Tuesday, August 22, 2023

तलछट की जनता

 जिन्दगी का सफ़र

स्कूल से आगे बढ़कर फिर
कालेज में जाना होगा इसके
सपने बहोत बार देखे थे मैंने
कोनसे कालेज में दाखिला हो
यह भी कई बार सोचा था मैंने
एक साल पहले सोचना शुरू किया
पहले दिन का पहनावा क्या होगा
हेयर स्टायल पर भी नजर डाली थी

क्या सायकिल पर ही कालेज जाना होगा

या फिर स्कूटर का जुगाड़ करेंगे

घर की हालत जुगाड़ की भी नहीं है

इसी उधेड़ बुन में गुजर जाता है

पूरा का पूरा दिन मेरा जुगाड़ पर

आखिर एक दिन पाँच सात लोग आये

आव भगत हुई मेरे से भी पूछा

कोनसी क्लास पास की है बेटी

दूसरा सवाल था कितने नंबर आये

नंबर बताये मैंने धीमे से ही सही

नजरें मुझे घूरती सी महसूस हुई

जैसे बकरे को घूरती हैं मारने से पहले

हर कसाई की नजरें और फिर हलाल

कर दिया जाता है बेचारा बकरा

मुझे क्या पता था कि मेरा भी

हलाल होने का वक्त आ गया है

हाँ एक महीने बाद ही मेरी शादी

कर दी गयी एक बेरोजगार के साथ

दो बेरोजगारों कि दुनिया के सपने

मैं नहीं देख पाई क्योंकि अँधेरे के

सिवाय कुछ दिखाई नहीं दी रहा था

भूखे घर कि आ गयी हम क्या करेँ ?

ये दिन देखने के लिए क्या छोरे

को जन्म दिया था ?

प्यार मोहबत बेहतर जिन्दगी

ये सब अतीत कि बातें थी

घर भी तंग सा दो ही कमरे

साथ में भैंस व बछिया का भी

सहवास रहता था चौबीस घंटे

समझ सकता है कोई भी कि

दो कमरों में छः सात सदस्यों के

परिवार का कैसे गुजारा होता है !

फुर्सत ही नहीं होती एक दूसरे के लिए

चोरों कि तरह मुलाकातें होती हैं हमारी

बस जीवन घिसट रहा है हमारा

एक दिन सोचा इस नरक से कैसे

छुटकारा मिले ?

मगर उसे ताश खेलने से फुर्सत कहाँ

घर खेत हाड़ तोड़ मेहनत और तान्ने

यही तो है जिन्दगी हमारी

हमारे जैसे करोड़ों युवक युवतियां हैं

कभी कभी जीवन लीला को ख़त्म

कर लेने का मन बनता है फिर

ख्याल आता है इससे क्या होगा

दो चार दिन का रोना धोना फिर खत्म

यह सिलसिला यूंही चलता रहेगा आगे

इस अँधेरे को कैसे ख़त्म किया जाये ?

कैसे रौशनी कि किरण हम तक भी

पहुँच सके यही तो यक्ष प्रश्न है

बहुत बार सोचा कई बार सोचा है

मगर रास्ता नजर नहीं आता है हमें

बस इसी कशमोकश में जीवन

किसी तरह गुजर रहा है हमारा

जीवन सरक रहा है हमारा !

पूजा पाठ बालाजी कि सेवा सब

कर के देख लिया मगर सब मन की

शांति की बात करते हैं कोई भी

रोटी और रोजगार की बात नहीं करता

आप ही बताओ क्या करेँ हम ?
******
मुझे लगता है कि उन्ही के मैदान में खेल रहे हैं हम
उन्हीं की शर्तों को आज भी देखो झेल रहे हैं हम

संस्कृति के नाम पर उनहोंने मेहनत छीनी हमारी
परम्परा के नाम पर अच्छे से खाल गयी है उतारी

हमारे नेताओं ने भी उनके मैदान में झोंक दिया रे
अपना मैदाने जंग नहीं पूरा अभी तयार किया रे

समझने की ताकत हैं अंगिन्नत ये दिमाग हमारे
कम्प्यूटर फेल हो जाते हैं बहुत बार देखो बेचारे

हमारी सोचने की ताकत को घुमा दिया है दोस्तों
अपने मैदान में आने का मन बना लिया है दोस्तों

अपनी लड़ाई अपने मैदान में लड़ने की ठान ली
समझो मालिकों ने हार शुरू हुई पक्का मान ली

इंकलाब तो आएगा ही नहीं कोई रोक पायेगा रे
इंसान का कब्ज़ा पूंजी पर फिर हो ही जायेगा रे

सबके लिए सब कुछ होगा नहीं भूख रहेगी यारो
मानवता की जीत होगी हैवानियत ये ढहेगी यारो

******
Please React
इस बेवफा सिस्टम से वफ़ा मांग रहे हैं
हमें क्या मालूम है हम खता  मांग रहे हैं
ये क़िस्मत  का खेल रचाया है इसी ने तो---
इसी से हम क़िस्मत क़ि दुआ  मांग रहे हैं
पूरा सच छिपा ये आधा  सच बताते हमको --
जहर घोला उसीसे साफ हवा मांग रहे हैं
रोजाना जो खेलता हमारे जज्बात के साथ--
सुख क़ि राही का उससे पाता मांग रहे हैं --
सुरग क़ि कामना में छिपी हुयी रणबीर--
अपने खुद क़ि ही हम चिता मांग रहे हैं 
*****
SUN JARA AUR KAH JARA
किसी पर भी तूं एतबार न कर

भावुकता में बर्बाद घरबार न कर

बात हैं बात का भरोसा क्या है
--
जाँ किसी पर निस्सार न कर

अमीर क़ि नजरें जाँ लेलेंगी--

इनसे कभी कोई करार न कर

बेवफा से वफ़ा नहीं होती है
--
जाने दे दिल को बेक़रार न कर

अमीर गरीब क़ि दुनिया है यह
--
झूठे वायदे हैं स्वीकार न कर

रणबीर एक दिन टूट जायेगा--

ख्वाब है ख्वाब से प्यार न कर |
*******
अन्दर और बाहर को समझना जरूरी है
न समझने की भी कईयों की मजबूरी है
अन्दर का मतलब हमारा अपना शरीर
बाहर का मतलब वातावरण की शमशीर
बाहर अन्दर को प्रभावित  करता बताते
अन्दर बाहर को प्रभावित करता जताते
अन्दर बाहर का आपसी क्या तालमेल
इसे समझने में हो ही जाता है घालमेल
अंदर बहुत छिपाता हमारी हकीकत को
फिर भी आ जाता बाहर कई मुशीबत को
******
बलात्कारियों का दबदबा चारों तरफ छा  रहा
रोजाना ब्लात्कार हो रहे समझ नहीं आ रहा
एक तरफ पेट में मारते जांच पड़ताल करके
महिला भ्रूण हत्या हरयाणा में गुल खिला रहा
शरीफ से शरीफ का दिमाग भी फिसल जाता
जब भी उसे मौका मिले शरीफ नहीं गवां रहा
औरत को दोषी ठहराने का झूठा चलन आज
हरयाणा में रोजाना दिन दिन बढ़ता जा रहा 
रिश्तेदार ठेकेदार  बने हमारी संस्कृति के देखो
बाप चाचा भाई पड़ौसी मुंह काला करवा रहा
पतन समाज का हो रहा नंबर वन हरयाणा में
नम्बर वन कहने में मेरा कलम तो घबरा रहा
*******
दो हजार तेरा का आधा बरस बीत गया 
सुधार कहाँ मंहगायी का दानव जीत गया 
भारत की अर्थ व्यवस्था चली गयी खाई मैं 
विकास दर बीते दस साल की नीची इकाई मैं 
औद्योगिक विकास दर की क्या बात बताऊं 
पिछ्ले बीस साल में सबसे नीचे गई दिखाऊँ 
बजट घाटा हमारी आज की चुनौती बड़ी है 
मोदी के बसकी नहीं आई सी यू में पड़ी है 
राजनीति दिशाभ्रम इसका कारण हैं बताते 
पूंजीवादी विकास दोषी ये बात क्यों छिपाते
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अभी बहुत कुच्छ बाकी है इस तुम्हारी 
खुश्क दुनिया में 
हमारी मेहनत 
हमारी सच्चाई 
हमारी इंसानियत 
हमारी कुर्बानी
हमारी मोहब्बत 
हमारी शर्मो लिहाज 
हमारी भूख मरी
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--------------
लंबी फहरिश्त है 
इस दुनिया को 
तबाह नहीं होने देंगे 
रणबीर
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असमंजस
पता नहीं आज का जमाना किधर को जा रहा है ।।
सुबह कहीं शाम कहीं अगली सुबह कहीं पा रहा है ।।
नई तकनीक ने कब्ज़ा जमाया पूरे इस संसार पर
इंसान इंसान को दिन दिहाड़े नोच नोच खा रहा है ।।
दूसरों के कन्धों पर पैर रख कर आसमान छू रहे हैं
फ्री सेक्स और नशा आज नई पीढी पर छा रहा है ।।
दारू समाज के हर हिस्से में सम्मान पाती जा रही
अच्छा  खासा हिस्सा आज दारू पीके गाने गा रहा है।।
लालच फरेब धोखा धडी का दौर चारों तरफ छाया
नकली दो नंबर का इंसान हम सबको ही भा रहा है ।।
बाजार व्यवस्था का मौसम है मुठ्ठी भर मस्त इसमें
बड़ा हिस्सा दुनिया का आज नीचे को ही आ रहा है।।
भाई भाई के सिर का बैरी आतंक वाद बढ़ गया है
पुलिश और अफसर दायें बाएं से पैसे खूब बना रहा है।।
पूर्व के पूरे सिस्टम को दीमक खाती जा रही देखो
आज भ्रष्टाचार चारों तरफ डंक अपना चला रहा है।।
एक तरफ माल खड़े हुए दूजी तरफ टूटी सड़कें हैं
तरक्की का यह माडल दूरियां कितनी बढ़ा रहा है।।
अपने भार तले एक दिन मुश्किल होगा साँस लेना
तलछट की जनता जागेगी रणबीर उसे जगा रहा है।।

