Friday, July 1, 2022

अग्निपथ विरोध 24/6/22

 *ध्यान रहें 24/6/22 को लाखों बच्चों का JEE का पेपर हैं,उनको सैंटरों तक पहुंचने में रूकावटें नहीं सहयोग करना हैं। इसलिए कोई बस,ट्रैन, व्यक्तिगत साधन कहीं भी नहीं रोका जाएगा।*

         अग्निपथ के शांतिपूर्ण विरोध को सर्व कर्मचारी संघ हरियाणा व हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ का पूरजोर समर्थन
24/6/22 को सभी नजदीकी,टोल नाकों, तहसील, सबडिवीजन व डीसी दफ्तरों पर संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा अग्निपथ के विरोध में होने वाले विरोध प्रदर्शनों में बढ़ चढ़ कर भाग लेंगे सभी शिक्षक व कर्मचारी।
     सरकार चाहती है कि युवा बहकावे में तोड़फोड़ करें, आगजनी करें, संपत्ति को नुक्सान करें....ऐसे मौकों पर पुलिस मुक दर्शक बनी खड़ी रहेगी ताकि युवाओं की जायज मांगों के विरोध में जनभावनाओं को भड़काया जा सके। प्राइवेटाइजेशन व उदारीकरण करने वाले सरकारें चाहती हैं कि संघर्षरत लोगों व जनता को आपस में लडा़कर, कार्पोरेट की लूट जारी रखी जाए। परन्तु अब बेरोजगार युवा, मजदूर, किसान ,शिक्षक व कर्मचारी सरकार की इस चाल को समझते हैं। अग्निपथ को वापिस लेने तक आन्दोलन चलेगा, परन्तु शांतिपूर्ण तरीके से,किसान आंदोलन की तरह सभी का सहयोग लेते हुए चलेगा। मुसाफिरों की सहायता के लिए टोल नाकों पर विद्यार्थियों के लिए फ्री टोल की सुविधाएं करवातें हुए प्रदर्शन किते जाएंगे।
  ध्यान रहे अपने घर के काम व ड्यूटी करते हुए,युवा, दुकानदार, मजदूर किसान,शिक्षक व कर्मचारी जहां भी हो, वहीं अपने नजदीकी प्रदर्शन में जरूर से जरूर शामिल हो। अग्निपथ अकेले फौज के प्राइवेटाइजेशन का,फौज के पद व पैंशन के प्राइवेटाइजेशन का मसला,या युवाओं की मान सम्मान व रोज़ी रोटी का ही मसला नहीं है, बल्कि यह देश की सुरक्षा व संप्रभुता का भी मसला हैं। अंबानी, अडानी, रामदेव,भाजपा व RSS का इतना दुस्साहस हमारी नासमझी,फूटप्रस्ती,मौन रहने व जुल्म सहने के कारण ही हो पाया है।गले तक पानी इसलिए आया क्योंकि

हम नोटबंदी के समय चुप रहे,जिससे 3 लाख कंपनियों के बंद होने से 2 करोड़ रोजगार छीन गये

गलत GST के समय चुप रहे

बिना तैयारी के हत्यारे लाकडाऊन पर चुप रहे

महंगाई पर चुप रहें

कश्मीर के असंवैधानिक बंटवारे पर चुप रहे।

असंवैधानिक व अमानवीय CAA,NRC पर चुप रहे।

इस तरह तानाशाही बढ़ती गई,हम नहीं समझे
काली शिक्षा नीति पर चुप्पी,रोड सेफ्टी बिल पर चुप्पी,बिजली संशोधन विधेयक पर मौन, रहे और भविष्य के लिए  शिक्षा,बिजली व परिवहन आम जरूरत की चीजें न रह कर सिर्फ अमीरों के लिए आरक्षण का रास्ता बन गया।
अब नई स्वास्थ्य नीति ने इलाज महंगा कर आमजन को मरने के लिए छोड़ दिया है।
हम चुप रहें और मर्ज व दर्द बढ़ता गया।लुटेरी सरकार अपने मालिकों को देश की धन दौलत व सभी सरकारी विभाग बेचती चलीं गईं।साथ ही बिकते चले आते युवाओं के सपने,उनका मान सम्मान, मानवीय गरीमा व प्रतिष्ठा।बिकती चली गई पक्की नौकरी,पैंशन, गुजारें लायक वेतन व सेवाशर्त। परन्तु हम फिर भी चुप रहे,मौन रहे,जुल्म सहते रहे।हमारी यहीं सहने की शक्ति दुश्मन की लूट व तानाशाही की ताकत बनती चली गई।

इसी बढ़ती ताकत के दम पर लुटेरी भाजपा की सरकार ने RSS की मंशानुरूप हमारी आंतरिक सुरक्षा यानि पुलिस के लगभग 50कामो को प्राइवेट कर दिया, पुलिस की नौकरी भी पार्ट टाइम,10-12 हजार की,बिना पैंशन की कर दी,,, हम तब भी चुप रहे।पर कब तक... सांस रोके बैठें रहे युवा,आखिर कब तक

जब फौज के गोले बारूद, हथियार बनाने की आयुध कंपनियों को भी देशी विदेशी कार्पोरेट को बेचकर देश की सुरक्षा में बड़ी सेंध लगाई,हम तब भी चुप रहे... हमारी चुप्पी ही हमारी बर्बादी का कारण बनती चलीं गईं।
परन्तु अब और नहीं।अब फैंसला होकर रहेगा।यह आर पार की लड़ाई होनी चाहिए।
*अब युवा समझ गया है कि भाजपा व RSS उनके हिस्से के रोजगार को पूंजीपतियों की पूंजी को रोजगार देकर भरना चाहती है।यह लड़ाई 166 घर बनाम 1.1 करोड़ जनता की है।*

अग्निपथ इस आक्रोश का एकमात्र कारण नहीं है।समाज का हर तबका तंग व बेहाल है। अग्निपथ तो एक आखिरी व तत्कालीन कारण है गुस्से के फ़ूटने का।
4 साल बाद ना तो युवा भाजपा के दफ्तरों पर और ना ही कार्पोरेट की गुलामी करेगा।वह शान से देश की सेवा भी करेगा और परिवार की परवरिश भी।ये दोनों काम एक दूसरे से ऐसे गुंथे हुए हैं कि अलग अलग किते ही नहीं जा सकते हैं। परिवार की परवरिश की चिन्ता में देश सेवा नहीं हो सकती और देश की सुरक्षा- सेवा के बिना परिवार की परवरिश नहीं हो सकती हैं।
इस गलत स्कीम को लागू करने के लिए सरकार द्वारा सेना प्रमुखों से भावनात्मक ब्लैकमेलिंग तक का सहारा लेना पड़ रहा है।
      ना तो ये देश कार्पोरेट का हैं,ना ही RSS का इस देश की आजादी में कोई योगदान हैं। इसलिए इसकी नीतियों के निर्धारण में भी इनकी भूमिका सहन नहीं करेगा आज का युवा। सावरकर नहीं भगतसिंह के सपनों का देश बनाने के लिए आज युवा जाग गया है।वह पढ़ेगा भी और कढ़ेगा भी।पर देशहित में पुरा काम भी करेगा और काम के पुरे दाम भी लेगा।देश का मान सम्मान व स्वतंत्रता और युवा का मान सम्मान व रोजगार अलग अलग चीजें नहीं है, बल्कि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।एक दूसरे के बिना दोनों अधूरे हैं।
तलवें चाट, चाटुकार,58 साल तक की नौकरी कर रिटायर्ड हुए,2-3 पैंशन लेने वाले लोगों के अग्निपथ के समर्थन की साज़िश उनकी कथनी व करनी के अंतर से समझी जा सकती हैं। कार्पोरेट का समर्थन कहना ही ग़लत हैं क्योंकि उनके व RSS के इशारों पर तो यह सब देश विरोधी काम हो ही रहे हैं।
     अपील है कि जायज मुद्दों के संघर्ष को साम्प्रदायिक ,दंगाई, आतंकी रंग देने वालों से बचाएं।जनता का आन्दोलन -जनता का सहयोग लेने देने से बनेगा,जनता को तंग करने से नहीं।अनजाने में अपनी उर्जा सरकार की इच्छा अनुसार देश की संपत्ति को नष्ट करने में न लगाएं।
      देश के विकास यानि सबके साथ वह सबके विकास की पूर्व शर्त हैं, कार्पोरेट व RSS भाजपा का विनाश।इनके हर रंग रूप का विनाश।

महत्व पूर्ण दिवस

 






महत्व पूर्ण दिवस
31 जुलाई
मुंशी प्रेमचंद
शहीद उधम सिंह  शहीदी दिवस
6 अगस्त
हिरोशिमा शांति दिवस
8 अगस्त 1942
भारत छोड़ो आंदोलन
9 अगस्त
नागाशाकी शांति दिवस
5 सितंबर
राष्ट्रीय अध्यापक दिवस
(सर्वपल्ली राधाकृष्ण का जन्म दिन )
8 सितंबर
अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस
23 सितम्बर
हरियाणा वीर शहीदी दिवस
(राव तुलाराम शहीदी दिवस)
27 सितम्बर
शहीद भगत सिंह जयंती
1 अक्टूबर
रक्तदान दिवस
2 अक्टूबर
महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री जयंती
5 अक्टूबर
अंतरराष्ट्रीय अध्यापक दिवस
8 अक्टूबर
वायु सेना दिवस
24 अक्टूबर 1945
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना
1 नवम्बर 1966
हरियाणा राज्य का गठन
4 नवम्बर 1966
यूनेस्को की स्थापना
14 नवम्बर
बाल दिवस
(जवाहर लाल नेहरू का जन्म दिन )
16 नवम्बर
करतार सिंह सराभा व 6 अन्य क्रांतिकारियों के शहीदी दिवस
26 नवम्बर 1949
भारत का संविधान पारित
3 दिसम्बर
खुदीराम बोस जयंती
4 दिसम्बर
जल सेना दिवस
7 दिसम्बर
झंडा दिवस
10 दिसम्बर
मानव अधिकार दिवस
19 दिसम्बर
राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां व रोशन सिंह शहीदी दिवस
22 दिसम्बर
गणित दिवस
( श्री निवास रामानुज का जन्म दिन )
23 दिसम्बर
किसान दिवस
(चौ. चरण सिंह का जन्म दिन)
25 दिसम्बर
उपभोक्ता दिवस और क्रिसमिस दिवस
26 दिसम्बर
शहीद उधम सिंह जयंती

विश्व सामाजिक मंच

 आज से 18 साल पहले जनवरी 2004 को मुम्बई में विश्व सामाजिक मंच का 6 दिवसीय एक सम्मेलन हुआ जिसमें दुनिया 180 देशों के करीब 2 लाख लोग प्रतिनिधि थे, जिसका उद्देश्य था "वैकल्पिक दुनिया संभव है" आओ मिलकर प्रयास करें। कोई ताकतवर देश या समुदाय छोटे देश या समुदाय पर हमला ना कर सके। बेहतर मानवीय प्रेम की दुनिया बनाने की दिशा में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता हिस्सेदारी कर रहे थे। उसमें करीब दो हजार सेमिनार आयोजित किए गए जो सामानतर चल रहे थे जिसमें भाषा अनुवादक की सुविधा उपलब्ध थी, उसमें हमें शामिल होने का मौका मिला था। सोचा शेयर कर दूं।

Malnutrition in India

 The vicious cycle of malnutrition in India


Today’s India looks forward to a healthy India, which is directly linked to people’s proper nutrition. Proper nutrition can lead to a healthy present and future generation. The people of India account for one of the most powerful as well as the most incredible resource for the country itself considering women and children as the prior groups. But the vicious cycle of not getting proper nutrition is still a concern as half of the population is deprived of what one can call proper nutrition. An undernourished child limits its performance in studies as well as employment opportunities. This whole process in a way creates a barrier in the development process of the country.

With time there have been signs of progress in overcoming the serious issue of malnutrition among women as well as children, but the improvement has been quite humble. This is despite the implementation of various government programs. The National Family Health Survey (NFHS-5) indicated the marginal improvement in different nutrition indicators. The reason for very slow progressing rate is that children in several states are still malnourished & undernourished.

The slow pace of growth

According to the report of NFHS-5, at the national level, child nutrition indices have improved slightly, with stunting falling from 38 percent to 36 percent (stunting is defined as low height-for-age), wasting from 21 percent to 19 percent (wasting is defined as low weight-for-height), and underweight falling from 36 percent to 32 percent.

In all phase-II States/UTs, child nutrition has improved, but the improvement is not considered because drastic improvements in these indicators are improbable in a short period of time. Overweight children have increased from 2.1 percent to 3.4 percent of children. India also has a widespread presence of anaemia.

In all Indian states, the incidence of anaemia in children under the age of five has increased (from 58.6 to 67 percent), women (53.1 to 57 percent), and males (22.7 to 25 percent) (20 percent -40 percent incidence is considered moderate). All states are in the “severe” category, with the



exception of Kerala (39.4%).

These situations remain serious and it is very vital to discuss them in a routine manner as these undernourished conditions of the people in India create a minus point in the overall development of the country as well as its national growth. While these situations need a very prominent discussion for a favorable outcome, there always comes the need for greater investment in the nutrition section regarding the women and children of the country. A need for channeled financial commitments is currently the most important thing through government programs and schemes.

Grass root level initiatives are required

India must look forward to a more result-oriented as well as innovative approach to different nutrition programs.

It is also very important that the parliamentarians shall begin monitoring the needs and awareness of the particular situation, moreover, the raising of awareness and monitoring of the situation must be engaged at the local level to create an engagement with the local people and find solutions according to the kind of challenges they face regarding the problem of malnutrition.

First molding up public opinions and implementing programs from the grass-root level can then be recreated at the district as well as national level. Education plays a vital role for every individual; a basic education will lead to a sense of awareness. Taking initiative at a personal level will bring about a great change in the nation. As the idea of sustainable development revolves around the process of a promising future for the future generation, in the same way, today raising awareness about proper nutrition patterns and regular monitoring of the programs regarding malnutrition can lead to a healthy and nourished future for the children and women of the country.

