Sunday, March 16, 2014

VOTE

चमेली पड़ौस की महिलाओं के बीच दोपहर को बात करती है ।
सभी महिलाएं महंगाई के बारे में बताती हैं । लैक्सन आगे पर महंगाई फेर
बी कम नहीं हुई । चमेली क्या कहती है ----
वोट देवां  जिब राखते हम सही गलत का ध्यान नहीं ॥
नाश करैंगे वे नेता जिनकै धोरै आज ईमान नहीं ॥
नजर घुमा कै देख लियो नित पेड़ झूठ का फलै सै
सच का तेल घलै दीवे मैं तो यो ज्ञान उजाला जलै सै
सच के दायरे मैं रहकै मन नहीं हिलाया हिलै सै
सच पै खड्या रहवै उसनै दिलां मैं जगां मिलै सै
विचार करै बुद्धि चेतन बिन चेतन मिलै ज्ञान नहीं ॥
भगत सिंह का नाम सुण्या धूम मचाई हिन्द म्हारे मैं
तेईस बरस का फांसी चढग्या सोचो कदे इस बारे मैं
सुणो आसान बात नहीं होती या ज्यान देनी आरे मैं
घर बार कति छोड़ दिया उसनै देश के प्रेम इशारे मैं  
म्हणत करकै दौलत पैदा करां समझे जां इंसान नहीं ॥
साच्ची बात कहूँ थारे तैं हम सच्चाई मंजूर करावैं
हाथ जोड़ कहूँ थारे तैं सच का साथ जरूर निभावें
सच्चाई पै चलना चाहिए सच्चाई का घर दूर बतावैं
बनावटी मिलावटी की जागां इंसानियत का नूर खिलावें
सच्चा सौदा ए बिकवावेंगे झूठ की चलै दुकान नहीं ॥
वो मानस ना किसे काम का जो सच पै सिर धुनै नहीं
अपनी कमाई का हिसाब वो बैठ कै कदे बी गिनै नहीं
वोहे मानस सदा सुख पावै सै जो बात झूठी सुनै नहीं
आज जो ठीक नहीं वो उस परम्परा का जाल बुनै नहीं
छुआछात की जो बात करै वो इंसान की संतान नहीं ॥




MEHNAT KASH KYOON PADYA BHRAM MAIN

BGVS EC MINUTES

भारत ज्ञान-विज्ञान समिति, हरियाणा


आदरणीय साथी,

                     नमस्कार!

भारत ज्ञान-विज्ञान समिति की नवगठित कार्यकारिणी की पहली बैठक दिनांक 2 मार्च 2014 को डाॅ0 महाबीर नरवाल की अध्यक्षता में की गई। बैठक में प्रमोद गौरी, डाॅ0 आर. एस. दहिया, सोहनदास डाॅ0 संतोष मुद्गिल, राजपाल दहिया, राजेंन्द्र कुमार, सुशील मेहरा, सतीश चैहान कृष्ण वत्स, राम मेहर, सीता राम, अविनाश सैनी, मनीषा व कमला ने हिस्सेदारी की। किये गये कार्यों की रिपोर्ट प्रमोद गौरी ने की।
रिपोर्ट के मुख्य बिन्दु इस प्रकार हैं -
बी.जी.वी.एस. की आमसभा 15 दिसंबर 2013 को रोहतक के किडिज़ कालेज में       आयोजित की गई। आमसभा में कुल 80 सदस्यों ने हिस्सेदारी की। इस अवसर पर ‘‘शिक्षा की गुणवत्ता का प्रश्न’’ विषय पर सेमिनार किया गया। विषय वक्ता के तौर पर रूम-टू-रीड़ संस्था, दिल्ली से श्री मनोज कुमार ने अपनी प्रस्तुति दी। उन्होंने शिक्षा के विभिन्न पक्षों को खोलते हुए शिक्षा की गुणवत्ता की स्थिति पर अपनी बात रखी। इसके उपरान्त सचिव द्वारा सांगठनिक तथा कार्य रिपोर्ट पेश की गई। सभी प्रतिभागियों ने समूह चर्चा के उपरान्त विभिन्न सुझाव प्रस्तुत किये और रिपोर्ट पारित की गई। आमसभा मंे बी.जी.वी.एस. की नई कार्यकारिणी का गठन किया गया। इस मौके पर पुस्तक प्रदर्शनी भी लगाई गई।
24 फरवरी 2014 को शिक्षा कोर ग्रुप की बैठक की गई। इसमें 14 सदस्यों ने हिस्सा लिया। बैठक में शिक्षक संदर्शिका के लिए डाॅ0 अपूर्वानन्द द्वारा लिखित आलेख पढ़ा गया। अब शिक्षक संदर्शिका का प्रारुप लगभग तैयार है। इसको छापकर अगामी 13 अपै्रल को शिक्षा पर सेमनिार करते हुए इसका विमोचन किया जाना है। सेमिनार में विषय वक्ता के तौर वक्तव्य रखने के लिए अपूर्वानन्द जी को शामिल करने की योजना है।
बैठक में नये विषयों पर पर्चे लेखन में बाल जिज्ञासा और स्कूल-मुकेश यादव, शिक्षा का अधिकार अधिनियम पर लेख-शीशपाल, शिक्षा की गुणवत्ता वक्तव्य का सयोजन-सुशील मेहरा, शिक्षण क्या और कैसे-सतीश चैहान, बाल मनौविज्ञान-निशा, अध्यापक के सामाजिक सरोकार-मनीषा, शिक्षक की भूमिका-अनीता ग्रेवाल तथा मुल्यांकन पर रमेश जाखड़ को जिम्मेदारी दी गई।
बी.जी.वी.एस. को 12ए के तहत इन्कमटैक्स कार्यलय में पंजीकरण करवाया गया है। इसके उपरान्त 80जी के लिए प्रयास किया जायेगा।
राष्ट्रीय शिक्षा असम्बली रांची (झारखण्ड) में हिस्सेदारी के लिये 25 सदस्यों के नाम तय किये गये हैं।
शिक्षा विभाग द्वारा पुस्तक मेलो से खरीदी गयी पुस्तकों की बकाया राशि को जुटाने का प्रयास किया जा रहा है। इसमें अधिकतम राशि जूटा ली गई है।
हथवाला में जीवनशाला का संचालन निरंतरता में है। इसमें कुल 50 बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। जीवनशाला के कार्य में वर्तमान में भी आर्थिक तंगी बनी हुई है और शैक्षणिक विकास में भी कमजोरी आई है।
विश्व पुस्तक मेले में बी.जी.वी.एस व हरियाणा विज्ञान मंच के द्वारा संयुक्त रूप से पुस्तक प्रदर्शनी लगाई गई। इसमें लगभग 25000 हजार रुपयों की पुस्तकों की सेल हुई जबकि खर्च इससे लगभग दुगने का है। भविष्य में इसको और अधिक व्यवस्थ्ति ढ़ग से किये जाने की आवश्यकता है।
बैठक में विभिन्न संस्थाओं व सदस्यों पर बी.जी.वी.एस. की बकाया लेनदारियों की सूची को रखा गया।
सर्च-राज्य संसाधन केन्द्र द्वारा विभिन्न जिलों की जिला शिक्षा प्रशिक्षण संस्थाओं में दिये गये प्रशिक्षण की रिपोर्ट को साझा किया गया तथा भविष्य में इसके सांगठनिक कन्सोलिडेशन पर चर्चा की गई।
बैठक में लिये गये निर्णय -
13 अपै्रल 2014 को शिक्षा, शिक्षक-विमर्श सम्मेलन में शिक्षक संदशिका का विमोचन करना। इसमें शिक्षा के क्षेत्र जुड़े लगभग 400 लोगों को शामिल करना।
राष्ट्रीय शिक्षा असम्बली रांची में हरियाणा से 25 लोगों को शामिल करना।
18-19 मार्च 2014 को जीवनशाला पर सचिवमण्डल तथा जिला इकाई नेतृत्वकारी सदस्यों की बैठक करना। बैठक के लिए समालखा टीम द्वारा संक्षिप्त नोट तैयार करना।
शिक्षा कोर ग्रुप सदस्यों की अनुभव लेखन पर कार्यशाला आयोजित करना।
विभिन्न 100 स्कूलों में पुसतक प्रदर्शनियां लगाते हुए पुस्तक प्रसार के काम को आगे बढ़ाना।
बी.जी.वी.एस. के आमसभा सदस्यों की सदस्यता फीस जूटाना। इसके लिए     डाॅ0 संतोष मुद्गिल, सुशील व सीताराम को जिम्मेदारी दी गई।
पुस्तक संस्कृति के विकास पर पुस्तक प्रसार के कार्य में शामिल सदस्यों की ओरियनटेशन कार्यशाला आयोजित करना।
राज्य कार्यकारिणी कांे सक्रिय करना।
बैठक में शामिल सभी कार्यकारिणी सदस्यों ने प्रस्तुत रिपोर्ट एवं भविष्य के कार्यों पर अपने सवालों-सुझावों एवं टिप्पणियों द्वारा सक्रिय भागीदारी की। अध्यक्षीय टिप्पणी के साथ बैठक समपन हुई।
                                                           