********
राखी का त्यौहार मन में उल्टा सवाल उठाता यारो
ना बराबरी का मसला लगता कहीं ये छिपाता यारो
करवा चौथ रख कर महिला लम्बी उम्र मांगती है
रक्षा करवाने को आपकी कलाई पर राखी बांधती है
कितना इमोशनल ब्लैक मेल सवाल उठाते डरता हूँ
मन में उठे सवाल पूछने की न मैं हिम्मत रखता हूँ
महिला का शोषण है इस जगह से सोच कर देखो
पुरुष प्रधान व्यवस्था को यारो खोल कर तो देखो
********
यही रफ़्तार रही ज़माने की ताऊ
तो इंसानों की जगह होंगे ये हाऊ
खुदगर्जी चुगलखोरी खुसामद की
मौज होगी हर चीज यहाँ बिकाऊ
अमेरिका और कोर्पोरेट छाया देखो
भारत बनाया इन्होंने बैल हिलाऊ
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गरीब  परिंदा उड़ान में  है 
तीर अमीर की कमान में है
है डराने को मारने को नहीं
मरा तो अमीर नुकसान में है
जिन्दा रख कर लहू चूसना
अमीरों के दीन ईमान में है
खौफ ही खौफ है जागते सोते
लूट हर खेत खलिहान में है
मरने न देंगे न जीने देंगे
साजिश  पूंजी महान  में है
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आम जनता के लिए बेरोजगारी है
घरों से बेदखली है बड़े पैमाने पर
समाज कल्याण के प्रावधानों में
कटौतियां बखूबी से जारी यारो
सरकारी खजाने की कीमत पर
बैंकों और  वितीय कम्पनियों को
फिर बड़ा मुनाफा बटोरने का ये
मौका मिल रहा है भारत देश में
मेहनतकश की कीमत पर ही तो
मग़र कब तक एक दिन हिस्साब
तो माँगा जायेगा  पाई पाई का
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बड़ी मुश्किल से ये आंसू छिपाए हमने
हँसना चाहा झूठे ठहाके लगाये हमने
तुमको मालूम ये  शायद हो के ना  हो
तुम्हारे जाने के बाद आंसू बहाए हमने
प्यार किया हमने नहीं  छुपाया कभी
दिल के तराने थे तुमको सुनाये हमने
तेरे साथ इन्कलाब के जो नारे लगाये
यारो अब तलक नहीं हैं भुलाये  हमने
राह में साथ छोड़ गये अफ़सोस तो है
पल याद हैं वो जो संग बिताये हमने
जानते हैं आप हमें नहीं  भूल सकेंगे
एक अनुभव बस बिंदु दिखाए हमने
हादसा नहीं एक सच्चाई है ये प्यार
अफ़सोस है क्यों ये रास्ते भुलाये तुमने
*******
कुछ नए बन रहे  कुछ पुराने बने
हर कदम पर यहाँ कैदखाने बने
किस तरफ से चली गोलियां क्या पता
किन्तु हर बार हम ही निशाने बने
था क्या हमने सोचा ये क्या हो गया
हमें क्यों इस चमन से गिला हो गया
दिया जिसकी खातिर था हमने लहू
वही मौसमें गुल क्यों खफा हो गया

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हम तो काँटों को भी नरमी से पकड़ते हैं
मगर लोग हैं जो फूलों को बेदर्दी से मसलते हैं

********
उस दिल में और इस दिल में
फर्क सिर्फ इतना ही तो है
वो पत्थर है जो साबूत है
ये शीशा था जो टूट गया

******
असमंजस
पता नहीं आज का जमाना किधर को जा रहा है ।।
सुबह कहीं शाम कहीं अगली सुबह कहीं पा रहा है ।।
नई तकनीक ने कब्ज़ा जमाया पूरे इस संसार पर
माणस माणस को दिन दिहाड़े नोच नोच खा रहा है ।।
दूसरों के कन्धों पर पैर रख कर आसमान छू रहे हैं
फ्री सेक्स का फैशन आज नई पीढी पर छा रहा है ।।
दारू समाज के हर हिस्से में सम्मान पाती जा रही
अछ खासा हिस्सा आज दारू पीके  गाने गा रहा है।।
लालच फरेब धोखा धडी का दौर चारों तरफ छाया
नकली दो नंबर का इंसान हम सबको ही भा रहा है  ।।
बाजार व्यवस्था का मौसम है मुठ्ठी भर मस्त इसमें
बड़ा हिस्सा दुनिया का आज नीचे को ही आ रहा है।।
भाई भाई के सिर का बैरी आतंक वाद बढ़ गया है
पुलिश और अफसर दायें बाएं से पैसे खूब बना रहा है।।
पूर्व के पूरे सिस्टम को दीमक खाती जा रही देखो
आज भ्रष्टाचार चारों तरफ डंक अपना चला रहा है ।।
एक तरफ माल खड़े हुए दूजी तरफ टूटी सड़कें हैं
तरक्की का यह माडल दूरियां कितनी बढ़ा रहा है ।।
अपने भार तले एक दिन मुश्किल होगा साँस लेना
तलछट की जनता जागेगी रणबीर उसे जगा रहा है ।।

थोड़ी और बातें

 मत कहो की तुम्हे हमसे प्यार  हो गया 

गर था तो इतनी जल्दी   कहाँ खो गया
प्यार तो सोनी महीवाल का बताते यारो 
कचा  मटका भी उनके प्यार पे रो गया

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लेगे उडारी देखो
मियां बीबी रहगे ऐकले तीनो बालक लेगे उडारी देखो।
के के सपने संजोये थे जिब हुई ये संतान म्हारी देखो ।
बचपन उनका सही बीते करे दीन रात काले हमनै
क्याहें की परवाह करी ना बहा पसीना पाले हमनै
पढ़न खंदाये लाड लड़ाए तनखा खर्ची सारी देखो।
कदे रुसजया कदे कुबध करै यो छोरा सबते छोटा मेरा
बड़ी छोरी हुई सयानी शादी का दुःख था मोटा मेरा
बिचली छोरी का के जिकरा वा तिनुओं मैं न्यारी देखो।
एक अम्बाला दूजी सूरत मैं परिवार अपने चला रही
ये मोबाइल साँझ सबेरी हमते रोजाना ही मिला रही
बात करें दुनिया भर की उमर बीतती जारी देखो।
कई बार बहोत ऐकले मियां बीबी हम हो ज्यावें सें
झगडा करल्याँ छोटी बात पै लड़भीड़ सो ज्यावें सें
रणबीर सिंह आप बीती सै कलम मेरी पुकारी देखो।
******
सच छिपाए न छिपे
एक बार भोपाल से ग्वालियर
ट्रेन से अपने घर जा रहा था मैं
उसी ट्रेन में उसी डिब्बे में एक
लड़की पास की सीट पर बैठी थी
थोड़ी बातचीत शुरू हुयी तो पूछा
मेरे घर परिवार के बारे में उसने
बताया पिता हाई कोर्ट में जज मेरे
मम्मी सुप्रीम कोर्ट की वकील हैं
लड़की मन ही मन में हंसने लगी
समझ नहीं सका मैं उसका हँसना
अपनी सीट पर लेट सो गया मैं
घर पहुंचा तो देखा वही लड़की
मेरे घर पर मेरे से पहले पहुंची थी
देख मुझे बहुत जोर से हँसी लड़की
असल में मेरी मौसी की बिटिया
मैंने सफ़र में पहली बार देखा उसे
उसकी हँसी ने शर्मशार किया मुझे
क्योंकि ट्रेन में जो बताया था मैंने
सभी कुछ झूठा था था कथन मेरा
उस दिन के बाद मैंने कसम खाई
अब के बाद झूठ नहीं बोलूँगा मैं
बहुत हद तक कसम मैंने है निभायी
कभी कभी झूठ बोलता हूँ मैं तो
ट्रेन का नजारा जरूर याद आता
एक बार फिर मुझे याद दिला जाता
******
इम्तिहान
हमारा इम्तिहान लिया हर बार पास हुए
सब कुछ तुम्हारे पास फिर भी उदास हुए
पता है तुम्हारा तुम एक अमर बेल हो
रब राखा क़िस्मत का रचा रहे खेल हो
तुम्हारा अहम् और ये अहंकार
दिखाता अन्दर का पूरा अंधकार
अंधी गली में तुम बढ़ते जा रहे
अपनी मौत के श्लोक पढ़ते जा रहे
******
कारोबार नया साल हुआ
आज नए साल का मनाना भी एक कारोबार हों गया
बनावटी पन लटके झटके मस्त हमारा घरोबार हों गया
कैटरिना मलायका के ठुमके कैसी इन्तहा ये बेहयाई की
देखके पूरा हिंदुस्तान ख़ुशी से कितना ये सरोबर हों गया
एक फुटपाथ पर बैठा हुआ वह यह सब देख रहा है
दो चार लकड़ी इकठी करके हाथ अपने सेक रहा है
सामने दुकान पर देखी ठुमकों की झलक थोड़ी सी
घरवाली ने देख लिया तो सच मुच ही झेंप रहा है
नए साल का जश्न मनाकर आज मुंबई छाई देखो
ठिठुरे बचपन और जवानी ये गाँव की रुसवाई देखो
लड़की मारके पेट में हमने लूटी है वाह वाही देखो
शराब नशा और मस्ती ठुमकों की ये बेहयाई देखो
गला काट मुकाबला आज दुनिया में है छाया देखो
भाई का भाई दुश्मन इसने यहाँ पर है बनाया देखो
आखिर कहाँ जा रहे है हम जरा देर सोचो तो यारो
इंसानियत का चेहरा यहाँ पर किसने है चुराया देखो
******
हम और वो
मिला वो भी नहीं करते , मिला हम भी नहीं करते
गिला वो भी नहीं करते , शिकवा हम भी नहीं करते
किसी मौड़ पर टकराव हों जाता है अक्सर हमारा
रुका वो भी नहीं करते , ठहरा हम भी नहीं करते
*******
मेरी शादी से पहले
मेरी शादी से पहले परिवार ने
खूब पूछताछ छानबीन की थी
बहुत गुणवान लड़का है कोई
मांग नहीं हैं उनकी सीधे सादे
सैल पर दो एक बार बात की
सपनों के संसार में खो गए हम
बस झट मंगनी और पट ब्याह
महीना दो महीना बहुत यादगार
गुजर गया वक्त पता नहीं चला
फिर असली जिन्दगी से सामना
हुआ मेरा तो बस धडाम से गिरी
सोचा यह सब किससे साँझा करूँ ?
या फिर घुट घुट के मैं यूं ही मरूं
उसकी शिकायत कि माँ को मैं
बिल्कुल खुश नहीं रख पा रही हूँ
बहुत देर बाद समझ आया कि
खुश ना रहने का दिखावा करती माँ
मुझे प्रताड़ित करना फितरत ये
माँ की बनता चला गया समझो
बहुत कोशिश की मैंने तो दिल से
मगर तीन साल में परिवार पूरा
कलह का अखाडा सा बन गया
मेरी माँ (सास) तीन साल हुए हैं
मुझसे बोलती ही नहीं है कभी
पूरा परिवार बायकाट पर उतरा
ऐसे में पति देव भी अब तो
छोटी छोटी बात के बहाने ही
मुझ में कमियां देखने लगे हैं
मेरे परिवार की विडम्बना पर
मुझे रोना आता है कई बार
मैंने तो लव मेरेज भी नहीं की
न ही एक गौत्र कि गलती की है
न ही एक गाँव में बसाया घर
दहेज़ जैसा बना वैसा तो लाई मैं
मैं जीन भी नहीं पहनती कभी भी
नौकरी भी करती हूँ और घर भी
पूरी तरह सम्भालती हूँ फिर भी
यह सब क्यों हों गया बताओ तो
हमारे बीच कोई लगाव न बचा
बस ये लोग क्या कहेंगे हमको
इस अदृश्य भय के कारण ही तो
हम एक छत के नीचे जी रहे
छत एक है मकान एक है
पर घर नहीं है यह हमारा
बंद करती हूँ यहीं पर मैं किस्सा
वर्ना अब खुल जायेगा पिटारा पूरा
आज का दौर नाज्जुक दौर है
मैं दुखी हूँ तो पति खुश है
ऐसी बात नहीं मानती हूँ मैं
दुखी वे भी बहुत जानती मैं
मगर क्या समाधान है इसका ?
एक साल मैं अपने पीहर रही
वहां भी बोझ ही समझी गयी
सासरे में दूरियां और बढ़ी मेरी
कई बार सोचा अलग हों जाऊं
अलग होंकर क्या हांसिल होगा
शायद पति के बिना नहीं रह
सकती मैं अकेले अकेले कहीं पर
तलाक का लोड सोच कांप जाती
समझौता कर के जीने की सोची
पता नहीं ठीक हूँ या गलत मैं !!!
******
तीर सच्चाई के
हम तीर सच्चाई के रूक रूक के चलाते हैं
दीवाने हैं इसके औरों को दीवाना बनाते हैं
हम रखते हैं ताल्लुक सफरिंग दुनिया से
उसके तस्सवुर में हम खवाब जगाते हैं
रहना होशियार उनके छलकते जामों से
ये मय के बहाने से बस जहर पिलाते हैं
चलना सही राहों पर रख जान हथेली पर
लूटेरे है धर्म की आड़ में खूब लूट मचाते हैं
साईनिंग जाल साजी रचते रचते हम पर
हम हैं की अपने से दीवाने बनाना चाहते हैं
*******
कम उमर के बच्चे होते हैं बहोत सच्चे
उमर  ही ऐसी है करे ऐसी की तैसी है
उलटी सीधी बात मिलें  दोस्तों के हाथ
हारमोन का कसूर आकर्षण का दस्तूर
माँ बाप भी  चुप हैं ये तो अँधेरा घुप है
नासमझी नादानी नहीं सिर्फ हिन्दुस्तानी
दुनिया में ऐसा होता नासमझ इसे ढोता
इतने जालिम न बनो हद से आगे न तनों
********
मेरा कसूर
हमने दोनो ने मिलकर सोचा