Shalini Jena




Global Education Crisis

 Global Education Crisis, 78.2 Million Children Are Out Of School


June 26, 2022Barsha Bohidar

“Education is the most powerful weapon you can use to change the world”- Nelson Mandela

Nelson Mandela, the former President of South Africa and one of the most prominent leaders of the Anti-Apartheid Movement once said, “Education is the most powerful weapon you can use to change the world” which indeed is true as it makes people aware of their potential and helps them to nourish their talents and become productive. It gives us a better idea of the world around us, helps to make decisions in life in a more effective way and perform our duties properly.

Quality Education for everyone is one of the 17 sustainable development goals of the United Nations. As per the data available on the website of the UN, about 260 million children were still out of school in 2018, globally.

Now, according to the Education Cannot Wait (ECW) report by the UN, about 222 million school aged children are affected globally due to protracted crisis. These children are in need of educational support.

About 78.2 million children are out of school, the majority of which are girls- around 54%, followed by children with functional disabilities-17% and children who were forcibly displaced-16%; while 119.6 million students have not achieved proficiency in reading or mathematics despite going to school.

This report also highlighted the prime causes of such alarming numbers of children in need of educational support are armed conflicts, forced displacements, climate induced disasters and protracted crisis.

To respond to this Global Education crisis, the ECW and strategic partners launched the #222milliondreams resource mobilization campaign in Geneva on June 21, 2022.

According to the report, ECW may consider to prioritize investments more explicitly in countries with the highest number of out of school children. The ECW has also called up on donors, various philanthropic foundations, the multi-millionaires and billionaires around the world to donate more in order to invest more resources to deliver quality education to the affected children.

Barsha Bohidar

अग्निपथ का विरोध क्यों

 *अग्निपथ का विरोध क्यों जरूरी है?*

मोदी ने 2014 में दिल्ली पर कब्जा करने की अपनी खोज में सशस्त्र बलों के कर्मियों को वन-रैंक-वन-पेंशन (ओआरओपी) का वादा किया था। आठ साल बाद उन्होंने केवल नो-रैंक-नो-पेंशन (एनआरएनपी) दिया है।
उन्होंने 4 साल की छोटी अवधि के लिए 46,000 सैनिकों की भर्ती की 'अग्निपथ' योजना शुरू करके भारतीय सशस्त्र बलों को एक और बड़ा झटका दिया है।
   संस्थाओं के गले से उतारी मनमौजी नीति ने सशस्त्र बलों के नेतृत्व को स्तब्ध कर दिया है और ग्रामीण भारत में सदमे की लहरें भेज दी हैं।
नौकरी की सुरक्षा और सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन वापस लेकर, पहले भर्ती रद्द करने और फिर सैन्य सेवा को अनाकर्षक बनाने के लिए युवा सरकार की मनमानी पर संघर्ष का हथियार उठा रहे हैं।
    सेना 2015 से हर साल औसतन लगभग 50,000 पुरुषों की भर्ती कर रही है। सेना में भर्ती की प्रक्रिया को 2020 में कोविड -19 महामारी के बहाने रोक दिया गया था। हालांकि, इस अवधि के दौरान नौसेना और वायु सेना ने नाविकों और वायुसैनिकों को भर्ती करना जारी रखा।
    चालू वर्ष में, अग्निपथ योजना के तहत केवल 40,000 सेना में शामिल होंगे, जिससे यूनिट स्तर पर भारी कमी होगी। वायु सेना और भारतीय नौसेना को 3,000-3,000 अग्निशामक मिलेंगे।
      "हम सबसे अच्छी तरह जानते हैं और आप नहीं समझते" 'दृष्टिकोण', मोदी सरकार की एक बानगी एक बार फिर एक अनिश्चित नीति के बचाव में प्रदर्शित होती है। विमुद्रीकरण, जीएसटी और कृषि कानूनों जैसी एकतरफा नीतियों की घोषणा के बाद प्रतिक्रिया से निपटने के लिए एक समान दृष्टिकोण अपनाया गया था।
            इस तरह के दुस्साहस और अहंकार ने पहले छोटे और मध्यम स्तर के क्षेत्रों में नौकरियों को नष्ट कर दिया और अब मोदी सशस्त्र बलों को नष्ट करने पर आमादा हैं, जो आज देश में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाली संस्था है। सरकार बड़े पैमाने पर मीडिया अभियानों के माध्यम से इस योजना को बेचने की कोशिश कर रही है, लेकिन देश के बेरोजगार युवा इस योजना को आगे बढ़ाने के सरकार के मन्तव्यों और इन इरादों के बारे में आश्वस्त नहीं हैं।
       सरकार में पूरी तरह से भ्रम की स्थिति है क्योंकि देश भर के युवा, उच्च मुद्रास्फीति और बढ़ती बेरोजगारी के युग में नौकरियों और सामाजिक सुरक्षा प्रावधानों को चूसने के सरकार के फैसले के विरोध में सड़कों पर हैं।
सरकार का एक हाथ दूसरे का विरोध करने में लगा हुआ है। योजना को बेचने के लिए सरकारी पीआर मशीनरी द्वारा कुछ सेवारत एडमिरल, जनरल और एयर मार्शल तैनात किए गए हैं, लेकिन अग्निपथ के बचाव में उनके द्वारा दिए गए तर्क सबसे कमजोर और अतार्किक हैं।
        एक सेवारत जनरल एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहते हैं कि सशस्त्र बलों का आकार कम करना एक लंबे समय से लंबित सुधार है और सेवा 1984 से एक दुबला प्रोफ़ाइल पर विचार कर रही है। जबकि रक्षा मंत्रालय (MoD) का कहना है कि इस योजना के तहत भर्ती किए जाने वाले स्वयंसेवकों की संख्या पहले चार वर्षों में 46,000 स्वयंसेवकों से बढ़कर पांचवें वर्ष में 90,000 स्वयंसेवकों की और छठे वर्ष में 125,000 स्वयंसेवको की हो जाएगी।
     कुछ का कहना है कि इससे सशस्त्र बलों को पैसे बचाने में मदद मिलेगी जिसका आधुनिकीकरण के लिए बेहतर उपयोग किया जा सकता है, पश्चिमी सैन्य-औद्योगिक परिसर और देश में नवजात निजी रक्षा उद्योग के खजाने को मोटा करने के लिए एक व्यंजना भी है। प्रतिष्ठान के अन्य लोगों का दावा है कि यह योजना वेतन और पेंशन बिलों को कम करने के लिए नहीं बनाई गई है, यह केवल एक जवान की औसत आयु 32 से 26 तक कम करके बलों को युवा दिखाने के लिए है। यह एक विशिष्ट तर्क है क्योंकि 32 वर्ष - वृद्ध व्यक्ति सैन्य कर्तव्यों का पालन करने के लिए किसी भी तरह की कल्पना के हिसाब से  अयोग्य नहीं है।
      विराट कोहली 33 साल के हैं और अपनी फिटनेस के चरम पर हैं। एक सैन्य प्रशिक्षण कार्यक्रम और दिनचर्या जो एक सैनिक को उसके शुरुआती 30 के दशक में फिट नहीं रख सकती, उसे खत्म करने की जरूरत है।
       सशस्त्र बलों के सामने एक फास्ट ट्रैक संरचना के तहत प्रशिक्षित नाविकों, वायुसैनिकों और जवानों का इष्टतम उपयोग है, जो "रैपिडेक्स इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स" के समान है। कई लोगों ने आशंका व्यक्त की है कि चुनौतीपूर्ण माहौल में 'एग्निवीरज' एक ऑपरेशनल खतरा साबित हो सकता है।
इकाइयों और संरचनाओं के कमांडिंग अधिकारी अत्याधुनिक उपकरणों को बनाए रखने और संचालित करने के लिए 'अग्निवर' का उपयोग करने के लिए ही  सावधान रहेंगे। इसलिए, महत्वपूर्ण कार्यों के लिए या यहां तक ​​कि महत्वपूर्ण पदों पर काम करने के लिए 'अग्निवर' का उपयोग सीमित रहेगा।
        पूरी संभावना है कि अग्निवीर सेना में विविध कार्य करेंगे। उदाहरण के लिए, एक युद्धपोत में, 4 साल के कार्यकाल के दौरान (जिसमें से एक वर्ष वार्षिक अवकाश में जाता है) एक अग्निवीर को लुकआउट कर्तव्यों के लिए, या डेक की पेंटिंग और चिपिंग जैसे बुनियादी सीमैनशिप कर्तव्यों के लिए सबसे अच्छा नियोजित किया जाएगा। जहाज का कप्तान एक अग्निवीर को जहाज का पहिया सौंपने से पहले दो बार सोचेगा।
       इस तरह की आशंकाओं से न केवल एक युवा व्यक्ति के पेशेवर विकास में बाधा आएगी बल्कि युद्धपोत या हवाई जहाज के संचालन में लगे प्रशिक्षित जनशक्ति पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ेगा
    अग्निपथ' के रक्षकों का तर्क है कि चूंकि युद्ध की प्रकृति बदल रही है और ड्रोन और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) जैसी विघटनकारी तकनीकों का उपयोग तेजी से सेवाओं में किया जा रहा है, इसलिए एक छोटा टूथ-टू-टेल अनुपात होना अनिवार्य है .
     दूसरी ओर, सरकार दावा कर रही है कि चार साल पूरे करने के बाद अग्निवीरों को या तो केंद्रीय अर्धसैनिक बलों या बड़े उद्योग में समाहित किया जाएगा। यदि नए युग की प्रौद्योगिकियां सेना में नौकरियों को कम करने जा रही हैं तो कोई उनसे नागरिक क्षेत्र में बढ़ने की उम्मीद कैसे कर सकता है?
    अग्निपथ सेना के भीतर इकाई सामंजस्य पर भी प्रहार है। एक यूनिट में अब जवानों के दो सेट होंगे, एक पेंशन के साथ और दूसरा बिना इसके। 15 साल की सेवा करने वाले जवान को साल में 90 दिन का अवकाश मिलेगा, वहीं अग्निवीर को सिर्फ 30 दिन का वार्षिक अवकाश मिलेगा.
    अधिकारी रैंक (पीबीओआर) से नीचे का व्यक्ति मूल रूप से गरीब ग्रामीण पृष्ठभूमि से आता है। 15 साल की पेंशन योग्य सेवा ने न केवल जवान की मदद की बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी बहुत योगदान दिया। एक PBOR के बच्चे को सशस्त्र बलों द्वारा चलाए जा रहे स्कूलों और पेशेवर कॉलेजों में सबसे अच्छी शहरी शिक्षा सुविधाएं मिलीं, जिससे गरीब परिवारों के लिए सामाजिक गतिशीलता सुनिश्चित हुई।
    सशस्त्र बलों के समुदाय को विभाजित करने का सरकार का निर्णय और उसका समर्थन वापस लेना ग्रामीण भारत के लिए लंबे समय में सामाजिक संरचनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
      सरकार किसके दबाव में 'अग्निवीर' पेश कर रही है? यदि दबाव वित्तीय है तो सरकार राज्य के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान को लक्षित करने से पहले कई क्षेत्रों में खर्च कम कर सकती है।
     लेकिन मोदी सरकार का ऐसा कोई झुकाव नहीं है क्योंकि यह उन अमीर वर्गों का प्रतिनिधित्व करती है जो पेंशन और सामाजिक सुरक्षा के विचार से नफरत करते हैं। मोदी न केवल सामाजिक सुरक्षा पर सीधे हमले के लिए प्रतिबद्ध हैं, बल्कि व्यापक निजीकरण के एजेंडे के लिए भी प्रतिबद्ध हैं, जो राष्ट्रीय ताकतों के लिए मौत की घंटी लगता है।
    अधिकांश भारतीयों को सामाजिक सुरक्षा पसंद है, अमीरों को नहीं। और अमीर वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाली मोदी सरकार पेंशन से नफरत करती है। मोदी की नीतियां निजी निगमों को न केवल पूंजीगत बजट बल्कि रक्षा राजस्व बजट का एक बड़ा हिस्सा उपभोग करने के द्वारा भारतीय राज्य को कमजोर कर रही हैं।
  यह उसी विचार का फल है जिसके लिए मोदी लक्ष्य बना रहे हैं। और यह पूर्व नियोजित डिजाइन आज सशस्त्र बलों द्वारा अनुभव किए गए सामूहिक आघात का कारण है।
   

Agni path yojna

 



MODI promised one-rank-one-pension (OROP) to the armed forces personnel in his quest to capture Delhi in 2014. After  eight years all he has ended up giving is no-rank-no-pension (NRNP). He has administered another rude shock to the Indian armed forces by launching the ‘Agnipath’ scheme of recruiting  46,000 soldiers for a short period of 4 years.

The maverick policy thrust down the institution's throat has left the armed forces leadership in a state of stupor and sent shock waves through rural India. The youth are up in arms at the government's highhandedness in first cancelling the recruitment and then making the military service unattractive, by withdrawing the job security and post retirement pensions. 

On an average the army has been recruiting around 50,000 men every year since 2015. The process of recruitment in the army was expediently stopped in 2020 using the pretext of Covid-19 pandemic. However, during this period the naval and air force continued to enlist sailors and airmen.  In the current year, under the Agnipath scheme only 40,000 would join the Army, leading to massive shortfalls at the unit level. The Air Force and Indian Navy will get 3,000 Agniveers each.

“We know best and you don’t understand’ approach, a hallmark of the Modi government is once again displayed in defence of an indefensible policy. A similar approach was adopted to tackle the backlash after announcing the lopsided policies like the demonetisation, GST and farm laws.

Such audacity and arrogance first destroyed jobs in the small and medium scale sectors and now Modi is hell bent on destroying the armed forces, the best performing institution in the country today.

The government is trying to hard-sell the scheme through massive media campaigns but the unemployed youth of the country remains unconvinced about its motives and intentions in pushing the scheme.

There is utter confusion in the government as the youth, across the country, are out on streets protesting against the government's decision to suck jobs and social security provisions in an era of high inflation and rising unemployment.  

One arm of the government is busy contradicting the other. A few serving admirals, generals and air marshals have been deployed by the government PR machinery to sell the scheme, but the arguments put forth by them in defence of Agnipath are at best flimsy and illogical. 

A serving general says, in a press conference, that downsizing the armed forces is a long pending reform and the service have been contemplating a leaner profile since 1984.