नोट - 13 अप्रैल को शिक्षक संदर्शिका के विमोचन तथा सेमिनार के आयोजन हेतु विस्तृत चर्चा करने के उद्देश्य से राज्य कार्यकारिणी, शिक्षक कोर ग्रुप तथा सहयोगी व्यक्तियों की बैठक दिनांक 27 मार्च 2014 को शाम 3ः00 बजे ‘‘सर्च’’ कार्यालय में होनी तय की गई है। अतः आपसे अनुरोध है कि आप समय पर पहुंचकर बैठक में हिस्सेदारी करने का कष्ट करें।
                                                            (प्रमोद गौरी)
                                                               सचिव

Saturday, March 15, 2014

8 March,2014 KARNAL














गोरखपुर ( हरयाणा ) परमाणु ऊर्जा संयंत्र महाविनाश को बुलावा

गोरखपुर ( हरयाणा ) परमाणु ऊर्जा संयंत्र महाविनाश को बुलावा
जापान के फुकुशिमा के दायिची परमाणु संयंत्र में सुनामी व् भूकम्प के कारण बड़ी दुर्घटना घटी , जिसकी वजह से 2 लाख लोगों को वहाँ से प्लायन करना पड़ा तथा हजारों लोग रेडिएशन से प्रभावित हुए । जिसके कारन पूरी दुनिया में परमाणु तकनीक पर फिर से सवाल उठने शुरू हो गए । इसी कारण  जर्मनी , स्पेन ,स्वीडन व् चीन ने अपने नए परमाणु रियेक्टरों की मंजूरी पर रोक लगा दी । खुद जापान के प्रधान मंत्री ने कहा कि अब हमें परमाणु से बिजली पैदा करने की तकनीक से परे जाना होगा।
तो फिर हरयाणा के गोरखपुर में यह संयंत्र क्यूँ लगाय़ा जा रहा है ??? सोचने का विषय है । पूछो चुनाव में सबसे।
इटली ने लोगों के बहुमत का ख्याल रखते हुए परमाणु ऊर्जा पर रोक लगा दी।  फ़्रांस जो कि दुनिया का उन्नत परमाणु तकनिकी देश है ने भी इस पर फिर से सोचना शुरू कर दिया है। अमरीका ने पहले से ही 1979 के बाद कोई नया संयंत्र नहीं लगाया , लेकिन हिंदुस्तान की सरकार 39 नए रियेक्टर देश में लगाने पर तुली हुई है , जबकि जापान जैसा तकनिकी उन्नत  देश व् सारी दुनिया के परमाणु वैज्ञानिक रेडिएशन के खतरे को रोक नहीं पा रहे हैं।
तो फिर हरयाणा के गोरखपुर में यह संयंत्र क्यूँ लगाय़ा जा रहा है ??? सोचने का विषय है । पूछो चुनाव में सबसे।
इसी के तहत हरयाणा के जिला फतेहाबाद के गोरखपुर गाँव   में देश का दूसरे नंबर का सबसे बड़ा परमाणु संयंत्र लगाया जाना प्रस्तावित किया गया और आधारसिला भी रख दी गयी है । जबकि सच्चाई यह है कि यह क्षेत्र भी भूकम्प चार जोन में है जहाँ पर 3 से 6 रिएक्टर स्केल तक के भूकम्प आ सकते हैं । देश की राजधानी यहाँ से मात्र 210 कि. मी. की दूरी पर है । जब फुकुशिमा परमाणु संयंत्र की वजह से टोक्यो जो कि 240 कि.मी.की दूरे पर है खाली होता है तो गोरखपुर पर सरकार चुप क्यों है ?
इससे पहले भीं परमाणु संयंत्रों की दुर्घटना 26 अप्रैल 1986 में सोवियत यूनियन के चरणोबिल में हुई थी जिसके कारण यूक्रेन की सरकार के आंकड़ों के मुताबिक रेडिएशन से 65000 से 1 . 10 लाख के बीच लोगों की मौत हो चुकी है । इसी प्रकार थ्रीमाइलआईलैण्ड  परमाणु संयंत्र के फटने की घटना 1979 में अमेरिका जैसे ताकतवर देश में घटित हुई जिसे वह नहीं रोक पाया तो क्या हिंदुस्तान जैसा ढीले ढाले तंत्र वाला ऐसी घटना को रोक पाने में सक्षम है । लेकिन इसके विपरीत भारत सरकार के प्रधानमंत्री यह कह रहे हैं कि भारत के सभी परमाणु संयंत्र सुरक्षित हैं तथा टी वी चैनलों व् मीडिया से यहाँ के परमाणु ऊर्जा के समर्थक वैज्ञानिक यह कह रहे हैं कि हम इस खतरे से निपटने में सक्षम हैं तथा हमारे पास भूकम्परोधी रिएक्टर हैं जो कि सरासर झूठ है , जबकि पूरी दुनिया के देश अपनी अपनी ऊर्जा निति में बदलाव कर रहे हैं ।

