिव को भी हास्यास्पद ढंग से पेश किया है। प्रोफ़ेसर राधिका अपने छात्र कृष्णा को कश्मीरी आतंकी बिट्टा कराटे से मुलाक़ात करने के लिए भेजती है। बिट्टा के घर में एक तस्वीर दिखायी जाती है जिसमें बिट्टा राधिका का हाथ पकड़े हुए है। इस दृश्य की प्रेरणा कुछ साल पहले अरुन्धति रॉय और यासीन मलिक की एक तस्वीर से ली गयी है जिसे संघियों द्वारा बेशर्मी के साथ वायरल किया गया था। यह दृश्य विवेक अग्निहोत्री सहित समूचे संघ परिवार के के घोर स्त्री-विरोधी चरित्र को भी सामने लाता है। इसके ज़रिये दोनों के बेहद क़रीबी रिश्ते को दिखाया गया है ताकि दर्शक आज़ादी के बात करने वाले वामपन्थियों से रोम-रोम तक नफ़रत करने लगें। बिट्टा कृष्णा को जेएनयू के प्रेसिडेंट का चुनाव लड़ने के लिए बधाई देता है और जाते समय उसे पिस्तौल थमाता है। जेएनयू के ज़रिये फ़िल्मकार समूचे वामपन्थ के प्रति लोगों में नफ़रत पैदा करने की कोशिश की है। दर्शकों के दिमाग़ में यह कनेक्शन बना रहे इसलिए जेएनयू के दृश्यों की पृष्ठभूमि में मार्क्स,लेनिन व माओ आदि की तस्वीरें प्रमुखता से उभारी गयी है।
फ़िल्म में शातिराना ढंग से मुख्य किरदार में बिट्टा कराटे और यासीन मलिक के किरदारों को गड्डमड्ड कर दिया गया है ताकि दर्शक कश्मीरी अलगाववादियों को हद दर्जे का बर्बर और दोगले इन्सान समझकर उनसे बेइन्तहाँ नफ़रत करें। एक ओर बिट्टा 20 से ज़्यादा पण्डितों की हत्या की बात कबूलता है वहीं दूसरी ओर वह गाँधीवादी ढंग से स्वतंत्रता आन्दोलन छेड़ने की बात करता है और वामपन्थियों के साथ गँठजोड़ करके भारत के ख़िलाफ़ साज़िश रचता है। फ़िल्म में इतिहास के साथ ज़्यादती करते हुए 2003 में कश्मीर के पुलवामा ज़िले के नदीमार्ग में हुए कश्मीरी पण्डितों के क़त्लेआम को 1990 के दशक में कश्मीरियों के पलायन की निरन्तरता में दिखाया गया है और उसे भी जेकेएलफ़ के बिट्टा कराटे द्वारा अंजाम देते हुए दिखाया गया है। सच तो यह है कि नदीमार्ग क़त्लेआम जेकेएलएफ़ की नहीं बल्कि लश्करे तोइबा की कारगुज़ारी थी। इतिहास के साथ किये गये इस घालमेल के पीछे भी फ़िल्मकार का मक़सद कश्मीर की आज़ादी के लिए चल रहे संघर्ष करने वाले सभी संगठनों और सभी व्यक्तियों को हैवान बताकर दर्शकों के मन में नफ़रत पैदा करना है। फ़िल्म के अन्तिम दृश्य में नदीमार्ग गाँव के सभी कश्मीरी पण्डितों को लाइन में खड़ा करके उनमें से सभी को एक-एक करके गोली से मारने का वीभत्स दृश्य दिखाया गया है और सबसे अन्त में बर्बर ढंग से बच्चे को मारते हुए दिखाया गया है ताकि दर्शक फ़िल्म को देखकर समूची कश्मीरी मुस्लिम आबादी के ख़िलाफ़ बेइन्तहाँ नफ़रत की भावना लेकर बाहर निकलें।
फ़िल्म में अनुपम खेर के किरदार की काफ़ी प्रशंसा की जा रही है। लेकिन इस किरदार के ज़रिये भी फ़िल्मकार ने चालाकी से नरेन्द्र मोदी को कश्मीरी पण्डितों के मसीहा बताने के संघी झूठ का एक नमूना पेश किया है। पुष्कर नाथ नामक यह किरदार घाटी से पलायन के बाद कश्मीर से धारा 370 को हटाने को अपने जीवन का एकमात्र उद्देश्य बना लेता है। ऐसा दिखाने का मक़सद दर्शकों के मन में यह भ्रान्ति पैदा करना है कि मोदी सरकार द्वारा कश्मीर से धारा 370 के हटाने से कश्मीरी पण्डितों को न्याय मिल गया है। सच तो यह है कि अनुपम खेर जै
चुनाव बारे
1.
सर्वाधिक ग़रीब आबादी के लिए ख़ैराती कल्याणकारी नीतियों और हिन्दुत्व का घातक मिश्रण***2.
ग़ैर-जाटव दलित और ग़ैर-यादव पिछड़ी जातियों के और आंशिक तौर पर जाटव दलित आबादी के वोट का बड़े पैमाने पर भाजपा को जाना कोई जातिगत परिघटना नहीं बल्कि वर्गीय परिघटना है***
3
भाजपा की जीत में बसपा की अहम भूमिका : आज के दौर में अम्बेडकरवादी व्यवहारवाद का तार्किक परिणाम***
4
झूठे प्रचार को अनन्त दुहराव के ज़रिए सच के तौर पर स्थापित करने की भाजपा की रणनीति***
5
उत्तर प्रदेश के कुलकों-धनी किसानों ने जमकर किया भाजपा का समर्थन**
Sunday, February 6, 2022
Budget
THE finance minister presented the Budget 2022 in the backdrop of an economic scenario when majority of the people are facing job loss and huge cuts in real income.
GDP in the current
financial year is estimated to marginally cross the pre pandemic levels. The private consumption expenditure is still short of the pre-pandemic levels and industries are facing low capacity utilisation and rising inventories primarily because of very low demand in the economy.
In such a scenario what was needed in the budget was a big push towards job creation and increasing domestic demand. The budget fails patently in addressing these issues. What was required was introducing an urban employment guarantee scheme.
On the contrary, it has cut down expenditure by Rs 25,000 crores in MGNREGS and reduced food, fuel and fertilizer subsidies and also the allocations in health and rural development.
The budget has proposed a growth in total expenditure by Rs 1,74,909 crores from the revised estimates of 202122 but as percentage of GDP the total expenditure has come down from 17.8 per cent in 2020-21 to 15.3 per cent in 2022-23 budget estimates.
The growth of revenue receipts has primarily grown as corporates were able to accumulate profits during the pandemic reflected through increased corporation tax realisation and also garnered through GST and hike in petroleum prices from indirect taxes levied upon common people.
However the growth of expenditure is far short from the growth of revenue receipts and in real terms is even less than what it was in last year’s revised estimates. The squeeze on expenditure is not merely in the central government expenditure. By squeezing the transfer of resources to states, the state governments are also being forced to do the same.
These transfers are to come down from 6.91 per cent of GDP in RE 2021-22 to 6.25 per cent in 2022-23. Allocations to all major schemes for farmers have seen a budget cut. The allocation for procurement to FCI and under decentralisation procurement scheme has been reduced by about 28 per cent at a time when farmers are struggling for a legally guaranteed MSP.
Allocation of funds for fertilizer subsidy has been reduced by 25 per cent. Under PM-KISAN, 12.5 crore farmer households are supposed to be provided Rs 6000 each which requires an allocation of Rs 75,000 crores. However, only Rs 68,000 crores have been allocated. Allocation for the crop insurance scheme has also fallen by about Rs 500 crores.
In all the recent years, government has not spent even the meagre allocation for welfare of children. The revised estimates for expenditure on welfare of children is Rs 5,700 crores less than what was budgeted. Nothing has been done to help children cope with the devastating impact of closure of schools and anganwadis.
Allocation of funds for the welfare of Scheduled Castes and Scheduled Tribes shows a marginal increase in absolute figures but factoring inflation it has come down in real terms.
Similarly, the renaming of mid-day meal scheme as PM Poshan could not raise the allocation from Rs 10,234 crores despite of 35 per cent of children not receiving MDM during the last year.
The finance minister talked about Narishakti upgrading two lakh anganwadis but the allocation is frozen at the revised estimates at Rs 20,000 crores. Over the last two years, there has been a huge cut in LPG subsidy. Last year, allocation was cut by 60 per cent and another 60 per cent cut has been inflicted in the budget for 2022-23.
No new allocation has been budgeted for the unorganised workers who were registered through e-shram portals. During the last two years of pandemic, the rich have become richer. According to Oxfam, wealth of India’s richest families reached a record high in 2021.
The top ten people in India hold 57 per cent of the wealth. Yet, there is no proposal to impose tax on these super profits and use these resources to provide relief to the vast majority of suffering people. Therefore, the budget 2022-23 has completely failed in identifying the priorities to provide relief for the common people. It is a betrayal.
The Polit Bureau of the CPI(M) calls upon the people to protest against this anti-people, pro-corporate budget demanding direct cash transfer of Rs 7,500 per month to all families outside the income tax bracket and distribution of free food kits. Budget 2022-23 ... contd from front pg
यह बजट किसका बजट
यह बजट किसका बजट
वित्त मंत्री ने आर्थिक परिदृश्य की पृष्ठभूमि में 2022 का बजट पेश किया, जब अधिकांश लोगों को नौकरी छूटने और वास्तविक आय में भारी कटौती का सामना करना पड़ रहा है।वर्तमान में सकल घरेलू उत्पाद वित्तीय वर्ष पूर्व महामारी के स्तर को मामूली रूप से पार करने का अनुमान है। निजी उपभोग व्यय अभी भी पूर्व-महामारी के स्तर से कम है और उद्योगों को कम क्षमता उपयोग और बढ़ती सूची का सामना करना पड़ रहा है, जिसका मुख्य कारण अर्थव्यवस्था में बहुत कम मांग है।
ऐसे परिदृश्य में बजट में जिस चीज की जरूरत थी, वह थी रोजगार सृजन की दिशा में एक बड़ा धक्का और घरेलू मांग में वृद्धि। बजट इन मुद्दों को हल करने में पूरी तरह विफल है। शहरी रोजगार गारंटी योजना शुरू करने की आवश्यकता थी।
इसके विपरीत, इसने मनरेगा में 25,000 करोड़ रुपये की कटौती की है और खाद्य, ईंधन और उर्वरक सब्सिडी और स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास में आवंटन में भी कमी की है।
बजट ने 2021-22 के संशोधित अनुमानों से कुल व्यय में 1,74,909 करोड़ रुपये की वृद्धि का प्रस्ताव किया है, लेकिन सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के रूप में कुल व्यय 2020-21 में 17.8 प्रतिशत से घटकर 2022-23 बजट अनुमानों में 15.3 प्रतिशत हो गया है।
राजस्व प्राप्तियों की वृद्धि मुख्य रूप से बढ़ी है क्योंकि कॉरपोरेट कर की वसूली में वृद्धि के माध्यम से परिलक्षित महामारी के दौरान कॉरपोरेट मुनाफा जमा करने में सक्षम थे और जीएसटी के माध्यम से और आम लोगों पर लगाए गए अप्रत्यक्ष करों से पेट्रोलियम की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण भी।
हालांकि व्यय की वृद्धि राजस्व प्राप्तियों की वृद्धि से बहुत कम है और वास्तविक रूप में पिछले वर्ष के संशोधित अनुमानों की तुलना में भी कम है। खर्च पर निचोड़ केवल केंद्र सरकार के खर्च में नहीं है। राज्यों को संसाधनों के हस्तांतरण को निचोड़ कर राज्य सरकारों को भी ऐसा करने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