While the ministry of defence (MoD) says that the number of volunteers being recruited under the scheme would rise from 46,000 volunteers in each of the first four years, to 90,000 volunteers in the fifth year, and to 125,000 in the sixth year.

Some say that this would help the armed forces save money which could be better utilised for modernisation, a euphemism for fattening the coffers of western military-industrial complex and the new-born private defence industry in the country. 

Others in the establishment claim that the scheme is not designed to prune pay and pension bills, it is only to make the forces look youthful by reducing the average age of a jawan from 32 to 26. This is a specious argument because a 32-year-old person is by no stretch of imagination unfit to perform military duties.
Virat Kohli is 33-years-old and is at the peak of his fitness. A military training program and routine that cannot keep a soldier fit in his/her early 30s needs to be scrapped.

The challenge before the armed forces is optimal utilisation of sailors, airmen and jawans trained under a fast-track structure, something akin to the “Rapidex English speaking course”.
Many have expressed the fear that  ‘Agniveers’ could prove to be an operational hazard in a challenging environment.

The commanding officers of the units and formations would be wary of using the ‘Agniveers’ to maintain and operate the state-of the art equipment. Therefore, ‘Agniveers’ utilisation for critical operations or even for manning critical posts will remain limited.

In all likelihood, the Agniveers would end up doing sundry jobs in the forces. For example, in a warship, throughout the 4-year tenure (of which one year would go in annual leave) an Agniveer would at best be employed for lookout duties, or for basic seamanship duties like painting and chipping of the deck. The captain of the ship would think twice before handing over the ship’s wheel to an Agniveer.

Such apprehensions will not only hamper the professional growth of a young person but would also put extra strain on the trained manpower engaged in operating the warship or an airplane.

The defenders of ‘Agnipath’ argue that since the nature of warfare is changing and disruptive technologies like drones and Internet of things (IoT) are going to be increasingly used in the services therefore it is imperative to have a small teeth-to-tail ratio.
On the other hand, the government is claiming that after completing four years the Agniveers would either be absorbed in central para military forces or big industry. If new age technologies are going to reduce jobs in the military then how does one expect them to grow in the civilian sector? 

Agnipath is also an assault on unit cohesion within the army. A unit will now have two sets of jawans one with pension and the other without it. The jawan serving for 15-years will enjoy 90-days leave in a year, on the other hand, Angniveer would be entitled to just 30-days of annual leave.

The person below the officer rank (PBORs) basically hail from poor rural backgrounds. The 15-year pensionable service not only helped the jawan but also contributed immensely to the rural economy. A PBOR’s child got the best urban education facilities in the schools and professional colleges run by the armed forces, which in turn ensured upward social mobility for poor families.

The government’s decision to splinter the armed forces community  and its withdrawal of support

to rural India will adversely impact the social structures in the long run.

Under whose pressure is the government introducing Agniveers’? If the pressure is financial the government could reduce expenditure in many areas before targeting the most revered institution of the state.
But the Modi government has no such inclination because it represents the rich classes that hate pensions and the very idea of social security. Modi is not just committed to a frontal attack on social security but to a broader privatisation agenda that sounds the death knell for the national forces.   

Most Indians love social security, the rich don’t. And the Modi government that represents the rich classes hates pensions. Modi's policies are enfeebling the Indian State by making private corporations consume not only  the capital budget but also a large chunk of the defence revenue budget.
It is the fruition of this very idea for which Modi is aiming. And this premeditated design is the cause of the collective trauma experienced by the armed forces today.

 

पर्यावरण संरक्षण

 हमारा परिवार.

15जुलाई -15 अगस्त.
(पर्यावरण संरक्षण मास)
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पेड़ो के बारे मे महत्वपूर्ण जानकारी.

☄️पेड़ धरती पर सबसे पुरानें living organism हैं, और ये कभी भी ज्यादा उम्र की वजह से नही मरते.

☄️हर साल 5 अऱब पेड़ लगाए जा रहे है लेकिन हर साल 10 अऱब पेड़ काटे भी जा रहे हैं.

☄️एक पेड़  दिन में इतनी ऑक्सीजन देता है कि 4 आदमी जिंदा रह सकें.

☄️देशों की बात करें, तो दुनिया में सबसे ज्यादा पेड़ रूस में है उसके बाद कनाडा में उसके बाद ब्राज़ील में फिर अमेरिका में और उसके बाद भारत में केवल 35 अऱब पेड़ बचे हैं.

☄️दुनिया की बात करें, तो 1 इंसान के लिए 422 पेड़ बचे है. लेकिन अगर भारत की बात करें,तो 1 हिंदुस्तानी के लिए सिर्फ 28 पेड़ बचे हैं.

☄️पेड़ो की कतार धूल-मिट्टी के स्तर को 75% तक कम कर देती है. और 50% तक शोर को कम करती हैं.

☄️एक पेड़ इतनी ठंड पैदा करता है जितनी 1 A.C 10 कमरों में 20 घंटो तक चलने पर करता है. जो इलाका पेड़ो से घिरा होता है वह दूसरे इलाकों की तुलना में 9 डिग्री ठंडा रहता हैं.

☄️पेड़ अपनी 10% खुराक मिट्टी से और 90% खुराक हवा से लेते है. एक पेड़ एक साल में लगभग 2,000 लीटर पानी धरती से चूस लेता हैं.

☄️एक एकड़ में लगे हुए पेड़ 1 साल में इतनी Co2 सोख लेते है जितनी एक कार 41,000 km चलने पर छोड़ती हैं.

☄️दुनिया की 20% oxygen अमेजन के जंगलो द्वारा पैदा की जाती हैं. ये जंगल 8 करोड़ 15लाख एकड़ में फैले हुए हैं.

☄️इंसानो की तरह पेड़ो को भी कैंसर होती है.कैंसर होने के बाद पेड़ कम ऑक्सीजन देने लगते हैं.

☄️पेड़ की जड़े बहुत नीचे तक जा सकती है. दक्षिण अफ्रिका में एक अंजीर के पेड़ की जड़े 400 फीट नीचे तक पाई गई थी.

☄️दुनिया का सबसे पुराना पेड़ स्वीडन के डलारना प्रांत में है. टीजिक्कोनाम का यह पेड़ 9,550 साल पुराना है. इसकी लंबाई करीब 13 फीट हैं.

☄️किसी एक पेड़ का नाम लेना मुश्किल है लेकिन तुलसी, पीपल, नीम और बरगद दूसरों के मुकाबले ज्यादा ऑक्सीजन पैदा करते हैं.

🙏 *इस बरसात में कम से कम एक पेड़ अवश्य लगायें*🙏

*हमारा  परिवार*
आएँ …..हम सब भी पर्यावरण संरक्षण में अपना योगदान अर्पित करें.

*जय प्रकृति....जय वनस्पति*
15 जुलाई को पौधारोपण करते हुए अपनी व परिवारजनों का एक छायाचित्र भी प्रेषित कीजिएगा.
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Monday, June 13, 2022

**दो भारत शाइनिंग और सफरिंग**

 **दो भारत शाइनिंग और सफरिंग**

भारत में एक नए स्वर्ग का निर्माण किया जा रहा है ।
साइनिंग और सफरिंग दो भारत बनाए जा रहे हैं ।
साइनिंग का बोलबाला चारों तरफ है। विदेशी मोटरें, एक्सप्रेस हाईवे, मोबाइल फोन, इंटरनेट, पांच सितारा होटल, फैशन परेड, सौंदर्य प्रतियोगिताएं, सैंकड़ों टी वी चैनल्स, आलिशान फ्लैट्स-बंगले,ऊंची इमारतें, पेप्सी-कोक, मैक्डोनाल्ड जैसे होटल, इलैक्ट्रोनिक साज -सामान की बाढ़....फहरिस्त बहुत लंबी है-----
सफरिंग का कहीं जिक्र ही नहीं है। जब देश में इतनी तरक्की हो रही है तो सफरिंग के शाइनिंग से कुछ सवाल हैं----
1* हम बेरोजगारी की गिरफ्त में क्यों?
2* नौकरियों से लोग निकाले क्यों जा रहे हैं?
3* दिन-ब-दिन  नौकरियों की संख्या कम क्यों हो रही हैं ?
4* वेतन कम क्यों हो रहे हैं।
5* मनरेगा का बजट कम क्यों किया जा रहा है?
6* किसान बड़ा आंदोलन करने पर मजबूर क्यों किये गए?
7* युवा और किसान बढ़ते कर्म में साल दरसाल आत्महत्याएँ क्यों कर रहे हैं?
8* अडानी अम्बानी की बेइंतहा वार्षिक आर्थिक सम्पति क्यों बढ़ती जा रही हैं ?
सफरिंग को साथ मिलकर हालात को बदलने के प्रयास करने होंगे। एक निरन्तर सामूहिक संघर्ष की सख्त जरूरत है।
डॉ रणबीर सिंह दहिया ।