1 . दुर्घटना ना हो तो भी परमाणु ऊर्जा संयंत्र लाखों सालों तक मानव के लिए बड़ा खतरा :
a ) रिएक्टर भौतिकी के अनुसार परमाणु विस्फोट अचानक हो सकता है तथा इसमें लगातार  अनियंत्रित क्रियाएं होती हैं । दुनिया का कोई भी देश परमाणु संयंत्र से निकलने वाले कचरे का सफल  प्रबंधन नहीं कर पाया है ।  इसका  रिसाई कलिंग प्रोसेस अभी तक कामयाब नहीं हुआ है । इंग्लैण्ड जैसे विकसित देश ने कचरा प्रबंधन के लिए लगभग 50 अरब पोंड खर्च किये लेकिन सफल नहीं हुआ  फ़्रांस जो कि परमाणु ऊर्जा में तकनीकी रूप से सबसे विकसित है , का मानना है कि परमाणु कचरा एक गम्भीर समस्या है तथा इसका कोई समाधान नहीं है । वैज्ञानिकों का यह मानना है कि रेडियो एक्टिव कचरे से मानव जीवन सुरक्षित होने में लगभग 2. 50 साल लग जायेंगे , क्योंकि एक हजार मेगावाट का परमाणु संयंत्र हर साल 30 टन रेडियोधर्मी कचरा छोड़ता   है ।
b ) कोई भी परमाणु ऊर्जा संयंत्र सामान्य स्थिति में भी रेडियो एक्टिव गैस वातावरण में छोड़ता रहता है ।  ये रेडियो एक्टिव गैस 40 -50 कि. मी. क्षेत्र में फैलती रहती हैं तथा हमारी श्वास प्रक्रिया के साथ शरीर के अंदर जाती है जिसके कारण फेफड़ों का कैंसर ,टी. बी. ,चरम रोग ,अपंगता ,मंदबुद्धि बच्चों का पैदा होना आदि बीमारियां फैलती हैं , जो भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी अनैतिक है ।
c ) परमाणु संयंत्र से निकलने वाले रेडियो एक्टिव तत्व हवा के द्वारा हमारी खाद्य श्रंखला में दूध ,मांस ,मछली ,फल ,सब्जी , आदि के द्वारा शरीर में सीधे पहुँचते हैं जहाँ पर वे शरीर की कोशिकाओं को तोड़कर छोटा करते हैं , जिसके कारण बीमारियां फैलती हैं ।
2. परमाणु ऊर्जा एक महंगी बिजली : परमाणु ऊर्जा के बारे में सस्ती बिजली के दावे लगातार गलत साबित हुए हैं ।
1. परमाणु तकनीक को व्यवाहरिक बनाने के लिए शोध तथा विकास का सारा खर्चा सरकारें वहन करती हैं इसलिए इस खर्चे को परमाणु -----------

Friday, January 31, 2014

किसान के शोषण के बारे एक गीत (रागनी )

किसान के शोषण के बारे एक गीत (रागनी )

मौलड़ कहकै तनै तेरा शोषण साहूकार करै ॥
मौलड़ कोन्या करम तेरे तैं तूँ ना इंकार करै ॥

भैंस खरीदी तनै जिब धार काढ़ कै  देखी  थी
बुलद खरीदया तनै जिब खूड बाह कै देखी थी
वैज्ञानिक ढंग अपनाये कौन नहीं स्वीकार करै ॥

हल की फाली तनै अपने सहमी तयार करायी
पिछवा बाल की महत्व तनै ध्यान मैं ल्याई
पूरी खेती बाड़ी मैं तर्क विवेक तैं सब कार करै ॥

एक  क्वींटल गंडे की तनै कितनी कीमत थ्यायी
इसकी बैठ कै तनै  कद  विवेक तैं हिस्साब लगाई
शीरा अर खोही कितनी थी नहीं खाता तैयार करै ॥

तनै मौलड़ कह्वानीया ना चाह्ता हिस्साब सीखाना \
हमनै तो चाहिए कमेरे म्हारी लूट का खाता बनाना
रणबीर बरोने  आला लिखकै तनै होशियार करै ॥


Tuesday, January 28, 2014

सच्चाई को दबाने का संघी आतंक

लोकसंघर्ष !


Posted: 26 Jan 2014 10:47 PM PST

सितम्बर 2013 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश (मुजफ्फरनगर, शामली और बागपत) के दंगे को संघियों ने भड़काया और मजदूर वर्ग के एक समुदाय को घर से बेघर कर दिया। दिन की उजाले की तरह साफ है कि दंगे राजनीतिक फायदे के लिये कराये गये थे, जिसमें सभी राजनीतिक पार्टियों ने अपने फायदे के लिए अपने-अपने तरीकों से दंगें में अपनी-अपनी भूमिका को निभाया। मुख्य भूमिका भाजपा विधायक संगीत सिंह सोम का था जिसने एक घटना को साम्प्रदायिक रंग देने और लोगों के अन्दर जहर घोलने के लिये, पकिस्तान के सियालकोट में दो युवकों  की हत्या का बर्बर विडियो फेसबुक पर अपलोड किया। इस विडियो को जब फेसबुक से हटा दिया गया तो यह मोबाईल पर भेजा गया और लोगों के अन्दर झूठा प्रचार कर एक समुदाय के खिलाफ भड़काने का काम किया गया ।
लोगों की समस्या रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य व रोजगार के मुद्दों से भटकाने के लिए ‘बहु-बेटी बचाओ’ महापंचायत का आयोजन किया गया। इसमें एक सम्प्रदाय विशेष के खिलाफ जहर उगला गया तो दूसरी तरफ यह अफवाह फैला दी गई कि लोग हमले करने के लिए आ रहे हैं। इसी तरह टीकरी गांव, जिला बागपत में एक हिन्दू लड़के को मार कर मस्जिद गेट पर लटका दिया गया। सवाल उठता है कि कोई मुस्लिम लड़के को मार कर मस्जिद गेट पर क्यों लटकायेगा?
दंगे के मुख्य आरोपी संगीत सिंह, जिन्होंने फेसबुक पर फर्जी विडियो अपलोड किया था, को मोदी के मंच से आगरा में पुरस्कृत किया गया। विश्व हिन्दू परिषद के नेता अशोक सिंघल खुलेआम बयान देकर कहते हैं कि ‘‘पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बंधुओं ने इस बार ‘लव जेहादियों’ को ऐसा करारा जबाब दिया है जैसा कि गुजरात में रामभक्तों को जलाने वालों को दिया गया’’।
7 सितम्बर के नांगला-मंदौड़ पंचायत में ‘बहू बेटी बचाओ’ महापंचायत को धारा 144 के बावजूद होने दिया गया, जबकि उससे पहले उत्तर प्रदेश के डीजीपी देवराज नागर ने दौरा भी किया था। डीजीपी देवराज नागर भाजपा सांसद व दंगा भड़काने के आरोपी हुकूम सिंह के रिश्तेदार भी हैं। दंगे के दौरान जब एक समुदाय के लोग पुलिस को फोन कर रहे थे तो पुलिस फोन रिसिभ नहीं कर रही थी या कर रही थी तो बस यही पुछ रही थी कि कोई मरा तो नहीं। मुस्लिम समुदाय के घरों की तलाशी ली गई, और बीच में पड़ने वाले हिन्दू घरों को छोड़ दिया गया। शिनाना गांव के मीर हसन व दीन मुहम्मद के घरों के जेवर पुलिस तलाशी के दौरान चुरा लिये गये और उनको झूठे केसों में फंसा कर जेल भेज दिया गया। क्या इसे हिन्दू फासिज्म नहीं बोला जायेगा? 1987 में मेरठ में पीएसी जवानों द्वारा किये गये जनसंहार में अभी तक पीडि़त परिवार को न्याय नहीं मिल पाया है। बर्खास्त पीएसी जवानों को कर्तव्यनिष्ठ व अनुशासित मानते हुए वापस नौकरी पर ले लिया गया।
मुजफ्फरनगर दंगे के पीडि़त परिवार अभी भी शिविरों में रह रहे हैं और उत्तर प्रदेश सरकार उन शिविरों को हटाने के लिए लगातार दबाव बना रही है। पीडि़त परिवार अपने गांव जाने को तैयार नहीं हैं। कुछ पीडि़तों को मुआवजा दिया गया और उनसे शपथ पत्र लिया गया कि वे अपने गांव नहीं जायेंगे-अगर वापस गये तो उनको मुआवजा वापस करना पड़ेगा।
डेमोक्रेटिक स्टूडेन्ट्स यूनियन ने दिल्ली विश्वविद्यालय के नार्थ कैम्पस में 22 जनवरी, 2014 को मुजफ्फरनगर दंगे में हिन्दुत्वा फासिज्म (संघ परिवार) की भूमिका पर एक सेमिनार रखी थी। इसमें संघ परिवार से जुडे़ ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ के गुंडों ने बाधा डाला। सेमिनार रूम के बाहर पुलिस की मौजदूगी में वे नारे लगाते रहे व सेमिनार रूम में बैठ कर वक्ताओं की बातों पर टोका-टोकी करते रहे। ‘संघी, गाय’ आदि का नाम नहीं लेने की बात कह रहे थे। आयोजकों के पूछने पर कि ‘‘संघी को संघी और गाय को गाय नहीं कहा जाये तो क्या कहा जाये’’ तो उनका जबाब था कि जानवर कहो। इस पर सभी लोग हंस पड़े। सच कहा जाये तो ये जानवर ही हैं जिनको यह ज्ञान नहीं है कि इंसानियत क्या होती है। संघीय गुंडों ने ‘न्यू सोशलिस्ट इनिसिएटिभ (छैप्)’ के साथी बनोजीत के कपड़े फाड़ दिये। इन संघी गुंडों का जबाब कौन , छैप् व अध्यापकों ने मिलकर दिया जिससे वे अपने मनसुबे में कमयाब नहीं हो पाये। दिल्ली पुलिस का भी वही रवैय्या था जो कि यूपी पुलिस का था। वह मूक दर्शक बनी देख रही थी। दिल्ली पुलिस डिर्पाटमेंट के एचओडी से ही सवाल पूछ रही थी कि सेमिनार के आयोजन का परमीशन क्यों दिया गया? दबाव में आकर डिर्पटमेंट ने जल्द से जल्द सेमिनार खत्म करने के लिए आयोजकों पर दबाव डालना शुरू कर दिया। दिल्ली के अन्दर किसी भी डेमोक्रेटिक सम्मेलन, सभा, धरना में आकर यह संघी परिवार बाधा उत्पन्न कर रहा है और दिल्ली पुलिस उनका पूरा साथ दे रही है।
संघी और सभी संसदीय राजनीतिक पार्टिया साम्राज्यवाद के नई आर्थिक नीतियों को जोर-शोर से लागू करवाने के लिए वही नीति अपना रहे हैं जो 1991-1992 में नरसिम्हा राव-मनोमहन औ संघी ने अपनाया था। आर्थिक नीति लागू करवाने के लिए अडवाणी ने रथ यात्रा निकालकर हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य को बढ़ा कर मुद्दे को भटकाया था। वही नीति अभी संघी अपना रहे हैं जब भूमंडलीकरण के नीतियों को जोर-शोर से लागू करने में शासक वर्ग लगा हुआ है तो देश में अचानक दंगों में तेजी आ गयी है। सभी शांतिप्रिय, जनवादपसंद संगठनों, बुद्धिजीवियों, नागरिकों को यह सोचने की जरूरत है कि भगवाधारियों व पुलिस गठजोड़ को कैसे चुनौती दी जाये। भगवाधारियों की झूठी देशभक्ति को चुनौती देते हुए आत्मनिर्भर, जनवादी भारत का निर्माण कैसे किया जाये। 