जिन्दगी का सफ़र तय करेंगे

बहुत सुन्दर सपने संजोये थे
प्रेम का पता नहीं ये हरयाणा
क्यों पुश्तैनी दुश्मन बन गया
यह सब मालूम था हमको पर

प्यार की राहों पर बढ़ते गए

मेरे परिवार वाले खुश नहीं थेa

क्यों मुझे पता नहीं चला है

न तो मैंने एक गोत्र में की है
न ही एक गाँव में शादी मेरी
न ही दूसरी जात में की मैंने

तो भी सब के मुंह आज तक

फुले हुए हैं हम दोनों से देखो

प्यार किया समझा फिर शादी

ससुराल वाले भी खुश नहीं हैं

शायद मन पसंद गुलाम नहीं

मिल सकी जो रोजाना उनके

पैर छूती पैर की जूती बनकर

सुघड़ सी बहु का ख़िताब लेती

दहेज़ ढेर सारा लाकर देती ना

प्यार का खुमार काम हुआ अब

जनाब की मांगें एकतरफा बढ़ी

मैं सोचती हूँ नितांत अकेली अब

क्या हमारा समाज दो प्रेमियों के
रहने के लायक बन पाया यहाँ \

चाहे कुछ हो हम लोड उठाएंगे

मगर घुटने नहीं टिकाएंगे यारो

वो सुबह कभी तो आयेगी की
इंतजार में ये संघर्ष जारी रखेंगे
झेलेंगे इस बर्बर समाज के सभी
नुकीले जहरीले तीर छाती पर ही
जिद हमारी शायद यही है कसूर

बाढ़ सी आयी

 क्या कुछ नहीं बदला 

---------------------

उखल कहाँ अब

मुस्सल  कहाँ अब 

गौजी  कहाँ अब 

राबडी  कहाँ अब 

बाजरे की खिचडी 

बताओ कहाँ अब 

गुल्गले  कहाँ अब 

पूड़े  कहाँ अब 

सुहाली  कहाँ अब 

शकर पारे  कहाँ अब 

पीहल  कहाँ अब 

टींट कहाँ अब

हौले  कहाँ अब

मखन का टींड 

कहाँ दिखता अब 

छोटी  सी बात 

आलू ऊबाल कर 

आलू के परोंठे 

कहाँ चले गये 

पौटेटो चिप्स आये 

बीस गुना महंगे 

छद्म आधुनिकता 

पौटेटो चिप्स खाना 

फैशन बन गया 

बहुत कुछ बदला 

लम्बी फहरिस्त है |

******

बेचैनी जनता की बढ़ती जा रही 

समझौता संघर्ष करती आ रही 

डायलैक्टिस इसी को कहते हैं 

आज बेचैनी दुनिया पर छा रही 

डेमोक्रेसी ने आगे कदम बढाया है 

जनता ने कुछ अधिकार पाया है 

कितना ही भ्रष्टाचार बढ़ गया हो 

इसके खिलाफ विरोध जताया है 

उठती बैठती जीवण बिता रही है 

कई बार घन घोर अँधेरा हटाया है 

लूट के हथियार बदल लिए जाते हैं 

जनता ने एकता हथियार बनाया है

******

शादी की अल्बम

शादी वह मौका है जब दो दिल 

दो ख़ानदान अपने सुख के पलों को 

पूरे भरपूर अंदाज में जीते हैं यारो 

इसके गवाह होते हैं कई परिवार 

बहुत से मेहमान दूर से आते यारो 

वे सब अपनी हाजरी दर्ज करवाते

कैमरे की जद में सब कैद हों जाते

जब भी शादी का अल्बम पल्टा जाता

यादों के हम सब के दरीचे खुल जाते

पुरानी खुसबूएं फिर महकने लगती हैं

धुंधले पड़ गए चेहरे साफ दिखाई देते

तभी तो हम तुम सब अपनी अल्बम

देखकर मुस्कुरा उठते हैं मन ही मन

हर तस्वीर एक कहानी कहती है

जाने क्या क्या यादें ताजा होती

फूफा बुआ ताऊ ताई सब आये 

कुछ लोगों के बीच नई शादी का

आगाज भी बनता इन शादियों में

आप भी देखना एक बार फिर आज

अपनी शादी की एल्बम और

लिख देना अपने दिल की बात

अपनी डायरी के किसी पन्ने पर

*****

मेरा कसूर

हमने दोनो ने मिलकर सोचा 


जिन्दगी का सफ़र तय करेंगे 


बहुत सुन्दर सपने संजोये थे

प्रेम का पता नहीं ये हरयाणा

क्यों पुश्तैनी दुश्मन बन गया

यह सब मालूम था हमको पर 


प्यार की राहों पर बढ़ते गए 


मेरे परिवार वाले खुश नहीं थे, 


क्यों मुझे पता नहीं चला है 


न तो मैंने एक गोत्र में की है

न ही एक गाँव में शादी मेरी

न ही दूसरी जात में की मैंने 


तो भी सब के मुंह आज तक 


फुले हुए हैं हम दोनों से देखो 


प्यार किया समझा फिर शादी 


ससुराल वाले भी खुश नहीं हैं 


शायद मन पसंद गुलाम नहीं 


मिल सकी जो रोजाना उनके 


पैर छूती पैर की जूती बनकर 


सुघड़ सी बहु का ख़िताब लेती 


दहेज़ ढेर सारा लाकर देती ना 


प्यार का खुमार काम हुआ अब 


जनाब की मांगें एकतरफा बढ़ी 


मैं सोचती हूँ नितांत अकेली अब 


क्या हमारा समाज दो प्रेमियों के

रहने के लायक बन पाया यहाँ \ 


चाहे कुछ हो हम लोड उठाएंगे 


मगर घुटने नहीं टिकाएंगे यारो 


वो सुबह कभी तो आयेगी की

इंतजार में ये संघर्ष जारी रखेंगे

झेलेंगे इस बर्बर समाज के सभी

नुकीले जहरीले तीर छाती पर ही

जिद हमारी शायद यही है कसूर

*******

TO OPPOSE

कहना बहुत आसान है मुश्किल चलना सच्चाई पर

लहर के उल्ट तैर कर ही पहुंचा जाता अच्छाई पर

बुराई की ताकत को यारो देख कर डर जाते हम

इसके दबाव में बहुत सी गलती भी कर जाते हम

आका बैठ के हँसते रोजाना फिर हमारी रुसवाई पर

मेहनत हमारी की अनदेखी रोजाना हो रही दोस्तो

चेहरे की लाली हम सबकी रोजाना खो रही दोस्तो

कहते वो हमको बेचारा जो जीते हमारी कमाई पर

बीज है खाद और खेत भी इससे फसल नहीं उगती

फसल उगती है तब यारो जब मेहनत हमारी लगती

महल बने ये सभी तुम्हारे हम सब की तबाही पर

******

सब कुछ बहता जा रहा है 

एकाध खड़ा रम्भा रहा है 

सफेद धन ढूंढें मिलता यहाँ 

काला धन सब पे छा रहा है 

गंभीरता शिकार हुई उतावलेपन की 

मानवता शिकार हुई शैतानियत की 

इमानदारी शिकार हुई बेईमानी की 

वो शिकारी हैं और हम शिकार उनके 

खेल पूरे यौवन पर है जीत उनकी है 

पर डर सता रहा है उनको क्योंकी 

जीत कर भी हारेंगे ही अम्बानी जी 

हार कर भी जीत तो हमारी ही होगी 

क्योंकी मानवता इंसानियत गंभीरता 

ये तो हमारे पास ही हैं और रहेंगी भी

******

प्यार का तोफा 

एक लड़की ने एक लड़के से प्यार किया 

लड़के ने उसे बलात्कार का उपहार दिया 

इतने मेंभी सबर नहीं उस वहसी को आया 

अपने चार मुसटन्ड़ों को था साथ में लाया 

उन्होंने भी बारी बारी मुंह किया था काला 

गिरती पड़ती ताऊ के घर पहुँची थी बाला 

ताऊ को  बाला ने सारी हकीकत बताई थी 

ताऊ ने भी वह हवस का शिकार बनाई थी 

माँ बाप ने जाकर बाला को छुड वाया था 

पुलिस में हिम्मत कर केस दर्ज कराया था

गाँव के कुछ नौजवानों ने आवाज उठाई थी 

पाँचों की  और साथ ताऊ की जेल कराई थी 

आज भी जेल में पैर पीट रहे हैं सारे के सारे 

क्या हुआ समाज को हवस ने हैं पैर पसारे

******

अभी तो शुरुआत है

लालच खुदगर्जी ये 

हमें शैतान बनायेंगी 

जरा संभल के !!!!! 


हमारी इंसानियत को 

हवानियत में तब्दील 

करने के अथक प्रयास 

किये जा रहे हैं दोस्तों 

अबतोसंभलना ही होगा 


जितना समझा दुनिया को 

उतना दुःख बढ़ता गया मेरा 

कि इतना भेदभाव क्यूं है 

क़िस्मत का ये जुमला तेरा 

मुझे सबसे बड़ा हथियार लगता 

इस भेदभाव के असली कारणों 

को छिपाने का !!!!!!!!!!!!