मौजूदा जनविरोधी हालात से निकलने के रास्ते और मुक्ति मंत्र

 मौजूदा जनविरोधी हालात से निकलने के रास्ते और मुक्ति मंत्र

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     ,,,, मुनेश त्यागी

     भाजपा ने पिछले आठ सालों से सांप्रदायिक और कारपोरेट गठजोड़ को मजबूत करते हुए, जनता पर तानाशाहीपूर्ण हमले बढ़ा दिए हैं। संविधान, जनवाद और गणतंत्र को खतरे में डाल दिया है। मोदी सरकार आर एस एस के हिंदू राष्ट्र के एजेंडे को तेज गति से आगे बढ़ा रही है उदारवादी नीतियों को अबाध गति से आगे बढ़ा रही है। आर एस एस का एजेंडा भारतीय संविधान, कानून के शासन, जनतंत्र, गणतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के ताने-बाने को गंभीर क्षति पहुंचा रहा है।
     इन आठ सालों  की अवधि में किसानों, मजदूरों, छात्रों, नौजवानों और महिलाओं का उत्पीड़न बढ़ा है, उनको आधुनिक गुलाम बनाने की सारी कोशिशें जारी हैं। उनके जनवादी अधिकारों पर हमले हुए हैं, मध्यम मध्यम वर्ग और छोटे और मझोले उद्योग धंधों की दुर्दशा हो गई है, लाखों लोग बेरोजगार हो गए हैं लाखों उद्योग धंधे ठप हो गए हैं। आज हिंदुत्ववादी सांप्रदायिकता एक बहुत बड़ी चुनौती बन कर उभरी है और यह देश के ताने-बाने को बहुत बड़ा खतरा बन गयी है। यहां पर सबसे मुख्य और अहम सवाल उठता है कि इसके लिए क्या हो और हम क्या करें?
     इस जनविरोधी और देशविरोधी निजाम का मुकाबला करने के लिए, धर्मनिरपेक्षता के लिए सतत और समझौताविहीन संघर्ष करने से ही काम चलेगा। इसके लिए सभी धर्मनिरपेक्ष पार्टियों और ताकतों को एक साथ लेना होगा और सांप्रदायिकता से लड़ने के लिए अवसरवादी रवैइया छोड़ना पड़ेगा ओर हम इस देश की, समाज की, प्रदेश की, सारी जनवादी धर्मनिरपेक्ष समाजवादी प्रगतिशील और वामपंथी ताकतों को जोड़कर, एकजुट करके, "भाईचारा मंच" बनाना पड़ेगा और इसमें जनता के मुद्दों को रखना पड़ेगा और हिंदू मुस्लिम के बीच बढ़ती खाई को रोकना पड़ेगा और खत्म करना पड़ेगा। भाईचारा मंच बनाकर काम करने का और हिंदू मुस्लिम एकता को मजबूत और पुख्ता करने का आज का सबसे जरूरी काम है।
      आगामी दिनों में भाजपा को अलग-थलग करना होगा, उसकी नफरत भरी मुहिम को हराना होगा और जनता को साझी संस्कृति और गंगा जमुनी तहजीब की हकीकत और तथ्यों से अवगत कराना होगा। हमारे इतिहास में हिंदू मुसलमान नायक नायिकाओं के हीरे मोती भरे पड़े हैं, हमें उन्हीं को निकाल कर जनता के बीच ले जाना होगा और उसकी साझी संस्कृति को और उसके ज्ञान को मजबूत करना होगा ताकि वह सांप्रदायिक ताकतों द्वारा नफरत भरी मुहिम को जान सके और उसका माकूल जवाब दे सके।
    सरकारी संपत्तियों, सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्तियों और खनिजों की बड़े पैमाने पर निजीकरण की मुहिम को रोकना होगा और जनविरोधी और देश विरोधी नीतियों के खिलाफ बड़ा आंदोलन खड़ा करना होगा। किसान संघर्ष की तर्ज पर किसान और मजदूरों का साझा अभियान शुरू करना होगा जिसमें छात्रों, नौजवानों, एससी एसटी के लोगों को शामिल करना होगा और कारपोरेट-सांप्रदायिक शासन के खिलाफ सभी जनवादी और धर्मनिरपेक्ष ताकतों को एकजुट करना होगा।
   जनहित के समान मुद्दों पर सभी जनतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को संसद और संसद के बाहर एकजुट करना होगा और औद्योगिक घरानों और हिंत्ववादी साम्प्रदायिक ताकतों के खिलाफ लड़ाई की सफलता के लिए, इन दोनों के खिलाफ, एक राष्ट्रीय मोर्चा बनाना और भाईचारा मंच बनाना ही समय की सबसे बड़ी मांग है। संसद और संसद कि बाहर सभी धर्मनिरपेक्ष पार्टियों और ताकतों को एक मंच पर लाकर ही इस जनविरोधी निजाम को मात दी जा सकती है, इसे सत्ता से हटाया जा सकता है।
     तमाम वामपंथी और धर्मनिरपेक्ष ताकतों की व्यापक और गहन लामबंदी करके, एक संयुक्त मोर्चा बनाकर, एक सर्वमान्य "कॉमन मिनिमम प्रोग्राम" के तहत, दमनात्मक कानूनों, उदारवाद के हमलों और लोकतांत्रिक अधिकारों के खिलाफ शासक वर्ग के हमलों के खिलाफ, मैदान-ए-जंग में उतरना पड़ेगा। किसानों, मजदूरों, नौजवानों, विद्यार्थियों, महिलाओं, बुद्धिजीवियों, मीडिया कर्मियों, लेखक और कवियों समेत, वर्गीय और तमाम संगठनों की सांझी और एकजुट  कार्यवाहियों को अमल में लाना होगा।
    इसकी पहल वामपंथी ताकतों को करनी होगी क्योंकि उनके पास जनमुक्ति की देशव्यापी नीतियां हैं, कार्यक्रम हैं और लड़ने की क्षमता है और माद्दा है और वे ही पिछले 31 साल से सरकार की जनविरोधी और देशविरोधी  ,,,उदारवादी, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों से लगातार लड़ते आ रहे हैं। उन्हें इस संयुक्त संघर्ष की कार्यवाही को नेतृत्व प्रदान करना होगा।
    जनमुक्ति मंत्र से हमारा मतलब है की जनता को शोषण, अन्याय, महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, गरीबी और मुफलिसी से निजात दिलाना, उन्हें रोजगार देना, उन्हें इलाज और शिक्षा की सुविधाएं प्रदान करना और इन सब से उन्हें निजात दिलाना। सामान्य अर्थों में जीवन के आवागमन, स्वर्ग नरक या मोक्ष जैसी मान्यताओं से हमारा कोई लेना देना नहीं है।
    वर्तमान कारपोरेट संप्रदायिक गठजोड़ की सरकारों और सत्ता को मात देने के लिए निम्नलिखित मुक्ति-मांगपत्र जनता के सामने रखना होगा और जनता को संयुक्त संघर्ष के मैदान में लाना होगा, पूरी जनता को इन मांगों के आधार पर एकजुट करना होगा। हमें इन मांगों को लेकर जनता के यानी किसानों, मजदूरों और मेहनतकशों के बीच जाना होगा और उसे इस लुटेरे निजाम के खिलाफ, जनता के जनवाद और समाजवादी व्यवस्था की स्थापना करने के अभियान में लगाना होगा और उसे इस जनमुक्ति के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट करना होगा। जनता की जनमुक्ति का मांगपत्र इस प्रकार होगा,,,,,
1. देश की सारी जनता को आधुनिक, अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा दी जाए,
2. देश की सारी जनता को मुफ्त और आधुनिक इलाज की सुविधाएं मुहैया कराई जाएं,
3. सभी नौजवानों को रोजगार मुहैया कराये जाएं और बेरोजगारों को ₹12000 महीना बेरोजगारी भत्ता दिलाया जाए,
4. जनहित में उद्योग धंधों का जाल बिछाया जाए और देश का पर्याप्त औद्योगिकरण किया जाए,
5. देश की सार्वजनिक संपत्ति पूंजीपतियों यानी धन्ना सेठों और उद्योगपतियों को कोडी के दाम बेचने पर रोक लगाई जाए,
6. पूरे देश में भूमि सुधार लागू किए जाएं और सीलिंग से फालतू जमीन को गरीबों और खेतिहर मजदूरों में बांटा जाए,
7. देश के साठ बरस से ऊपर सभी बुजुर्गों,,, स्त्री पुरुष को ₹6000 मासिक पेंशन दी जाए और और  20,000 रु प्रतिवर्ष ब्याज पाने वाले बुजुर्गों की आमदनी पर कोई टैक्स नहीं लगाया जाए,
8.  किसानों की फसलों के वाजिब दाम दिए जाएं और एमएसपी पर खरीद की गारंटी की जाए,
9. पूरे देश में धर्मनिरपेक्षता पर आधारित समाज की स्थापना की जाए और अंधविश्वासी, धर्मांध और कपोल कल्पित और पाखंडपूर्ण आचार विचार पर रोक लगाकर, जनता में वैज्ञानिक संस्कृति का प्रचार प्रसार किया जाए,
10. कमरतोड़ महंगाई पर अविराम रोक लगाई जाए, पेट्रोल डीजल और गैस के बढ़े हुए दाम तुरंत वापस लिए जाएं और जनता को राहत प्रदान की जाए,
11. मझोले और छोटे उद्योग धंधों का विकास किया जाए ताकि लोगों को रोजगार मिल सके और उनकी आमदनी बढायी जा सके,
12. किसान मजदूरों की सरकार कायम की जाए ताकि पूंजीवादी लूट खसोट का खात्मा करके आम जनता का विकास किया जा सके,
13. देश के प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग बंद किया जाए और इनका प्रयोग देश की जनता के विकास के लिए किया जाए,
14. वर्तमान लुटेरी पूंजीवादी व्यवस्था को बदल कर इसके स्थान पर जनता की जनवादी और क्रांतिकारी समाजवादी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना का अभिमान चलाया जाए और किसानों, मजदूरों, नौजवानों और सारी जनता को इसके इर्द-गिर्द  लामबंद यानी एकजुट किया जाए,
15.  कई कई वर्षों से खाली पड़े हुए सरकारी और गैरसरकारी संस्थानों के खाली पदों को तुरंत भरा जाए ताकि शासन प्रशासन में होने वाली परेशानियों से जनता को राहत मिल सके और उसके काम समय से हो सके और बेरोजगारों को काम मिल सके,
16. समाज में आकंठ और सर्वव्यापी भ्रष्टाचार पर और कानून की खामियों पर रोक लगाकर जनता को सस्ता और सुलभ न्याय दिलाया जाए और एक भ्रष्टाचार रहित समाज का निर्माण किया जाए, और
17.पूरे भारतवर्ष के तमाम मजदूरों को न्यूनतम वेतन दिया जाए, नियुक्ति पत्र दिये जाएं, वेतन पर्चियां दी जाएं और श्रम कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए और कानून का उल्लंघन करने वाले पूंजीपतियों को, पैसे वालों को और धन्ना सेठों को, कठोर से कठोर दंड दिया जाए,
18. पूरे प्रदेश और देश में चल रहे मुसलमान विरोधी नफरत को रोकने के लिए और हिंदू मुसलमान एकता बनाए रखने के लिए, देश प्रदेश जिला गांव और मोहल्ला स्तर पर "भाईचारा मंच" का निर्माण करके, लोगों को मिली-जुली संस्कृति के बारे में बताया जाए और सांप्रदायिक नफरत की मुहिम का डटकर मुकाबला किया जाए और इन देश विरोधी और समाज विरोधी व मानवता विरोधी ताकतों को परास्त किया जाए।