-सुनील कुमार

Sunday, January 26, 2014

aap

आम आदमी पार्टी: राजनीति में उबाल




दिल्ली विधानसभा चुनाव (दिसंबर 2013) में आम आदमी पार्टी की शानदार सफलता ने इस साल होने वाले आम चुनाव के नतीजों के बारे में पूर्वानुमानों और नजरिए को बदल दिया है। इससे चुनावी राजनीति के समीकरण भी परिवर्तित हो गए हैं। यद्यपि दिल्ली में भाजपा सबसे बडे़ दल के रूप में उभरी और वह सरकार बनाने का दावा प्रस्तुत कर सकती थी परंतु उसने ऐसा नहीं किया। यहां यह स्मरणीय है कि बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद, 1996 में हुए आम चुनाव में भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी, उसने सरकार बनाने का दावा प्रस्तुत किया था और अल्प समय तक दिल्ली से राज भी किया था। इस बार दिल्ली के मामले में उसका रूख अलग था और उसने आगामी आम चुनाव को दृष्टिगत रखते हुए, दिल्ली में सरकार न बनाने का फैसला किया। शूरूआत में कुछ ना-नुकुर करने के बाद, आप ने जनता की राय जानने का उपक्रम किया और उसके बाद बहुमत में न होने के बावजूद सरकार बना ली।
इसके पहले कि हम दिल्ली विधानसभा चुनावों के नतीजों और आप की सरकार बनने से राजनीति के प्रांगण में आए परिवर्तनों की चर्चा करें, हम उन परिस्थितियों पर प्रकाष डालना चाहेंगे जिनके चलते आप उभरी। अरविंद केजरीवाल द्वारा अन्ना हजारे को सामने रखकर चलाए गए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने देष को हिलाकर रख दिया था। इस आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन मिला। इसके समर्थकों में खाप पंचायतों से लेकर एमबीए और आई.टी. इंजीनियर व बिल्डरों से लेकर छोटे व्यापारी तक शामिल थे। इसे मुख्यतः मध्यम वर्ग का समर्थन प्राप्त था। इस आंदोलन को आरएसएस भी पर्दे के पीछे से समर्थन दे रहा था और लोगों की भीड़ इकट्ठा करने में आरएसएस का महत्वपूर्ण योगदान था। विरोध की इस लहर ने संसदीय व्यवस्था को भी चुनौती दी परंतु अन्ना-केजरीवाल के नेतृत्व में चले आंदोलन के दबाव के बावजूद, संसद का अस्तित्व बना रहा। आंदोलन के केन्द्र में थी यह मांग कि भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए लोकपाल विधेयक लाया जाना चाहिए। इसके बाद यह आंदोलन दो धाराओं में बंट गया। एक धारा केवल कांग्रेस पर हमला करने की हिमायती थी और इसकी आवाज बनीं किरण बेदी। दूसरी ओर, केजरीवाल के नेतृत्व वाली दूसरी धारा हर तरह के भ्रष्टाचार के विरोध में थी।
दूसरी धारा से उपजी आम आदमी पार्टी, जिसने दिल्ली विधानसभा चुनाव से अपनी राजनैतिक यात्रा षुरू की। उसने मुख्यतः ‘नगरपालिका स्तर’ के मुद्दों, विशेषकर बिजली, पानी पर जोर दिया और दिल्ली में धूम मचा दी। आप जनता को यह समझाने में सफल रही कि उसकी नीयत नेक है और उसकी पहुंच आम आदमी तक हो गई। झुग्गी झोपड़ी के लोगों में, चारों ओर व्याप्त भ्रष्टाचार के प्रति गुस्से को आप अपने प्रति समर्थन में बदलने में सफल रही। नतीजा यह हुआ कि दिल्ली के वे नागरिक, जो बढ़ती कीमतों और रोजाना की जिंदगी की अन्य समस्याओं से परेशान  थे, उन्होंने कांग्रेस को छोड़कर आप का दामन थाम लिया। आप, भाजपा-आरएसएस के आधार में भी कुछ हद तक सेंध लगाने में सफल रही परंतु उसके समर्थक मुख्यतः वे थे, जो अब तक कांग्रेस का साथ देते आ रहे थे। यह भी हो सकता है कि कई लोगों ने, जो आप को वोट देने के इच्छुक रहे हों, उन्होंने इसलिए उसे वोट न दिया हो क्योंकि यह उसका पहला चुनाव था। आप की जीत का संदेश स्पष्ट है। उसे स्थापित पार्टियों के विकल्प के रूप में जनता ने स्वीकार कर लिया है। यह इस तथ्य से भी साफ है कि आप मेंशामिल होने के लिए दे श  भर में हजारों लोग आतुर हैं और उसके लिए काम करने की इच्छा रखते हैं।
इसके पहले तक चुनावी परिदृष्य पर नरेन्द्र मोदी हावी थे, जिन्होंने ‘‘गुजरात के विकास’’ के अनवरत प्रचार के जरिए अपनी छवि एक ऐसे मजबूत नेता की बना ली थी जिसने गुजरात में कमाल कर दिखाया है। भाजपा ने उन्हें अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया था और मोदी को आरएसएस का सहयोग और समर्थन भी प्राप्त था। मोदी, गुजरात कत्लेआम में अपनी भूमिका पर पर्दा डालने में सफल हो गए थे और उन्होंने इसके लिए एसआईटी की अपूर्ण जांच रपट को मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट द्वारा सही ठहराए जाने के तथ्य का जमकर दुरूपयोग किया। सच यह है कि उसी रिपोर्ट में मोदी के खिलाफ सुबूत हैं परंतु जैसे तैसे मोदी अब तक सजा से बचे हुए हैं। मोदी की आम सभाएं अत्यंत सुनियोजित होती हैं। इन आम सभाओं और मीडिया एक हिस्से की मदद से मोदी ऐसा माहौल बनाने में सफल हो गए मानो अगले चुनाव में उनकी विजय सुनिष्चित है। सोशल मीडिया में भी मोदी ने पैठ बना ली और वेबसाइटों और ब्लागों पर उनका गुणगान होने लगा। इसके साथ ही, मोदी-भाजपा-आरएसएस कांग्रेस और विषेशकर राहुल गांधी पर निशाना साधते रहे। सरदार वल्लभ भाई पटेल की भव्य मूर्ति की स्थापना की योजना, रन फाॅर यूनिटी व अन्य कई कार्यक्रम, मोदी के चुनाव अभियान का हिस्सा थे।