ये हस्तांतरण आरई 2021-22 में सकल घरेलू उत्पाद के 6.91 प्रतिशत से कम होकर 2022-23 में 6.25 प्रतिशत होना है। किसानों के लिए सभी प्रमुख योजनाओं के आवंटन में बजट में कटौती हुई है। एफसीआई और विकेंद्रीकरण खरीद योजना के तहत खरीद के लिए आवंटन में लगभग 28 प्रतिशत की कमी की गई है, ऐसे समय में जब किसान कानूनी रूप से गारंटीकृत एमएसपी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
उर्वरक सब्सिडी के लिए धन आवंटन में 25 प्रतिशत की कमी की गई है। PM-KISAN के तहत, 12.5 करोड़ किसान परिवारों को प्रत्येक को 6000 रुपये प्रदान किए जाने चाहिए, जिसके लिए 75,000 करोड़ रुपये के आवंटन की आवश्यकता है। हालांकि, केवल 68,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। फसल बीमा योजना के आवंटन में भी करीब 500 करोड़ रुपये की गिरावट आई है।
हाल के सभी वर्षों में, सरकार ने बच्चों के कल्याण के लिए मामूली आवंटन भी खर्च नहीं किया है। बच्चों के कल्याण पर खर्च का संशोधित अनुमान बजट से 5,700 करोड़ रुपये कम है। स्कूलों और आंगनबाड़ियों को बंद करने के विनाशकारी प्रभाव से निपटने में बच्चों की मदद करने के लिए कुछ भी नहीं किया गया है।
अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के लिए धन का आवंटन निरपेक्ष आंकड़ों में मामूली वृद्धि दर्शाता है लेकिन मुद्रास्फीति को ध्यान में रखते हुए यह वास्तविक रूप से नीचे आ गया है।
इसी तरह, पिछले वर्ष के दौरान एमडीएम प्राप्त न करने वाले 35 प्रतिशत बच्चों के बावजूद, मध्याह्न भोजन योजना का नाम बदलकर पीएम पोषण 10,234 करोड़ रुपये से आवंटन नहीं बढ़ा सका।
वित्त मंत्री ने नारी शक्ति को दो लाख आंगनबाड़ियों के उन्नयन की बात कही, लेकिन आवंटन संशोधित अनुमानों पर 20,000 करोड़ रुपये पर रुका हुआ है। पिछले दो वर्षों में एलपीजी सब्सिडी में भारी कटौती की गई है। पिछले साल, आवंटन में 60 प्रतिशत की कटौती की गई थी और 2022-23 के बजट में एक और 60 प्रतिशत की कटौती की गई थी।
ई-श्रम पोर्टल के माध्यम से पंजीकृत असंगठित श्रमिकों के लिए कोई नया आवंटन बजट नहीं किया गया है। महामारी के पिछले दो वर्षों के दौरान, अमीर और अमीर हो गए हैं। ऑक्सफैम के मुताबिक, भारत के सबसे अमीर परिवारों की संपत्ति 2021 में रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई।
भारत में शीर्ष दस लोगों के पास 57 प्रतिशत संपत्ति है। फिर भी, इन अत्यधिक लाभ पर कर लगाने और पीड़ित लोगों के विशाल बहुमत को राहत प्रदान करने के लिए इन संसाधनों का उपयोग करने का कोई प्रस्ताव नहीं है। इसलिए बजट 2022-23 आम लोगों को राहत देने की प्राथमिकताओं की पहचान करने में पूरी तरह विफल रहा है। यह एक विश्वासघात है।
सांस्कृतिक आंदोलन
सांस्कृतिक आंदोलन
हिंदी प्रदेशों में सांस्कृतिक आंदोलन की बहुत जरूरत है। आज की परिस्थितियों में भाषा, साहित्य, संगीत, ललित कलाएं और वैज्ञानिक सोच एक सही रास्ता दिखा सकते है।
यह रास्ता लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक सद्भाव, सहयोग,एकता, प्रेम और विश्वास, ईमानदारी और सच्चाई का रास्ता होगा। हिंदी प्रदेशों में सांस्कृतिक आंदोलन का वैचारिक आधार भारतीय संविधान में वर्णित बुनियादी मूल्य और मान्यताएं होना चाहिए।
यह आंदोलन छोटे बड़े शहरों, क़स्बों और बड़े गांव में चलना अधिक आवश्यक है।
इस आंदोलन को संगठनों द्वारा या छोटे समूह बनाकर या व्यक्तिगत स्तर पर भी चलाया जा सकता है।
कार्यक्रम की रूपरेखा अनेक प्रकार से बनाई जा सकती है। समूह को जैसी सुविधा हो उस तरह रूपरेखा बनाई जाए।
निम्नलिखित गतिविधियां अयोजित की जा सकती हैं। अपनी अपनी रुचि/परिस्थितियों/साधनों के अनुसार समूह गतिविधियोँ का चयन कर सकते हैं।
1. सांस्कृतिक और साहित्यिक समारोह
2.सेमिनार, विचार गोष्ठियां/ रचना पाठ
3. कला और पुस्तक प्रदर्शनी
4. नाटक का मंचन
5. पुस्तकालय आंदोलन/ पुस्तक साझा योजना
6. संगीत सभाएं
7. बच्चों के लिए कार्यक्रम
8. पुस्तिका/ पत्रिका प्रकाशन
9. फ़िल्म/डॉक्यूमेंट्री दिखाना और उस पर बातचीत
10. स्कूल कॉलेजों के पुस्तकालयों में हिंदी की किताबें भेंट करना
यह बाधा नहीं बनना चाहिए कि मैं अकेला कुछ नहीं कर सकता। जब और लोग आएंगे, समूह बनेगा तभी कुछ काम होता है। मोहल्ला स्तर पर या व्यक्तिगत रूप से भी ये काम किए जा सकते हैं और बहुत से लोग कर भी रहे हैं।
आयोजन की योजना बनाते समय और उसे प्रभावशाली, कम खर्चीला बनाने के लिए हिंदी प्रदेशों में कार्यरत बहुत से साहित्यिक, सांस्कृतिक, सामाजिक संगठनों और लोगों से मदद ली जा सकती है। जिन मित्रों को ऐसे संगठनों, संस्थानों और व्यक्तियों की जानकारी है वे इसे साझा भी कर सकते हैं।
युवा मित्र इस काम को आगे बढ़ा सकते हैं।
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पहले वाले गांव
रसायनिक हथियार आये पहले क़ि शमशीर नहीं
वक्त के साथ बदलती इस दुनिया का दस्तूर यही
कबीर रैदास सूफी संतों ने घुमा फिर ये बात कही
रोहतक जो छप्पन में था बची वह तस्वीर नहीं
खाना पीना बदल गया अब ज्वर बाजरे बचे कहाँ
हरयाणा नंबर वन हुआ डिस्को डांस में फ़सा जहाँ
बथुआ राबड़ी खिचड़ी गौजी बची खाने में खीर नहीं
कडुआ सच है बदलाव का इसे समझना जरूरी देखो
देखनी होगी दिशा इसकी इसको परखना जरूरी देखो
बदलाव कई तरह के होते कुछ को माने जमीर नहीं
जनता हक़ में बदलाव के ये नारे बहोत उछाले हैं
जनता बहकावे में आई मुंह से ये दूर हुए निवाले हैं
तर्क की नजर जनता की बणी प्रहरी रणबीर नहीं
वोट किसे देनी है
सीखने के संकटकाल पर ध्यान दिलाने हेतु वोट
महामारी के चलते हर क्षेत्र की गतिविधियों में उल्लेखनीय गिरावट देखी जा रही है जिसके चलते गरीबों के लिए जीवनयापन एक चुनौती बन गया है І लेकिन सुदूर में जब हम देखते हैं तो पाते हैं कि इससे स्कूल जाने वाले बच्चे बहुत प्रभावित हुए हैं जिनको गुज़रे लगभग दो सालों के दौरान नियमित स्कूल से दूर रहना पडा І उक्त परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए निम्न समस्याओं पर त्वरित रूप से ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है –
• कई स्कूलों में बच्चों को अभी मध्यान्ह भोजन नहीं दिया जा रहा है तथा परिवारों को जो सूखा राशन दिया गया है वह बहुत ही कम मात्रा में बच्चों को मिल पा रहा है І ख़राब आर्थिक हालातों के चलते गरीब लोग अधिक प्रभावित हुए हैं और बच्चे गंभीर कुपोषण का सामना कर रहे हैं І
• इस सबके चलते बच्चों का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हुआ है І स्कूलों के माध्यम से उनका समाजीकरण न होने और शारीरिक समूह खेलों के न हो पाने के चलते बच्चों की भावनात्मक स्थितियां भी समस्यापूर्ण हुई हैं І
• कुछ बच्चे विशेषकर लड़कियों को अपने परिवार में ही उत्पीड़न का सामना करना पडा है और स्कूल के रूप में जो एक सुरक्षित जगह उन्हें मिल पाती थी वह अब नहीं मिल पा रही है І
• कई बच्चों ने काम पर या मजदूरी के लिए जाना शुरू कर दिया है जिसके चलते उनका फिर से नामांकन कर उन्हें स्कूल में ला पाना मुश्किल होगा І किशोरावस्था के कई बच्चे शराब और अन्य असामाजिक व्यवहारों की तरफ़ भी चले गए हैं І
• विशेषकर ग़रीब परिवारों के बच्चों का एक बड़ा तबका है जिसको पिछले लगभग दो वर्षों से औपचारिक शिक्षण से दूर रहना पडा है І जब स्कूल खुलेंगे तब हम यह उम्मीद नहीं कर सकते कि बच्चे आसानी से लौट आयेंगे और सब कुछ वैसे ही सीखने लगेंगे І स्कूल आना और सीखना एक तरह की आदत होती है जिसे फिर से स्थापित करने हेतु धैर्य की आवश्यकता होती है І
• जब 5 फ़ीसदी से भी कम ग्रामीण घरों में कंप्यूटर है और केवल 15 फ़ीसदी लोगों के पास डिजिटल शिक्षण हेतु आवश्यक, इंटरनेट तक अर्थपूर्ण पहुँच है तब ऐसी परिस्थितियों में ऑनलाइन शिक्षण के महत्व के दावे करना व्यापक तौर पर झूठ तो है ही साथ ही बहुसंख्य लोगों के शिक्षा के अधिकार की अनदेखी भी है І
• वे बच्चे जिनकी ऑनलाइन शिक्षण तक पहुँच है उनमें से अधिकाँश बच्चों को इन्टरनेट और स्क्रीन का नशा होने लगा है जिसके उनके स्वास्थ्य पर बहुत ही घातक दुष्प्रभाव देखने में आ रहे हैं І
• शिक्षकों का भी अपने विद्यार्थियों के साथ बहुत ही कम संपर्क रह गया है और इन मौजूदा चुनौतियों के कारण वे भी बहुत हताश महसूस कर रहे हैं І जब फिर से स्कूल खुलेंगे तब इन महत्वपूर्ण बदलावों को वे आसानी से नहीं ले पायेंगे І
लोगों के अधिकारों को महत्त्व दिलाने और राज्य को अपने उत्तरदायित्वों के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए चुनाव एक लोकतांत्रिक अवसर होते हैं І महामारी के लगभग दो सालों के बाद हम बच्चों की शिक्षा के अवसर पैदा करने से राज्य को मुकरने नहीं दे सकते हैं І स्कूल सुरक्षित तरीकों से पुनः आरम्भ हों, सभी बच्चों की शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और बौद्धिक आवश्यकताएं अनिवार्य रूप से पूरी करते हुए बच्चे जिस किसी भी स्तर पर हों उन्हें शिक्षण प्रदान कराया जाना चाहिए І राजनैतिक दलों व चुनाव में उम्मीदवारों को आवश्यक रूप से इस बात के लिए मजबूर किया जाना चाहिए कि उनके पास स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए क्या नीतियाँ व योजनायें हैं यह सभी को बताएं І
शिक्षा के अधिकार को दृढ़ता से लागू करने के लिए वोट; सामजिक न्याय के लिए वोट
हमारी प्रतिबद्धता
हमारी प्रतिबद्धता
वास्तव में हिपोक्रेटिस की शपथ चाहे अपने मूल रूप में हो या संशोधित रूप में नैतिक सिद्धांतों की तमाम और घोषणाओं की तरह ही है। यह जितनी दृढ़ है उतनी उसका सम्मान और हिफ़ाजत करने की लोगों की इच्छा शक्ति नहीं है। "स्वतंत्रता के घोषणापत्र" ने ऐलान किया था कि आजादी इंसान का अपना जन्मसिद्ध अधिकार है। फिर भी अमेरिकी नीग्रो लोगों को गुलाम बनाए रहे। इसी प्रकार हिपोक्रेटिस की शपथ का यह ऐलान है कि चिकित्सक की प्राथमिक वफादारी अपनी मरीज के प्रति है। फिर भी चिकित्सक इस वफादारी की बलि देते हैं--मध्यकाल में चर्च की सेवा में और आधुनिकजगत में राज्य की ।
----थॉमस एस. साज
Sunday, January 16, 2022
आज का दौर और हमारी सेहत
आज का दौर और हमारी सेहत
भारत की और हरियाणा के स्वास्थ्य सेवाओं के ढांचे में भी व्यापक स्तर की पुर्नगठन की प्रक्रियाएं जारी हैं और पिछले दशक से और तेजी पकड़ रही हैं।बड़े पैमाने पर प्राईवेट मैडीकल सैक्टर का फैलाव , स्वास्थ्य सेवाओं में प्राईवेट इंशोरैंस कम्पनियों की दखलन्दाजी , सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में मैडीकल सर्विसिज के लिए पेमैंट सिस्टम की शुरुआत पिछले दशकों में हुई तीन मुख्य तबदीलियां हैं। मैडीकल एजुकेशन का बड़े पैमाने पर व्यापारिकरण साफ नजर आने लगा है जब कई राज्यों में प्राईवेट मैडीकल कालेजों में एम बी बी एस कोर्स की फीस दो करोड़ रुपये कर दी गई है। हरियाणा के बुढ़ेड़ा मैडीकल कालेज में भी एक करोड़ की फीस बताई जा रही है। जिस तेजी के साथ ये बदलाव आ रहे हैं इससे एक संशय की बड़ी जगह संवेदनशील दिमागों में बनती है। हो सकता है कि यदि हम उस रफतार से चले तो आने वाले कुछ वर्षों में हम स्वास्थ्य क्षेत्र में अमरीकी मॉडल जो कि बहुत मंहगा है, मुनाफे से संचालित है, तकनीक(टैक्नोलोजी) इंटैंसिव है, अन्यायपूर्ण व ना बराबरी पर टिका हुआ है, को भारत वर्ष में प्रस्थापित कर देंगे।पूरी पूरी सम्भावना है कि बहुत जल्द ही हमारा स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा आम आदमी की पहुंच से बाहर हो जायेगा। हम में से काफी लोग यह भी महसूस करते हैं कि इससे उपजा असंतोष जन मंचों के माध्यम से अभिव्यक्ति पा रहा है और आने वाले समय में और तीखे स्वरों में उठाया जायेगा। इसमें एक हैरानी की बात यह है कि सरकारें तथा उनकी एजैंसीज भी इस कोरस में शामिल हो रही हैं। कोरोना की महामारी ने इन सब बातों को जग जाहिर कर दिया है।