Sunday, May 29, 2022

आज का हरियाणा

हरयाणा का सामाजिक सांस्कृतिक परिद्रश्य रणबीर सिंह दहिया        हरयाणा एक कृषि प्रधान प्रदेश के रूप में जाना जाता है । राज्य के समृद्ध और सुरक्षा के माहौल में यहाँ के किसान और मजदूर , महिला और पुरुष ने अपने खून पसीने की कमाई से नई तकनीकों , नए उपकरणों , नए खाद बीजों व पानी का भरपूर इस्तेमाल करके खेती की पैदावार को एक हद तक बढाया , जिसके चलते हरयाणा के एक तबके में सम्पन्नता आई मगर हरयाणवी समाज का बड़ा हिस्सा इसके वांछित फल नहीं प्राप्त कर सका ।        यह एक सच्चाई है कि हरयाणा के आर्थिक विकास के मुकाबले में सामाजिक विकास बहुत पिछड़ा रहा है । ऐसा क्यों हुआ ? यह एक गंभीर सवाल है और अलग से एक गंभीर बहस कि मांग करता है । हरयाणा के सामाजिक सांस्कृतिक क्षेत्र पर शुरू से ही इन्ही संपन्न तबकों का गलबा रहा है । यहाँ के काफी लोग फ़ौज में गए और आज भी हैं मगर उनका हरयाणा में क्या योगदान रहा इसपर ज्यादा ध्यान नहीं गया है । उनकी एक भूमिका है। इसी प्रकार देश के विभाजन के वक्त जो तबके हरयाणा में आकर बसे उन्होंने हरयाणा की दरिद्र संस्कृति को कैसे प्रभावित किया ; इस पर भी गंभीरता से सोचा जाना शायद बाकी है । क्या हरयाणा की संस्कृति महज रोहतक, जींद व सोनीपत जिलों कि संस्कृति है? क्या हरयाणवी डायलैक्ट एक भाषा का रूप ले  सकता है ? महिला विरोधी, दलित विरोधी तथा प्रगति विरोधी तत्वों तथा सामंती पितृसत्तात्मक सोच  को यदि हरयाणवी संस्कृति से बाहर कर दिया जाये तो हरयाणवी संस्कृति में स्वस्थ पक्ष क्या बचता है ? इस पर समीक्षात्मक रुख अपना कर इसे विश्लेषित करने कि आवश्यकता है । क्या पिछले दस पन्दरा सालों में और ज्यादा चिंताजनक पहलू हरयाणा के सामाजिक सांस्कृतिक माहौल में शामिल नहीं हुए हैं ? व्यक्तिगत स्तर पर महिलाओं और पुरुषों ने बहुत सारी सफलताएँ हांसिल की हैं | समाज के तौर पर 1857 की आजादी की पहली जंग में सभी वर्गों ,सभी मजहबों व सभी जातियों के महिला पुरुषों का सराहनीय योगदान रहा है । इसका असली इतिहास भी कम लोगों तक पहुँच सका है ।         हमारे हरयाणा के गाँव में पहले भी और कमोबेश आज भी गाँव की संस्कृति , गाँव की परंपरा , गाँव की इज्जत व शान के नाम पर बहुत छल प्रपंच रचे गए हैं और वंचितों, दलितों व महिलाओं के साथ न्याय कि बजाय बहुत ही अन्याय पूर्ण व्यवहार किये जाते रहे हैं ।उदाहरण के लिए हरयाणा के गाँव में एक पुराना तथाकथित भाईचारे व सामूहिकता का हिमायती रिवाज रहा है कि जब भी तालाब (जोहड़) कि खुदाई का काम होता तो पूरा गाँव मिलकर इसको करता था । रिवाज यह रहा है कि गाँव की हर देहल से एक आदमी तालाब कि खुदाई के लिए जायेगा । पहले हरयाणा के गावों क़ी जीविका पशुओं पर आधारित ज्यादा रही है। गाँव के कुछ घरों के पास 100 से अधिक पशु होते थे । इन पशुओं का जीवन गाँव के तालाब के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा होता था । गाँव क़ी बड़ी आबादी के पास न ज़मीन होती थी न पशु होते थे । अब ऐसे हालत में एक देहल पर तो सौ से ज्यादा पशु हैं, वह भी अपनी देहल से एक आदमी खुदाई के लिए भेजता था और बिना ज़मीन व पशु वाला भी अपनी देहल से एक आदमी भेजता था । वाह कितनी गौरवशाली और न्यायपूर्ण परंपरा थी हमारी? यह तो महज एक उदाहरण है परंपरा में गुंथे अन्याय को न्याय के रूप में पेश करने का ।              महिलाओं के प्रति असमानता व अन्याय पर आधारित हमारे रीति रिवाज , हमारे गीत, चुटकले व हमारी परम्पराएँ आज भी मौजूद हैं । इनमें मौजूद दुभांत को देख पाने क़ी दृष्टि अभी विकसित होना बाकी है | लड़का पैदा होने पर लडडू बाँटना मगर लड़की के पैदा होने पर मातम मनाना , लड़की होने पर जच्चा को एक धड़ी घी और लड़का होने पर दो धड़ी घी देना, लड़के क़ी छठ मनाना, लड़के का नाम करण संस्कार करना, शमशान घाट में औरत को जाने क़ी मनाही , घूँघट करना , यहाँ तक कि गाँव कि चौपाल से घूँघट करना आदि बहुत से रिवाज हैं जो असमानता व अन्याय पर टिके हुए हैं । सामंती पिछड़ेपन व सरमायेदारी बाजार के कुप्रभावों के चलते महिला पुरुष अनुपात चिंताजनक स्तर तक चला गया । मगर पढ़े लिखे हरयाणवी भी इनका निर्वाह करके बहुत फखर महसूस करते हैं । यह केवल महिलाओं की संख्या कम होने का मामला नहीं है बल्कि सभ्य समाज में इंसानी मूल्यों की गिरावट और पाशविकता को दर्शाता है । हरयाणा में पिछले कुछ सालों से यौन अपराध , दूसरे राज्यों से महिलाओं को खरीद के लाना और उनका यौन शोषण  आदि का चलन बढ़ रहा है । सती, बाल विवाह अनमेल विवाह के विरोध में यहाँ बड़ा सार्थक आन्दोलन नहीं चला । स्त्री शिक्षा पर बल रहा मगर को- एजुकेसन का विरोध किया गया , स्त्रियों कि सीमित सामाजिक भूमिका की भी हरयाणा में अनदेखी की गयी । उसको अपने पीहर की संपत्ति में से कुछ नहीं दिया जा रहा जबकि इसमें उसका कानूनी हक़ है । चुन्नी उढ़ा कर शादी करके ले जाने की बात चली है । दलाली, भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी से पैसा कमाने की बढ़ती प्रवृति चारों तरफ देखी जा सकती है । यहाँ समाज के बड़े हिस्से में अन्धविश्वास , भाग्यवाद , छुआछूत , पुनर्जन्मवाद , मूर्तिपूजा , परलोकवाद , पारिवारिक दुश्मनियां , झूठी आन-बाण के मसले, असमानता , पलायनवाद , जिसकी लाठी उसकी भैंस , मूछों के खामखा के सवाल , परिवारवाद ,परजीविता ,तदर्थता आदि सामंती विचारों का गहरा प्रभाव नजर आता है । ये प्रभाव अनपढ़ ही नहीं पढ़े लिखे लोगों में भी कम नहीं हैं । हरयाणा के मध्यमवर्ग का विकास एक अधखबड़े मनुष्य के रूप में हुआ ।           तथाकथित स्वयम्भू सामंती संस्थाएं नागरिक के अधिकारों का हनन करती रही हैं और महिला विरोधी व दलित विरोधी तुगलकी फैसले करती रहती हैं और इन्हें नागरिक को मानने पर मजबूर करती रहती हैं । राजनीति व प्रशासन मूक दर्शक बने रहते हैं या चोर दरवाजे से इन संस्थाओं की मदद करते रहते हैं । यह अधखबड़ा मध्यम वर्ग भी कमोबेश इन संस्थाओं के सामने घुटने टिका देता है । एक दौर में हरयाणा में इस प्रकार की संस्थाओं द्वारा जाति, गोत ,संस्कृति ,मर्यादा आदि के नाम पार महिलाओं के नागरिक अधिकारों के हनन में बहुत तेजी आई  और अपना सामाजिक वर्चस्व बरक़रार रखने के लिए जहाँ एक ओर कई जात पर आधारित संस्थाएं घूँघट ,मार पिटाई ,शराब,नशा ,लिंग पार्थक्य ,जाति के आधार पर अपराधियों को संरक्षण देना आदि सबसे पिछड़े विचारों को प्रोत्साहित करती हैं वहीँ दूसरी ओर साम्प्रदायिक ताकतों के साथ मिलकर युवा लड़कियों की सामाजिक पहलकदमी और रचनात्मक अभिव्यक्ति को रोकने के लिए तरह तरह के फतवे जारी करती रही हैं । जौन्धी औऱ ,नयाबांस की घटनाएँ तथा इनमें इन संस्थाओं द्वारा किये गए तालिबानी फैंसले जीते जागते उदाहरण हैं । युवा लड़कियां केवल बाहर ही नहीं बल्कि परिवार में भी अपने लोगों द्वारा यौन-हिंसा और दहेज़ हत्या की शिकार हों रही हैं । ऐसी संस्थाएं बड़ी बेशर्मी से बदमाशी करने वालों को बचाने की कोशिश करती हैं । एक दौर से गाँव की गाँव, गोत्र की गोत्र और सीम के लगते गाँव के भाईचारे की गुहार लगाते हुए हिन्दू विवाह कानून 1955 ए में संसोधन की बातें की  गई और अभी भी कभी कभी की जा रही हैं ,धमकियाँ दी जा रही हैं और जुर्माने किये जा रहे हैं। हरयाणा के रीति रिवाजों की जहाँ एक तरफ दुहाई देकर संशोधन की मांग उठाई जा रही है वहीँ हरयाणा की ज्यादतर आबादी के रीति रिवाजों की अनदेखी भी की जा रही है । हरियाणा में  खाते-पीते मध्य वर्ग और अन्य साधन सम्पन्न तबक़ों का इसे समर्थन किसी हद तक सरलता से समझ में आ सकता है, जिनके हित इस बात में हैं कि ये तबके- स्त्रियां, दलित, अल्पसंख्यक और करोड़ों निर्धन जनता- नागरिक समाज के निर्माण के संघर्ष से अलग रहें।      लेकिन साधारण जनता अगर फ़ासीवादी मुहिम में शरीक करने की कोशिश की जाती है तो वह अपनी भयानक असहायता , अकेलेपन, हताशा अन्धसंशय, अवरुद्ध चेतना, पूर्वग्रहों, भ्रम द्वारा जनित भावनाओं के कारण शरीक होती है। फ़ासीवाद के कीड़े जनवाद से वंचित और उसके व्यवहार से अपरिचित, रिक्त, लम्पट और घोर अमानुषिक जीवन स्थितियों में रहने वाले जनसमूहों के बीच आसानी से पनपाए जा सकते हैं। यह भूलना नहीं चाहिए कि हिन्दुस्तान की आधी से अधिक आबादी ने जितना जनतंत्र को बरता है, उससे कहीं ज़्यादा फ़ासीवादी परिस्थितियों में रहने का अभ्यास किया है।            गाँव की इज्जत के नाम पर होने वाली जघन्य हत्याओं की हरियाणा में बढ़ोतरी हो रही हैं । समुदाय , जाति या परिवार की इज्जत बचाने के नाम पर महिलाओं को पीट पीट कर मार डाला जाता है , उनकी हत्या कर दी जाती है या उनके साथ बलात्कार किया जाता है । एक तरफ तो महिला के साथ वैसे ही इस तरह का व्यवहार किया जाता है जैसे उसकी अपनी कोई इज्जत ही न हो , वहीँ उसे समुदाय की 'इज्जत' मान लिया जाता है और जब समुदाय बेइज्जत होता है तो हमले का सबसे पहला निशाना वह महिला और उसकी इज्जत ही बनती है । अपनी पसंद से शादी करने वाले युवा लड़के लड़कियों को इस इज्जत के नाम पर सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटका दिया जाता है ।            यहाँ के प्रसिद्ध सांगियों हरदेव , लख्मीचंद ,बाजे भगत , महाशय दयाचंद, ,मांगेराम ,चंदरबादी, धनपत, मेहर सिंह , व खेमचंद  की रचनाएं काफी प्रशिद्ध हुई हैं। रागनी कम्पीटिसनों का दौर एक तरह से काफी कम हुआ है । ऑडियो कैसेटों की जगह सीडी लेती गई और अब यु ट्यूब और सोशल मीडिया ने ले ली है। स्वस्थ ,जन पक्षीय सामग्री के साथ ही पुनरुत्थान वादी व अंध उपभोग्तवादी मूल्यों की सामग्री भी नजर आती है । हरयाणा के लोकगीतों पर  समीक्षातमक काम कम हुआ है । महिलाओं के गीतों में महिला के दुःख दर्द का चित्रण काफी है । हमारे त्योहारों के अवसर के बेहतर गीतों की बानगी भी मिल जाति है ।         गहरे संकट के दौर में हमारी धार्मिक आस्थाओं को साम्प्रदायिकता के उन्माद में बदलकर हमें जात गोत्र व धर्म के ऊपर लडवा कर हमारी इंसानियत के जज्बे को , हमारे मानवीय मूल्यों को विकृत किया जा रहा है | गऊ हत्या या गौ-रक्षा के नाम पर हमारी भावनाओं से खिलवाड़ किया जाता है । दुलिना हत्या कांड और अलेवा कांड गौ के नाम पर फैलाये जा रहे जहर का ही परिणाम थे। इसी धार्मिक उन्माद और आर्थिक संकट के चलते हर तीसरे मील पर मंदिर दिखाई देने लगे हैं । राधास्वामी और दूसरे सैक्टों का उभार भी देखने को मिलता है । अब इस ऊभार ने बहुत ही विकट रूप धारण कर लिया है।          सांस्कृतिक स्तर पर हरयाणा के चार पाँच क्षेत्र हैं और इनकी अपनी विशिष्टताएं हैं । हरेक गाँव में भी अलग अलग वर्गों व जातियों के लोग रहते हैं । जातीय भेदभाव एक ढंग से कम हुए हैं मगर अभी भी गहरी जड़ें जमाये हुए हैं । आर्थिक असमानताएं बढ़ रही हैं । सभी पहले के सामाजिक व नैतिक बंधन तनावग्रस्त होकर टूटने के कगार पर हैं ।  मगर जनतांत्रिक मूल्यों के विकास की बजाय बाजारीकरण की संस्कृति के मान मूल्य बढ़ते जा रहे हैं । बेरोजगारी बेहताशा बढ़ी है । मजदूरी के मौके भी कम से कमतर होते जा रहे हैं। मजदूरों का जातीय उत्पीडन भी बढ़ा है । दलितों से भेदभाव बढ़ा है वहीँ उनका असर्सन भी बढ़ा है । कुँए अभी भी कहीं कहीं अलग अलग हैं । परिवार के पितृसतात्मक ढांचे में परतंत्रता बहुत ही तीखी हो रही है | पारिवारिक रिश्ते नाते ढहते जा रहे हैं मगर इनकी जगह जनतांत्रिक ढांचों का विकास नहीं हो रहा । तल्लाकों के केसिज की संख्या कचहरियों में बढ़ती जा रही है । इन सबके साथ साथ महिलाओं और बच्चों पर काम का बोझ बढ़ता जा रहा है । मजदूर वर्ग सबसे ज्यादा आर्थिक संकट की गिरफ्त में है । खेत मजदूरों ,भठ्ठा मजदूरों ,दिहाड़ी मजदूरों व माईग्रेटिड मजदूरों का जीवन संकट गहराया है । लोगों का गाँव से शहर को पलायन बढ़ा है ।                       कृषि में मशीनीकरण बढ़ा है । तकनीकवाद का जनविरोधी स्वरूप ज्यादा उभर कर आया है । ज़मीन की दो -ढाई एकड़ जोत पर 70 प्रतिशत के लगभग किसान पहुँच गया है | ट्रैक्टर ने बैल की खेती को पूरी तरह बेदखल कर दिया है। थ्रेशर और हार्वेस्टर कम्बाईन ने मजदूरी के संकट को बढाया है।सामलात जमीनें खत्म सी हों रही हैं । कब्जे कर लिए गए या आपस में जमीन वालों ने बाँट ली । अन्न की फसलों का संकट है । पानी की समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है । नए बीज ,नए उपकरण , रासायनिक खाद व कीट नाशक दवाओं के क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की दखलंदाजी ने इस सीमान्त किसान के संकट को बहुत बढ़ा दिया है । प्रति एकड़ फसलों की पैदावार घटी है जबकि इनपुट्स की कीमतें बहुत बढ़ी हैं । किसान का कर्ज भी बढ़ा है । स्थाई हालातों से अस्थायी हालातों पर जिन्दा रहने का दौर तेजी से बढ़ रहा है । अन्याय व अत्याचार बेइन्तहा बढ़ रहे हैं । किसान वर्ग के इस हिस्से में उदासीनता गहरे पैंठ गयी थी और एक निष्क्रिय परजीवी जीवन , ताश खेल कर बिताने की प्रवर्ति बढ़ी है । हाथ से काम करके खाने की प्रवर्ति का पतन हुआ है । साथ ही साथ दारू व सुल्फे का चलन भी बढ़ा है और स्मैक जैसे नशीले पदार्थों की खपत बढ़ी है । पिछले दिनों एक साल तक चले किसान आंदोलन ने एक बार किसानी एकता को मजबूत करने का काम किया है। लेकिन किसानी संकट बढ़ता ही नजर आ रहा है। मध्यम वर्ग के एक हिस्से के बच्चों ने अपनी मेहनत के दम पर सॉफ्ट वेयर आदि के क्षेत्र में काफी सफलताएँ भी हांसिल की हैं । मगर एक बड़े हिस्से में एक बेचैनी भी बखूबी देखी जा सकती है । कई जनतांत्रिक संगठन इस बेचैनी को सही दिशा देकर जनता के जनतंत्र की लड़ाई को आगे बढ़ाने में प्रयासरत दिखाई देते हैं । अब सरकारी समर्थन का ताना बाना टूट गया है और हरयाणा में कृषि का ढांचा बैठता जा रहा है । इस ढांचे को बचाने के नाम पर जो नई कृषि नीति या नितियां परोसी जा रही हैं उसके पूरी तरह लागू होने के बाद आने वाले वक्त में ग्रामीण आमदनी ,रोजगार और खाद्य सुरक्षा की हालत बहुत भयानक रूप धारण करने जा रही है।     आज के दौर में साथ ही साथ बड़े हिस्से का उत्पीडन भी सीमायें लांघता जा रहा है, और इनकी दरिद्र्ता बढ़ती जा रही है । नौजवान सल्फास की गोलियां खाकर या फांसी लगाकर आत्म हत्या को मजबूर हैं ।                  गाँव के स्तर पर एक खास बात और पिछले कुछ सालों में उभरी है वह यह की कुछ लोगों के प्रिविलेज बढ़ रहे हैं । इस नव धनाड्य वर्ग का गाँव के सामाजिक सांस्कृतिक माहौल पर गलबा है । पिछले सालों के बदलाव के साथ आई छद्म सम्पन्नता , सुख भ्रान्ति और नए उभरे सम्पन्न तबकों --परजीवियों ,मुफतखोरों और कमीशन खोरों -- में गुलछर्रे उड़ाने की अय्यास कुसंस्कृति तेजी से उभरी है । नई नई कारें ,कैसिनो ,पोर्नोग्राफी ,नँगी फ़िल्में ,घटिया केसैटें , हरयाणवी पॉप ,साइबर सैक्स ,नशा व फुकरापंथी हैं,कथा वाचकों के प्रवचन ,झूठी हसियत का दिखावा इन तबकों की सांस्कृतिक दरिद्र्ता को दूर करने के लिए अपनी जगह बनाते जा रहे हैं| जातिवाद व साम्प्रदायिक विद्वेष ,युद्ध का उन्माद और स्त्री द्रोह के लतीफे चुटकलों से भरे हास्य कवि सम्मलेन बड़े उभार पर हैं । इन नव धनिकों की आध्यात्मिक कंगाली नए नए बाबाओं और रंग बिरंगे कथा वाचकों को खींच लाई है । विडम्बना है की तबाह हों रहे तबके भी कुसंस्कृति के इस अंध उपभोगतावाद से छद्म ताकत पा रहे हैं ।                      दूसर तरफ यदि गौर करेँ तो सेवा क्षेत्र में छंटनी और अशुरक्षा का आम माहौल बनता जा रहा है इसके बावजूद कि विकास दर ठीक बताई जा रही है । कई हजार कर्मचारियों के सिर पर छंटनी कि तलवार चल चुकी है और बाकी कई हजारों के सिर पर लटक रही है । सैंकड़ों फैक्टरियां बंद हों चुकी हैं । बहुत से कारखाने यहाँ से पलायन कर गए हैं । छोटे छोटे कारोबार चौपट हों रहे हैं । संगठित क्षत्र सिकुड़ता और पिछड़ता जा रहा है । असंगठित क्षेत्र का तेजी से विस्तार हों रहा है । फरीदाबाद उजड़ने कि राह पर है , सोनीपत सिसक रहा है , पानीपत का हथकरघा उद्योग गहरे संकट में है । यमुना नगर का बर्तन उद्योग चर्चा में नहीं है, ,सिरसा ,हांसी व रोहतक की धागा मिलें बंद हो गयी । धारूहेड़ा में भी स्थिलता साफ दिखाई देती है ।       स्वास्थ्य के क्षेत्र में और शिक्षा के क्षेत्र में बाजार व्यवस्था का लालची व दुष्टकारी खेल सबके सामने अब आना शुरू हो गया है । सार्वजनिक क्षेत्र में साठ साल में खड़े किये ढांचों को या तो ध्वस्त किया जा रहा है या फिर कोडियों के दाम बेचा जा रहा है । शिक्षा आम आदमी की पहुँच से दूर खिसकती जा रही है । स्वास्थ्य के क्षेत्र में और भी बुरा हाल हुआ  है । गरीब मरीज के लिए सभी तरफ से दरवाजे बंद होते जा रहे हैं । लोगों को इलाज के लिए अपनी जमीनें बेचनी पड़ रही हैं । आरोग्य कोष या राष्ट्रिय बीमा योजनाएं ऊँट के मुंह  में जीरे के समान हैं । उसमें भी कई सवाल उठ रहे हैं ।       आज के दिन व्यापार धोखाधड़ी में बदल चुका  है । छोटे व्यापारी का संकट बढ़ा है। माध्यम वर्ग के व्यापारी की हालत भी बदतर होती जा रही है।          यही हाल हमारे यहाँ की ज्यादातर राजनैतिक पार्टियों का हो चुका है । आज के दिन हर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा ने दुश्मनी का रूप ले लिया है । हरयाणा में दरअसल सभ्य भाषा का इस्तेमाल खत्म सा होता दिखाई दे रहा है । लठ की भाषा का प्रचलन बढ़ा है । भ्रम व अराजकता का माहौल बढ़ा है । लोग किसी भी तरह मुनाफा कमाकर रातों रात करोड़पति से अरब पति बनने  के सपने देखते हैं । मनुष्य की मूल्य व्यवस्था ही उसकी विचारधारा होती है । मनुष्य कितना ही अपने को गैर राजनैतिक मानने की कोशिश करे फिर भी वह अपनी जिंदगी  में मान मूल्यों का निर्वाह करके इस या उस वर्ग की राजनीति कर रहा होता है । विचार धारा का अर्थ है कोई समूह ,समाज या मनुष्य खुद को अपने चारों ओर की दुनिया को, अपनी वास्तविकता को कैसे देखता है ।      हरयाणा के  सांस्कृतिक क्षेत्र के भिन्न भिन्न पहलू हैं । धर्म, परिवार , शिक्षा , प्रचार माध्यम , सिनेमा टी वी ,रेडियो ,ऑडियो ,विडिओ ,अखबार , पत्र --पत्रिकाएँ , अन्य लोकप्रिय साहित्य , संस्कृति के अन्य लोकप्रिय रूप जिनमें लोक कलाएं ही नहीं जीवन शैलियों से लेकर तीज त्यौहार , कर्मकांड , विवाह , मृत्यु भोज आदि तो हैं ही ; टोने- टोटके , मेले ठेले भी शामिल हैं । इतिहास और विचारधारा की समाप्ति की घोषणा करके एक सीमा तक भ्रम अवश्य फैलाया जा सकता है मगर वर्ग संघर्ष को मिटाया नहीं जा सकता । यही प्रकृति का नियम भी है और विज्ञान सम्मत भी । इंसान पर निर्भर करता है कि वह मुठठी  भर लोगों के विलास बहुल जीवन की झांकियों को अपना आदर्श मानते हुए स्वप्न लोक के नायक और नायिकाओं के मीठे मीठे प्रणय गल्पों में मजा ले,मानव मानवी की अनियंत्रित यौन आकांक्षाओं को जीवन की सबसे बड़ी प्राथमिकता के रूप में देखें , औरत की देह को जीवन का सबसे सुरक्षित क्षेत्र बना डालें या अपने और आम जनता के विशाल जीवन और उसके विविध संघर्षों  को आदर्श मानकर वैचारिक उर्जा प्राप्त करे । समाज का बड़ा तबका बेचैन है अपनी गरिमा को फिर से अर्जित करने को। कुछ जनवादी संगठन इस बेचैनी को आवाज देने व जनता को वर्गीय अधरों पर लामबंद करने को प्रयास रत हैं ।     