आप के उदय और इस एहसास ने कि वह भारतीय राजनैतिक परिदृष्य से जल्द गायब होने वाली नहीं है, नागपुर में बैठे आरएसएस के शीर्ष नेताओं और मोदी की टीम ने अपनी रणनीति बदल ली। अब उनके निशाने पर आप है। सोशल मीडिया और मुंहजबानी प्रचार के जरिए केजरीवाल, प्रशांत भूषण व अन्यों पर कटु हमले बोले जा रहे हैं। प्रशांत भूषण के इस संतुलित वक्तव्य की कि कष्मीर में सेना की तैनाती के संबंध में वहां के लोगों की राय को महत्व दिया जाना चाहिए, पर भारी बवाल मचा दिया गया। हिंदू रक्षक सेना नामक संगठन, जिसे आप संघ-भाजपा से जुड़ा हुआ बताती है, ने आप के दफ्तर में तोड़फोड़ की। यह अलग बात है कि स्वयं केजरीवाल ने भी इस वक्तव्य से अपने आप को अलग कर लिया है। आप को मिले अनापेक्षित भारी जनसमर्थन ने धर्मनिरपेक्ष प्रजातांत्रिक ताकतों की इस आशंका को कुछ हद तक दूर किया है कि मोदी प्रधानमंत्री बन जाएंगे और उसके बाद देश में फासीवाद का युग शुरू होगा। केजरीवाल मोदी को किस हद तक रोक पाएंगे यह कहना मुष्किल है। दोनों ओर से विभिन्न कारक काम कर रहे हैं। आप की छवि में तेजी से आ रहे सुधार और उसके बारे में लोगों की बदलती सोच को संघ-भाजपा-मोदी चुपचाप नहीं देखेंगे। बड़े औद्योगिक घराने भी चाहते हैं कि मोदी सत्ता में आएं क्योंकि वे सरकारी खजाने का मुंह उनके लिए खोलने में जरा भी संकोच नहीं करते। औद्योगिक घरानो द्वारा नियंत्रित मीडिया भी वर्तमान में आप के समर्थन में बात कर रहा है।
सन् 1998 मंे जब भाजपा एक बार फिर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी तब कुछ अवसरवादी राजनैतिक समूह अलग-अलग आधारों पर उसका समर्थन करने के लिए तैयार हो गए। सौभाग्यवश उस समय मोदी नहीं थे। सौभाग्यवष उस समय मोदी के दाहिने हाथ अमित शाह भी नहीं थे। सौभाग्यवश उस समय भाजपा की सीटें कम थीं और उसे आरएसएस के हिन्दू राष्ट्र के एजेन्डे को लागू करते हुए भी अपने गठबंधन के साथियों की इच्छा का सम्मान करना पड़ता था। इस बार यदि मोदी के नेतृत्व में भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी तो समीकरण एकदम अलग होंगे। भाजपा के पास अब देश पर शासन करने का अनुभव है और मोदी के पास दुनियाभर की चालों का खजाना है। मोदी अब तक कानून के लंबे हाथों की पकड़ में नहीं आ सके हैं। उनकी गुजरात कत्लेआम में महत्वपूर्ण भूमिका थी। उनके शासनकाल में फर्जी मुठभ्ेाड़ें हुईं हैं, एक युवा लड़की की जासूसी की गई है और अब तीस्ता सीतलवाड और अन्य मानवाधिकार रक्षकों को फंसाने की तैयारी हो रही है। मोदी दूसरे भाजपा नेताओं से अलग हैं। अगर भाजपा सत्ता मंे आ गई तो मोदी के नेतृत्व में वह पहले से कहीं अधिक आक्रामक होगी और अपनी चलाएगी।
आप की राजनीति क्या है? किसी पार्टी की राजनीति उसकी कथनी, करनी व घोषणापत्रों आदि से पता चलती है। आप ने अपनी नीतियों के बारे में अभी तक कोई सुस्पष्ट दस्तावेज जारी नहीं किया है यद्यपि उसका एक दृष्टिपत्र अवष्य सामने आया है। आप का जन्म भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से हुआ है। यह आंदोलन सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक व्यवस्था को लगे रोग पर केन्द्रित न होकर उसके लक्षण पर केन्द्रित था। इस आंदोलन का लक्ष्य व्यवस्था परिवर्तन नहीं था। जो पार्टियां सामाजिक परिवर्तन की हामी होती हैं और जिनका समाज के दबे-कुचले और वंचित वर्गों के लिए कोई एजेन्डा होता है वे सामान्यतः बेहतर व्यवस्था की स्थापना की चाह से उपजती हैं। उनकी सुविचारित नीतियां और कार्यक्रम होते हैं। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को ब्रिटिश औपनिवेशवाद से मुकाबला करना था और इसलिए उसने नवोदित भारतीय राष्ट्रवाद को स्वर दिया। भगतसिंह समाजवादी राज्य की स्थापना करना चाहते थे और उन्होंने हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन की स्थापना की। अम्बेडकर ने वंचित वर्गों के श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए इंडीपेन्डेन्ट लेबर पार्टी बनाई और बाद में रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया की नींव रखी। मुस्लिम श्रेष्ठि वर्ग अपना अलग राष्ट्र चाहता था और उसने मुस्लिम लीग की स्थापना की। हिन्दू श्रेष्ठि वर्ग का एक हिस्सा हिन्दू राष्ट्र का स्वप्न देखता था और इसलिए आरएसएस और हिन्दू महासभा अस्तित्व में आए। हाल के वर्षों में सोशलिस्ट पार्टियां भी अस्तित्व में आईं हैं। आप इस अर्थ में एक अलग तरह का प्रयोग है। वह अभी राजनैतिक दल का स्वरूप ग्रहण ही कर रही है और शायद उसके नेतृत्व की यह सोच होगी की आंदोलनों और आत्मावलोकन के जरिए शनैः-शनैः पार्टी की विचारधारा विकसित हो जाएगी। अब तक तो कष्मीर के मुद्दे पर पार्टी ने अपने ही नेता की बात से किनारा कर लिया है- एक ऐसी बात से जो उस सोच को प्रतिबिंबित करती है जिसके आधार पर हम भारतीय राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं। शिक्षा के मुद्दे पर आप की प्रस्तावित नीति क्षेत्रवादी है। कई गंभीर मुद्दों पर उसका दृष्टिपत्र चुप है। पार्टी के निर्माण का यह दौर चुनौतीपूर्ण है। मुख्य मुद्दा यह है कि क्या आप अपनी सतही सोच से ऊपर उठकर आर्थिक नीति, सामाजिक व लैंगिक न्याय आदि जैसे मुद्दों पर अपनी आवाज बुलंद करेगी। आप से लोगों की ढेरों अपेक्षाएं हैं। केवल समय ही बताएगा कि शुरूआती दौर की मुष्किलातों से उबरने के बाद पार्टी किस रास्ते पर आगे बढेगी।
  -राम पुनिया