*********

एक लड़की ने साहस किया और आवाज उठाई 

बदतमीज गुरु जी ने अपनी बदनीयत दिखाई 

कुछ लडकीयों ने साहस किया और भीड़ गयी 

गुरु जी की सरेआम की सबने मिल कर पिटाई 

केस दर्ज होने जा रहा था उस गुरु के खिलाफ 

लड़की के बाप ने बीच में आकर के  खेल रचाई 

पैसे लेकर केस बिगड़ दिया गुरु छुट गया साफ़

यह कहानी नही हकीकत है आप तक पहुंचाई 

कहाँ जा रहे हैं हम समझ नहीं पा रहा दोस्तों 

एक घटना नहीं है ऐसी घटनाओं की बाढ़ आयी

कुछ काम की बातें हैं

 कैसा अजीब नजारा

कैसा अजीब नजारा देह मेरी पर हल्दी बीरू के नाम की
कैसा अजीब नजारा हथेली मेरी मेहंदी बीरू के नाम की
कैसा अजीब नजारा सिर मेरा पर चुनरी बीरू के नाम की
कैसा अजीब नजारा मांग मेरी पर सिन्दूर बीरू के नाम की
कैसा अजीब नजारा माथा मेरा पर बिंदी बीरू के नाम की
कैसा अजीब नजारा नाक मेरी पर नथनी बीरू के नाम की
कैसा अजीब नजारा गला मेरा मंगल सूत्र बीरू के नाम की
कैसा अजीब नजारा कलाई मेरी चूड़ियाँ बीरू के नाम की
कैसा अजीब जमाना ऊँगली मेरी अंगूठी बीरू के नाम की
कैसा अजीब जमाना कुछ भी तो नहीं है मेरा मेरे नाम का
चरण वन्दना करूँ सदा सुहागन आशीष बीरू के नाम का
करवा चौथ व्रत मैं करूँ  पर वो भी तो बीरू के नाम का
बड़मावस व्रत मैं करती पर वो भी तो बीरू के नाम का
कोख मेरी खून मेरा दूध मेरा और नीरू बीरू के नाम का
मेरे नाम के साथ लगा गोत्र भी मेरा नहीं बीरू के नाम का
हाथ जोड़ अरदास सबसे बीरू के पास क्या मेरे नाम का
रणबीर
6.7.2015
*******
अगले पिछले का चक्कर
अगले पिछले के चक्कर में अबका हिसाब बिगाड़ लिया
टिकवा पथरों पर माथे हमारे भक्तों ने बिठा जुगाड़ लिया
इसमें भोगा वो पिछले का अब किया वो मिलेगा अगले में
इसकी कोई जगह नहीं है सार सोच कर लिकाड़ लिया
कर्म करो फल की चिंता ना करो कभी से इसे मानते आये
अडानी अम्बानी जैसों ने गीता से क्यों खिलवाड़ किया
अन्धविश्वाशों का हुआ है क्यों बहुत प्रचार प्रसार यहाँ पर
विज्ञान ने अंधविश्वासों का आज पूरा नकाब उघाड़ दिया

****
मान सम्मान नहीं मिलता,दिल का फूल नहीं खिलता
मेरा विश्वास रोज हिलता, यह सब कैसे समझाऊँ मैं ||
भाई का भाई दुश्मन लड़की महफूज नहीं घर बार में
पैसा छा  गया चारों और खुद गरज बेगैरत संसार में
गरीब मरें बिना दवाई क्यों , बच्चे रहें बिना पढ़ाई क्यों
अम्बानी लूटें हैं कमाई क्यों , यह सब कैसे समझाऊँ मैं ||
हमारी इज्ज़त  पर डाका रोजाना सफेदपोश डाल रहे
दबाते हैं हर तरह से मग़र उठ फिर भी सवाल रहे
अमीर गरीब की खाई है , देती बढ़ी हुई दिखाई है
काले धन धूम मचाई है , यह सब कैसे समझाऊँ मैं ||
खुदगर्जी धोखे बाजी का बाजार बहुत गरम हुआ है
हुए सरमायेदार लालची जमाना बहुर बेशर्म हुआ है
सच पिटता बीच बाजार , फैला है कितना भ्रस्टाचार
क्यों लूट के खाते ठेकेदार ,यह सब कैसे समझाऊँ मैं ||
नंबर वन की चीज मिलनी बिल्कुल भी आसान नहीं है
नंबर दो में जो चाहो लो कुछ कहता भगवान नहीं है
आत्म  सम्मान हम पाएंगे ,तराने आजादी के गायेंगे
हम नया भारत बनायेंगे ,यह सब कैसे समझाऊँ मैं ||
*****
ऊट पटांग
पुलिस तुम्हारी फ़ौज तुम्हारी
मीडया तुम्हारा कोर्ट बीचारी
जनता द्वारा जनता के लिए
चुनी हुई ये सरकार हमारी
जनतंत्र का झुनझुना पकडाया
कार्पोरेट की करे है ताबेदारी
मसला इस या उस नेता का  नहीं
जनतंत्र की पोल खुल गयी सारी
कैसे मजबूत हो जनतंत्र भारत का
कैसे जनता की बढे हिस्सेदारी
सवाल आया है तो जवाब भी
ढूंढेगी मिलके ये जनता सारी
******
ranbir dahiya - October 4, 2009
दोहरापन
दोहरा पन जीवन का हम को अन्दर से खा रहा |

एक दिखे दयालु दूसरा राक्षस बनता जा रहा |

चेहरों का खेल चारों तरफ दुनिया में फैल रहा

मुखौटे हैं कई तरह के कोई पहचान ना पा रहा |

सफेद मुखौटा काला चेहरा काम इनके काले हैं,

बिना मुखौटे का तेरा चेहरा नहीं किसी को भा रहा |

कौनसा मुखौटा गुजरात में करतब दिखा रहा ये

जनता को बहला धर्म पे कुरसी को हथिया रहा |

धार्मिक कट्टरता का चेहरा प्यारा लगता क्यों है

मानव से मानव की हत्या रोजाना ही करवा रहा |

कौन धर्म कहता हमें कि घृणा का मुखौटा पहनो,

खुद किसकी झोंपड़ी में आग खुदा जाकर लगा रहा |

राम भी कहता प्यार करो दोहरेपन को छोड़ दो अब

रणबीर सिंह भी बात वही दुजे ढंग से समझा रहा |

CHALE KHETON KI AUR

कुछ बातें काम की

 


******
गरीब और गरीब हो गये अमीर के कहने क्या
रोटी नहीं नसीब मुरारी देखे उनके गहने क्या
उनके तो हैं सूट सुपारी हम बताओ पहने क्या
देख के हाल सारा आंसू तुम्हारे ना बहने क्या
****
रोने से किसी को कभी पाया नहीं जा सकता
खोने से किसी को भुलाया नहीं जा सकता
वक्त तो  मिलता है जिंदगी बदलने के लिए
मगर जिंदगी छोटी है वक्त बदलने के लिए
****
आज रास्ते बदल लिए मौका परस्ती दिखलाई
पन्द्रह साल तक तुमने कदम से कदम  मिलाई
चुनौती ज्यादा गंभीर आज जब सामने है आयी
भूल गए वो इंकलाबी नारे नकली कुर्सी है भाई
******
इंकलाब छुपा रखा है  इन पलकों मे ही
पर इनको ये बताना ही  तो नहीं आया,
संकट के वक्त लाल हो जाती ऑंखें पर ,
गरीब का दर्द दिखाना ही तो  नहीं आया
****
ये रिश्ते काँच की तरह होते है,
टूट जाए तो चुभते है अंदर तक
इन्हे संभालकर हथेली पर यारो
क्योकि इन्हे टूटने मे एक पल
और बनाने मे बरसो लग जाते हैं
*****
एक क्रोधित  हुए दिल का  आगाज़ मुझे कहिए
सुर जिसमें सब क्रान्ति के, वो साज़ मुझे कहिए
मैं कौन हूँ क्या हूँ  मैं किसके लिए ज़िंदा हूँ यारो
वंचित और दमित की एक आवाज  मुझे कहिए
******
मेरे अल्फाज़ों को झूठ ना समझना यारो
असल में ही चाहता समाज बदलना यारो ,
जी रहा हूँ ईमानदारी का दामन  थाम कर,
नहीं बदल पाऊँ तो बेवफा मत समझना..
****
दोस्ती फूल से करोगे तो महक जाओगे
सावन से करोगे तो जरूर भीग जाओगे
सूरज से करोगे तो जरूर जल जाओगे
हमसे करोगे तो जरूर "बिगड़"जाओगे
******
ए दोस्तों कभी हमको तुम भुला ना देना
इस हँसते हुए चेहरे को तुम रुला ना देना
कभी किसी बात पर खफा हो भी जाओ
मुझ से दूर होकर जुदाई की सजा ना देना
*****
उलटे सीधे धंधे करते डर नहीं थारै घळणे का
सब कुछ छोड़ कै जाना साथ कुछ ना चळणे का
बाजार मैं आज सब किमैं  बिकता पाया देखो
इसनै पीस्से का रिश्ता हर घर पहोंचाया देखो
मानवता को नचाया देखो फूल इंका ना खिळणे का ।
सब कुछ छोड़ कै जाना साथ कुछ ना चळणे का
त्याग प्रेम की भावना आज ये जमा सुखा दई रै
आपसी आव भगत भी या पढ़ण बिठा दई रै
ईमानदारी रुआ दई रै यो संकट ना टळणे का ।
सब कुछ छोड़ कै जाना साथ कुछ ना चळणे का
पीसा चाहिए बेशक काला रास्ते करे काले रै
पूरी दुनिया पै छाया अपने चमचे घने पाले रै
बद राजनीत घर घाले रै खेल रचाया दलणे का।
सब कुछ छोड़ कै जाना साथ कुछ ना चळणे का
रिश्ते नाते बिगाड़ दिए यो व्यभिचार फैला दिया
चोरी जारी और डकैती पूरा समाज हिला दिया
फासिज्म याद दिला दिया रणबीर ना फ़लणे का ।
सब कुछ छोड़ कै जाना साथ कुछ ना चळणे का
****
हम सब किधर जा रहे हैं जरा सोचो तो सही
हम सब क्या बना रहे हैं जरा सोचो तो सही
सार्वभौमिक शिक्षा पर अब हमला बोल दिया
कैसी शिक्षा ला रहे हैं जरा सोचो तो सही
स्वास्थ्य भी प्राइवेट सेक्टर को सौंपा जा रहा 
पाकिट खर्च बढ़ा रहे हैं जरा सोचो तो सही
भूख बेरोजगारी पूरे देश में आज बढ़ाई देखो
देश विश्वगुरु बना रहे हैं जरा सोचो तो सही
समाधान सबका कंधों पे कावड़ लाद दिये
असली रास्ता छिपा रहे हैं जरा सोचो तो सही
जात धर्म पर बांट रहे बहुविविधता पर हमला
आज धर्मांधता फैला रहे हैं जरा सोचो तो सही
*****
76वें आजादी दिवस पर एक तस्वीर यह भी है मेरे देश महान की कि जहाँ ---
1 देश में शिक्षण संस्थानों से ज्यादा धार्मिक स्थल हैं
2 देश में गाय दूध की जगह वोट देती है
3 देश के बच्चों के हाथ में कलम की बजाय झूठे बर्तन हैं
4 देश का शिक्षक अध्ययन की जगह घर घर जाकर जनगणना , आर्थिक गणना और मतदाता सर्वे करता है
5 देश का अन्नदाता कर्ज में डूब कर आत्महत्या कर रहा है
6 देश में शिक्षा और स्वास्थ्य बाजार की वस्तु हैं
7 देश में मजदूर की मज़दूरी और किसान की उपज का भाव बढ़ाने में तकलीफ होती है
8 देश में नेताओं का वेतन एक मिनट में बढ़ जाता है
9 देश की जनता हाथ जोड़ कर नेताओं के सामने गिड़गिड़ाती है
10 देश में धर्म ,जाति, सम्प्रदाय,लिंग और गोत्र के नाम पर पहचान की राजनीति होती है
11 देश के नेताओं के लिए शिक्षा, उम्र और चरित्र का कोई पैमाना नहीं है
  *********** उस लोकतांत्रिक देश का भविष्य क्या होगा-------- ?
****
76वें आजादी दिवस पर एक तस्वीर यह भी है मेरे देश महान की कि जहाँ ---
1 देश में शिक्षण संस्थानों से ज्यादा धार्मिक स्थल हैं
2 देश में गाय दूध की जगह वोट देती है
3 देश के बच्चों के हाथ में कलम की बजाय झूठे बर्तन हैं
4 देश का शिक्षक अध्ययन की जगह घर घर जाकर जनगणना , आर्थिक गणना और मतदाता सर्वे करता है
5 देश का अन्नदाता कर्ज में डूब कर आत्महत्या कर रहा है
6 देश में शिक्षा और स्वास्थ्य बाजार की वस्तु हैं
7 देश में मजदूर की मज़दूरी और किसान की उपज का भाव बढ़ाने में तकलीफ होती है
8 देश में नेताओं का वेतन एक मिनट में बढ़ जाता है
9 देश की जनता हाथ जोड़ कर नेताओं के सामने गिड़गिड़ाती है
10 देश में धर्म ,जाति, सम्प्रदाय,लिंग और गोत्र के नाम पर पहचान की राजनीति होती है
11 देश के नेताओं के लिए शिक्षा, उम्र और चरित्र का कोई पैमाना नहीं है
  *********** उस लोकतांत्रिक देश का भविष्य क्या होगा-------- ?
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दिल की बात दिल से