खुला पत्र

*पीएम  कार्यालय  को*  *सम्मान  के  साथ   खुला   पत्र।* 💥 मैं एक वरिष्ठ नागरिक हूं और  01अगस्त 2012 को 5 साल के लिए एक राष्ट्रीयकृत बैंक में ₹20 लाख रुपये जमा किया था। 👉🏻 मुझे ₹17676.00 हर महीने  व्याज की राशि का भुगतान किया जा रहा था,जो आर्थिक रूप से चिंता मुक्त जीवन जीने में सक्षम था। 👉 परिपक्वता तारीख पर जब  बैंक ने राशि का पुनर्निवेश  किया तो अब मुझे केवल *₹ 10416*  व्याज मिल रहा है अर्थात  *₹7260/* प्रति माह कम मिल रहा है। जो पिछले रिटर्न पर 40% कम के हिसाब से भुगतान किया जा रहा है। 👉  क्या आप मुझे सलाह दे  सकते हैं कि मुझे यह नुकसान क्यों उठाना चाहिए या अपनी दवाईयां ,आटा , दाल,सब्जी, फल, दूध आदि का सेवन त्याग देना चाहिए? 👉  2014 में सत्ता संभालने के बाद वरिष्ठ नागरिकों के लिए  अभी तक कुछ  नहीं किया गया  और न कोई सुविधाएं दी गई।  लेकिन 2014 में जो मौजूद था उसे भी वापस ले लिया गया । 👉 वर्ष 2014 की कीमत पर मुद्रास्फीति की वजह से कोई भी वस्तु या सेवा उपलब्ध नहीं है।   👉 हां, आप मुद्रास्फीति और सूचकांकों के आंकड़े लाने में सक्षम रहे हैं, लेकिन वास्तविक कीमतों पर नहीं। 👉दैनिक जीवन की आवश्यक वस्तुएँ आटा, दाल, चावल, नमक,  बेसन, प्याज, टमाटर, साग सब्जी आदि वस्तुओं को ठीक से वरिष्ठ नागरिक इस्तेमाल करने का साहस भी नहीं कर पा रहा है। 👉   मुझे पता है कि आपके पास इन मुद्दों के लिए जवाब हैं जैसे बैंकों में जमा/ अग्रिम पर ब्याज,मांग और आपूर्ति पर निर्भर है। कृषि उत्पादों के मौसम के साथ दैनिक उपयोग की  वस्तुओं की कीमतें बदलती रहती हैं। 👉 लेकिन कीमतों के सीधे ऊपर की ओर तेजी से बढ़ने को ,इन कारणों से उचित नहीं ठहराया जा सकता है। 👉🏻 यदि सरकार उद्योगों को सस्ता क्रेडिट प्रदान करना चाहती है, जरुर करे। परंतु वरिष्ठों की जमा के व्याज की कीमत पर नहीं होना चाहिए। 👉🏻 बैंक NPA के ज्वालामुखी पर बैठे हैं और सभी अच्छे पैसे खराब पैसे के लिए डायवर्ट किए जा रहे हैं। 👉🏻लेकिन क्या यह सरकार का कर्तव्य नहीं है कि वह वरिष्ठ नागरिकों को  सम्मानजनक जीवन जीने में सक्षम करे जिन्होंने अपने स्वर्णिम  जिंदगी के हजारों दिन/30-40 साल देश की सेवा में विभिन्न संगठनों में काम करके व्यतीत किया हो? 👉 मैं ये समझ नहीं पा रहा हूं, कि इस 40% की आय की कमी को कैसे पूरा किया जाए जब कि महंगाई 200% से ज्यादा बढ़ गई है। 👉🏻क्या कोई  केन्द्रीय एवम् राज्य सरकार मंत्री / सांसद / विधायक अपने वेतन और भत्ते में इस प्रतिशत से कटौती करने के लिए तैयार है ? अगर नहीं तो फिर वरिष्ठ नागरिक ही क्यों वहन करे। 👉  शायद ऐसा इसलिए है कि आप की तरह हमारे पास अपने स्वयं के वेतन भत्ते और  पर्क को समय समय पर संशोधित करने की शक्ति नहीं है। पूरे वर्ष में मात्र 3 महीने के सत्र में काम के लिए पूरे वर्ष तक वेतन भत्ते आदि दिया जाता है। 👉 जब आपकी सैलरी बढ़ाने की बात आती है, तो एक या 2 मिनट में बिना किसी चर्चा के पास कर देते हैं, सभी सत्ताधारी और विपक्ष🙄 एक साथ हो जाते  हैं। 👉इस वृद्धि के लिए,आप राजकोष, घाटे, अर्थशास्त्र और किसी भी अन्य कारकों  को नहीं देखते। 👉 सरकार ने पहले वरिष्ठ नागरिकों की जमा राशि के लिए एक योजना 9.20% की शुरू की थी लेकिन जुलाई में इसे घटाकर 8.3% कर दिया गया, और फिर मई 2020 में घटाकर 7.4% कर दिया। इसके अलावा जमा की अधिकतम सीमा केवल 15 लाख रुपये तक कर दी गई है। जो  अनुचित है। 👉  अनुरोध है वरिष्ठ नागरिकों के लिए न्यूनतम व्याज दर 12% की जाए और अधिकतम राशि सीमा  एक व्यक्ति के टर्मिनल लाभों के बराबर होनी चाहिए। 👉सरकार को वरिष्ठ नागरिकों को  वित्तीय सम्मान सुनिश्चित करना चाहिए 👉 रेलवे के टिकट में जो 30% छूट मिलती थी उसे तुंरत प्रभाव से लागू किया जाय . 👉 मुझे यकीन है कि आप उन लोगों की दुर्दशा को अवश्य समझेंगे जिनको अपने वर्तमान खर्च का हिस्सा उनके जीवनकाल की बचत के ब्याज से मिलता है। 👉   मैं क्षमा चाहता हूँ अगर मैंने आपको किसी भी तरह से नाराज किया है। धन्यवाद और सादर --सभी भारतीय सीनियर सिटीजन  💥👉🏻 प्रिय भाईयों यदि सहमत हों तो 10-20 भाईयों को भेजें🙏🙏

किसान

भारत में कुल 6,28,221 गाँव हैं, जिनमें खेती योग्य भूमि हैं, वर्ष 2017 से ड्रोन से मैपिंग और GPS पोल लगाए जा रहे हैं। वर्ष 2017 मे ही इज़राइल के साथ कृषि के साथ साथ लगभग 10 अहम मुद्दों पर समझौता किया गया था। जानवर पालने के कड़े नियम बना दिए 2024 तक कृषि के उपयोग में आने वाले समस्त उपकरणों को हटाने का प्रण किया गया है भारत में लगभग 14 करोड़ किसान हैं, प्रतिवर्ष कितने किसान आत्महत्या करते हैं.....?? बैंक और सरकार केवल कर्ज़ देने पर जोर क्यों देती हैं ज़मीन अधिग्रहण के कानून में भारी बदलाव रूस के साथ 2019 मे 90 साल की लीज पर समझौता किसानी करने के लिए पीयूष गोयल के नेतृत्व में 5 राज्यों के मुख्यमंत्री और व्यापारी क्या करने गए थे, यह योजना पूरी करनी है👍 क्या सभी किसान अपने पुराने डीजल चलित उपकरण हटा कर, नए ड्रोन जो भी बहुत महंगे होगें खरीद सकेगा.......??? बहुत सी बातें हैं, जिसके कारण किसान बड़ी संख्या में किसानी छोड़ देगा,आत्महत्या करेगा,जो बचेगा वो दूसरे देशों में पलायन करेगा👌

Friday, May 6, 2022

Press statement

प्रेस विज्ञप्ति दिनांक 6 मई, रोहतक। देश के जाने-माने शिक्षाविद् और अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, बेंगलुरु में 'शिक्षा के दर्शनशास्त्र' विभाग के प्रोफ़ेसर रोहित धनकर 7 मई को रोहतक आएंगे। हरियाणा ज्ञान-विज्ञान समिति और हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ के संयुक्त तत्त्वावधान में आयोजित राज्य स्तरीय कार्यशाला में रविवार 8 मई को रोहित धनकर मुख्य स्रोत व्यक्ति होंगे। कार्यशाला में राज्य-भर से के सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के 100 से अधिक शिक्षक भाग लेंगे। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में बहु विषयक अध्ययन पद्धति पर ज़ोर दिया गया है जिसमें विद्यार्थी आर्ट्स, साइंस और मानविकी के विषयों को एक साथ पढ़ेंगे। नीति दस्तावेज़ में कहा गया है कि इससे चिंतन की गहनता, दृष्टिकोण की व्यापकता और जीवन-कौशलों का विकास होगा। इस पद्धति को लागू करने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा 17 मार्च को बी ए कोर्स के लिए 4 वर्षीय पाठ्य चर्या जारी करके देशभर में लागू करने के दिशा-निर्देश भी दिए गए हैं। दूसरी ओर शिक्षाविदों का मानना है कि इससे विद्यार्थियों में चयनित विषयों की विशेषज्ञता हासिल करने की प्रवृत्तियों को चुनौती मिल सकती है और अधिकांश विद्यार्थी सामान्य स्तर तक ही बने रह जाएंगे। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के इस अति महत्त्वपूर्ण आयाम पर शिक्षकों के बीच व्यापक चर्चाओं की आवश्यकता को समझते हुए उक्त कार्यशाला का आयोजन हो रहा है ताकि सही समझ बन सके और हरियाणा के अध्यापक विद्यार्थियों को दिशा प्रदान कर सकें। जारीकर्ता : प्रमोद गौरी, राज्य सचिव, हरियाणा ज्ञान-विज्ञान समिति, हरियाणा।

Saturday, March 19, 2022

द कश्मीर फाइल्स

 https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=3230278547184990&id=1955495977996593


*‘द कश्‍मीर फ़ाइल्‍स’: कश्‍मीरी पण्डितों की त्रासदी दिखाने की आड़ में मुस्लिमों और वामपन्थियों के ख़‍िलाफ़ नफ़रत को चरम पर ले जाने का हिन्‍दुत्‍ववादी हथकण्‍डा*
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✍🏾 आनन्द सिंह