गुड गर्वनैस के सिद्धान्त पर चलते हुए स्वास्थ्य सेवाओं की दोहरी व्यवस्था - एक अमीरों के लिए और एक गरीबों के लिए- के नियम को आगे बढ़ाया जा रहा है ताकि समता के मसले को आसानी से टैक्ल किया जा सके बिना उस प्रक्रि के साथ छेड़खानी किये बगैर जिसके चलते विनिवेश की प्रक्रिया चालू रही रहे। समाज के एक छोटे से अमीर और सर्विस के हिस्से के लिए अर्न्तराष्ट्रीय स्तर की उच्च तकनीक आधारित स्वास्थ्य सेवाओं का विकास जा रहा है और उसके माध्यम से फोरन एक्सचेंज कमाने का तर्क भी दिया जा रहा है। इसको हैल्थ टूरिज्म का नाम दिया गया है। गरीब लोगों के लिए सरकार विश्व बैंक की 1993 की रिपोर्ट पर आधारित सुझााव के हिसाब से ‘‘मुफत’’ ‘‘ मिनिमम क्लीनिकल पैकेज’’ देगी।
मूलभूत सवाल यह उठता है कि गरीब लोगों की जो बीमारियों का परोफाइल क्या उसका जो ‘‘ मिनिमम एसैन्सियल क्लीनिकल पैकेज ’’ सुझाया जा रहा है , उसके साथ कोई तारतम्य भी है? इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि इस पैकेज से हम गरीबों की बीमारियों का इलाज सम्भव नहीं है। इसके साथ ही सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में लागू किये जा रहे यूजर चार्जिज के चलते समाज के इस हिस्से के लिए अपनी स्वास्थ्य समस्याओं के समाधान के लिए कोई जगह शायद ही बच पायेगी। इसी कारण से गरीबों के हिस्सों में भी एक ऐसा रुझान देखने को मिलता है कि वे यदि सम्भव हो तो या कुछ बेचकर जुगाड़ करके प्राईवेट सैक्टर में अपना इलाज करवाते हैं। ऐसा वे तभी करते हैं जब उनके पास दूसरा कोई विकल्प नहीं बचता। बीमारी काफी गम्भीर होती है या इलाज काफी महंगा होता है तो वे सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की शरण में आने को मजबूर होते हैं या प्राईवेट डाक्टर के पास लुट पिट कर सरकारी अस्पतालों में पहुंचते हे। इस आबजरवेशन की विडम्बना यह है कि लोगों और खासकर गरीब लोगों द्वारा अपने स्वास्थ्य पर किये जा रहे खर्च को उनकी इलाज के लिए ‘‘रजामन्दी’’ रुपी ब्यान के रुप में पेश किया जाता है। जबकि सच्चाई यही है कि दूसरे विकल्पों के अभाव में ऐसा किया जाता है न कि एक च्वाइस के रुप में। उन सर्वेक्षणों को जो इलाज पर परिवार द्वारा किये गये खर्चों के संदर्भ में किये गये हैं दो क्रिटिकल फैक्टरज के संदर्भ में देखे जाने की जरुरत है। एक तो यही कि उस पैसे की उगाही किस तरह और किन हालात में की गई और दूसरा यह कि इस खर्चे का परिवार पर कुल मिलाकर क्या आर्थिक असर पड़ा। जहां इस प्रकार की स्टडीज में स्वास्थ्य पर हुए खर्च को तो उजागर किया जाता है मगर इस खर्च के कारण जो कर्ज में डूबने की बात है उस पर चुप्पी साध ली जाती है। यह बात गरीब लोगों के हितों के खिलाफ जाती है। मजबूरी में जमीन बेचते हैं लोग । इस प्रकार की स्टडीज ने सर्विस के लिए पैसे वसूलने के सिद्धान्त को आधार दिया तथा पब्लिक अस्पतालों में भी ‘‘ यूजर चार्जिज’’ की शुरुआत हुई। यहां भी उदघोषित उद्येश्य बताया गया कि इन ‘‘ यूजर चार्जिज ’’ को गरीब लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाएगा मगर असलियत यह है कि समाज का वह हिस्सा जो थोड़ा बहुत खर्च करने की क्षमता रखता है उसे भी ‘‘प्राईवेट हैल्थ सिस्टम’’ की धकेल दिया गया है - साफ है कि यदि उसे पैसा खर्च करना है तो वह सैकेंड बैस्ट की च्वाइस क्यों करेगा ? और प्राईवेट अस्पतालों को राज्य सरकारों ने सरकारी कर्मचारियों के लिए एमपैनलमैंट पर रख कर और प्रोत्साहन दिया है। इन अस्पतालों में करीब 60 प्रतिशत मरीज सरकारी कर्मचारी होते हैं जिनका इलाज का खर्च सरकार वहन करती हैं। दूसरी तरफ पब्लिक सैक्टर के अस्पतालों में ‘यूजर चार्जिज ’ लागू होने के बावजूद वहां की गिरती हुई स्वास्थ्य सेवाओं के क्या कारण हैं? पंजाब में सरकारी अस्पतालों में मरीजों की संख्या काफी कम हुई है। इतना ही नहीं वर्तमान हालात में गरीब लोगों पर दोहरी मार पड़ रही है, जब वे सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का इस्ते माल करते हैं तो एक तो पैसा देना पड़ता है अप्रत्यक्ष करों के रुप में और दूसरे सीधे टैक्स ‘‘ यूजर चार्जिज’’ के रुप में भी पैसा देना पड़ता है। प्राईवेट सैक्टर में कम्पीटीसन के नाम पर कम कीमत में स्वास्थ्य सुविधाएं मिलने का तर्क दिया जाता है। मगर असली सच्चाई यही है कि जब बाजार व्यवस्था का एक मात्र लक्ष्य किसी भी कीमत पर अपना मुनाफा बढ़ाना हो तो प्राईवेट सैक्टर किसी भी कीमत पर किसी भी किस्म का कम्पीटीसन बर्दाश्त नहीं करता। सुधारीकरण के नाम पर सैकण्डरी और टरसरी स्तर की सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को एक एक करके पी पी पी मॉडल के तहत प्राईवेट हाथों में देने के काम को एक तरह से प्राईवेटाइजेशन के सामने खड़े अवरोध को दूर करने की परिणीति के रुप में ही देखा जाना चाहिये। यहां तक भी तैयारी है कि सरकार अपनी भूमिका बदल ले। अब तक स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में सरकार की भूमिका सर्विस प्रोवाइडर की रही है। मगर अ बवह फाइनैंसर की भूमिका में आ रही है जो कि गरीबों के लिए प्राईवेट हैल्थ प्रोवाइडर से सेवाएं खरीद कर गरीबों को दिलवा सके। और यह बात प्राईवेट सैक्टर की स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने वालों में कम्पीटीसन करवाकर गरीबों को क्वालिटी स्वास्थ्य सेवाएं हासिल करवाने का सरकार बहुत ही कारगर तरीका मान रही है। यह एक तरह से पहले से ही बड़े पैमाने पर सबसिडाइज्ड प्राईवेट हैल्थ सैक्टर को और अधिक सबसिडी देने का ही एक तरीका है।
आज हम इतिहास के उस मुकामपर हैं जहां भारतवर्ष ने उननिवेषवाद से मुक्ति पाये आजादी के 69 साल के करीब हो गये हैं।हम आज पतिहास के उस मुकाम पर भी हैं जहां भारतवर्ष ने सहर्ष रुप में ढांचागत समायोजन कार्यक्रम स्वीकार करके नवउपेनिवेषवाद की नई गुलामी को एक बार फिर स्वीकार कर लिया है। इस 69 संस की आजादी के दौरान गरीब लोगों की एक ऐसी भी पीढी पैदा हुई जो अपने पूरे जीवन काल में ता उम्र दो जून की रोटी की लक्जरी के बगैर ही मर गई। दूसरी तरफ उन्होंने यह भी देखा कि उनके खून पसीने की कमाई से हुए विकास के फलों को समाज के एक छोटे हिस्से के कम्फरट और एन्ज्वायमैंट के लिए सुरक्षित करके रख लिया गया- यह तबका है उच्च वर्ग और स्वर्ण जाति का। यह महज एक दुर्घटना की बात नहीं है कि हमारे समाज का यही हिस्सा जिसने हमारी आजादी के सबसे ज्यादा सुख भोगे आज हमारे देश की संप्रभुता और भविष्य को गिरवी रख कर अपने लिए अर्न्तराष्ट ªीय स्तर के शासक वर्गों में अपना स्थान ढंूढ़ रहा है। इस बात को समझना बहुत जरुरी है।
70 साल के लगभग का समय कम नहीं होता जिसमें हमें हमारे शासक वर्ग की नीतियों के बारे में, उनके इरादों के बारे मेंए लोगों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को लेकर अन्दाजा न हुआ हो। पाले बन्दी साफ होती जा रही है। यह महज एक चांस की बात नहीं है बल्कि च्वाइस की बात है कि हमारे देश में लाखों लोग लम्बी भूख के दौर से गुजर रहे हैं जबकि गोदामों में अनाज पड़ा पड़ा सड़ रहा है। यह महज चांस नहीं मगर च्वाइस है जिसने ट ªांसनेशनल पूंजी की डिक्टेटर सिप के लिए जमीन तैयार की है। हमारी राजसता से पार्लियामैंट को निष्क्रिय करवाने के इस पूंजी के गम्भीर प्रयास हो रहे हैं। उदाहरण के लिए यह महज चांस की बात नहीं है बल्कि च्वाइस का मसला है कि पिछले 69 साल में ‘‘ प्राइवेट मैडीकल सैंटर’’ का किस तरह से विकास हुआ। हम इस बात का क्या जवाब दे सकते हैं कि 80 के आरम्भ के दशक में जो प्राइवेट हैल्थ सैक्टर 20 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान कर रहा था वही अब 80 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान कर रहा है। इस प्राइवेट हैल्थ सैक्टर में काम करने वाले डाक्टर कहां से आते हैं? क्या ये डाक्टर हमारे शिक्षा व स्वास्थ्य शिक्षा के उत्पाद नहीं हैं जो बउ़े पैमाने पर गरीबों की मेहनत की कमाई में से सबसिडाइज्ड की जा रही है? गरीबों की यह कमाई इनडायरेक्ट टैक्सिज के द्वारा सरकार के पास पहंुचती है। हमें क्यों नहीं झटका लगता है जब हम हिपोक्रेटिक औथ के बावजूद मैडीकल समुदाय के अन्दर जातिवाद और साम्प्रदायिकता बडे़ पैमाने पर महसूस करते हैं? क्या यह मैडीकल समुदाय की उसकी जाति व वर्ग की लोकेशन के कारण नहीं है? क्या हमारी नीति में दोगलापन नहीं था या है? हमने आजादी के बाद लाइसैंसियेट डाक्टर जो कि हमारी बड़ी जनता की जरुरत था, की पढ़ाई जारी रखने की बजाय अर्न्तराष्ट ªीय दर्जे का डाक्टर बनाने की पढ़ाई पर जोर दिया जो पहले दुनिया के देशों में ब्रेन र्डेन के रुप में हमसे चला गया और आज देश में ही प्राइवेट सैक्टर में ब्रेन ड्रेन हो रहा हैं। हमारे हांव तक हम इस डाक्टर को जाने के लिए अभी तक प्रोत्साहित नहीं कर पाये। कभी सोचा है हम कैसा डाक्टर वपैदा कर रहे हैं? ऐसा आखिर क्यों किया गया?
आज जब हम एक तरफ तो अर्न्तराष्ट्रीय स्तर के ट्रेंड डाक्टरों की बहुतायत हमारे पास हैतो क्या हम उन तथकथित सब स्टैंडर्ड लाइसैंसियेट डाक्टरों की गरीबों के इलाज के लिए बात कर सकते हैं? जब हमने हमारी रनता के हिसाब से सफिसियैंट संख्या डाक्टरों की तैयार कर ली है तो हम रोजाना डाक्टरों की कमी का बहाना करके रोजाना और मैडीकल किस लिए खोले जा रहे हैं? विश्व बैंक 1993 जिसने हमारे देश के स्वास्थ्य सेवाओं के ढांचे को दिशा निर्देश दिये वह सरप्लस डाक्टरों के बारे चुप्पी क्यों साधे हुए है? दूसरी तरफ सच्चाई यह है कि कई पश्चिमी देशों में भारत के डाक्टर बड़ी संख्या में मौजूद हैं । हमारे देश की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति इस पर चुप क्यों है?उपनिवेशवाद की लिगेसी इसका जवाब नहीं हो सकती क्योंकि इसको पलटने के लिए हमारे पास 69 साल का समय रहा है। महज इतना भर कह देना काफी नहीं है कि ‘पब्लिक हैल्थ केयर सिस्टम ’ पर हमला बोला जा रहा है या इसे डिसमैंटल किया जा रहा है। बल्कि इसे परिभाषित करना बहुत आवश्यक हो गया है। असल में किस चीज पर हमला किया जा रहा है और क्या डिसमैंटल किया जा रहा है इसे व्याख्यायित किया जाना बहुत जरुरी हो गया है। साथ ही यह भी देखना है कि किस तरह से यह सब गरीब लोगों के स्वास्थ्य को प्रभवित करेगा हालांकि गरीब लोग इन सब प्रक्रियाओं को एक इनडिफरैंस, क्रोध और बेचैनी के साथ देख रहे हैं। जब टूटी फूटी बिखरी उपस्वास्थ्य केन्द्रों की इमारतों से लेकर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की इमारतों तक; स्वास्थ्य क्षेत्र के उपर से लेकर नीचे तक भ्रष्टाचार के चलते, गरीब विरोधी, जातिगत,लिंगभेद वाला मैडीकल प्रोफैसन और खासकर डाक्टर बतौर टीम लीडर के व्यवहार के कारण, दवाओं की कमी के कारण; उपकरणों की कमी,उपकरण हैं भी तो उनके इस्तेमाल करने वाले विषेशज्ञों की कमी, पी एच सी. एच. सी. और जिला अस्पतालों में ढीली स्वास्थ्य सेवाओं के चलते, गरीब विरोधी और महिला विरोधी जनसंख्या नियन्त्रण विभाग के हमलों के चलते- गरीब लोग जमीना स्तर पर मौजूद स्वास्थ्य सेवाओं के भ्रष्टीकरण के गरीब चश्मदीद गवाह हैं और उनपर इस बात का ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ने वाला जब उनको बताया जाता है कि यह सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा खत्म किया जा रहा है क्योंकि उसके लिए तो एक तरह से यह पहले से ही बन्द हो चुका है। आगे क्या आने वाला है इस बात पर उन लोगों के बीच में भी जो इस स्वास्थ्य सेवाओं के ढांचे के बारे में गम्भीरता से सोचते हैं एक चुप सहमति सी लगती है। और इस बात पर भी चुप सहमति लगती है कि अब इन बााजार की ताकतों को आगे बढ़ने से नहीं रोका जा सकता है। किसी भी व्यक्ति द्वारा उसके व्यक्गित विश्व दृृष्टिकोन के हिसाब से सरकार की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में बदलाव के लिए जो सोचा जाता है वह कुछ इस प्रकार कि विश्व बैंक और ट्रांसनेशनल पूंजी ने जो ढांचा और जगह देशों की सरकारों के माध्यम से बनाया है उसी में गरीब मरीजों की जगह कैसे बनाई जाए और साथ ही इस ढांचे को कोई चुनौती भी न दी जा सके। असल में मूलभूत ढंग से इन कमजोर तबकों की नजर से देखकर वैकल्पिक स्वास्थ्य ढांचे की परिकल्पना करना एक रणनीतिक काम है ताकि स्वास्यि सेवाओं की पहुंच इन तबकों तक हो सके।