एक बात

एक बात 

लोकसंघर्ष !


Posted: 25 Jan 2014 07:34 AM PST
सरकार बनाना आसान है, सरकार में बने रहना मुश्किल है; सत्ता पर कब्जा करना  आसान है, ज़िम्मेदारी के साथ जनता के लिए काम करना कठिन काम है.
आम आदमी पार्टी (आप) को देख कर ऐसा लगता है कि  वो अब किसी तरह शासन से भाग खड़ी होना चाहती  है. दिल्ली की जनता ने बड़ी आशाओं के साथ आप को जिताया था. लोगों में एक  कशा का संचार हुआ था कि जब यह पार्टी सत्ता में आएगी तो उसकी कुछ रोजमर्रा  की समस्याएं, पानी, बिजली, कीमतें, भ्रष्टाचार इत्यादि दूर  होंगीं यक आम होंगीं. इसमें कोई दो राय  नहीं है कि जनता और मध्य  वर्ग के एक हिस्से ने इस पार्टी पर बड़ा भरोसा किया था.
लेकिन केवल दो या टीन हफ्तों के अंदर ही कई भ्रम टूटने लगे हैं. आरंभ में इस पार्टी ने दिल्ली में आकर कुछ अच्छे काम करने की ओर कदम बढ़ाया थे. लेकिन अब स्थिति आ-स्पष्ट  होती जा रही है. किसीने यह नहीं सोचा तट की आप दिल्ली में सरकार बनाने की स्तिथि  में आएगी. एक ओर तो उसने कॉंग्रेस को शिकस्त दी तो दूसरी ओर मोदी का ज़ोर कम कर दिया और उनके अभियान की हवा निकल दी.
लेकिन आप को समझना चाहिए की नकारात्मक राजनीति उसे कहीं नहीं ले जाएगी.

“मैं अनार्किस्ट (अराजकतावादी) हूँ”!
आख़िर केजरीवॉल ने स्वीकार कर ही लिया कि  वे अराजकतावादी हैं. वे जिस तरह दिल्ली में सरकार चला रहे हैं, उससे इस बात की पुष्टि होती है की कि  पिछले दो या तीन हफ्तों में आप सरकार ने अराजक तरीके से ही सरकार चलाई है. हम उसका महत्व  कम नहीं करना चाहते हैं लेकिन यह याद दिलाना ज़रूरी है की शासन चलाने का यह तरीका आख़िरकार जनतंत्र  का उल्लंघन है. विकल्पा बनने के बजाए आप अपने ही बिखराव की तैयारी करती नज़र आ रही है. दिल्ली की जीत से इसे देश के कई प्रदेशों में काफ़ी समर्थन मिला था लेकिन वह टिक सकेगा की नहीं, इसमे अब शक है.
‘अराजक’ शब्द का अर्थ क्या होता है? वह जिसका राज्य से कोई समबंध ना हो! तो आप सरकार में बैठे क्यों, मंत्रिमंडल बनाया ही क्यों?! सत्ता में रहते हुए आप सत्ता में नहीं नहीं है क्या?! ये अजीबोगरीब बातें किसी भी तरह जनता या ‘आम आदमी’ के हक में नहीं है.
यह सस्ती लोकप्रियता पाने की कोशिश ही थी की अपना काम धाम छोड़कर सड़क पर बैठ जाना अपनी ज़िम्मेदारी से भागना ही है. जिस दिन से आप सत्ता में आई, वह लगातार अराजक तरीके से कम कर रही है. प्रशासन तो बेहतर बनाने के बजाए उसने दिल्ली की व्यवस्था में गड़बड़ी ही पैदा की है. पहले जनता दरबार का तमाशा किया, फिर उसे वापस लिया और कहा कि  मोबाइल से खबर करो; भ्रष्टाचारियों को पकड़ने के नाम पर स्टिंग ऑपरेशन के लिए छोटे क़ैमरौ  का बाज़ार बढ़ाया जो एक खतरनाक कदम है क्योंकि इसका पूरा दुरुपयोग हो सकता है. क्या आप सरकार को नहीं मालूम की कौन से भ्रष्ट अफ़सर वहाँ सचिवालय और अन्य सरकारी दफ़्तरों मैं बैठे हुए हैं? उनपर अभी तक कार्यवाई क्यों नहीं हुई? जाहिर है है यह सर एक दिखावा है.
बिजली और पानी के मोटरों में भारी घोटाला है और यह स्पष्ट  हो चुका है कि  जान-बूझकर ग़लत और सादे  मीटर लगाए जा रहे हैं. बड़ी कंपनियों को भारी सब्सिडी दी जा रही है. पानी के रेट्स में भारी गड़बड़ी की जा रही है और असलियत अब सामने आ रही है. यह सारे धरने और प्रदर्शन जो आप के मिनिस्टर और मुख्य मंत्री अलग  रहे हैं, उसे छिपाने के लिए हैं.
उन्हे यह जवाब देना चाहिए   कि  वे जनता के लिए व्यवस्था और प्रशासन के लिए आएँ हैं या बनी बनाई व्यवस्था को तोड़ने के लिए. 
आप मंत्रियों का दुर्व्यवहार

आप के मंत्रियों द्वारा  महिलाओं के लिए अभद्र भाषा का एक बार नहीं, बार बार प्रयोग क्या दर्शाता है?इसी   के लिए लोगों ने उन्हे चुना? यूगांडा की महिलाओं या केरल की नर्सों के लिए आप के मंत्रियों ने अत्यंत ही निन्न  स्तर पर उतर कर बातें कि और केजरीवाल ने उनका समर्थन किया! सचमुच अराजक और अनुशासनहीन सरकार साबित हो  रही है.
इतना ही नहीं, एक खबर के अनुसार दिल्ली मैं एक जगह पर शराब का ठेका जब महिलाओं ने बंद  करवाया तो आप के स्थानीय नेता ने ने मालिकों से भारी मात्रा में पैसे लेकर उसे फिर से खुलवाया! केजरीवाल क्यों चुप हैं?
सारी जनता को अपने मकान के विवाद   में कई दिनों तक फँसाए रखना कहाँ का जनतंत्र  है? क्या लोगों को और कोई काम नहीं है? अब उनके मंत्री  अच्छी से अच्छी कारों में घूम रहे हैं और उन्ही की हरकतों के कारण दिल्ली में ट्रॅफिक जाम बढ़ता जा रहा है. अब कहाँ गया आम आदमी?