हमने तो बस निभा दी किसी तरह ईमानदारी यहां
तुमने तो बस दबा दी किसी तरह ईमानदारी यहां
स्टेज पर मशवरे देना बड़ा आसान है सब कहते
मगर जीवन में धारणा बड़ा मुश्किल कहते रहते
करनी कुछ कथनी कुछ सारी उम्र झूठ ढोते देखे
ऊपर से प्यार मुलाहजा वैसे जहर बीज बोते देखे
जब मैडीकल में दाखिल हुए समाज सेवा इरादा था
हमें सिखाया उसमें अपनी सेवा का भाव ज्यादा था
मैडीकल में भी लालच बहुत गये थे दिखाये हमको
पैसा कमाओ मौज उडाओ यही मंत्र सिखाये हमको
बाकी समाज से अलग मैडीकल ऐसा समझा जाता
जीने मरने के बीच का जीवन इन्सान यहां बिताता
मरीजों से ही सीखा मैने ये इलाज हर बीमारी का
अब सर्जन बन कर कैसे रुप धारुं मैं व्यापारी का
यह भी अच्छा ही हुआ माहिर सर्जन न बन पाया
कई माहिर सर्जनों ने पैसे के पीछे ईमान ही गंवाया
दिखावटी ईमानदारी का लबादा कुछ ने बात बनाई
हमारी ईमानदारी की कसम लोगों ने कई बार उठाई
चीफ विजीलैंस आफिसर की चुनौती भरी जिम्मेदारी
इस चुनौती के दांव पर सच्चाई ये चाही खरी उतारी 
हमने समाज सेवा पक्ष जीवन में पूरी तरह अपनाया
वी आर एस ली चाहते समाज सेवा को आगे बढ़ाया
आप सबका सहयोग चाहिये यही है अरदास साथियो
समाज सुधार का ही एजैंडा रहेगा आस पास साथियो
*******
मुझे लगता है कि उन्ही के मैदान में खेल रहे हैं हम
उन्हीं की शर्तों को आज भी देखो झेल रहे हैं हम

संस्कृति के नाम पर उनहोंने मेहनत छीनी हमारी
परम्परा के नाम पर अच्छे से खाल गयी है उतारी

हमारे नेताओं ने भी उनके मैदान में झोंक दिया रे
अपना मैदाने जंग नहीं पूरा अभी तयार किया रे

समझने की ताकत हैं अंगिन्नत ये दिमाग हमारे
कम्प्यूटर फेल हो जाते हैं बहुत बार देखो बेचारे

हमारी सोचने की ताकत को घुमा दिया है दोस्तों
अपने मैदान में आने का मन बना लिया है दोस्तों

अपनी लड़ाई अपने मैदान में लड़ने की ठान ली
समझो मालिकों ने हार शुरू हुई पक्का मान ली

इंकलाब तो आएगा ही नहीं कोई रोक पायेगा रे
इंसान का कब्ज़ा पूंजी पर फिर हो ही जायेगा रे

सबके लिए सब कुछ होगा नहीं भूख रहेगी यारो
मानवता की जीत होगी हैवानियत ये ढहेगी यारो
*****
सुबह तैयार हो अस्पताल को चला
हरेक इंसान भागता हुआ सा मिला
परेशन सी ये सूरत भागती सी टाँगें
किसी का भी चेहरा दिखा न खिला 
सड़कों पर ये कारें सरपट दौड़ रही 
स्कूटर आगे निकालें लग हौड  रही
पैदल लड़के आदमी औरत ये बच्चे
सबको वे लड़कियां पीछे छोड़ रही
लंगड़ाते मरीज संबंधी का है सहारा
धक्के खाता इधर उधर को बेचारा
कभी यहाँ लाइन कभी वहां लाइन
उसे नहीं मिलता कोई छोर किनारा
क्या इलाज इस भीड़ की बीमारी का
धक्के मुक्के खेल देखो लाचारी का
गरीब दुखी ये कर्मचारी दुखी भीड़ से
पहोंच रिश्वत का तमाशा महामारी का
सुबह शुरू किया साँस नहीं  आया भाई
मरीजों की कतार ने खूब  थकाया भाई 
हाली भी हलाई के बाद रेस्ट कर लेता
डेढ़ बजे तक दबाव मेरे पे  बनाया भाई
*****
चौका--तुक्का
जनतंत्र में जनता कईबार,झुका देती अलंबरदारों को
संगठित जनता हिला देती,बड़ी से बड़ी सरकारों को
अलंबरदार जूटे हैं फिर, इसे जात धर्म पर बाँटने को
छिपायें ताकि करतूतें छूट की, दी हैं जो साहूकारों को
*****
चौका--तुक्का
जनतंत्र में जनता कईबार,झुका देती अलंबरदारों को
संगठित जनता हिला देती,बड़ी से बड़ी सरकारों को
अलंबरदार जूटे हैं फिर, इसे जात धर्म पर बाँटने को
छिपायें ताकि करतूतें छूट की, दी हैं जो साहूकारों को
*****
नीलाम कुछ इस कदर हुए , बाज़ार_ए_वफ़ा में हम आज ,
बोली लगाने वाले भी वो ही थे , जो कभी झोली फैला कर माँगा करते थे  !
*******
असमंजस
पता नहीं आज का जमाना किधर को जा रहा है ||
सुबह कहीं शाम कहीं अगली सुबह कहीं पा रहा है ||
नई तकनीक ने कब्ज़ा जमाया पूरे इस संसार पर
माणस माणस को दिन दिहाड़े नोच नोच खा रहा है ||
दूसरों के कन्धों पर पैर रख कर आसमान छू रहे हैं
फ्री सेक्स का फैशन आज नई पीढी पर छा रहा है ||
दारू समाज के हर हिस्से में सम्मान पाती जा रही
अछ खासा हिस्सा आज दारू पीके  गाने गा रहा है||
लालच फरेब धोखा धडी का दौर चारों तरफ छाया
नकली दो नंबर का इंसान हम सबको ही भा रहा है  ||
बाजार व्यवस्था का मौसम है मुठ्ठी भर मस्त इसमें
बड़ा हिस्सा दुनिया का आज नीचे को ही आ रहा है ||||
भाई भाई के सिर का बैरी आतंक वाद बढ़ गया है
पुलिश और अफसर दायें बाएं से पैसे खूब बना रहा है||
पूर्व के पूरे सिस्टम को दीमक खाती जा रही देखो
आज भ्रष्टाचार चारों तरफ डंक अपना चला रहा है ||
एक तरफ माल खड़े हुए दूजी तरफ टूटी सड़कें हैं
तरक्की का यह माडल दूरियां कितनी बढ़ा रहा है ||
अपने भार तले एक दिन मुश्किल होगा साँस लेना
तलछट की जनता जागेगी रणबीर उसे जगा रहा है ||
********
भक्त लोग
इतिहास को तो मिथ बनाने चले हैं लोग
महाकाव्य को इतिहास बताने चले हैं लोग
विज्ञान को रूढ़िवाद सिखाने चले हैं लोग
महानता का कैसा पर्व मनाने चले हैं लोग
पाकिस्तान से व्यापार बढ़ाने चले हैं लोग
चीन से लेनदेन अरबों कमाने चले हैं लोग
जात मजहब पर हमें लड़ाने चले हैं लोग
मनुवाद को फिर से जमाने चले हैं लोग
महिलाओं को चीज दिखाने चले हैं लोग
वंचित को हर रोज बहकाने चले हैं लोग
बहुविविधता देश की मिटाने चले हैं लोग
संविधान का मख़ौल उड़ाने चले हैं लोग
क्या और क्यों पे ताले लगाने चले हैं लोग
रणबीर
--******
मुझे लगता है कि उन्ही के मैदान में खेल रहे हैं हम
उन्हीं की शर्तों को आज भी देखो झेल रहे हैं हम
संस्कृति के नाम पर उनहोंने मेहनत छीनी हमारी
परम्परा के नाम पर अच्छे से खाल गयी है उतारी
हमारे नेताओं ने भी उनके मैदान में झोंक दिया रे
अपना मैदाने जंग नहीं पूरा अभी तयार किया रे
समझने की ताकत हैं अंगिन्नत ये दिमाग हमारे
कम्प्यूटर फेल हो जाते हैं बहुत बार देखो बेचारे
हमारी सोचने की ताकत को घुमा दिया है दोस्तों
अपने मैदान में आने का मन बना लिया है दोस्तों
अपनी लड़ाई अपने मैदान में लड़ने की ठान ली
समझो मालिकों ने हार शुरू हुई पक्का मान ली
इंकलाब तो आएगा ही नहीं कोई रोक पायेगा रे
इंसान का कब्ज़ा पूंजी पर फिर हो ही जायेगा रे
सबके लिए सब कुछ होगा नहीं भूख रहेगी यारो
मानवता की जीत होगी हैवानियत ये ढहेगी यारो
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मेरे चाहने से दुनिया बदलती तो कब की बदल चुका होता
मेरी चाहत से समाज सुधरता तो कब का सुधर चुका होता
यही तो बड़ा सवाल है कि सब चाहते हैं समाज सुधर जाये
मगर दिन बी दिन ख़राब क्यों होती हम सबकी नजर जाये
गढ़ दिए हैं हमारे सिर पर नैतिकता के मापदण्ड यहाँ पर
नहीं बताता कोई ये मापदंड पूरे हुए हैं आज तक कहाँ पर
जदोजहद जारी है शासनतंत्र भारी है लूट हुई हमारी देखो
हमारी जूती हमारे ही सिर पर मार रहे हैं बड़े व्यापारी देखो
पूंजी का शब्द शायद सुना होगा इस पूंजी ने कहर ढाया है
मानव को मानव का दुश्मन बना कितना जहर फैलाया है
पूंजी का चरित्र समझ गया मानव तो जीवन सुधार पायेगा
वरना इसके चक्रव्यूह में और भी गहरे फंसता ही जायेगा
पूंजी मुनाफे के लिए हमें आपको सबको लूटती है यहां पे
भारी मुनाफे के वास्ते तो मालिक को भी चूटती है यहाँ पे
इस लूट का सच छिपाने को जबरदस्त संस्कृति जाल लाई
बाँट दिए इंसान जातों गोतों और नस्लों की हैं ढाल बनाई
पूंजी का खेल मार्क्स ने समझने समझाने का प्रयास किया
सरप्लस पूंजी का कन्सेप्ट मुनाफे का भी पर्दाफास किया
पूंजी छा गई इंसान पर कुछ जगह इसपे इंसान छाया देखो
किसका किस पर कब्जा हो घमासान इसने मचाया देखो
पूँजी और इंसान की जंग जारी ये इंसान से हैवान बनाती
हैवान पर करके पूंजी सवारी पूरे ही समाज को ये खाती
रणबीर
4.8.2015
*******
अब हालत बदलने होंगे ग़म का बोझ उठाने वाले |
वरना देते ही जायेंगे दुःख दिन रात ज़माने वाले |
मजलूमों को बाँट रहे हैं जुल्म का खेल रचाने वाले
इस साजिस ही में शामिल हैं वे नफरत फ़ैलाने वाले |
दुनिया पर कब्ज़ा है जिन का वो उस के हक़दार नहीं हैं
उनसे अब कब्ज़ा छीनेंगे  सब का बोझ उठाने वाले |
पत्थर दिल लोगों से अपने जख्मों को ढांपे ही रखो
खुद को हल्का कर लेते हैं सबको जख्म दिखाने वाले |
कोई किसी का साथ निभाए इतनी फुर्सत ही किसको है
अफसानों में मिल सकते हैं अब तो साथ निभाने वाले
******
ज़माने की हकीकत से रूबरू होना आसान कहाँ
ज़माने का स्तर कहीं और तय होता उनमान कहाँ
गीता का सार महज मजदूर किसान के लिए यारो
हरित क्रांति लाओ ताज बनाओ खुद की छान कहाँ
अडाणी अम्बानी को फल की चिंता सबसे पहले
कर्म बाद में करते खुद करते गीत का गुणगान यहाँ
हमें बहकाते पिछले का इस जन्म में भुगतना है
इसका अगले में अगले पिछले की पहचान कहाँ
नहीं बताते जो है इसी जन्म में है बाकि सब धोखा
जात धर्म पर बाँट दिया बचा हममें है इंसान कहाँ
रातों रात अडाणी कैसे बनें बहुतों की यही सोच
गरीब के लिए झूठे वायदे पूरे हुए हैं अरमान कहाँ
********
गर मेरे  बर्बाद  होने  से तुम्हारा आबाद होना जुड़ा है 
तो आज बन्दा तयार होके  तुम्हारे सामने देखो खड़ा है
कुछ भी कर लो मगर बेवफाई का ख़िताब न दे देना तुम
ईमानदारी और वफादारी के लिए ही तो बन्दा लड़ा है