यह विषय अधूरा रहेगा यदि नोन गवर्नमैंटल आरगेनाइजेशन ; एनजीओ (NGO ) के बारे में आलोचनात्मक विश्लेषन न किया जाए । ऐतिहासिक रुप से , एन जी ओ सैक्टर जिसे पहले वालैन्टरी सैक्टर कहा जाता था, ने समीक्षात्मक ढंग से राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति एवं प्रोग्रामों को मूर्त रुप देने में कंट्रीब्यूट किया है। आरम्भ में सर्विस प्रोवाइडर की भूमिका में, अस्पतानों के स्थपित करने खासकर ग्रामीण इलाकों में और हर स्तर की मैन पावर को टे ªनिंग देने के क्षेत्रों पर एम्फैसिस रेखांकित हुआ और इस दिशा में काम किया गया। कई सालों के बाद इस प्रकार के संगठनों ने व्यकित के स्वास्थ्य को ज्यादा व्यापक बनाते हुए समुदाय को शामिल करने की परिकल्पना विकसित की और वैकल्पिक स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में प्रयोग किये मसलन ग्रामीन स्वास्थ्य कार्य कर्ताओं को प्रशिक्षित करना, नीतिगत बदलाओं के लिए कैम्पेनिंग करना,असमानताओं के मामलों को हाई लाइट करना जन पक्षीय नजर के साथ समीक्षात्मक डाटा तैयार करना आदि महत्वपूर्ण योगदान रहे हैं। मगर पिछले दो दशकों से इनकी प्राथमिकताएं ज्यादातर फंडिंग संस्थओं के एजैंडा के हिसाब से तय होनी शुरु गई जो कई प्रकार कई प्रकार के ेवालों के घेरे में आ गई हैं। लोगों के साथ सीधे रुप से काम करने के बजाय प्राथमिकता लोबिंग और एडवोकेसी नीति निर्धारकों के साथ, को बदलाव लाने के ज्यादा प्रभावी तौर तरीकों के रुप में देखा गया। बीतते समय के साथ संघर्षशील लोगों के संघर्षों को समर्थन देने का काम धीरे धीरे कम होता चला गया तथा गरीब तबकों ने भी इन संस्थाओं को अविश्वास और सिनिसिज्म के साथ देखना शुरु कर दिया। एक सच्चाई यह भी है कि इस एन जी ओ सैक्टर के अन्दर एक हिस्सा ‘लिबरल वोकल मिडल क्लास’ का भी है जिसकी सोसल एकाउन्टैबिलिटी बहुत कम है तथा कोई विचार धारा नहीं हे या लम्बे समय तक निरन्तरता के साथ काम करने का संकल्प नहीं है। इस सबके चलते यह तबका ‘सिटिंग डॅक ’ फोर कोओपसन बन गया है। बाहर की फंडिंग पर निर्भरता देशी हो या बदेशी , का मतलब यह हो गया है कि ‘संकट के समय’ या ‘गम्भीर मसलों’ पर इनको मैनुपुलेट या प्रैसराइज किया जा सकता है और उनका ध्यान लोगों के जिन्दा रहने की जरुरतों के सवालों से हटाकर उनके अपने हितों के बचाव की तरफ कर दिया जाता है। यह वलनरेबलिटी तथा वैसीलेसन की तासीर की वजह से एन जी ओ सैक्टर की तरफ विश्व बैंक और राज्य का भी आकर्षण बढ़ा है क्योंकि इसमें मौजूद डाइसैंट के पोटैंसियल को वे अपने ढंग से दिशा देना चाहते हैं। एक रणनीतिक ढंग से सोच के साथ इन सभी एन जी ओज को चाहे वे किसी भी तरह की हैं, एक ही खाते में डाल देना , इनके वैचारिक पक्ष को धूमिल करने की चेष्टा रही है। यह पहला कदम था किसी भी प्रकार की असहमति की घेरा बन्दी करके खत्म करने का और इसका प्रतिरोध भी कमोबेश नहीं किया गया। इसीलिए इस एन जी ओ आन्दोलन के नेता गण आमतौर पर एक वैचारक के रुप में अग्रणी कतारों में नजर आते हैं और इन नीतियों व कार्यक्रमों को लागू करते दिखाई देते हैं जो सीधे सीधे ट्रांसनेशनल पूंजी के हित में हैं। इसके बावजूद यह अभी भी सम्भव है कि इस बड़ी उर्जा को सही दिशा में आगे बढाया जा सके ताकि जो शोषण कारी नीतियां हैं उनका विरोध किया जा सके। जनसंख्या निसन्.ण कार्यक्रमों , खतरनाक गर्भ निरोधकों, दवा उद्योग के खिलाफ इस प्रकार के विरोध के सटीक उदाहरण हैं। इसी प्रकार ‘पीपल्ज हैल्थ असैम्बली’ एक आक्र इसी प्रकार का व्यापक प्रयास है। जन स्वास्थ्य अभियान भारत और हरियाणा के स्तर पर सक्रिय है।
पिछले दशक में और भी खतरनाक बदलावों की शुरुआत 2005 में डबल्यू टी ओ संधि लागू हो जाने के बाद सामने आने लगी और ये बदलाव जोर पकड़ते गये हैं। वैश्वीकरण के नाम पर सुधारीकरण की प्रक्रिया के चलते बढ़ती बेरोजगारी, कर्मचारियों की छंटनी,कैजुअल व कॉन्ट्रेक्चुअल लेबर की तरफ बढ़ते कदम, कम तनखाएं आदि रुझान सामने आने लगे जो अब और जोर पकड़ते जा रहे हैं।इसके साथ साथ स्वास्थ्य सुविधाओं के निजीकरण के कारण म्हंगा होता इलाज तथा म्हंगी होती दवाएं अपने दुष्प्रभाव दिखा रहे हैं। इस प्रकार के बदलाव गरीब लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर डाल रहे हैं जिनके चलते बीमारियां तथा उनके कारण हो रही मौतें बढ़ती जा रही हैं।
हम वर्तमान और भविष्य के बारे में बिना भूतकाल पर चर्चा किये बातचीत नहीं कर सकते । इसके बावजूद हमें वर्तमान और भविष्य से सरोकार है। इसके अलावा 2001 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति पर उठी बहस के बाद ऐसा महसूस किया जा रहा है कि पब्लिक हैल्थ की पुरानी परिभाषा में ही बदलाव आ रहा है। हमें आर्थिक , राजनीतिक सरोकारों व मजबूरियों की जिनके चलते हमारे देश की राष्ट्रीय स्वास्थय नीतियां देश की आजादी से लेकर अब तक बनती रही हैं, एक बार फिर समीक्षा की जरुरत है तथा इसके जहां आवश्यक हो वहां इसके पिछले उपनिवेशवादी दौर व परम्पराओं के संदर्भ में भी देखने की जरुरत है तभी नई स्वास्थ्य नीति जो कि स्ट क्चरल एडजैस्टमैंट प्रोग्राम के तहत लागू की जा रही हैं को देखने का कोई मतलब है और तभी एक जन सापेक्ष स्वास्थ्य नीति तथा देश में स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा सोच सकते हैं।
Tuesday, November 2, 2021
गणतन्त्र की रक्षा में
गणतंत्र की रक्षा में: बोस, नेहरू, अंबेडकर और गांधी की याद में
– आल इंडिया पीपुल्स साईंस नेटवर्क अभियान 23 से 30 जनवरीभारत का संविधान 26 नवंबर को संविधान सभा में पारित किया गया, और 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। इस संविधान ने भारत को एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में घोषित किया। इसका अर्थ यह है कि समाज के सभी वर्गों को, नस्ल, धर्म या जाति के बावजूद, राष्ट्र में पूर्ण अधिकार प्राप्त हैं। इसी संविधान में सम्माननीय जीवन स्तर का अधिकार भी शामिल है। यह वोही धर्मनिरपेक्ष भारत है जिसके लिए महात्मा गांधी ने अपना बलिदान दिया। आज दोनों ही सामाजिक और आर्थिक रूप से धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र और लोकतंत्र खतरे में हैं।p
अंबेडकर ने संविधान सभा को दिए गए अपने भाषण में स्पष्ट किया कि लोकतंत्र का अर्थ सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र दोनों से है; इनके बिना, लोकतंत्र सिर्फ एक नाम मात्र है। आर्थिक लोकतंत्र की इस दूरदर्शिता ने जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस को अंबेडकर के साथ एकजुट किया। उनके अनुसार, भारत को औद्योगिक और कृषि उत्थान के लिए न सिर्फ सार्वजनिक क्षेत्र की योजना और निर्माण की परम आवश्यकता है, बल्कि देश के सभी वर्गों के लिए विकास के लाभों को फिर से वितरित भी करना है। यह केवल अर्थव्यवस्था में राज्य के हस्तक्षेप से ही मुमकिन हो सकता है जिससे भारत को ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौर की गरीबी, अकाल, विषम जीवन प्रत्याशा और अशिक्षा से मुक्त कराया जा सके।
23 जनवरी (सुभाष बोस का जन्मदिन) से लेकर 30 जनवरी ( जब गोडसे द्वारा महात्मा गांधी की हत्या की गई थी) के इस सप्ताह को हमारे गणतंत्र के चार दिग्गजों – महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, बीआर अंबेडकर, और सुभाष चंद्र बोस को याद करें। इन चार नेताओं को एक लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष गणराज्य के प्रतिनिधित्व के रूप याद रखना बहुत महत्वपूर्ण है। आज हम सरकार के खुले समर्थन के साथ विशेष रूप से अल्पसंख्यकों और दलितों पर हिंसक हमलों को देखते हैं। आल इंडिया पीपुल्स साइंस नेटवर्क धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य के वचन के साथ एक राष्ट्रीय आन्दोलन के रूप में लोगों के साथ प्रचार करेगा, और इस लोकतंत्र को पटरी से उतारने के सभी प्रयासों का विरोध करेगा।
आज हम अम्बेडकर, बोस, पटेल और गांधी को नेहरू के खिलाफ मोर्चा खोलने की निरंतर कोशिशों को देखते हैं। ऐसा करने वाले लोगों का मानना है कि हमारी यादें कमजोर हैं, और हम अपने अतीत को भूल गए हैं। हां, निश्चित रूप से इन सभी नेताओं में आपसी मतभेद थे। वे मजबूत विचारों वाले नेता थे, उनके बीच असहमती भी होती थीं और कभी कभी बहुत कठोर मतभेद भी हो जाते थे, और यह सभी राष्ट्रहित कि दिशा में होते थे। लेकिन आरएसएस-हिंदू महासभा, भाजपा के वैचारिक संस्थापकों, और मुस्लिम लीग में नेताओं के विपरीत, वे सभी एक स्वतंत्र भारत के लिए अंग्रेजों के खिलाफ लड़े थे।
बोस ने तिरस्कारपूर्वक उल्लेख किया कि किस तरह हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग ब्रिटिश समर्थक थे, और कैसे उन्होंने खुद को राष्ट्रीय संघर्ष से बाहर रखा। उन्होंने और नेहरू ने भारत को गरीबी से बाहर निकालने के लिए योजना तैयार करने और विज्ञान में विश्वास किया। दोनों ने रूस में समाजवादी प्रयोग से प्रेरणा ली, जिसने दो दशकों में इसे अति पिछड़ेपन से बाहर निकालकर एक आधुनिक राष्ट्र में बदल दिया। उन दोनों का दृष्टिकोण धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी था। नेहरू, बोस के विपरीत, उस खतरे को भी समझते थे जिसमें फासीवादी ताकतों ने दुनिया का प्रतिनिधित्व किया था। बोस ने एक्सिस शक्तियों को दुश्मन का दुश्मन के रूप में देखा – ब्रिटिश उनका मुख्य दुश्मन था – और एक्सिस शक्तियों के साथ अस्थायी रूप से सहयोग देने के लिए तैयार थे। लेकिन, आरएसएस-हिंदू महासभा के विपरीत, वे स्वतंत्र भारत में अर्थव्यवस्था, आर्थिक लोकतंत्र और विज्ञान की योजना बनाने की अपनी इस सोच में एकजुट थे। ये वो मुंबो जंबो विज्ञान में नहीं था जिसका बखान हमारे पीएम के नेतृत्व वाले मंत्रियों का परिषद करता है।