आप में आंतरिक कलह

कोई भी पार्टी और राजनैतिक आंदोलन बिना विचारधारा और स्पष्ट  नीतियों के नहीं चल सकते. वह सिर्फ़ लुभावने वायदों  से नहीं आगे बढ़ सकते. आप ने अभी तक राज्य  और देश के प्रमुख सवालों पर अपनी नीतियाँ सॉफ नहीं की हैं. अर्थतंत्र , देश की नीति, विदेश नीति, भविष्य में सामाजिक और आर्थिक दिशा इतियादि नदारद है.
अब आप का आंतरिक कलह और आपस में झगड़े सामने आ रहे हैं. उसके नेता अलग अलग स्वरों में बोल रहे हैं और विवादों में फँस रहे हैं. कोई कश्मीर पर कुछ बोल रहा है, कोई महिलाओं पर अजीबोगरीब बात कर रहा है, तो कोई जनंमत-संग्रह अर्थहीन बात. उनके कुछ नेता जैसे बिन्नी खुलकर पार्टी का ही विरोध कर रहे हैं.
इस गति से यह पार्टी जल्द ही बिखराव की स्थिति नें आ जाएगी और इसने जो आशायें जगाई थीं  वे धूमिल हो जाएँगीं. अभी तक इस अप्रत्य ने एक भी मूल प्रश्न पर कोई नीति नहीं अपनाई है.
आप (आम आदमी पार्टी) के अंदर दक्षिण-पंथी, वामपंथी, मध्य  मार्गी , विचारधारा-विहीन, गैर-राजनैतिक, अराजकतावादी एत्यादि विभिन्न प्रकार के लोग और धारायें हैं. वे पार्टी को अलग- अलग दिशाओं में खींच रहे हैं. ऐसे में पूरी तरह बिखराव और दिशाहीनता का खतरा है. सबसे बड़ा नुकसान आम जनता का ही होगा. साथ ही  दक्षिण और चरम दक्षिणपंथ को ही फायदा  होगा.
साम्राज्यवाद से ख़तरा
एक और ख़तरे की ओर ध्यान दिलाना हम ज़रूरी समझते हैं. इसे नज़र अंदाज नहीं किया जाना चाहिए. बिना प्रगतिशील दिशा और उद्देश्य के कोई भी आंदोलन जनता के लिए नुकसानदेह और  ख़तरनाक साबित हो सकता है, भले ही उसके पीछे लोगों का बड़ा हिस्सा हो. हम पाठकों का ध्यान ट्यूनईशिया, ईजिप्ट (मिस्र देश), अरब के कुछ देशों जैसे लीबिया, सिरीया इत्यादि में हाल के घटनाक्रम की ओर खीचना चाहते हैं. उनकी कई माँगें सही तीन: जनतंत्र , भ्रष्टाचार के खिलाफ, नौकरशाही अत्याचार के विरुद्ध वग़ैरह.
लेकिन हुआ क्या? बिना प्रगतिशील और दिशा और विचारों के, बिना साफ सुथरी संगठित पार्टियों  के ये आंदोलन चरम दिशाहीन पार्टियों , यहाँ तक की कुछ  आतंकी संगठनों के हाथों में चले गये हैं. मिस्रा (ईजिप्ट) में मुस्लिम ब्रदरहुड आ गया है. सिरीया में विरोधी आंदोलन, जिसकी काई माँगें सही हैं, आज अल-क़ायदा के हाथ में है. बांग्लादेश और मलेशिया में चुनावों के ज़रिया राजनीति करने और जनतांत्रिक सरकार चुनने के बजाए एक चुनाव विरोधी जन आंदोलन चल रहा है.
ये सारी रुझनें ख़तरनाक हैं. इनके पीछे छिपे और खुले तौर पर अमरीकी साम्राज्यवाद सक्रिय है. मैं यह नहीं कह रहा हूँ की आप भी उसी  श्रेणी में आती है. लेकिन मैं आगाह कर देना चाहता  हूँ कि  यदि बातों को बहुत खींचा जाएगा तो उसी तरह की गड़बड़ी हो सकती है. इसका सीधा निशाना भारतिया चुनाव प्रणाली होगी और है. अच्छे और जनता के हक में कम के सही और गलत  दोनो तरीके होते हैं दोनो के नतीजे एक दूसरे के विपरीत होते हैं.
आज विदेशीसाम्राज्यवाद, ख़ासकर अमरीकी साम्राज्यवाद, इस तक में है की भारत का जनतंत्र कमजोर हो. कुछ ताकतें उसकी कठपुतली बन रही हैं. आप को इससे बचना चाहिए. जनतंतंत्र को बेहतर बनाना है, ना कि कमजोर. सड़कों पर बैठ जाने और जनता के  सवालों से भागने से समस्या  हल नहीं होती और ना ही सरकार चलती है. इससे तो समस्यायें और भी जटिल हो जाएँगी.

 गणतंत्र दिवस का अपमान

इसकी एक झलक आप और उसके नेता केजरीवाल द्वारा गणतंत्र दिवस का बड़े ही हल्के और आपत्तिजनक तरीके से मजाकिया उल्लेख करने में मिला. यह अजीब सी बात है की ये पढ़े लिखे अनुभवी नेता ऐसा कर रहे हैं. आम जनता तक हमारी आज़ादी और  गणतंत्र का सम्मान करती है. आप का यह रुख़ अत्यंत ही आपत्तिजनक और  जनतंत्र विरोधी है. इसकी निंदा की जानी चाहिए। हम आशा करते है की आप के समझदार तबके इन बातों को समझते हुए स्वयं को सुधरेंगे।राज्य और सरकार चलाना  एक गंभीर और समर्पण भरा कार्य है, कोई खेल खिलवाड़ नहीं है. यदि  वे कॉंग्रेस से बेहतर शासन देने का दावा करते हैं तो उन्हे कर के दिखाना होगा. अन्यथा दावा दंभ बन जाएगा. कॉंग्रेस ने आज़ादी के बाद देश के विकास का नेतृत्व किया, इसमे दो राय नहीं है. अन्य पार्टियों ने भी  योगदान दिया. कॉंग्रेस की कई जन-विरोधी नीतियों से वह लोक-प्रियता खो रही है. ऐसे में उससे बेहतर शासन की ज़रूरत है, ना कि  कमतर.
आशा है आने वाले  दिनों में आप सीखेगी, अन्यथा वह जल्द ही इतिहास में लुप्त हो जाएगी.
-अनिल राजिमवाले