*****
सोचना कैसे हो --
1. लिंग असमानता कैसे खत्म हो
2. जात-पात पर आधारित असमानता कैसे खत्म हो
3. अवसाद से छुटकारा कैसे हो
4. बेरोजगारी का खात्मा कैसे हो
5. निर्ममता का खात्मा कैसे हो
6.अन्धविश्वास , मूर्खता का खात्मा कैसे हो
7. परजीवी वर्गों का खात्मा कैसे हो
8. ग्रामीण गरीबी का खात्मा कैसे हो
9. शहरी गन्दी बस्तियों का खात्मा कैसे हो
10.आर्थिक असमानता का खात्मा कैसे हो
11. धार्मिक कट्टरता का खात्मा कैसे हो
12. बेईमानी का खात्मा कैसे हो
13. नशों का खात्मा कैसे हो
14. व्यक्तिवाद का खात्मा कैसे हो
15. शिथिलता का खात्मा कैसे हो
16. आलस्य का खात्मा कैसे हो

*****
मेरा स्वतंत्र वो वजूद
मेरे से किसने पूच्छा था कि वहां
पैदा होना भी चाहता हूँ मैं कि नहीं
वो घर वो गाओं वो जिला वो प्रदेश
वो देश वो मजहब चिपक से गए
बिना कभी पूच्छे मेरे वजूद के साथ
बहुत बार अहसास करवाया जाता
मेरे इस प्रकार के अनचाहे वजूद का
मेरी मानवता मेरा स्वतंत्र वो वजूद
पता नहीं कहाँ खो गया ढूंढ रहा हूँ
ढूंढ नहीं पाया अभी तक तो शायद
कभी इसे ढूंढ भी पाऊंगा कि नहीं
******
एक नया ट्रेंड
आज की मोहब्बत फेसबुक और व्हाट्सअप हो गई हैं बताते
धीरे - धीरे दोस्ती और फिर मोहब्बत का अहसास हैं  जताते
फिर नम्बरों का आदान प्रदान होता पूरी रात जागके बिताते
मोहब्बत के पाठ पढ़े जाते हैं ,वादों का सिलसीला हैं  चलाते  
और फिर मॉल में मुलाकातें शुरू हो हाँ में हाँ कुछ रोज मिलाते
कुछ दिन का सिलसिला फिर किसी बात पर तकरार बनाते
और फिर अन्फ्रेंड का बटन दब जाता है सब कुछ फिर भुलाते
और फिर एक नया चेहरा उस पर लाइक कर  नया प्यार रचाते
सिलसिला जारी है चार के बाद पांचवें प्यार से फेरे फिर घुमाते 
दो तीन साल चलता मगर  फिर तलाक का परचम  उठाते
*******
SOME OF THE FRIENDS REQUESTED TO WRITE IN HINDI BECAUSE THEY DONOT UNDERSTAND HARYANVI/ MEDICAL PROFESSION KO DHYAN MEIN RAKH KAR

*एक काउन्सिलिंग में कई साल पहले पाया।।*
*एम बी बी एस छोड़ के बी डी एस को चाहया।।*
समझ ना सका लड़की ने क्यों किया ऐसा
*बाद में पूछा तो माली हालत कारण बताया।।*
बहुत से मैरिट वाले बच्चे छोड़ते देखे हैं
*टैस्ट पास पर नाम एम बी बी एस से कटाया।।*
कोटा आजकल ट्रेनिंग के लिए मशहूर है
*मगर वहां का खर्चा बहुतों को रास ना आया।।*
कई ऐसे भी बताए विदेशों में लोन लेते
*वोम्ब बेचकर अपना वो लोन जाता लौटाया।।*
मेहनत करके दिन रात बने जो डाक्टर
*भूल रहे अपना अतीत मरीज से पैसा कमाया।।*
शायद यही दस्तुर हमारे समाज का यारो
*आगे बढे जिस मेहनत के दम उसे ही भुलाया।।*
काबिल डाक्टर बना मरीजों पे सीख करके
*फिर उसी काबलियत को बाजार में भुनवाया।।*
क्या करुं बच्चे को बिना कैपिटेशन दाखिला नहीं
*रस्ता तो है पर बच्चों को वह रस्ता न सिखाया।।*
काश उनको भी अपना रास्ता सिखा पाते यारो
*मैंने कोशिष से ही पहला रास्ता ही पढ़ाया।।*
इतना मंहगा इलाज सपने में नहीं सोचा था
*मुफत इलाज के नाम गया क्वालिटी को गिराया।।*
एम्पैनलमैंट के रास्ते प्राईवेट को लाये हैं
*सरकारी संस्थाओं को बैक सीट पर बैठाया।।*
बिना नीति और नियत के हम चल दिये हैं
*मुफत इलाज का दे नारा नब्बे को है बहकाया।।*
बीमा योजना करी लरगू सब फेल हो रही हैं
*गरीब साथ खेल हुआ कम्पनी धन कमाया।।*
जनता को भी थ्री डी का गल्त रास्ता दिखा रहे
*डीजीज डाक्टर और ड्रग नुस्खा गल्त थमाया।।*
साफ पानी और हवा पौष्टिक खाना मिले तो
*अस्सी प्रतिषत बीमारी होगी ही नहीं बताया।।*
संसाधनों का टोटा नहीं नियत साफ नहीं है
*संसाधनों में भारत सबसे अमीर है गिनवाया।।*
सिस्टम का मसला है नहीं समझ पाई जनता
*नब्बे दस का खेल सारा हमसे गया छिपाया।।*
नब्बे को बांट दिया जात गोत मजहब पर
*नब्बे कैसे आयें एक मंच सवाल ये उठाया।।*

*******
मेरा जनाजा निकाल कर कितने दिन जी पाओगे ।।
तुम मेरी मेहनत बिना कैसे शक्कर घी खाओगे।।
कई ढंग से बांट रहे हैं एक दूजे के दुश्मन बनाए
ये चाल तुम्हारी समझी तो दस के एक बांटे आओगे।।
हमारे वास्ते जो गढ़े खोदे इनका पता चल गया तो
याद रखना इन्हीं गढ़ों में मूंधे मूंह गिरते जाओगे।।
ये संकट बढ़ता जा रहा हमारा निवाला खोसते हो
यूं कितने दिन जालिमो दुनिया को ठेके पे दौड़ाओगे।।
तुमसे ज्यादा शतिर कौन पैदा करते हो आतंकवादी
पालते पोसते हो इन्हें सच कब तक छिपाओगे।।

******
असल में जो नंगे हो गये वो अपना नंगा पन  छिपाने को
सबको नंगा कहते हैं ताकि हम झिझकें उंगली उठाने को
पत्थर तोड़ कर ताज महल बनाया क्यों नहीं दिखाई देता
ताज महल के साथ सब कोई नाम शाहजहाँ का ही लेता
*****
कैसा अजीब नजारा
कैसा अजीब नजारा देह मेरी पर हल्दी बीरू के नाम की
कैसा अजीब नजारा हथेली मेरी मेहंदी बीरू के नाम की
कैसा अजीब नजारा सिर मेरा पर चुनरी बीरू के नाम की
कैसा अजीब नजारा मांग मेरी पर सिन्दूर बीरू के नाम की
कैसा अजीब नजारा माथा मेरा पर बिंदी बीरू के नाम की
कैसा अजीब नजारा नाक मेरी पर नथनी बीरू के नाम की
कैसा अजीब नजारा गला मेरा मंगल सूत्र बीरू के नाम की
कैसा अजीब नजारा कलाई मेरी चूड़ियाँ बीरू के नाम की
कैसा अजीब जमाना ऊँगली मेरी अंगूठी बीरू के नाम की
कैस

Monday, July 24, 2023

भारत में वैज्ञानिक मानसिकता की जड़ें क्यों नहीं

सवाल ये उठता है कि भारत में वैज्ञानिक मानसिकता की जड़ें क्यों नहीं जम पाई और उसका फैलाव क्यों नहीं हो पाया? 

  यह सही है कि एक समय था जब भारत में वैज्ञानिक मानसिकता थी। बुद्ध और उससे पहले चार्वाक और लोकायत ने उस समय तार्किक सोच को प्रतिपादित किया। वाराहमिहिर, आर्यभट्ट, सर्जन सुश्रुत भी हुए। 7वीं सदी 

   ईसा पश्चात से लेकर 18वीं सदी  ईसा पश्चात तक (1000)साल तक अंधकार का युग रहा । कई बेहतरीन राजा थे, बेहतरीन दार्शनिक थे, बेहतरीन सन्त और समाज सुधारक थे मगर वैज्ञानिक कोई नहीं था । 

1 सर्व प्रथम हमारी संस्कृति में सवाल पूछे जाने को प्रतिष्ठा नहीं दी जाती ।

2 हमारे समाज में वैज्ञानिक मानसिकता का प्रसार न होने का दूसरा कारण परिवार में निरंकुशता का होना है।

3 तीसरी बात यह है कि महान व्यक्तियों को देवताओं की तरह पूजा जाना है। आ लोचनात्मक विश्लेषण व्यक्तियों का नहीं किया जाता। 

4 वैज्ञानिक मानसिकता की राह में चौथी रूकावट हमारे आमजन पर परम्परागत रीति रिवाज का जबरदस्त शिकंजा है । 

5 हमारे देश में वैज्ञानिक मानसिकता के विकास न कर पाने का सब से महत्वपूर्ण कारण जाति-व्यवस्था और पितृसत्ता है। 

6 हमारे देश में आज भी ब्रह्म और परब्रह्म है- इन दोनों का मिश्रण है। यही सत्य है बाकी सब मिथ्या है । संसार ही स्वयं में मिथ्या या माया है तो यहाँ वैज्ञानिक  दृष्टिकोण का विकास कैसे हो ? 