बोस द्वारा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में 1938 में योजना आयोग स्थापित किया गया। इस आयोग ने नेहरू की अध्यक्षता में योजना समिति की सोच को आगे बढ़ाया। इसका समापन कर नीति अयोग नामक थिंक-टैंक से प्रतिस्थापन करना इस बात का संकेत हैं कि आर्थिक लोकतंत्र वर्तमान भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के एजेंडे में ही नहीं है। ऐसा न हो कि हम भूल जाएँ कि बोस और नेहरू को योजना बनाने में एक उत्साही विश्वास था, और वह एक स्वतंत्र भारत में सरकार का मार्गदर्शन करने के लिए योजना आयोग की आवश्यकता के बारे में बात करते थे।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और लोकतंत्र के दो अन्य स्तंभ धार्मिक अल्पसंख्यकों और दलितों के प्रति सोच थी। अंबेडकर, बोस, नेहरू और गांधी, सभी का मनाना था कि भारत सभी लोगों के लिए एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य होना चाहिए। हम यह न भूलें कि भारतीय संविधान का आरएसएस द्वारा कटु विरोध किया गया और यह तर्क दिया गया कि भारत का संविधान मनुस्मृति, भारत के प्राचीन कानूनी पाठ, पर आधारित होना चाहिए। यह वही मनुस्मृति है जिसमें जाति विभाजित समाज का मूल पाठ है, और इसके मूल में पुरुषों और महिलाओं के बीच असमानता भी शामिल है। आरएसएस और जनसंघ ने मनु और मनुस्मृति की सरहाना करते हुए आंबेडकर का उपहास किया और उनको लिलिपुट कहा गया। आरएसएस के मुखपत्र द ऑर्गनाइज़र ने 30 नवंबर, 1949 के अंक में कहा गया:
भारत के नए संविधान के बारे में सबसे बदतरीन बात यह है कि इसमें कुछ भी भारतीय नहीं है। संविधान के प्रारूपकारों ने इसमें ब्रिटिश, अमेरिकी, कनाडाई, स्विस और विविध अन्य संविधान के तत्वों का समावेश किया है … लेकिन हमारे संविधान में, प्राचीन भारत में अद्वितीय संवैधानिक विकास का उल्लेख नहीं है। मनु का कानून स्पार्टा के लाइकुरस या फारस के सोलन से बहुत पहले लिखा गया था। आज भी मनुस्मृति में वर्णित उनके कानून की दुनिया प्रशंसा करती है और सहज आज्ञाकारिता और अनुरूपता का परिचय देती है। लेकिन हमारे संवैधानिक पंडितों के लिए इसका कुछ भी मतलब नहीं है।
यह आश्चर्य की बात नहीं है कि भारतीय संविधान में विकास की अन्य सकारात्मक कार्यवाहियों अर्थात् शिक्षा और रोजगार में आरक्षण, का भी आरएसएस विरोध किया था। आज भी, आरएसएस के नेता आरक्षण के खिलाफ बोलते हैं कि यह अलगाववाद को बढ़ावा देता है और इसे कैसे खत्म किया जाना चाहिए।
अल्पसंख्यकों और दलितों पर हालिया हमले, गाय के जीवन को मनुष्य के जीवन की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण बनाने के लिए आंदोलन, हमारे धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला है। यह वही ताकतें हैं जो अल्पसंख्यकों पर हमला करती हैं, जो आरक्षण पर हमला करती हैं, महिलाओं द्वारा प्रेम और स्वतंत्र रूप से शादी करने का अधिकार और उनके जीने के तरीकों पर हमला करती हैं। चाहे वो बोलने की आज़ादी हो या अपने धर्म और अपनी संस्कृति के अभ्यास करने का अधिकार, हमारी संस्कृति और लोकतंत्र के हर पहलू पर आज हमला हो रहा है।
यह सिर्फ देश के अल्पसंख्यकों पर हमला नहीं है। ये हमले तब से हो रहे हैं जब से भारत में उतनी ही असमानता हो गई है जितनी अंग्रेजों के अधीन रहते समय थी; जैसा कि फ्रांसीसी अर्थशास्त्री पिकेटी ने कहा था: ब्रिटिश राज से बिलियनेयर राज की ओर। आज क्रोनी कैपिटलिज्म देश पर शासन कर रहा है; जहां 1% लोगों के पास 73% भारतीयों के बराबर संपत्ति है। यह गणतंत्र के मूल संवैधानिक मूल्यों पर हमला है जो यह कहता है कि सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र, और जाति या पंथ के आधार पर समाज के किसी भी वर्ग के खिलाफ कोई भेदभाव नहीं। यह वही हैं जिसके खिलाफ हमें लड़ना है, यह एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य के लिए हमारी लड़ाई है जो हमारे पूर्वजों ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लड़ी थी।
Sunday, October 24, 2021
कोर्ट में पेंडिंग केसेज
जनता के साथ हो रहे अन्याय के लिए केवल सरकार जिम्मेदार ******†***************""****************" ,,,, मुनेश त्यागी भारतवर्ष में इस समय 4 करोड़ 600000 मुकदमे पेंडिंग हैं। निचली अदालतों में इनकी संख्या चार करोड़ 25060 है। कोविड-19 शुरुआत पर यह संख्या 3 करोड़ 20 लाख थी। तीन स्तरीय न्यायिक व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट, 25 हाई कोर्ट और जिला न्यायालय में एक साल पहले यह संख्या 3 करोड़ 70 लाख थी जो अब अब बढ़कर चार करोड़ 60 लाख हो गई है। 15 सितंबर 2021 के टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार मार्च 2020 से केसों की संख्या एक करोड़ केस बढ़ गए हैं। सुप्रीम कोर्ट में मार्च 2020 को यह संख्या 60, 000 थी, जो अब बढ़कर 70,000 हो गई है। मार्च 2020 में हाईकोर्ट में मुकदमों की संख्या 46 लाख 4,000 थी जो अब बढ़कर 56,04,000 हो गई है। लोअर कोर्ट में यह संख्या मार्च 2020 में 3 करोड़ 20 लाख थी जो अब बढ़कर 4 करोड हो गई है। इस प्रकार देश में कुल 4 करोड़ 60 लाख मुकदमे पेंडिंग है। केस बढ़ने का एक मुख्य कारण न्याय व्यवस्था में ई-फाइलिंग का नहीं होना है यानी की न्याय व्यवस्था आधुनिक तकनीक का सही प्रयोग करने में नाकाम रही है।न्यायपालिका के तीनों स्तरों पर इन तकनीकों का फायदा नहीं उठा रही है जिसमें केस फाइलिंग करना, कोर्ट फीस दाखिल करना और पक्षकारों को समन भेजना शामिल हैं। इसका मुख्य कारण वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, ब्रॉडबैंड, हाई स्पीड इंटरनेट और पूरा कंप्यूटरकरण न होना भी है। अधिकांश अदालतें इस आधुनिकतम तकनीक का उपयोग नहीं कर पा रही हैं और पुराने तौर-तरीकों से ही चिपकी हुई है। जिस कारण वादों की समय से सुनवाई नहीं होती और वादों का निपटारा लंबा होता चला जाता है। अदालतों में केस निस्तारण का समय से निस्तारण न होने का मुख्य कारण है न्यायालयों में मुकदमों के अनुपात में जजों का ना होना। हमारी 25 हाई कोर्ट में लगभग 40 परसेंट और लोअर ज्यूडिशरी में लगभग 30 परसेंट जजिज के पद खाली पड़े हुए हैं, उन्हें समय से भरने की सरकार कोई जरूरत नहीं समझती और लगातार मांग करने पर भी उन्हें नहीं भरा जा रहा है। अदालतों में पर्याप्त संख्या में स्टेनो और प्रक्षिशित स्टाफ नहीं है, जहां पर वर्षों से उनकी कमी मौजूद है जिस कारण न्यायिक अधिकारी गण मुकदमों का समय से निस्तारण नहीं कर पा रहे हैं। कई बार तो यह देखा गया है की जज वर्षों तक काम करते रहते हैं मगर उनके पास स्टेनो नहीं हैं और इस प्रकार वे मुकदमों का निस्तारण नहीं कर पाते और पक्ष कार न्याय की उम्मीद करते करते हार जाते हैं। भारत का संविधान सस्ते, सुलभ और शीघ्र न्याय का उद्घघोष करता है मगर सरकार की नीतियों के कारण यह नारा खोखला ही बना हुआ है। आज भी वादकारियों को जिला स्थान से हाई कोर्ट जाने में 600 मील से भी दूर जाना पड़ता है जो जनता द्वारा वहनीय नहीं है और सरकार वादकारिर्यों और वकीलों द्वारा आंदोलन करने पर भी इस और ध्यान नहीं देती, उसे अनसुना कर देती है। भारत का संविधान भी जनता को सस्ते और सुलभ न्याय की वकालत करता है मगर हमारी सरकारें जिन्होंने न्याय विरोधी रुख अपना रखा है वह संविधान के मैंडेट को भी सुनना और लागू करना नहीं चाहती और जनता को सस्ता सुलभ और शीघ्र न्याय नहीं देना चाहती इस मामले में अधिकांश सरकारों ने न्याय विरोधी और संविधान विरोधी रुख अपना रखा है। इस मामले में सभी सरकार दोषी हैं। चाहे सरकार बीजेपी की है, कांग्रेस की रही है, चाहे बीएसपी की रही है,या समाजवादी पार्टी की रही है। वे सब जनता को सस्ता सुलभ और शीघ्र न्याय देने के पक्ष में नहीं रही हैं। यह मुद्दा कभी उनके एजेंडे में ही नहीं रहा है। न्यायपालिका का बजट लगातार कम किया जा रहा है जो वर्तमान में .०२ परसेंट है जबकि वास्तव में यह कम से कम जीडीपी का 3 परसेंट होना चाहिए। हम लोग यूएसए, यूके, जापान, कनाडा, आस्ट्रेलिया आदि देशों की बात करते हैं मगर उनसे कुछ सीखना नहीं चाहते। यूएसए में और यूके में जीडीपी का 3 परसेंट न्यायपालिका पर खर्च किया जाता है। उपरोक्त विवरण से यह आसानी से कहा जा सकता है कि सरकार के एजेंडे में न्याय व्यवस्था नहीं है। वह जनता को समय से सस्ता, सरल और शीघ्र न्याय उपलब्ध नहीं कराना चाहती, वह मुकदमों के अनुपात में जज और स्टाफ की नियुक्ति नहीं करना चाहती, वह बजट का समुचित परसेंट जो लगभग 3 परसेंट हो सकता है, न्याय व्यवस्था पर खर्च नहीं करना चाहती और न्याय सरकार के एजेंडे में नहीं है। इसके लिए किसी दूसरे पक्ष को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए वकीलों या जनता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। जनता को सस्ता, सुलभ और शीघ्र न्याय न देने के लिए केवल और केवल सरकारें जिम्मेदार हैं।
आशा मिश्रा जी
भारत_में_शिक्षा ; #यूनेस्को_रिपोर्ट
🔴 ज्यों ज्यों दिन की बात की गयी, त्यों त्यों रात हुयी🔵 युनेस्को की 2021 की भारत में शिक्षा की स्थिति पर तीसरी रिपोर्ट अभी हाल में जारी हुयी। इसे 5 अक्टूबर विश्व शिक्षक दिवस पर जारी किया गया। रिपोर्ट में भारत में शिक्षा की स्थिति की हालत का इस रिपोर्ट के शीर्षक से ही पता चल जाता है। ‘‘शिक्षक नहीं - कक्षायें नहीं ’’ इसमें बिलकुल भी अतिरंजना नहीं है। यह हमारे देश में शिक्षा की वास्तविक स्थिति है। मुंबर्ह के टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के शोधकर्ताओं द्वारा यूनेस्को के दिशा निर्देश पर बनायी यह रिपोर्ट हमारे देश की शिक्षा की दयनीय स्थिति को उजागर करने वाली है। शिक्षा के अधिकार का कानून पारित करने के बावजूद इस स्थिति का होना खराब बात ही कहा जाएगा।
🔵 इस रिपोर्ट के बाद यूनेस्को द्वारा दिये गये सुझाव गौरतलब हैं। यह रिपोर्ट बताती है कि आज भी इस देश में ग्रामीण और शहरी शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता में जमीन आसमान का अंतर है। मोदी सरकार की 2020 में पारित शिक्षा नीति की कड़ी आलोचना करते हुये यह रिपोर्ट कहती है कि आश्चर्य है कि जब सारे शिक्षा संस्थान कोरोना महामारी के चलते बंद थे तब यह नीति घोषित हुयी और स्कूलों-कॉलेजों के बंद रहते हुए ही इस साल उसका एक वर्ष मना भी लिया गया।
🔵 रिपोर्ट बताती है कि देश के 15 लाख 51 हजार स्कूलों में 96 लाख शिक्षक हैं। इनमें पचास प्रतिशत महिला शिक्षक हैं। मध्य प्रदेश में यही प्रतिशत 44 प्रतिशत है। 30 प्रतिशत से अधिक स्कूल शिक्षक उन निजी स्कूलों में हैं जिन्हे कोई सरकारी मदद नहीं मिलती है। केवल 50 प्रतिशत शिक्षक सरकारी स्कूलों में हैं।
🔵 मजेदार और सोचने वाली बात यह है कि शिक्षा जिसकी नींव पर पूरे समाज का ढांचा खडा होता है उसे निजी हाथों में देने की पैरवी करने वाली सरकार के आका अमरीका में भी सरकारी स्कूलों पर सबसे अधिक जोर दिया गया है और आज वहां पर सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों की संख्या 32 लाख और निजी स्कूलों के शिक्षकों की संख्या 4 लाख है।