उत्‍तर प्रदेश सहित 4 राज्‍यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा की जीत के बाद संघ परिवार की समूची फ़‍ासिस्‍ट मशीनरी अब विवेक अग्निहोत्री की फ़‍िल्‍म ‘द कश्‍मीर फ़ाइल्‍स’ को प्रचारित करने में जुट गयी है। फ़‍िल्‍म रिलीज़ होने के अगले ही दिन प्रधानमंत्री मोदी ने फ़‍िल्‍म के निर्माता,निर्देशक और मुख्‍य कलाकारों से मुलाक़ात की। यही नहीं, फ़ि‍ल्‍म चर्चा में बनी रहे इसलिए मोदी ने भाजपा की एक बैठक में फ़‍िल्‍म को बदनाम करने की साज़‍िश का भी ज़‍िक्र किया। गृहमंत्री अमित शाह ने भी फ़‍िल्‍म की टीम से मुलाक़ात की। भाजपा शासित प्रदेशों ने फ़‍िल्‍म को टैक्‍स-फ्री कर दिया है ताकि फ़‍िल्‍म को ज्‍़यादा से ज्‍़यादा लोग देखें। तमाम शहरों के सिनेमा हॉलों में संघ परिवार के कार्यकर्ता और उसके लग्‍गू-भग्‍गू फ़‍िल्‍म प्रदर्शन को हिन्‍दुत्‍ववादी ज़हरीली नफ़रती राजनतिक प्रोपागैण्‍डा में तब्‍दील कर रहे हैं। स्‍पष्‍ट है कि यह सब एक सोची-समझी रणनीति के तहत किया जा रहा है जिसका समाज पर वैसा ही असर होने वाला है जैसा नाज़ी जर्मनी में ‘द इटर्नल ज्‍यू’ जैसी यहूदी-विरोधी प्रोपागैण्‍डा फ़‍िल्‍मों का हुआ था।
 
कश्‍मीर मसले के इतिहास के तमाम पहलुओं से वाक़‍िफ़ किसी भी व्‍यक्ति को यह आसानी से समझ में आ सकता है कि फ़‍िल्‍म में आधे सच और सफ़ेद झूठ का शातिराना ढंग से मिश्रण करते हुए कश्‍मीरी पण्डितों की हत्‍याओं और पलायन की त्रासदी को कश्‍मीर समस्‍या के पूरे सन्‍दर्भ से काटकर एक स्‍वतंत्र समस्‍या के रूप में पेश किया गया है। लेकिन इस फ़‍िल्‍म का सबसे ख़तरनाक पहलू यह है कि इसमें कश्‍मीरी पण्डितों की त्रासदी दिखाने की आड़ में संघ परिवार के मुस्लिम-विरोधी और कम्‍युनिज्‍़म-विरोधी एजेण्‍डा को बेहद नंगे और भोंडे रूप में सामने लाया गया है जो कम ऐतिहासिक व राजनीतिक चेतना के किसी भी व्‍यक्ति के भीतर कश्‍मीर समस्‍या के बारे में कोई विवेक पैदा करने की बजाय नफ़रत और ग़ुस्‍सा पैदा करने का काम करता है।

फ़‍िल्‍म को देखने के बाद सिनेमा हॉल से बाहर निकले लोगों की प्रतिक्रिया को भी सोशल मीडिया पर प्रचारित करके नफ़रत और ग़ुस्‍से को और ज्‍़यादा तूल दिया जा रहा है। ऐसी ज्‍़यादातर प्रतिक्रि‍याओं में लोगों को फ़ि‍ल्‍म देखने के बाद रोते हुए और भावनात्‍मक टिप्‍पणी करते हुए दिखाया जा रहा है। फ़‍िल्‍म का मक़सद ही यही है कि कश्‍मीरी पण्डितों की त्रासदी दिखाकर लोगों को नकारात्‍मक भावना और ग़ुस्‍से से भर दिया जाये। लेकिन अगर कोई व्‍यक्ति कश्‍मीरी पण्डितों की त्रासदी के कारणों को जानने की जिज्ञासा के साथ फ़‍िल्‍म देखने जाएगा तो उसे निराशा ही हाथ लगेगी। फ़‍िल्‍म में कश्‍मीरी पण्डितों की समस्‍या और त्रासदी को भारत की आज़ादी के बाद पैदा हुई कश्‍मीर समस्‍या और त्रासदी के एक अंग के रूप में दिखाने की बजाय उसे एक स्‍वतंत्र समस्‍या के रूप में पेश किया गया है। फ़‍िल्‍म में इसका कोई ज़‍िक्र नहीं मिलता कि किस प्रकार आज़ादी के बाद कश्‍मीरियों ने इस्‍लाम के आधार पर बने पाकिस्‍तान में न मिलने का फैसला किया था। कश्‍मीर में रायशुमारी कराने के वायदे से भारतीय राज्य के मुकरने, उसकी ज़ोर-ज़बर्दस्‍ती और ग़ैर-लोकतांत्रिक आचरण की वजह से कश्‍मीर समस्‍या लगातार उलझती चली गयी जिसका नतीजा कश्‍मीर घाटी की मुस्लिम आबादी में लगातार बढ़ते अलगाव के रूप में सामने आया। फ़‍िल्‍म में इसका भी कोई हवाला नहीं मिलता है कि कश्‍मीरी मुस्लिम आबादी के बीच भारत की राज्‍यसत्‍ता से बढ़ते अलगाव के बावजूद 1980 के दशक के उत्‍तरार्द्ध से पहले कश्‍मीरी पण्डित अल्‍पसंख्‍यक आबादी के ख़‍िलाफ़ पूर्वाग्रह भले ही हों लेकिन नफ़रत और हिंसा जैसे हालात नहीं थे। ऐसे हालात पैदा करने में 1980 के दशक में घटी कुछ अहम राष्‍ट्रीय और अन्‍तरराष्‍ट्रीय घटनाओं की भूमिका थी।

11 फ़रवरी 1984 को भारतीय और पाकिस्‍तानी क़ब्ज़े वाले समूचे कश्‍मीर की आज़ादी की माँग को लेकर सशस्‍त्र संघर्ष के हिमायती लोकप्रिय नेता मक़बूल बट को तिहाड़ जेल में फाँसी दे दी गयी थी जिसने कश्मीरी युवाओं में असंतोष बढ़ाने का काम किया। जुलाई 1984 में इंदिरा गाँधी ने फारूख़ अब्दुल्ला की सरकार को बरख़ास्‍त कर दिया जिससे घाटी में एक बार फिर असन्तोष बढ़ने लगा। श्रीनगर में 72 दिनों तक कर्फ्यू लगा रहा। लेकिन 1986 में फारूख अब्दुल्ला ने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के साथ समझौता किया और वे एक बार फिर मुख्यमंत्री बने। मार्च 1987 में जम्मू एवं कश्मीर विधानसभा का चुनाव सम्पन्न हुआ जिसमें नेशनल कान्फ्रेंस और कांग्रेस ने गठबन्धन बनाया। इन चुनावों में बड़े पैमाने पर धाँधली हुई। विपक्षी मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट (एमयूएफ) की कश्मीर घाटी में ज़बरदस्त लोकप्रियता होने के बावजूद चुनावी धाँधली की वजह से उसे विधानसभा में सीटें नहीं मिल पायीं। इन चुनावों में धाँधली के बाद कश्मीरी युवाओं की बड़ी आबादी को चुनावी प्रक्रिया से भरोसा उठ गया और बड़ी संख्या में युवाओं ने बन्दूकें थामी। इसके बाद से ही कश्मीर में सशस्त्र संघर्ष प्रभावी रूप में सामने आया। ग़ौरतलब है कि जिन नेताओं ने बाद में आतंकवाद की राह पर जाने का फैसला किया उनमें से अधिकांश ने 1987 के चुनावों में हिस्सा लिया था और चुनावी धाँधली की वजह से उनका मोहभंग हुआ। 1986 में गठित इस्लामिक स्टूडेंट्स लीग के चार प्रमुख सदस्यों – अब्दुल हमीद शेख, अश्फ़ाक माज़िद वानी, जावेद अहमद मीर और यासीन मलिक – जिन्हें हाजी ग्रुप कहा जाता था, ने एमयूएफ के समर्थन में चुनाव प्रचार किया था। यहाँ तक कि हिजबुल मुजाहिद्दीन का मुखिया सैयद सलाहुद्दीन जिसका असली नाम मोहम्मद यूसुफ शाह है, ने भी एमयूएफ़ के उम्मीदवार के रूप में 1987 के चुनाव में भागीदारी की थी। 1987 के चुनावों में भारी धाँधली के बाद कश्मीर में जो जनउभार देखने को आया उसके पीछे पिछले 40 सालों का कुशासन, आर्थिक बदहाली, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार भी प्रमुख कारण थे। 1988 में बिजली की दरों में वृद्धि के खि़लाफ़ प्रदर्शन के दमन से कश्मीर घाटी की जनता में ज़बरदस्त आक्रोश देखने को आया। उसी साल मकबूल बट की बरसी पर पुलिस ने कश्मीरी आज़ादी के समर्थकों पर अन्धाधुन्ध गोलियाँ चलायीं। यही वह दौर था जब पाकिस्तान ने अफ़गानिस्तान में अमेरिका की मदद से सोवियत संघ के ख़‍िलाफ़ लड़ाई में प्रशिक्षित मुजाहिद्दीनों को कश्मीर में जेहाद के लिए भेजना शुरू किया और कश्मीर की आज़ादी के संघर्ष को इस्लामिक कट्टरपन्थी रंग देने की कुटिल चाल चली जिसने कश्‍मीर की आज़ादी के संघर्ष को नुक़सान पहुँचाने के अलावा अल्‍पसंख्‍यक कश्‍मीरी पण्डितों के ख़‍िलाफ़ नफ़रत फैलाने में प्रमुख भूमिका अदा की।

इस सन्‍दर्भ के बिना 1989-90 में हुई कश्‍मीरी पण्डितों की हत्‍याओं और उसके बाद हुए उनके पलायन को समझा ही नहीं जा सकता है। लेकिन ‘द कश्‍मीर फ़ाइल्‍स’ का मक़सद यह समझाना नहीं बल्कि लोगों की रगों में नफ़रत का ज़हर फैलाना है। इसीलिए इस फ़‍िल्‍म में कश्‍मीर के इस समकालीन इतिहास को पूरी तरह से ग़ायब कर दिया गया और इतिहास के नाम पर चयनित ढंग से कश्‍मीर के प्राचीन इतिहास के गौरव और मध्‍यकालीन सामन्‍ती मुस्लिम शासकों की बर्बरता के क़‍िस्‍से सुनाये गये हैं जिनका वर्तमान कश्‍मीर समस्‍या और कश्‍मीरी पण्डितों के पलायन से कोई रिश्‍ता नहीं है और जो संघ की शाखाओं से उधार लिये गये हैं। यह पूरा ब्‍योरा संघ के ‘हिन्‍दू ख़तरे में है’ और ‘इस्‍लाम है ही कट्टर’ के प्रोपागैण्‍डा के अनुरूप है।     

फ़‍िल्‍म में समूची कश्‍मीरी मुस्लिम आबादी को एक एकाश्‍मी समूह के रूप में दिखाया गया है, सभी कश्‍मीरी मुस्लिम किरदार या तो कश्‍मीरी पण्डितों के ख़ून के प्‍यासे हैं या उनकी सम्‍पत्ति हड़पने के लिए लालायित हैं या उनकी महिलाओं पर बुरी नज़र रखते हैं। मुस्लिम बच्‍चे पाकिस्‍तान क्रिकेट टीम के समर्थक हैं, मुस्लिम महिलाएँ राशन डिपो पर पूरे अनाज पर क़ब्‍ज़ा कर लेती हैं ताकि पण्डितों को राशन न मिले। मुस्लिम पड़ोसी पण्डितों के भागने का इन्‍तज़ार करते हैं ताकि उनकी सम्‍पत्ति पर क़ब्‍ज़ा कर सकें। मौलवी की बुरी नज़र पण्डित महिलाओं पर रहती है। हालाँकि 1990 में जब पण्डितों के ख़‍िलाफ़ नफ़रत अपने चरम पर थी तब कश्‍मीरी मुस्लिम आबादी ऐसे लोगों की मौजूदगी और इस प्रकार की चन्‍द घटनाओं से इन्‍कार नहीं किया जा सकता है क्‍योंकि ऐसी घटनाओं के कुछ संस्‍मरण मौजूद हैं, लेकिन उस दौर के जितने भी संस्‍मरण, रिपोर्टें मौजूद हैं जिनमें कश्‍मीरी पण्डितों के भी संस्‍मरण शामिल हैं वे यह भी बताते हैं कि तमाम कश्‍मीरी मुस्लि‍मों ने पण्डितों को बचाया भी था और वे नहीं चाहते थे कि पण्डित घाटी छोड़कर जाएँ। लेकिन ‘द कश्‍मीर फ़ाइल्‍स’ में ऐसा एक भी मुस्लिम किरदार नहीं मौजूद है जो पण्डितों के पलायन से दुखी हो। कारण साफ़ है कि ऐसे किरदार के होने से नफ़रत का असर थोड़ा कम हो जाता।

फ़‍िल्‍म में निहायत ही शातिराना ढंग से यह सच्‍चाई भी पूरी तरह से छिपा दी गयी है कि जिस दौर में कश्‍मीरी पण्डितों पर हमले हो रहे थे उस समय तमाम कश्‍मीरी मुस्लिमों को भी निशाना बनाया गया था जिनमें नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस के नेताओं के अलावा मीरवाइज़ मोहम्‍मद फ़ारूख़ जैसे कई नरमपन्‍थी अलगाववादी नेता और आम कश्‍मीरी मुस्लिम भी शामिल थे। पाकिस्‍तानपरस्‍त इस्‍लामिक कट्टरपन्थियों के निशाने पर वे सभी लोग थे कश्‍मीर के पाकिस्‍तान में मिलने मिलने का विरोध कर रहे थे, चाहे वो भारत के नज़रिये से विरोध कर रहे हों या कश्‍मीर की आज़ादी के नज़रिये से। आतंकवाद के दौर में कश्‍मीरी पण्डितों से कई गुना ज्‍़यादा कश्‍मीरी मुस्लिमों की मौतें हुईं। लेकिन अगर विवेक अग्निहोत्री इस सच्‍चाई को अगर दिखाने लग जाते तो मुस्लिमों के ख़‍िलाफ़ नफ़रत कैसे फैला पाते और कश्‍मीर समस्‍या को हिन्‍दू बनाम मुस्लिम की लड़ाई के रूप में कैसे दिखा पाते!