Saturday, January 25, 2014

ADAM GAUNDVEE

अदम गौंडवी 
काजू भुने प्लेट में विह्स्की गिलास में 
उतरा है रामराज्य  विधायक निवास में 
पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत 
इतना असर है खादी के उजले लिबास में 
आजादी का ये जश्न मनाएं वे किस तरह 
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में 
पैसे से आप चाहें तो सरकार  गिरा दें 
संसद बदल गयी है यहाँ की नखास में 
जनता के पास एक ही चारा है -- बगावत 
यह बात कह रहा हूँ मैं होशो हवास में 
अदम गौंडवी 
गजल को ले चलो अब गाओं के दिलकश नजारों में 
मुसलसल फन का दम घुटता है इन अदबी इदारों में 
न इनमें वो कशिश होगी , न बू होगी , न रअनाई 
खिलेंगे बेशक फूल लॉन की लम्बी कतारों में 
अदीबो , ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ 
मुलम्मे के सिवा क्या है फलक के चाँद तारों में 
रहे मुफलिस गुजरते बेयकीनी के तजरबे से 
बदल देंगे ये महलों की रंगीनी मजारों में 
कहीं पर भुखमरी की धुप तीखी हो गयी शायद 
जो है संगीन के साये की चर्चा इश्तहारों में 

Friday, January 24, 2014

संस्कृति एक औजार

संस्कृति एक औजार

सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का मतलब है एक संस्कृति का दूसरी संस्कृति में घुसकर उसका शोषण करना। खासतौर से उस दूसरी संस्कृति का शोषण  अपने आर्थिक और राजनीतिक उद्येष्यों के लिए करना। साम्राज्यवाद का प्रत्यक्ष रुप होता है और दूसरा परोक्ष। प्रत्यक्ष रुप यह है कि आपने अपनी सैनिक शक्ति के बल पर कहीं जाकर हमला किया और कब्जा कर लिया। लेकिन आज की दुनिया में ऐेसा करना आसान नहीं रह गया है। हालांकि आज की दुनिया में भी ऐसे उदाहरण मिल जाते हैं कि अमेरिका ने इराक पर हमला किया और कब्जा कर लिया, लेकिन अमरीका की इस कार्यवाही का दुनिया भर में  विरोध भी हुआ। इसलिए साम्राज्यवाद प्रत्यक्ष रुप के अलावा परोक्ष रुप में भी आता है और तब उसका औजार होती है संस्कृति। मसलन , जब ब्रिटिष लोग शुरु-शुरु में हिंदुस्तान में आये , तो यह देखकर दंग रह गये कि यहां तो बड़ी विकसित संस्कृति है। अफ्रीका में उन्हें उतनी विकसित संस्कृति नहीं मिली थी, इसलिए वे अफ्रीका को आसानी से अपना गुलाम बना सके । मगर हिन्दुस्तान को गुलाम बनाने में उन्हें काफी बक्त लगा। उनहें खुद का ही यह बात समझने में वक्त लगा  कि  वे हिन्दुस्तान को गुलाम बना सकते हैं, जहां की संस्कृति उनकी संस्कृति से ज्यादा विकसित है।
इसलिए उन्होंने यहां की संस्कृति में घुसपैठ करना शुरु किया। उन्होंने हम लोगों को यह समझााना शुरु  किया कि तुम तो आध्यात्मिक लोग हो , तुम्हें राज-काज करना आता ही नहीं, हम भौतिकवादी हैं, दुनियादार लोग हैं, हमें राज करना आता आता है। इसलिए तुम अपनी आध्यात्मिक साधना करो ,राज-काज हमें करने दो। पूर्व की संस्कृति अध्यात्मवादी है और पश्चिम की संस्कृति भौतिकवादी, यह उन्हीं का झूठा प्रचार था , जिसे हममें से बहुतों ने सच समझ लिया और आज तक भी सच समझते हैं।
लेकिन 1857 में उन्होंने देख लिया कि यहां के लोग उनकी बातों में आने वाले नहीं हैं । इसलिए उन्होंने दूसरा तरीका अपनाया। एक तरफ तो उन्होंने अपनी सैनिक शक्ति से उस विद्रोह को कुचला और दूसरी तरफ हिन्दुस्तानियों को यह समझाना शुरु  किया कि तुम लोग असभ्य हो, पिछड़े हुए हो , तुम्हारे पास कोई सभ्यता-संस्कृति नहीं है और हम तुमसे श्रेश्ठ हैं,हम एक आधुनिक संस्कृति लेकर आये हैं। कई इतिहासकारों ने ब्रिटिष साम्राज्यवाद के बारे लिखते हुए यह कहा है- जैसे मृदुला मुखर्जी ने कहा है,विपिन चंद्र ने कहा है- कि ब्रिटिश  लोगों ने 1857 के बाद हमें हर तरह से यह समझााना शुरु  किया कि एक तरफ तो हम बहुत ताकतवर हैं, बहुत बड़ी सैनिक शक्ति हैं,हम दुनिया कि इतनी बड़ी ताकत हैं कि हमारे राज्य में सूरज नहीं डूबता, और दूसरी तरफ यह समझाना शुरु   किया की हम तुम्हारे लिए बहुत अच्छे हैं, हम तुम्हारे लिए आधुनिकता लेकर आये हैं । तुम हिंदू और मुसलमान सब अन्धकार में पड़े हुए हो । हम तुम्हारे लिए रोशनी लेकर आये हैं। तुम्हारी संस्कृति बहुत घटिया संस्कृति है और उसके लिए हम एक वरदान की तरह हैं। ब्रिटिश  साम्राज्यवाद के लिए ये दोनों बातें जरुरी थीं- अगर तुम हिंदुस्तानी लोग समझााने बुझाने से यह मान जाओ कि ब्रिटिश  शासन अच्छा है, तो ठीक, नहीं तुम्हें ठीक करने के लिए हमारे पास सैन्य शक्ति है। लेकिन तुम हमारी बातें मान लोगे  तो हमारा काम आसान हो जाएगा। यही है सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का परोक्ष रुप। लेकिन साम्राज्यवाद के लिए अपने प्रत्यक्ष और परोक्ष  रुप दोनों ही जरुरी होते हैं । इसलिए संस्कृति हमेशा  ही साम्राज्यवाद की एक प्रमुख योजना होती है।

Thursday, January 23, 2014

एक बात

एक बात
रातों की बेचैनी दिन की थकन ने साथ निभाया
यादों के फटे हुए इस कफ़न  ने साथ निभाया
बरसों से जल रहा हूँ इस गरीबी की आग में
ना काबिले जीकर इस जलन ने साथ निभाया ॥
गरीब के लिए तो साँस भी लेना मुहाल है यारो
जीने की बारीक सी इस लगन ने साथ निभाया ॥
आँखों में बस गयी है मेरे उसकी भोली तस्वीर
मिलेगी कभी तो की इस तपन ने साथ निभाया ॥
वतन की वफ़ा और उसका प्यार ना छोड़ पाया
मेरे मिजाज मेरे इस चलन ने साथ निभाया ॥

Wednesday, January 22, 2014

अपने अंदर झाँक कर देखना बंद कर दिया दुनिया ने 
तेज गति से चलना और उड़ना सीख लिया दुनिया ने 
हवस और प्यार का अंतर मिटाते जा रहे हर पल क्यों 
इंसान को इंसान नहीं मानते  ये क्या किया दुनिया ने 

beer's shared items

Will fail Fighting and not surrendering

I will rather die standing up, than live life on my knees:

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