🔵 रिपोर्ट के मुताबिक़ देश में एक लाख से अधिक स्कूल एक शिक्षक के भरोसे पर हैं। इसमें सबसे अधिक 21,077 स्कूल मध्य प्रदेश में हैं। यह कुल स्कूलों का 14 प्रतिशत का है। ये एक शिक्षक वाले 89 प्रतिशत स्कूल ग्रामीण इलाकों में हैं। और स्वाभाविक रूप से इन स्कूलों में किसी भी प्रकार की सुविधाओं के बारे में सोचा नहीं जा सकता है। यह इकलौते मास्साब भी स्कूल कितने दिन जा पाते होंगे क्योंकि उन्ही पर सरकारी योजनाओं के आंकड़े इकट्ठा करने से लेकर सारे कामकाज का बोझा भी लदा हुआ है।
🔵 इस पूरी स्थिति वाले देश के मुकाबले केरल एकदम अलग दिखायी देता है जहां पर 88 प्रतिशत स्कूलों में जिसमें 80 प्रतिशत ग्रामीण स्कूल भी शामिल हैं इंटरनेट की सुविधा है, लाइब्रेरी है, 90 प्रतिशत से अधिक स्कूलों में मुफ्त किताबों का वितरण होता है। यहां पर 99 प्रतिशत में साफ पीने के पानी की सुविधा है, 98 प्रतिशत स्कूलों में लड़कियों के लिये अलग शौचालय है और 99 प्रतिशत स्कूलों में अबाध बिजली की सुविधा है। डिजिटल इंडिया का नारा देने वाली भाजपा के द्वारा शासित प्रदेशों के स्कूलों में इंटरनेट की स्थिति उनमें बिजली की उपलब्धता से देखी जा सकती है। मध्य प्रदेश के केवल 11 प्रतिशत स्कूलों में इंटरनेट की सुविधा है।
🔵 इस रिपोर्ट से देश की सरकार और शिक्षा मंत्रालय के कानों पर जूं भी नहीं रेेंगने वाली है क्योंकि एक अर्धशिक्षित और कुशिक्षित पीढ़ी तैयार करने का काम इस देश की भाजपा की सरकारें बड़ी तेजी से कर रही हैं। उनके लिए इसी तरह की जनता मुफीद है। इनके विद्यालय व्हाट्स अप पर हैं और भाजपा की आई टी सेल इनके शिक्षक हैं। इतिहास में झांकने से ऐसी पीढियां तैयार करने वाले दो देशों के भयानक उदाहरण देखे जा सकते हैं जर्मनी और जापान जिन्होने अपनी पूरी नौजवान पीढी को आज्ञाकारी, झूठ पर गर्व करने वाली नस्लवादी सोच की पीढ़ी के देशों में बदल कर रख दिया था और जो हुआ वह द्वितीय विश्वयुद्ध के रूप में हमारे सामने था।
🔵 शिक्षा की स्थिति पर युनेस्को की यह रिपोर्ट आंखें खोलने वाली है इसीलिये इतिहास की गलतियों से सबक लेकर इस दिशा में काम करना शुरू करना और स्थाई वैश्विक लक्ष्य 2030 हासिल करने की ओर बढना पूरे देश की जनता की जिम्मेदारी है।
Thursday, July 15, 2021
कृषि संकट
कृषि संकट
हमारे देश का बड़ा सरमायेदार वर्ग आज एक निर्णायक संकट का सामना कर रहा है। वह अंतरराष्ट्रीय भी पूंजी के साथ गठजोड़ करते हुए दोनों उत्पादक वर्गों मतलब किसानों और मजदूरों के शोषण को तेज कर के संकट को दूर करने के भ्रम में हैं । न्यूनतम मजदूरी व कई अन्य लाभों को नकारने वाली चार श्रम संहिताओं और कृषि उपज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य को नकारने वाले तीन कृषि अधि- नियमों का लाया जाना इस दिशा में उठाए गए कदम ही हैं । दूसरी ओर, किसान और मजदूर वर्ग को कॉरपोरेट के दबदबे का सामना करने के लिए मजबूर किया जाता है । यह हालत उनके गंभीर दरिद्रता पैदा करेंगे और उनकी क्रय शक्ति में गिरावट का कारण बनेंगे जो कि पूंजीवाद को और गहरे संकट की ओर ले जाएंगे ।भारत में सामाजिक प्रगति का प्रमुख पहलू किसी प्रश्न का समाधान है। आजादी के बाद भारतीय राज्य का नेतृत्व करने वाले बड़े सरमायेदार वर्ग ने व्यापक भूमि सुधारों को लागू करने के बजाय, जमीदार वर्ग के साथ गठबंधन किया। कृषि सुधारों के माध्यम से कृषि आधारित उद्योगों पर जोर देते हुए घरेलू औद्योगिकरण के आधार पर उत्पादक शक्तियों को आगे बढ़ाने के बजाय, उन्होंने अंतरराष्ट्रीय वित पूंजी के साथ सहयोग करके विकास के नव उदारवादी मॉडल के लिए आत्मसमर्पण कर दिया। भारत में पूंजीवादी संकट का प्रमुख कारण भूमि का केंद्रीय करण है। भाजपा की अगुवाई वाली केंद्र सरकार विशाल किसान वर्ग के हितों की रक्षा के लिए व्यापक भूमि सुधार करके और कृषि आधारित उद्योग विकसित करने की जगह कृषि संकट के समाधान के रूप इन कृषि के निगमीकरण के प्रस्ताव को आगे बढ़ा रही है । इस प्रकार की गलत नीति के कारण ही देश भर में जहां भी किसान संघर्षरत है, भाजपा का जनाधार खिसकना शुरू हो गया है ।
तीनों कृषि अधिनियम कार्पोरेट बलों के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं। जबकि किसानों के हितों की रक्षा के लिए कानून लाए जाने की जरूरत है। गरीब व मंझोले किसान परिवारों और खेत मजदूरों को कृषि क्षेत्र से बाहर करने से गंभीर सामाजिक राजनीतिक प्रभाव पड़ेगा और असल में मौजूदा किसान संघर्ष वास्तव में इसी खतरे का प्रतिरोध कर रहे हैं । अंतर्राष्ट्रीय वित्त पूंजी के साथ गठजोड़ कर काम करने वाले बड़े पूंजीपति वर्ग ने बड़े पैमाने पर किसानों के साथ वर्ग संघर्ष को तेज करने की संभावनाएं पैदा की हैं जिसमें अमीर किसानों तथा जमींदारों के वर्ग भी शामिल हैं। शासक वर्ग में सत्ता के साझेदारों के बीच इस संघर्ष ने मजदूर वर्ग , गरीब किसान व खेत मजदूरों के लिए कार्पोरेट -जमींदार प्रभुत्व के खिलाफ वर्ग संघर्ष को तेज करने की संभावनाएं पैदा की हैं। विनिवेश के जरिए हमारी राष्ट्रीय संपत्ति की लूट के साथ नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को जबरदस्ती आगे बढ़ाने और अंधाधुंध निजीकरण ने बड़े पूंजीपतियों और गैर- पूंजी पतियों के बीच एक नए अंतर्द्वंदों को जन्म दिया है। इन अंतर्द्वंदों ने भाजपा के खिलाफ व्यापक एकता बनाने के लिए संभावनाएं और क्षमताएं पैदा की हैं।
Monday, May 24, 2021
कॉपरनिकस
कोपरनिकस की महान क्रांतिकारी रचना ने कैसे पादरियों और धर्मगुरूओं के बनाए संसार को उसकी धुरी से रपटा दिया था।
अशोक पाण्डे की वाल से
ब्लैक डैथ एक ऐसी महामारी थी जिसने यूरोप की आधी आबादी का सफाया कर दिया था. 14वीं शताब्दी के इस त्रासद दौर के बाद अगले तीन सौ बरस तक यूरोप ने अपना पुनर्निर्माण किया. ग्रीक और रोमन सभ्यताओं के ज्ञान को दोबारा से खोजा गया. कला और विज्ञान के प्रति लोगों में नई दिलचस्पी जागी और पढ़े-लिखे लोगों ने इस सिद्धांत का प्रचार-प्रसार किया कि आदमी के विचारों की क्षमता असीम है और एक जीवन में वह जितना चाहे उतना ज्ञान बटोर कर सभ्यता को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान कर सकता है. तीन सौ बरस का यह सुनहरा अंतराल रेनेसां यानी पुनर्जागरण कहलाया.
रेनेसां के मॉडल के तौर पर अक्सर पोलैंड के निकलॉस कॉपरनिकस का नाम लिया जाता है. गणितज्ञ और खगोलशास्त्री कॉपरनिकस चर्च के कानूनों के ज्ञाता, चिकित्सक, अनुवादक, चित्रकार, गवर्नर, कूटनीतिज्ञ और अर्थशास्त्री भी थे. उनके पास वकालत में डॉक्टरेट की डिग्री थी और वह पोलिश, जर्मन, लैटिन, ग्रीक और इटैलियन भाषाओं के विद्वान थे. 19 फरवरी 1473 को तांबे का व्यापार करने वाले परिवार में जन्मे कॉपरनिकस चार भाई-बहनों में सबसे छोटे थे. दस के थे जब माता-पिता दोनों का देहांत हो गया. आगे की परवरिश मामा ने की.
मामा ने ही उन्हें क्राकाव यूनिवर्सिटी पढने भेजा जहां उन्होंने गणित, ग्रीक और इस्लामी खगोलशास्त्र का अध्ययन किया. वहां से लौटने के बाद मामा ने आगे की पढ़ाई के लिए अपने काबिल भांजे को इटली भेजने का मन बनाया. यातायात के साधन दुर्लभ थे और दो महीनों की लम्बी पैदल यात्रा के बाद कॉपरनिकस किसी तरह इटली पहुंचे जहाँ अगले छः साल तक यूरोप के सबसे प्राचीन और सर्वश्रेष्ठ दो अलग-अलग विश्वविद्यालयों – बोलोना और पाडुआ – में उनकी पढ़ाई हुई. यहीं उन्होंने उन सारी चीजों पर सवाल करना शुरू किया जो उनके अध्यापक कक्षाओं में पढ़ाया करते रहे थे. ब्रह्माण्ड की संरचना के बारे में अरस्तू और टॉल्मी के सिद्धान्तों में उन्हें घनघोर विसंगतियां नजर आईं.
1503 में जब वे वापस घर लौटे उनकी उम्र तीस की हो चुकी थी. मामा प्रभावशाली आदमी थे और उनकी सिफारिश पर उन्हें स्थानीय चर्च में कैनन की नौकरी मिल गई. इस पेशे में उन्हें नक्शे बनाने के अलावा टैक्स इकठ्ठा करना और चर्च का बही-खातों को देखना होता था. आराम की नौकरी थी. 1510 में मामा सिधार गए.
कॉपरनिकस ने अपना अलग घर बनाया और अपने खगोलीय अध्ययन के वास्ते एक टावर बनवाई. उस समय तक टेलीस्कोप का अविष्कार नहीं हुआ था. लकड़ियों और धातु के पाइपों की मदद से वे नक्षत्रों की गति का अध्ययन किया करते. 1514 में उन्होंने एक वैज्ञानिक रपट लिख कर अपने दोस्तों को बांटी. भौतिकविज्ञान के इतिहास में इस रपट को अब ‘द लिटल कमेंट्री’ के नाम से जाना जाता जाता है. कॉपरनिकस ने दावा किया कि धरती सूरज के चारों ओर घूमती है न कि सूरज धरती के, जैसा कि धर्मशास्त्रों में लिखा था. इस सिद्धांत से अरस्तू और टॉल्मी के सिद्धान्तों की दिक्कतें दूर हो जाती थीं. इस शुरुआती काम के बाद अगले दो दशक गहन अध्ययन के थे.
1532 के आते-आते कॉपरनिकस अपने सिद्धांतों को एक पांडुलिपि का रूप दे चुके थे. इसका प्रकाशन उन्होंने जानबूझ कर रोके रखा क्योंकि उन्हें आशा थी वे कुछ और सामग्री जुटा सकेंगे. इसके अलावा उन्हें यह भय भी था कि पादरी लोग भगवान के नाम पर बड़ा बखेड़ा खड़ा करेंगे. कुछ सालों बाद जर्मनी से एक नामी गणितज्ञ जॉर्ज रेटीकस उनके साथ काम करने पोलैंड आए. कॉपरनिकस अड़सठ के हो चुके थे जब उनकी सहमति से संशोधित पांडुलिपि को लेकर जॉर्ज रेटीकस नूरेमबर्ग पहुंचे जहाँ योहान पेट्रीयस नाम के प्रिंटर ने उसे ‘ऑन द रेवोल्यूशंस ऑफ द हेवनली स्फीयर्स’ नामक क्रांतिकारी किताब की शक्ल दी.
किताब की शुरुआत में कॉपरनिकस एक रेखाचित्र के माध्यम से ब्रह्माण्ड के आकार के बारे में बताया. इसमें सूर्य को केंद्र में रख उन्होंने उसके चारों तरफ अलग- अलग कक्षाओं में परिक्रमा करने वाले सभी ग्रहों को दिखाया गया था. जटिल गणनाओं के बाद उन्होंने यह भी बताया था कि इनमें से हर ग्रह को सूर्य का एक फेरा लगाने में कितना समय लगता है. आज के उन्नत खगोलविज्ञान और उसकी तकनीकों की मदद से जो ग्रहों की परिक्रमा का जो समय निकलता है, कॉपरनिकस की गणना आश्चर्यजनक रूप से उसके बहुत करीब है.
किताब छपकर नहीं आई थी और लम्बे समय से बीमार कॉपरनिकस कोमा में जा चुके थे. बताते हैं कि जब पहली प्रति उनके पास पहुंचाई गई वे बेहोशी से उठ बैठे और लम्बे समय तक आंखें मूंदे किताब को थामे रहे. कुछ दिनों बाद उनकी मौत हो गई. वे यह देखने को जीवित नहीं बचे कि कैसे उनकी महान क्रांतिकारी रचना ने पादरियों और धर्मगुरुओं के बनाए संसार को उसकी धुरी से रपटा दिया था.
जाहिर है कॉपरनिकस की किताब ने धर्म के कारोबारियों को बौखला दिया. चर्च का आधिकारिक बयान आया जिसमें किताब “झूठा और पवित्र धर्मशास्त्र की खिलाफत करने वाला” बताया गया.
कोई 60 साल बाद इटली के ब्रूनो को सिर्फ इसलिए ज़िंदा जलाए जाने की सजा दी गयी कि उसने कॉपरनिकस के सिद्धांत का प्रचार-प्रसार किया. इसी अपराध के लिए गैलीलियो को भी ज़िंदा तो नहीं जलाया गया अलबत्ता उसके समूचे जीवन को अपमान और तिरस्कार से भर दिया गया.
आज जब आदमी मंगल पर घर बनाने की कल्पना कर रहा है हमने कॉपरनिकस को याद रखना चाहिए, समूचे अन्तरिक्षविज्ञान की बुनियाद में जिसकी चालीस-पचास सालों की साधना चिनी हुई है. कॉपरनिकस का जीवन बताता है सच्चाई की खोज कभी निष्फल नहीं जाती और उसकी रोशनी सदियों बाद तक आदमी के रास्ते को आलोकित करती रहती है.
1543 में आज ही के दिन कॉपरनिकस की देह की मृत्यु हुई. उनकी आत्मा दुनिया भर की प्रयोगशालाओं में जीवित है.