              साइंटिफिक टेम्पर पर हमला आज कल बहुत तेज हो गया है । वैज्ञानिक विचारों और इतिहास का मिथ्याकरण जोर शोर से किया जा रहा है ।

Wednesday, June 21, 2023

आज के हरियाणा की चुनौतियां--1

 आज के हरियाणा की चुनौतियां..1

हरयाणा प्रदेश  ने 1966 में अपना अलग प्रदेश के रूप में सफ़र शुरू किया और आज 2023 तक पहुंचा है ।  इस बीच बहुत परिवर्तन हुए हैं ।  इनका सही सही आकलन ही हमें आगे की सही दिशा दे सकता है । इसके बनने के वक्त पिछड़ी खेती बाड़ी का दौर था ।
         उसके बाद हरित क्रांति का दौर आया । हरित क्रांति का दौर अपने आप नहीं आ गया । यहाँ के किसान और मजदूर की मेहनत रंग ले कर आई  जिसने सड़कों का जाल बिछाया , बिजली गावों -गावों तक पहुंचाई । नहरी पानी की सिचाई का भी विस्तार हुआ । इस सब का सही सही आकलन शायद ही हुआ हो । मगर एक बात जरूर देखी जा सकती है कि इस के आधार पर ही हरित क्रांति दौर आ पाया ।
नए बीज, नए उपकरण , नयी खाद , नए तौर तरीकों को यहाँ के किसान मजदूर ने अंगीकार किया और हरयाणा के कुछ हिस्सों में हरित क्रांति ने उन क्षेत्रों की खेती की पैदावार को बढ़ाया ।
        वहीँ आहिस्ता आहिस्ता इसके दुष्प्रभाव भी सामने आने लगे । जमीन की उपजाऊ शक्ति कम होती चली गई । कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल ने अपने कुप्रभाव मनुष्यों , पशुओं व् जमीन के अंदर दिखाए हैं जो चिंतनीय स्तर तक जा पहुंचे हैं । 
       हरित क्रांति से एक धनाढय़ वर्ग पैदा हुआ, जिसने अपने अपने इलाके में अपनी दबंगता व् स्टेटस का इस्तेमाल करते हुए यहाँ के राजनैतिक , आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में अपना प्रभुत्व जमाया है । इस सब में हमारी पिछड़ी सोच और अंध विश्वासों के चलते एक अधखबडे़ इंसान का विकास हुआ है जो कुछ बातों में प्रगतिशील है और बहुत सी बातों में रूढ़िवादी है । जात पात और गोत नात अभी भी वंचित तबकों के बेहतर जीवन के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं।  इस इंसान के व्यक्तित्व का प्रभाव हर क्षेत्र में देखा जा सकता है। चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो, चाहे स्वास्थ्य का क्षेत्र हो, चाहे खेती बाड़ी का क्षेत्र हो , चाहे उद्योग का क्षेत्र हो , चाहे सामाजिक क्षेत्र हो ।
      हमारे समाज में कृषि में हरित क्रांति के साथ-साथ जो औद्योगिक प्रगति हुई है, उसका लाभ तो शिक्षित मध्य वर्ग को मिला है। इसके चलते हरियाणा की आबादी के एक बड़े हिस्से की आर्थिक स्थिति मज़बूत हुई है लेकिन सामाजिक-सांस्कृतिक पिछड़ापन बड़े पैमाने पर व्याप्त है। हरियाणा में अर्ध-सामंती मूल्यों पर आधारित जातीय वर्चस्व, पितृसत्ता और पुरुष प्रधानता की मान्यता है; और सामाजिक सम्बन्धों का आधार यही मान्यता है। इसके चलते महिलाओं और दलित-पिछड़ी जातियों का उत्पीड़न आम घटनाक्रम है। इसी के साथ नवधनाढ्य वर्ग में सत्ता की भूख, जोड़-तोड़ के साथ निजी तरक्की का रुझान और आत्मकेंद्रित सोच हावी है। आज़ादी के आंदोलन में पैदा हुए आदर्शवाद की कमज़ोर उपस्थिति आदि के चलते अवसरवादी, भाई-भतीजावाद पर आधारित एवं भ्रष्टाचार से लिप्त राजनीति का बोलबाला है।
    इस अधखबड़े व्यक्तित्व को भरे पूरे मानवीय इंसान में कैसे बदला जाये यह अहम् मुद्दा है जो कि महज राजनैतिक ही नहीं बल्कि सामाजिक भी है। और एक  नवजागरण आंदोलन की मांग करता है । यह हरियाणा के पूरे समाज की जरूरत भी है और जिम्मेदारी भी बनती है कि सामंती और पुरुषवादी पिछड़ी सोच के खिलाफ समाज सुधार आंदोलन चलाया जाए।
   जल संकट से जूझ रहे हरियाणा में भूजल की स्थिति गंभीर है। हरियाणा जल संसाधन प्राधिकरण द्वारा पूरे प्रदेश से जुटाए आंकड़ों के मुताबिक अब 1948 गांव रेड जोन में आ चुके हैं। चिंता की बात यह कि 84 प्रतिशत गांवों में भूजल स्तर तेजी से पाताल की ओर जा रहा है। प्रदेश के कुल 7287 गांवों में से केवल 1304 गांव ग्रीन जोन में हैं, जबकि
6150 गांवों में भूजल तेजी से नीचे जा रहा है।
3041 गांव कमी पानी की
40% संकट में
1948 गम्भीर संकट में
         शिक्षा के क्षेत्र में जहाँ एक और एजुकेशन हब बनाने के दावे किये जा रहे हैं और नए नए विश्विदालयों का खोलना एक अचीवमैंट  के रूप में पेश किया जा रहा है । 14473 सरकारी स्कूल और 10394 प्राइवेट स्कूल  2021 में मंत्री महोदय ने हरयाणा विधान सभा में एक सवाल के जवाब में बताए। 137 संस्कृति सीनियर सेकेंडरी स्कूल भी इन्ही का हिस्सा बताए थे।
   
          वहीँ दूसरी और सरकारी स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता कई तरह से प्रभावित हुई है । शिक्षा की प्राइवेट दुकानों में भी शिक्षा की गुणवत्ता का तो प्रश्न ही नहीं बल्कि शिक्षा को व्यापार बना दिया गया है। चाहे वह स्कूली शिक्षा हो , चाहे वह उच्च शिक्षा हो , चाहे वह विष्वविद्यालयों की शिक्षा हो या ट्रेनिंग संस्थाओं की शिक्षा हो , हरेक क्षेत्र में व्यापारीकरण और पैसे के दम पर डिग्रीयों का कारोबार बढ़ा है, बढ़ता ही जा रहा है ।  दलाल संस्कृति ने इस क्षेत्र में दलाल माफियायों की बाढ़ सी लादी है । सेमेस्टर सिस्टम ने भी शिक्षा के स्तर को बढ़ाया तो बिलकुल भी नहीं हाँ घटाया बेशक हो । आगे सर्वे करने के विषय हो सकती हैं ये सब बातें।
       स्कूल बचेंगे तो शिक्षक बचेंगे। शिक्षक बचेंगे तो शिक्षा बचेगी। शिक्षा बचेगी तो देश बचेगा। अन्यथा कुछ नहीं बचेगा क्योंकि निजीकरण से शिक्षा का व्यवसायीकरण होगा। व्यवसायीकरण में शिक्षक और छात्र के बीच गुरु-शिष्य का रिश्ता कम लाभ-हानि का रिश्ता अधिक बनेगा। लाभ-हानि में पूंजीवादी लोग एक शिक्षक का नहीं, बल्कि एक ऐसे नौकर का चुनाव करेंगे, जो पूंजी को सलाम ठोकेगा। इस व्यवस्था में शिक्षक अपना ज्ञान बेचेगा, छात्र शिक्षा खरीदेगा बाक़ी गरीब, दलित, आदिवासी, असहाय, मजदूर इत्यादि से अच्छी शिक्षा कोसों दूर चली जायेगी । बेहतर है, शिक्षा का संरक्षण करें। हमें एकसमान, सरकारी, निःशुल्क, क्वालिटी एजुकेशन की दरकार है। इसी के लिए सरकार है। बेहतर राष्ट्र की कल्पना करते हैं, शिक्षकों का सम्मान करते हैं तो फिर पहले सुगम शिक्षा की बात जरूर कीजिए।
इंस्टीच्युट खोल दिए गए , कई कई सौ करोड़ की इमारतें खड़ी करके मगर उनकी फैकल्टी उनकी कार्य प्रणाली की किसी को कोई चिंता नहीं है ।
        # हरियाणा के 538 सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए कोई टॉयलेट नहीं हैं
# 131 सरकारी स्कूलों में पीने के पानी की फैसिलिटी भी नहीं है।
# 236 सरकारी स्कूलों में इलेक्ट्रिसिटी कनेक्शन भी नहीं हैं।
# 8240 और क्लास रूम की जरूरत है इसके अलावा 5630 और दूसरे कमरे चाहिए जैसे साइंस लैब आदि के लिए सरकारी स्कूलों में।
# 321 सरकारी स्कूल की बाउंड्री वाल भी नहीं हैं।
# इस सबके लिए हरयाणा सरकार को कुल 1,784.03 करोड़ रुपये की जरूरत होगी।
# विडंबना है कि वित्त वर्ष 2023-24 के लिए सिर्फ 424.22 करोड़ का बजट है।
पंजाब हरियाणा हाई कोर्ट के सामने डॉक्टर अनशाज सिंह डायरेक्टर सेकेंडरी एजुकेशन डिपार्टमेंट हरियाणा ने यह सब आंकड़े रखे।
        विश्वविदयालयों के उपकुलपतियों की नियुक्तियों में यू जी सी की गाइड लाइन्स की धजियां उड़ाई जाती रही हैं । सबके लिए एक समान स्कूल की अनदेखी की जाती रही है जबकि यह सम्भव है । 150 के लगभग स्कूलों को बंद करने या मर्ज करने की खबरें भी आ रही हैं ।
          स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्राइवेट सैक्टर की दखलंदाजी बढ़ी है । एम्पैनलमेंट  का कारोबार खूब चल रहा है । सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं जैसे तैसे स्टाफ की कमी , डाक्टरों की कमी ,कहीं कुछ और कमियों के चलते , घिसट रही हैं । गरीब जन की सेहत के लिए सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के माधयम से इलाज के रास्ते बंद होते जा रहे हैं या यूं कहें कि बंद किये जा रहे हैं । जितनी भी स्वास्थ्य सेवा की योजनाएं गरीबों के लिए हैं उनमें एक्जीक्यूसन की भारी कमियां हैं और योजना में भी कई कमियां हैं । प्राइवेट नर्सिंग होम के लिए केंद्र में पारित एक्ट भी हरयाणा में लागू नहीं किया है । इसलिए प्राइवेट  नर्सिंग होम्ज की लूट दिनोदिन आमनवीय रूप अख्तियार करते हुए बढ़ती जा रही है ।
      सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में कर्मचारियों की भारी कमी देखने को मिलती है। ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाएं अप्रैल 2021 को जनसंख्या 18197826 के अनुसार कमी इस प्रकार है:-- उप स्वास्थ्य केंद्र...942
पीएचसी...74
सीएचसी..32
चिकित्सा अधिकारी
पीएचसी..721
विशेषज्ञ सीएचसी..879
नर्सेस पीएचसी/सीएचसी..378
रेडियोग्राफर सीएचसी..113
फार्मासिस्ट पीएचसी/सीएचसी..503
लैब टेक्निशियन पीएचसी/सीएचसी..508
       सरकारी हॉस्पिटलज में सी टी स्कैन की महीनों लम्बी तारीखें दी जाती है । मुख्य मंत्री मुफ्ती इलाज योजना सैद्धांतिक तोर पर बहुत ठीक योजना होते हुए भी इसकी एक्जीक्यूसन बहुत ढीली ढाली चल रही है । इसके लिए मॉनिटरिंग कमेटीज का प्रावधान नहीं रखा गया है । खून की कमी NFHS 4 के मुकाबले NFHS 5 में गर्भवती महिलाओं में बढ़ी है । इसी प्रकार मालन्यूट्रिसन भी बच्चों में बढ़ा है । गरीब के लिए मुफ्त इलाज भी महंगा होता जा रहा है ।
         आज के हरयाणा की कुछ चुनौतियों में से एक बड़ा मसला सामाजिक न्याय  का मसला है । सामाजिक न्याय के सवाल तीव्र रूप से सामने आ रहे हैं । महिलाएं न घर में , न कर्म स्थल पर , न गली कूचों में , न बाजारों में सुरक्षित हैं । लॉ एंड ऑर्डर को स्थापित करने का काम काफी कमजोर होता जा रहा है । भ्रष्ट अफसर , भ्रष्ट पुलिस और भ्रष्ट नेता की तिकड़ी का उभार तेजी हो रहा है ।
     हरियाणा का दुलीना कांड हमें याद है । अक्तूबर 2002 में ठीक दशहरे के दिन पांच दलितों को जिंदा जला दिया गया था। आरोप था गौकशी का। पांच जनों की मौत पर संघ और आर्य समाज हत्यारों के साथ खड़ा था। पिछले महीने 23 सितंबर को  विहिप के केंद्रीय मंत्री डॉ. सुरेंद्र कुमार जैन ने गौकशी को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर चेतावनी दी कि दुलीना कांड की पुनरावृत्ति हो सकती है। 2012 में दलित लड़कियों के साथ रेप की अनेक वारदातों के समय दलितों में तूफान मचा तो मुख्य पार्टियां  चौधरियों के नाराज होने के डर से उत्पीड़ितों के बजाय आरोपियों के पक्ष में तर्क तलाशते घूम रहे थे। मिर्चपुर, भगाना, डाबडा, दुलीना हर कहीं तो मुख्यधारा की पार्टियां, आर्य समाज, आरएसएस कोई भी आरोपियों के खिलाफ खड़े नहीं हुए। अब विभाजन कारी ताकतें और भी भयानक रूप से लोगों को जात पात और धर्म के नाम पर बांटने का घिनोना काम कर रही हैं ।
        सकारातमक अजेंडा न होने के कारण आज युवा वर्ग का एक हिस्सा नशे , फ्री सेक्स और अपराधीकरण की गिरफत में आता जा रहा है । दलित उत्पीड़न के , महिला उत्पीड़न के  केसिज बढे हैं पिछले कुछ वर्षों में । लम्पटपन बढ़ रहा है ।
       असंगठित क्षेत्र का विस्तार होता जा रहा है जिसमें मजदूर की हालत चाहे वह महिला है , पुरुष है , प्रवासी मजदूर है और उसकी जिंदगी बहुत ही मुस्किल हालातों की तरफ धकेली जा रही है । महंगाई का असर इन तबको के इलावा माध्यम वर्ग को भी प्रेषण किये हुए है ।