आज का हरियाणा.बहस के लिए:-
आज का हरियाणा.बहस के लिए:-
1857 की आजादी की पहली जंग में हरियाणा वासियों की काफी महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रही। मगर उसके बाद विभाजन कारी ताकतों का सहारा लेकर अंग्रेजो ने हरियाणा की एकता को काफी चोट पहुंचाई। बाद में हरियाणा में यह कहावत चली कि साहब की अगाड़ी और घोड़े की पिछाड़ी नहीं होना चाहिये . नवजागरण के दौर में हरियाणा में आर्य समाज भी काफी लेट आया। महिला शिक्षा पर बहुत जोर लगाया आर्य समाज ने मगर सहशिक्षा का डटकर विरोध किया। एक और कहावत का चलन भी हुआ'म्हारे हरियाणा की बताई सै या विद्या की कमजोरी'
'बांडी बैल की के पार बसावै जब जुआ डालदे धोरी'।
आज का साम्राज्यवाद पहले के किसी भी समय के मुकाबले ज्यादा संगठित,ज्यादा हथियारबन्द और ज्यादा विध्वंसक है। नवस्वतंत्र या विकासशील देशों की खेतियों, देसी उद्योग धन्धों और सामाजिक संस्कृतियों को तबाह करने पर लगा है। दुनिया भर में साम्राज्यवादी वैश्वीवीकरण की यही विध्वंसलीला हम देख रहे हैं। नव सांमन्तवाद और नवउदारीकरण का दौर हरियाणा में पूरे यौवन पर नजर आता है। जहां एक तरफ हरियाणा ने आर्थिक तौर पर किसानों और कामगरों तथा मध्यमवर्ग के लोगों के अथक प्रयासों से पूरे भारत में दूसरा स्थान ग्रहण किया है वहीं दूसरी तरफ हरियाणा के ग्रामीण समाज का संकट शहरों के मुकाबले ज्यादा तेजी से गहराता जा रहा है। सामाजिक सूचकांक चिन्ताजनक स्थिति की तरफ इशारा करते नजर आते हैं।भूखी, नंगी, अपमानित और बदहाल आाबादी के बीच छदम सम्पन्नता के जगमग द्वीपों जैसे गुड़गांव पर जश्न मनाते इन नये दौलतमंदों का सफरिंग हरियाणा से कोई वासता नजर नहीं आता। कुछ भ्रष्ट राजनितिज्ञों, भ्रष्ट पुलिस अफसरों, भ्रष्ट नौकरशाहों तथा भ्रष्ट कानून के रखवालों , गुण्डों के टोलों के पचगड्डे ने काले धन और काली संस्कृति को हरियाणा के प्रत्येक स्तर पर बढ़ाया है। फिलहाल देश के और हरियाणा के दौलतमंदों का बड़ा हिस्सा साम्राज्यवादी वैश्वीकरण का पैरोकार बना हुआ नजर आता है। वह सुख भ्रान्ति का शिकार है या समर्पण कर चुका है। वह पूरे हरियाणा या पूरे देश के बारे में नहीं महज अपने बारे में सोचता है। फसलों की जमीन के बढ़ते बांझपन के कारण पैदावार कम से कमतर होती जा रही है। तालाबों पर नाजायज कब्जे कर लिये गये जिनके चलते उनकी संख्या कम हो गई और जो बचे उनके आकार छोटे होते गये। अन्धाधुन्ध कैमिकल खादों और कीट नाशकों और घास फूसी नाशिकों के इस्तेमाल के कारण जमीन के नीचे का पानी प्रदूशित होता जा रहा है। गांव की शामलात जमीनों पर दबंग लोगों ने कब्जे जमा लिए हैं। सरकारी पानी की डिगियों की बुरी हालत है। पीने के पानी का व्यवसायिकरण बहुत से गावों में टयूबवैलों के माध्यम से हो गया। ।पानी के नलकों की टूटियां गायब हैं | पानी की वेस्टेज बहुत ज्यादा है | इसीलिये गलियों का बुरा हाल है | यदि पक्की भी हो गई हैं तो भी पानी की निकासी का कोई भी उचित प्रबन्ध न होने के कारण जगह जगह पानी के चब्बचे बन गये हैं जो बहुत सी बीमारियों के जनक हैं। बिजली ज्यादातर समय गुल रहती है। बैल आमतौर से कहीं कहीं बचे हैं।भैंसो का पालन बढ़ा है | भैंसों के सुआ लगा कर दूध निकालने की कुरीति बढ़ती जा रही है। सब्जियों में भी सुआ लगाने का चलन बहुत बढ़ता जा रहा है। खेती की जोत का आकार कम से कमतर हुआ है और दो एकड़ या इससे कम जोत के किसानों की संख्या किसी भी गांव में कुल किसानों की संख्या में सबसे जयादा है।किसानों और खेती के तरीकों में कई बदलाव दिखाई देते हैं | गांव के सरकारी स्कूलों का माहौल काफी खराब हो रहा है। इन स्कूलों में खाते पीते व दबंग परिवारों के बच्चे नहीं जाते। इसलिए उनकी देखभाल भी नहीं बची है। दलित और बहुत गरीब किसान परिवार के बच्चे ही इन स्कूलों में जाते हैं। उपर से सैमैस्टर सिस्टम और बहुत दूसरी नीतिगत खामियों के चलते माहौल और खराब हो रहा है।इस सबके चलते प्राइवेट स्कूलों की बाढ़ सी आ गई है। उंची फीसें इन प्राइवेट स्कूलों का फैशन बन गया है। बीएड के कालेजों की एक बार बाढ़ आई, फिर नर्सिंग कालेजो की और फिर डैंटल कालेजों की। ज्यादातर प्राईवेट सैक्टर में हैं। बी एड कालेजों में से ज्यादातर बन्द होने के कगार पर हैं। प्राईवेट सैक्टर में दुकानदारी बढ़ी है और शिक्षा की गुणवता काफी कम हुई है। प्राइवेट विश्व विद्यालयों की सांख्य में भी काफी बढ़त दिखाई दे रही है | इन की समीक्षा अपने आप में एक लेख की मांग करती है। स्वास्थ्य के क्षे़त्र में 90 के बाद प्राईवेट सैक्टर 57 प्रतिशत हो गया है। गांव के सबसैंटर में,प्राईमरी स्वास्थ्य केन्द्र में या सामुदायिक स्वास्थय केन्द्र में क्या हो रहा है यह गांव के दबंगों की चिन्ता का मसला कतई नहीं है। बल्कि इनमें काम करने वाले कुछ भ्र्ष्ट कर्मचारियों के साथ सांठगांठ करके ठीक काम करने वाले डाक्टरों व दूसरे कर्मचारियों को परेशान किया जाता है। कहने को संस्थागत प्रसव का प्रतिशत बढ़ा है | गांव में सरकार द्वारा बनाई गई डिगियों का इस्तेमाल न के बराबर हो रहा है जिसके चलते प्राइवेट ट्यूबवैलों से पानी खरीदना पड़ रहा है । अब भी पीने के पानी के कुंए अलग अलग जातियों के अलग अलग हैं। बहुत कम गांव हैं जहां सर्वजातीय कुँए हैं। खेती में ट्रैक्टर का इस्तेमाल बहुत बढ़ गया है। आज ट्रैक्टर से एक एकड़ की बुआही के रेट 500 से 550 रुपये हो गये हैं। ट्यूबवैल से एक एकड़ की सिंचाई के रेट 80 रुपये घण्टा हो गये हैं। थ्रैशर से गिहूं निकालने के रेट1500रुपये प्रति एकड़ हो गये हैं। हारवैस्टर कारबाईन से गिहूं कटवाने के 1400 रुपये प्रति एकड़ और निकलवाने के रैपर के रेट 1200 प्रति एकड़ हो गये हैं। बड़ी बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का सामान हरेक गांव की छोटी से छोटी दुकानों पर आम मिल जाता है। 8.10 दुकानों से लेकर 40.50 दुकानों का बाजार छोटे बड़े सभी गांव में मौजूद है। छोटी छोटी किरयाने की दुकानों पर दारु के प्लास्टिक के पाउच आसानी से उपलब्ध हैं। पहले का डंगवारा जिसमें एक एक बैल वाले दो किसान मिलकर खेती कर लेते थे बिल्कुल खत्म हो गया है। पहले दो एकड़ वाला 10 एकड़ वाले की जमीन बाधे पर लेकर बोता रहा है और काम चलाता रहा है। साथ एक दो भैंस भी रखता रहा है जिसका दूध बेचकर रोजाना के खर्चे पूरे करता है। पहले कहावत थी "दूध बेच दिया इसा पूत बेच दिया"। आज दूध भी बेचना पड़ता है और बेटा भी बेचना पड़ता है। मगर आज 10 किल्ले वाला भी दो किल्ले वाले की जमीन बाधे पर लेकर बोता है। खेती में मशीनीकरण तेजी से हुआ और हरित क्रांन्ति का दौर शुरु हुआ। हरित क्रान्ति ने बहुत नुकसान किये हैं जो अपने आप में एक बहस और रिसर्च का विषय है। मगर किसानी के एक हिस्से को लाभ भी बहुत हुआ है। एक नया नवधनाढ़य वर्ग पैदा हुआ है हरियाणा में जिसका हरियाणा के हरेक पक्ष पर पूरा कब्जा है। इन्ही के दायरों में अलग अलग जातों के नेताओं का उभरना समझ में आता हैं । मसलन चौधरी देवीलाल जाटों के नेता, चौधरी चान्द राम दलितों के नेता. उनमें भी एक हिस्से के.। पंडित भगवतदयाल शर्मा पंडितों के नेता , राव बिरेन्द्र सिंह अहीरों के नेता आदि। आज इन जाटों के नेताओं में भी एक ही जात में प्रतिष्पर्धा बढ़ी है। इस धनाढ़य वर्ग का एक हिस्सा आढ़तियों में शामिल हो गया है। सब आढ़तिये कम जमीन वाले किसान की कई तरह से खाल उतार रहे हैं । पुराने दौर के परिवारों में से डी एल एफ ग्रूप और जिन्दल ग्रूपों ने राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है। इसी धनाढ़य वर्ग में से कुछ भठ्ठों के मालिक हो गये हैं | दारु के ठेकों के ठेकेदार हैं, प्राप्रटी डीलर बन गये हैं। नेताओं के बस्ता ठाउ भी इन्ही में से हैं। हरेक विभाग के दलाल भी इन्हीं लोगों में से पैदा हुए हैं। इन ज्यादातरों के और भी कई तरह के बिजिनैश हैं। इनका जीवन ए सी जीवन में बदल गया है चाहे शहर में रहते हों या गांव में। हर तरह के दांव पेच लगाने में यह तबका बहुत माहिर हो गया है। जिन लोगों की हाल में जमीने बिकी हैं उन्होंने पैसा इन्वैस्ट करने का मन बनाया मगर पैसा लगाने की उपयुक्त जगह न पाकर वापिस गांव में आकर मकान का चेहरा ठीक ठ्याक कर लिया और एक 8.10 लाख की गाड्डी कार ले ली। एक मंहगा सा मोबाइल ले लिया। जिनके पास कई एकड़ जमीन थी और संयुक्त परिवार था उन्होंने सिरसा की तरफ या कांशीपुर में या मध्यप्रदेश में खेती की जमीनों में यह पैसा लगा दिया। कुछ लोगों ने 200 से 300 गज का प्लॉट शहर में लेकर सारा पैसा वहां मकान बनाने पर खर्च कर दिया। आगे क्या होगा उनका कुछ नहीं कहा जा सकता। इन बिकी जमीनों पर जीवन यापन करने वाले खेत मजदूर और बाकी के तबकों का जीना मुहाल हो गया है।बड़ी मुश्किल में है इनका जीवन यापन। ऊपर से दारू का चलन भी इन तबकों में भी बढ़ा है। यह दबंगों और मौकापरस्तों के समूह हरेक कौम में पैदा हुए हैं। इनका वजूद जातीय , गोत्रों और ठोले पाने की राजनिति पर ही टिका है। ज्यादातर गांव में सड़कें पहुंच गई हैं बेशक खस्ता हालत में हों बहुत सी सड़कें। किसी भी गांव में चार पहियों के वाहनों की संख्या भी बढ़ी है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के प्रोडक्ट ज्यादातर गावों में मिलने लगे हैं। टी वी अखबार का चलन भी गांव के स्तर पर बढ़ा है। सीडी प्लेयर तो बहुत सें घरों में मिल जाएगा। मोबाइल फोन गरीब तबकों के भी खासा हिस्से के पास मिल जाएगा। संप्रेषन के साधन के रुप में प्रोग्रेसिव ताकतों को इसके बारे में सोचना होगा। माइग्रेटिड लेबर की संख्या ग्रामीण क्षेत्र में भी बढ़ रही है। किसानी के एक हिस्से में अहदीपन बढ़ रहा है।गाँव में कई परतें बन गई लगती हैं आर्थिक समानताओं के बढ़ते जाने क्र कारण। गांव की चौपालों की जर्जर हालत हमारे सामूहिक जीवन के पतन की तरफ इशारा करती है। नशा , दारु और बढ़ता संगठित सैक्स माफिया सब मिलकर गांव की संस्कृति को कुसंस्कृति के अन्धेरों में धकेलने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।पुरुष प्रघान परिवार व्यवस्था में छांटकर महिला भ्रूण हत्या के चलते ज्यादातर गांव में लड़कियों की संख्या काफी कम हो रही है। बाहर से खरीद कर लाई गई बंहुओं की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। पुत्र लालसा बहुत प्रबल दिखाई देती है यहां के माईडं सैट में। हर 10 किलो मीटर पर शर्तिया छोरा के लिए गर्भवती महिला को दवाई देने वाले मिल जाएंगे। उंची से उंची पढ़ाई भी हमारे दकियानूसी विचारों में सेंध लगाने में असफल रही लगती है।बल्कि अंधविश्वासों को बढ़ावा भी दिया जा रहा लगता है। जैंडर बलाइन्ड और साइंटिफिक टेम्पपर रहित उच्च शिक्षा ने महिला विरोधी सामन्ती सोच को ही पाला पोसा लगता है। हमारे आपस के झगड़े बढ़े हैं। इस सबके चलते महिलाओं पर घरेलू हिंसा में बढ़ोतरी हुई है। महिलाओं पर बलात्कार के केस बढ़े हैं। महिलाओं के साथ छेड़छाड़ आदि के केस बढ़े हैं जिनमें से ज्यादातर केस दर्ज ही नहीं हो पाते। कचहरियों में तलाक के केसिज की संख्या बेतहासा बढ़ रही है। सल्फास की गोली खाकर हर रोज 1 या 2 नौजवान मैडीकल पंहुच जाते हैं। 