        एक तरफ शाइनिंग हरयाणा है जिसका गुणगान हर जगह और बहुत से इससे लाभान्वित तबकों द्वारा किया जाता है । मगर यह सच है कि यह तबका बहुत छोटा होते हुए भी प्रभावशाली है ।
     दूसरी तरफ सफरिंग हरयाणा हैं जिसका बहुत बार कोई भी व्यक्ति गम्भीरता से जिकर तक नहीं करता । इस तबके को हासिये पर धकेला जा रहा है । इसकी जद  में गरीब किसान , मजदूर , वंचित तबके, महिलाएं , नौजवान लड़के लड़की , प्रवाशी मजदूर , माइग्रेटेड पापुलेशन , असंगठित क्षेत्र के कर्मचारी खासकर महिला हैं । यानि हरयाणा का बड़ा हिस्सा इसमें शामिल है ।
     संक्षिप्त में कहें तो
ये बढ़ गई बेरोजगारी, करजे चढ़ते जा रहे भारी, हुई दुखी गरीब जनता सारी,हमारे बालक  बिना दवाई मर रहे हैं, पढ़ाई महँगी से महँगी होती जा रही है।
नाबराबरी ने वंचित तबकों को साँस चढ़ा दिये हैं , कारपोरेट के अत्याचारों की हदें पार हो रही हैं , मीडिया ने वर्तमान सरकार के प्रचारी का रूप धार गया है। ,
जात पात मैं बाँटी है जनता, विरोध किया तो काटी है जनता।
किसान की श्यामत आ गई है, महिला की इज्जत तार तार की जा रही है, चोरी जारी बढ़ती ही जा रही है।
झूठे जुमले रोजाना देते हैं,मगर खबर हमारी कभी नहीं लेते हैं। ये सब देख देख जन की तबियत  खारी होंती जा रही है, क्योंकि शासक हुआ बहुत  भ्रष्टाचारी है।
जनता हिम्मत नहीं  हारी है उसका संघर्ष जारी है । 'लड़े हैं जीते हैं , लड़ेंगे -जीतैंगे' भरतू और भरतारी।
         नैशनल कैपिटल रीजन स्कीम के तहत हरयाणा का ताना बाना काफी बदल रहा है और और भी बदलेगा । फोरलेन , टोल प्लाजा , फलाई ओवर , सेज़ के तहत उपजाऊ जमीनों के अधि गरहण के चलते खेती योग्य जमीन कम से कमतर होती जा रही है । जी डी  पी  में एग्रीकल्चर का योगदान काफी कम हुआ है । नए हरयाणा का सवरूप क्या होगा ? बिखरते गांव  इस पर कोई चर्चा नहीं है । औद्योगिकीकरण के दिशा क्या होगी कोई चर्चा नहीं। नौकरी पैदा करने वाली या नौकरी खत्म करने वाली ? वातावरण का क्षरण रोकने के बारे क्या किया जायेगा ?
          जेंडर फ्रैंडली , एको फ्रैंडली , और सामाजिक न्याय प्रेमी विकास का नक्शा क्या होगा ? ये कुछ मुद्दे हैं जिन पर हरयाणा के प्रबुद्ध नागरिकों को सोच विचार करना चाहिए और फिर एक जनता का चुनाव अजेंडा बना कर सभी राजनैतिक पार्टीयों के सामने पेश करके उनकी इस अजेंडे पर अपनी पोजीसन रखने को  कहा  जाना चाहिए । इस सबके लिए जनता का जनपक्षीय राजनीती के लिए लामबंद होना बहुत जरूरी है ।
हरियाणा नंबर वन -मजदूर किसान बिना , इन सबके सम्मान बिना  इनके चेहरे पर मुस्कान बिना - कैसे हो सकता है?
रणबीर सिंह दहिया




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Saturday, June 10, 2023

Mobile phone problems

          In this article, we’ll look at five main problems that are causing people to "break up with their

phones" or quit social media altogether. These are the toxic parts of the new online world.

As businesses, we need social media to be relevant and stay in the eyes of the consumer, too. However,
there are lines that could be crossed if you aren’t careful. Here are just a few issues that are
erupting every day on the internet:
1. Too much content
Ever heard of the "endless scroll?" People become addicted to constantly checking their social media
feeds and companies are constantly posting ads, blogs, photos, questions and podcasts.

The brain can go through serious fatigue even without the added visual stimulation of the real world.
Many young people are being diagnosed with ADHD and similar behavioral issues because of this kind of
content overload.
2. Jealousy and constant competition
With photoshopped images and filters everywhere, it’s no wonder that the statistics for depression,
loneliness, self-esteem issues and suicides are on the rise. Sadly, plenty of companies are taking
advantage of this and posting envy-worthy bodies and lifestyles to make a quick buck from those with
low self-esteem.

3. Cancel culture
This is a more recent phenomenon for social media, where many are being "called out" for their past
transgressions. In some ways, it’s great — the #MeToo movement and other similar movements are weeding
out awful people that have held power for far too long.

However, this trend is also affecting people in a bad way as well. Many "cancellations" were incorrect
but already forever ruined someone’s reputation.

Does cancel culture mean you can’t make mistakes? We’re human, and mistakes are bound to happen, no
matter how careful you are as an individual or company.
4. Not enough fact-checking
"Fake news" is everywhere and sometimes people can’t tell the difference. Of course, Facebook and other
companies are attempting to mitigate the problem, trying to stop conspiracy theories or forcing
articles to go through fact-checks. However, it’s still a very real problem that, in some cases, can
cause huge political upheavals and deadly consequences.
5. Diagnosis without experience
This isn’t just medical. It also calls upon other service industries as well.

Suddenly everyone’s a doctor, plumber or dietitian from watching a YouTube video when, in reality, we
know that most of the expert work comes from years of hands-on experience and education.

This causes a lot of issues and has a real-world impact. Sure, you can pick up some handy tips from the
internet, but you can’t diagnose yourself with a deadly disease just because a website said you had a
few symptoms.

These problems aren’t going anywhere for a while unless the social media companies, governments, and
other technologies can start combating them correctly. Social is now too integral to business success
to stop using, but these are just a few things to keep in mind next time you’re hitting “post” online.

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About the Author
Mashaal Ryan
Mashaal Ryan is a content editor at MultiView. She is based in Dallas, Texas, and graduated from Baylor
University with an English degree in 2014. She blogs somewhat regularly and enjoys writing lifestyle
pieces. In the past, she has worked in marketing as well as journalism.

Thanks and Regards,
Dr. R.S. Dahiya

Manusmirti

 अब अदालतों में फैसले भी मनुस्मृति के आधार पर होने लगे हैं। मामला गुजरात का है। हाल ही में गुजरात हाईकोर्ट का एक फैसला आया है। एक सामूहिक बलात्कार पीड़िता जो कि  नाबालिक है,  प्रेगनेंट हो गई। दुखियारी पीड़िता ने हाईकोर्ट से प्रार्थना की कि उसे गर्भ गिराने की इजाजत दे दी जाए लेकिन हाईकोर्ट के माननीय  जज ने अपने फैसले 

में लिखा   है कि उसे गर्भ गिराने की इजाजत नहीं दी जा सकती क्योंकि मनुस्मृति के अनुसार पूर्व में 14-  15 वर्ष की आयु में ही लड़कियों की शादी हो जाती थी और 17 साल की आयु से पहले ही बच्चे हो जाते थे । अतः उसे गर्भ गिराने की इजाजत नहीं दी जा सकती ।  

   जज साहब का नाम है Justice Samir J. Dave.

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Will fail Fighting and not surrendering

I will rather die standing up, than live life on my knees:

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