30. से 40 ट्रक ड्राईवर ज्यादातर गांव में मिल जाएंगे । एडस की बीमारी के इनमें से ज्यादातर वाहक हैं। सुबह से लेकर शाम तक ताश खेलने वाली मंडलियों की संख्या बढ़ती जा रही है। युवा लड़कियों का यौन शोषण संगठित ढ़ंग से किया जा रहा है तथा सैक्स रैकेटियर बहुत से गांवों तक फैल गये लगते हैं। इसके अलावा युवा लड़कियों में शादी से पहले गर्भ की तादाद बढ़ रही है। मौखिक तौर पर कुछ डाक्टरों का कहना है कि इस प्रकार के केसिज में 50 प्रतिशत से ज्यादा परिवार के सदस्य, रिस्तेदार या पड़ौसी ही होते है जो यौन षोशण करते हैं । महिला न घर के अन्दर सुरक्षित रही है न घर से बाहर। युवा लड़कियों का गांव की गांव में यौण उत्पीड़न हरियाणवी ग्रामीण समाज की भयंकर तसवीर पेश करता है। गांव के युवाओं .लड़के लड़कियों . को अपनी स्थगित ऊर्जा का सकारात्मक इस्तेमाल करने का कोई अवसर हमारी दिनचर्या में नहीं है। इस सब के बावजूद बहुत सी लड़कियों व महिलाओं ने खेलों में हरियाणा का नाम रोशन किया है। केबल टीवी ज्यादातर बड़े गांव में पहुंच गया है। टी वी में आ रही बहुत सी अच्छी बातों के साथ साथ देर रात बहुत सी जगह बल्यू फिल्में दिखाई जाती हैं। युवाओं में आत्म हत्या के केसिज बढ़ रहे हैं। महिलाओं के दुख सुख की अभिव्यक्ति महिला लोक गीतों में साफ झलकती दिखाई देती है। हमारे सांगों में पितृसतात्मक मूल्यों का बोलबाला दिखाई देता है। इसके साथ साथ महिला विरोधी और दलित विरोधी रुझान भी साफ झलकते हैं। मूल्यों के संदर्भ में हमारा साहित्य दबंग के हित की संस्कृति का ही निर्वाह करता नजर आता है खासकर ज्यादातर सांगों के कथानक में। पूरे हरियाणवी चुटकलों के भण्डार में एक सेकुलर चुटकुला मिलना मुश्किल। झगड़ों में इन्होंने समझौते करवाये उनमें 100 में से 99 फैंसले दबंग के हक में और पीड़ित के खिलाफ किये गये। बहोत बार बलात्कारी के केस के समझौतों में बलात्कारी को ही राहत दिलवाई गई। कत्ल के केस में जेल में बन्द कुछ कातिलोन को ही राहत दिलवाई जाती है । तरीके अलग अलग हो सकते हैं मगर नतीजे हमेशा पीड़ित के खिलाफ ही हुए। कमजोर के हक में न्यायकारी फैंसला शायद ही कोई हों। इसी प्रकार ब्याह शादी के मामलों में गांव की गांव और गोत की गोत का केस एक मनोज बबली का ही केस है। बाकी सारे के सारे केस दो गौतों के बीच के हैं जिनमें ज्यादातर में बच्चों के माता पिताओं को बहन भाई बन कर रहने के फतवे जारी किए गये हैं और प्रेमियों के कत्ल किये गये हैं। या दूसरी तरह के उत्पीड़न किये गये हैं। राई का पहाड़ बनाया जा रहा है। असली मुद्दों से युवाओं का ध्यान बांटा जा रहा है। भावनात्मक स्तर पर लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ किया जा रहा है। किसानी के संकट से किसानों को दिशा भ्रमित किया जा रहा है। गांव के युवा लड़के और लड़की जिन्दगी के चौराहे पर खड़े हैं। एक तरफ नवसामन्तवादी और नवउदारवादी अपसंस्कृति का बाजार उन्हें अपनी ओर खींच रहा है। दूसरी ओर बेरोजगारी युवाओं के सिर पर चढ़ कर इनके जीवन को नरक बनाए है। नशा , दारु, सैक्स व पोर्नोग्राफी उसको दिशा भ्रमित करने के कारगर औजारों के रुप में इस्तेमाल किए जा रहे हैं। साथ ही समाज में व्याप्त पिछड़े विचारों और रुढ़ियों को भी इस्तेमाल करके इनका भावनात्मक शोषण किया जा रहा है। हरियाणा में खाते पीते मध्यमवर्ग और अन्य साधन सम्पन्न तबकों का साम्राज्यवादी वैष्वीकरण को समर्थन किसी हद तक सरलता से समझ में आ सकता है जिनके हित इस बात में हैं कि स्त्रियां,दलित,अल्पसंख्यक और करोड़ों निर्धन जनता नागरिक समाज के निर्माण के संघर्ष से अलग रहें। लेकिन साधारण जनता अगर फासीवादी मुहिम में शरीक कर ली जाती है तो वह अपनी भयानक असहायता, अकेलेपन, हताषा, अवरुद्ध चेतना , पूर्व ग्रहों, उदभ्रांत कामनाओं के कारण शरीक होती है। फासीवाद के कीड़े जनवाद से वंचित ओर उसके व्यवहार से अपरिचित, रिक्त, लम्पट और घोर अमानुशिक जीवन स्थितियों में रहने वाले जनसमूहों के बीच आसानी से पनपते हैं। यह भूलना नहीं चाहिये कि हिन्दुस्तान की आधी से अधिक आबादी ने जितना जनतन्त्र को बरता है उससे कहीं ज्यादा फासीवादी परिस्थितियों में रहने का अभ्यास किया है। इसमें कोई शक नहीं कि हरियाणा में जहां आज अनैतिक ताकत की पूजा की संस्कृति का गलबा है वहीं अच्छी बात यह है कि शहीद भगत सिंह से प्रेरणा लेते हुए युवा लड़के लड़कियों का एक हिस्सा इस अपसंस्कृति के खिलाफ एक सुसंस्कृत सभ्य समाज बनाने के काम में सकारात्मक सोच के साथ जुटा हुआ है। साधुवाद इन युवा लड़के लड़कियों को। इतने बडे़ संकट को कोई भी अपनी अपनी जात के स्तर पर हल करने की सोचे तो मुझे संभव नहीं लगता । कैसे सामना किया जाए इसके लिए विभिन्न विचारकों के विचार आमन्त्रित हैं।
कुछ विचारणीय बिन्दू इस प्रकार हो सकते हैं.
1- भेड़ों कि तरह बेघर लोगों का शहरों के ख़राब से ख़राब घरों में बढ़ता जमावड़ा
2- सभी सामाजिक नैतिक बन्धनों का तनाव ग्रस्त होना तथा टूटते जाना
3- परिवार के पितृस्तात्मक ढांचे में अधीनतांए ;परतंत्रता , का तीखा होना
4- पारिवारिक रिश्ते नाते ढहते जाना ... युवाओं के सामने गंभीर चुनौतीयाँ ..बेरोजगारी
5- परिवारों में बुजुर्गों की असुरक्षा
6- महिलाओं और बच्चों पर काम का बोझ बढ़ते जाना, असंगठित क्षेत्र में सुविधाओं का भी काफी अभाव है
7- मजदूर वर्ग को पूर्ण रूपेण ठेकेदारी प्रथा में धकेला जाना
8- गरीब लोगों के जीने के आधार संकुचित होना
9- गाँव से शहर को पलायन बढ़ना तथा लम्पन तत्वों की बढ़ोतरी , शहरों के विकास में,अराजकता,ठेकेदारों और प्रापर्टी डीलरों का बोलबाला
10- जमीन की उत्पादकता में खड़ोत , पानी कि समस्या , सेम कि समस्या
11- कृषि से अधिक उद्योग कि तरफ व व्यापार की तरफ जयादा ध्यान
12- स्थाई हालत से अस्थायी हालातों पर जिन्दा रहने का दौर
13- अंध विश्वासों को बढ़ावा दिया जाना , हर दो किलोमीटर पर मंदिर का उपजाया जाना
14- अन्याय का बढ़ते जाना
15- कुछ लोगों के प्रिविलिज बढ़ रहे है
16- मारूति से सैंट्रो कार की तरफ रूझान, आसान काला धन काफी इकठ्ठा किया गया है
17- उत्पीडन अपनी सीमायें लांघता जा रहा है , रूचिका कांड ज्वलंत उदाहरण है ,
18- व्यापार धोखा धड़ी में बदल चुका है
19- शोषण उत्पीडन और भ्रष्टाचार की तिग्गी भयंकर रूप धार रही है
20- प्रतिस्पर्धा ने दुश्मनी का रूप धार लिया है
21- तलवार कि जगह सोने ने ले ली है
22- वेश्यावृति दिनोंदिन बढ़ती जा रही है
23- भ्रम व अराजकता का माहौल बढ़ रहा है , धिगामस्ती बढ़ रही है
24- संस्थानों की स्वायतता पर हमले बढ़ रहे हैं
25- लोग मुनाफा कमा कर रातों रात करोड़ पति से अरब पति बनने के सपने देख रहे हैं और किसी भी हद तक अपने को गिराने को तैयार हैं
26- खेती में मशीनीकरण तथा औद्योगिकीकरण मुठ्ठी भर लोगों को मालामाल कर गया तथा लोक जन को गुलामी व दरिद्रता में धकेलता जा रहा है
27- बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का शिकंजा कसता जा रहा है
28- वैश्वीकरण को जरूरी बताया जा रहा है जो असमानता पूर्ण विश्व व्यवस्था को मजबूत करता जा रहा है
29- पब्लिक सेक्टर की मुनाफा कमाने वाली कम्पनीयों को भी बेचा जा रहा है
30- हमारी आत्म निर्भरता खत्म करने की भरसक नापाक साजिश की जा रही हैं
31- साम्प्रदायिक ताकतें देश के अमन चैन के माहौल को धाराशाई करती जा रही हैं
32- गुट निरपेक्षता की विदेश निति से खिलवाड़ किया जा रहा है
33- युद्ध व सैनिक खर्चे में बेइंतहा बढ़ोतरी की जा रही है
34- परमाणू हथियारों की होड़ में शामिल होकर अपनी समस्याएँ और अधिक बढ़ा ली हैं
35- सभी संस्थाओं का जनतांत्रिक माहौल खत्म किया जा रहा है
36- बाहुबल, पैसे , जान पहचान , मुन्नाभाई , ऊपर कि पहुँच वालों के लिए ही नौकरी के थोड़े बहुत अवसर बचे हैं
मैं इस पक्ष पर अभी जान बूझ कर कुछ नहीं कह रहा ताकि हिड्डन अजैंडे की समस्या से बचा जा सके। संस्कृति को भी सांझी संस्कृति के रुप में ही बचाया जा सकता है न कि संकुचित दायरों में बांधकर।
और अब लॉक डाउन में बहुत से मुद्दों का प्रखर हो कर सामने आना ।
रणबीर सिह
हिसार ज्ञान विज्ञान समिति
हरियाणा ज्ञान विज्ञान समिति, हिसार।
(परिप्रेक्ष्य और कार्य दिशा)
साथियों,
आज हम एक भयानक विडंबनामय दौर से गुजर रहे हैं। आम तौर पर विकसित दुनिया में और हमारे देश में भी विकास के जो तौर-तरीके अपनाए गए हैं उनकी विसंगतियां दुनिया की अधिकांश आबादी को बदहाली, भुखमरी ,असुरक्षा और अनिश्चय की ओर धकेल रही हैं ।खुद मानव जाति का बड़ा हिस्सा आज भी विकास के अवसरों से वंचित है। तथाकथित विकसित देश भी अनेक प्रकार से गरीब देशों का दोहन करने के बावजूद बेरोजगारी ,गरीबी, सामाजिक हिंसा, दिमागी बीमारियों और हत्या आत्महत्या की महामारी से बच नहीं पाए हैं। बल्कि यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि उनकी गहरी गिरफ्त में हैं । इन देशों की नजर फिर भी एक बार गरीब देशों की मंडी और संसाधनों पर है।
नवजागरण के 400 साल के इतिहास में भी पिछले 200 वर्षों में विज्ञान ने साधारण लोगों के जीवन को बहुत अधिक प्रभावित किया है । वैज्ञानिक खोजों के साथ ज्ञान और विवेक की एक नई दुनिया खुली है। मानवतावाद दुनिया के केंद्रीय दर्शन के रूप में उभरा है। जनतंत्र ,समानता और धर्मनिरपेक्षता के आदर्श इसी मानवतावाद से निकले । विज्ञान ने नई उत्पादन शक्तियों को जन्म दिया। एक ऐसे मनुष्य को जन्म दिया जो धर्म, संप्रदाय, जात, गोत्र का प्रतीक मात्र नहीं था। जो नागरिक था ।यह नागरिक राष्ट्र ,राज्य और नागरिक समाज का केंद्र था। तर्क, विवेक ,आत्मनिर्भरता ,स्वतंत्रता और समानता जिसके मूल्य थे। हमारे यहां नवजागरण का दौर 19वीं शताब्दी में रेल, डाक ,तार और नई शिक्षा व्यवस्था के साथ-साथ आया। स्त्रियों और साधारण लोगों को शिक्षा के अवसर पहली बार मिले। लेकिन आज भी हमारे यहां एक बड़ा निर्क्षर समाज मौजूद है। पूरी दुनिया में समानता ,आत्मनिर्भरता और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत व्यवहार में बहुत पीछे रह गए हैं।
इस संदर्भ में हरियाणा ज्ञान विज्ञान समिति ने राज्य परिपेक्ष के निम्नलिखित बिंदुओं पर विभिन्न क्षेत्रों में काम करते हुए अपनी पहल कदमी ली हैं।
1. वैज्ञानिक दृष्टि से संपन्न शिक्षित धर्मनिरपेक्ष और आत्मनिर्भर समाज विकसित करना
2. पूरी मानव जाति के हित में विज्ञान के इस्तेमाल के लिए लोगों को संगठित करना और विज्ञान के जनक द्रोही इस्तेमाल का सक्रिय विरोध करना।
3. जीवन के सभी क्षेत्रों पर वह उनसे जुड़ी तमाम समस्याओं पर ठोस वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करना और उसे साधारण लोगों की पहुंच में लाना।
4. अपने जीवन को बेहतर बनाने की दिशा में संगठित प्रयास करने और प्रतिरोध करते तबकों से और उनके संघर्षों से गहरा तालमेल बनाना और ज्ञान-विज्ञान आंदोलन के सूत्रों से उन्हें जोड़ना उनका अध्ययन।
5. रोजगार आवास स्वास्थ्य शिक्षा स्वस्थ पर्यावरण आदि नागरिक सुविधाओं व मूल मानव अधिकारों के संदर्भ में जन पक्षीय दृष्टि मंचों व संस्थाओं का विकास करना।
6. साक्षरता और शिक्षा के कार्यक्रम चलाना पुस्तकालय बनाना वह चलाना जनवा चंद व अध्ययन समूह और जनचेतना केंद्रों को चलाना किताबों को लोगों की पहुंच।
7. सार्वभौम सेकुलर शिक्षा के लिए वैकल्पिक कार्यक्रम चलाना अध्ययन सामग्री तैयार करना प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाने व संस्थाओं का निर्माण और संचालन करना।
8. प्राकृतिक आपदाओं के समय पीड़ित लोगों की मदद करना।
9. बच्चों के बीच ज्ञान विज्ञान को लोकप्रिय बनाना।
10.स्थानीय 10 कारों व लोगों के कौशल के सत्र को उठाना उन्हें संगठित करते हुए कृषि आधारित छोटे उद्योग के के क्षेत्र में कार्य करना।