फ़‍िल्‍म के एक दृश्‍य में जेएनयू में जब प्रो. राधिका मेनन कश्‍मीर में भारतीय सेना द्वारा किये गये ज़ुल्‍म की चर्चा करते हुए कश्‍मीर में पायी गयी 7000 से भी ज्‍़यादा गुमनाम कब्रों का हवाला देती है तो फ़‍िल्‍म का मुख्‍य किरदार कृष्‍णा फौरन बोल पड़ता है कि ‘व्‍हाट अबाउट बट मज़ार’? जब प्रो. पूछती है कि बट मज़ार क्‍या है तो वह बताता है कि जहाँ एक लाख कश्‍मीरी हिन्‍दुओं का डल लेक में डुबोकर मार डाला गया। इतने लोग मरे कि सिर्फ़ उनके जनेऊ से ही 7 बड़े टीले बन गए थे। यह दृश्‍य व्‍हाटअबाउटरी की टिपिकल संघी शैली का उदाहरण है। इसमें बड़ी ही चालाकी से आज के कश्‍मीर में हुए ज़ुल्‍म के बरक्‍स मध्‍यकाल की किसी घटना को रख दिया जाता है और उसका समय जानबूझकर नहीं बताया जाता ताकि दर्शकों को ऐसा लगे कि आधुनिक कश्‍मीर में पण्डितों के साथ ऐसी घटना घटी हो और उनका दिल कश्‍मीरी मुस्लिमों के प्रति नफ़रत से भर उठे।   

फ़‍िल्‍म में धूर्ततापूर्ण तरीक़े से यह सच्‍चाई भी छिपायी गयी है कि जिस दौर में कश्‍मीरी पण्डितों के साथ सबसे घृणित अपराध हुए उस समय दिल्‍ली में वी.पी.सिंह की सरकार थी जो भाजपा के समर्थन के बिना एक दिन भी नहीं चल सकती थी। लेकिन भाजपा ने कश्‍मीरी पण्डितों पर होने वाले ज़ुल्‍मों के मुद्दे पर सरकार से समर्थन वापस नहीं लिया। फ़‍िल्‍म में उस दौर को कुछ इस तरह से प्रस्‍तुत किया गया है मानो उस समय राजीव गाँधी की कांग्रेसी सरकार हो। यह भी दिखाता है कि फ़‍िल्‍मकार का मक़सद सच दिखाना नहीं बल्कि संघ परिवार का प्रोपागैण्‍डा फैलाना है।

वी.पी. सिंह की सरकार 2 दिसम्‍बर 1989 में सत्‍ता में आयी थी और 8 दिसम्‍बर को कश्‍मीरी मिलिटेंट्स ने उस सरकार में गृहमंत्री मुफ़्ती मोहम्‍मद सईद की बेटी रूबिया सईद का अपहरण कर लिया था। भारत सरकार ने गृहमंत्री की बेटी को छोड़ने की एवज में 5 मिलिटेंट्स को रिहा किया था जिसके बाद से कश्मीर घाटी में मिलिटेंट्स का बोलबाला हो गया था और कश्‍मीरी पण्डितों की हत्‍याओं में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई थी। 18 जनवरी 1990 को फ़ारूख़ अब्‍दुल्‍ला की सरकार इस्‍तीफ़ा देती है और कश्‍मीर में दूसरी बार राज्‍यपाल के पद पर कुख्‍यात जगमोहन को नियुक्‍त किया जाता है। कई कश्‍मीरी पण्डित समेत तमाम पत्रकारों और विश्‍लेषकों का यह मानना है कि जगमोहन ने स्‍वयं कश्‍मीरी पण्डितों को घाटी छोड़ने के लिए कहा और उनके पलायन के लिए गाड़‍ियाँ तक मुहैया करायीं ताकि उन्‍हें घाटी में निर्ममता से सुरक्षा बलों का इस्‍तेमाल करने का बहाना मिल जाये। हालाँकि यह व्‍याख्‍या विवादास्‍पद है लेकिन इतना तो तय है कि जगमोहन के कार्यकाल में कश्‍मीरी पण्डितों को सुरक्षित माहौल नहीं मिल पाया जिसकी वजह से पण्डितों को पलायन होने पर मजबूर होना पड़ा। उस समय जम्‍मू व कश्‍मीर में तैनात वरिष्‍ठ नौकरशाह वजाहत हबीबुल्‍लाह ने लिखा है कि घाटी के कई मुस्लिमों ने उनसे कश्‍मीरी पण्डितों के पलायन को रोकने की गुहार लगायी थी जिसके बाद उन्‍होंने जगमोहन से आग्रह किया था कि वे दूरदर्शन के प्रसारण के माध्‍यम से कश्‍मीरी पण्डितों को घाटी न छोड़ने के लिए कहें। लेकिन जगमोहन ने ऐसा करने की बजाय यह घोषणा की कि अगर कश्‍मीरी पण्डित घाटभ्‍ छोड़ते हैं तो उनका इन्‍तज़ाम शरणार्थी शिविर में किया जाएगा और सरकारी कर्मचारियों को उनकी तनख्‍़वाहें मिलती रहेंगी। फ़‍िल्‍म में पण्डितों को घाटी में सुरक्षा का आश्‍वासन देने की बजाय उनके पलायन को बढ़ावा देने में जगमोहन की भूमिका पर भी पूरी तरह से पर्दा डाला गया है। इसी तरह फ़‍िल्‍म में 19 जनवरी 1990 को श्रीनगर में कश्‍मीरी पण्डितों पर हुए हमलों और उनके ख़‍िलाफ़ नफ़रत से भरी नारेबाज़ी को विस्‍तार से दिखाया है लेकिन इस सच्‍चाई को छिपा दिया है कि उसके दो दिन बाद ही श्रीनगर के गौकदल पुल के पास सीआरपीएफ़ की अँधाधुँध गोलीबारी में 50 से अधिक कश्‍मीरियों की जान चली गयी थी जिसके बाद से घाटी का माहौल और ख़राब हो गया था।

मुस्लिमों के अलावा ‘द कश्‍मीर फ़ाइल्‍स’ द्वारा प्रसारित नफ़रत का दूसरा प्रमुख निशाना वामपन्थी हैं। फ़‍िल्‍म में पल्‍लवी जोशी ने जेएनयू की एक प्रो. राधिका मेनन का किरदार निभाया है। पल्‍लवी जोशी ने अपने एक इण्‍टरव्‍यू में कहा है कि इस किरदार को उन्‍होंने इस कदर निभाया है कि लोग उससे बेइन्‍तहाँ नफ़रत करें। इस प्रोफ़ेसर को देश के ख़‍िलाफ़ काम करने वाले एक कुटिल व्‍यक्ति के रूप में पेश किया गया है जो अपने छात्रों का ‘ब्रेनवाश’ करके उन्‍हें भारत के ख़‍िलाफ़ काम करने के लिए प्रेरित करती है। वह अपनी खुली कक्षा में कश्‍मीर की आज़ादी की बात करती है और उसके छात्र भारत के टुकड़े करने के नारे लगाते हैं। यह 2016 में जेएनयू प्रकरण का संघी कैरिकेचर है जिसे विवेक अग्निहोत्री ने बेशर्मी के साथ दिखाया है।

इतना ही नहीं फ़‍िल्‍म में संघ परिवार द्वारा फैलाये जा रहे ‘वामपन्‍थी-जेहादी गँठजोड़’ के फ़र्जी नरेटिव को भी हास्‍यास्‍पद ढंग से पेश किया है। प्रोफ़ेसर राधिका अपने छात्र कृष्‍णा को कश्‍मीरी आतंकी बिट्टा कराटे से मुलाक़ात करने के लिए भेजती है। बिट्टा के घर में एक तस्‍वीर दिखायी जाती है जिसमें बिट्टा राधिका का हाथ पकड़े हुए है। इस दृश्‍य की प्रेरणा कुछ साल पहले अरुन्‍धति रॉय और यासीन मलिक की एक तस्‍वीर से ली गयी है जिसे संघियों द्वारा बेशर्मी के साथ वायरल किया गया था। यह दृश्‍य विवेक अग्निहोत्री सहित समूचे संघ परिवार के के घोर स्‍त्री-विरोधी चरित्र को भी सामने लाता है। इसके ज़रिये दोनों के बेहद क़रीबी रिश्‍ते को दिखाया गया है ताकि दर्शक आज़ादी के बात करने वाले वामपन्थि‍यों से रोम-रोम तक नफ़रत करने लगें। बिट्टा कृष्‍णा को जेएनयू के प्रेसिडेंट का चुनाव लड़ने के लिए बधाई देता है और जाते समय उसे पिस्‍तौल थमाता है। जेएनयू के ज़रिये फ़‍िल्‍मकार समूचे वामपन्‍थ के प्रति लोगों में नफ़रत पैदा करने की कोशिश की है। दर्शकों के दिमाग़ में यह कनेक्‍शन बना रहे इसलिए जेएनयू के दृश्‍यों की पृष्‍ठभूमि में मार्क्‍स,लेनिन व माओ आदि की तस्‍वीरें प्रमुखता से उभारी गयी है।      

फ़‍िल्‍म में शातिराना ढंग से मुख्‍य किरदार में बिट्टा कराटे और यासीन मलिक के किरदारों को गड्डमड्ड कर दिया गया है ताकि दर्शक कश्‍मीरी अलगाववादियों को हद दर्जे का बर्बर और दोगले इन्‍सान समझकर उनसे बेइन्‍तहाँ नफ़रत करें। एक ओर बिट्टा 20 से ज्‍़यादा पण्डितों की हत्‍या की बात कबूलता है वहीं दूसरी ओर वह गाँधीवादी ढंग से स्‍वतंत्रता आन्‍दोलन छेड़ने की बात करता है और वामपन्थियों के साथ गँठजोड़ करके भारत के ख़‍िलाफ़ साज़‍िश रचता है। फ‍़‍िल्‍म में इतिहास के साथ ज्‍़यादती करते हुए 2003 में कश्‍मीर के पुलवामा ज़‍िले के नदीमार्ग में हुए कश्‍मीरी पण्डितों के क़त्‍लेआम को 1990 के दशक में कश्‍मीरियों के पलायन की निरन्‍तरता में दिखाया गया है और उसे भी जेकेएलफ़ के बिट्टा कराटे द्वारा अंजाम देते हुए दिखाया गया है। सच तो यह है कि नदीमार्ग क़त्‍लेआम जेकेएलएफ़ की नहीं बल्कि लश्‍करे तोइबा की कारगुज़ारी थी। इतिहास के साथ किये गये इस घालमेल के पीछे भी फ़‍िल्‍मकार का मक़सद कश्‍मीर की आज़ादी के लिए चल रहे संघर्ष करने वाले सभी संगठनों और सभी व्‍यक्तियों को हैवान बताकर दर्शकों के मन में नफ़रत पैदा करना है। फ़‍िल्‍म के अन्तिम दृश्‍य में नदीमार्ग गाँव के सभी कश्‍मीरी पण्डितों को लाइन में खड़ा करके उनमें से सभी को एक-एक करके गोली से मारने का वीभत्‍स दृश्‍य दिखाया गया है और सबसे अन्‍त में बर्बर ढंग से बच्‍चे को मारते हुए दिखाया गया है ताकि दर्शक फ़ि‍ल्‍म को देखकर समूची कश्‍मीरी मुस्लिम आबादी के ख़‍िलाफ़ बेइन्‍तहाँ नफ़रत की भावना लेकर बाहर निकलें।    

फ़‍िल्‍म में अनुपम खेर के किरदार की काफ़ी प्रशंसा की जा रही है। लेकिन इस किरदार के ज़रिये भी फ़‍िल्‍मकार ने चालाकी से नरेन्‍द्र मोदी को कश्‍मीरी पण्डितों के मसीहा बताने के संघी झूठ का एक नमूना पेश किया है। पुष्‍कर नाथ नामक यह किरदार घाटी से पलायन के बाद कश्‍मीर से धारा 370 को हटाने को अपने जीवन का एकमात्र उद्देश्‍य बना लेता है। ऐसा दिखाने का मक़सद दर्शकों के मन में यह भ्रान्ति पैदा करना है कि मोदी सरकार द्वारा कश्‍मीर से धारा 370 के हटाने से कश्‍मीरी पण्डितों को न्‍याय मिल गया है। सच तो यह है कि अनुपम खेर जै

चुनाव बारे

 1.

सर्वाधिक ग़रीब आबादी के लिए ख़ैराती कल्याणकारी नीतियों और हिन्दुत्व का घातक मिश्रण***
2.
ग़ैर-जाटव दलित और ग़ैर-यादव पिछड़ी जातियों के और आंशिक तौर पर जाटव दलित आबादी के वोट का बड़े पैमाने पर भाजपा को जाना कोई जातिगत परिघटना नहीं बल्कि वर्गीय परिघटना है***
3
भाजपा की जीत में बसपा की अहम भूमिका : आज के दौर में अम्बेडकरवादी व्यवहारवाद का तार्किक परिणाम***
4
झूठे प्रचार को अनन्त दुहराव के ज़रिए सच के तौर पर स्थापित करने की भाजपा की रणनीति***
5
उत्तर प्रदेश के कुलकों-धनी किसानों ने जमकर किया भाजपा का समर्थन**

Sunday, February 6, 2022

Budget



THE finance  minister  presented  the Budget 2022 in the backdrop of an economic scenario when majority of  the  people  are  facing  job  loss  and  huge  cuts in real income.
   GDP in the current
financial year is estimated to marginally cross the pre pandemic levels. The  private consumption expenditure is still short of the pre-pandemic levels and industries are facing low capacity utilisation and rising inventories primarily because of very low demand in  the  economy. 
    In  such  a  scenario  what was  needed in the  budget was a big push towards job creation  and increasing domestic demand. The budget fails patently in addressing these issues.  What was required was introducing an urban employment guarantee scheme.
        On  the  contrary,  it  has  cut down expenditure by Rs 25,000 crores in MGNREGS and reduced food, fuel and fertilizer subsidies and also the allocations in health and rural development.
       The budget has proposed a growth in total expenditure by Rs 1,74,909 crores from the revised estimates of  202122 but as  percentage of GDP the total expenditure  has  come  down  from  17.8 per  cent  in  2020-21  to  15.3  per  cent  in 2022-23  budget  estimates.   
         The  growth of revenue receipts has primarily grown as corporates were able to accumulate profits  during  the  pandemic  reflected through increased corporation tax realisation and also  garnered  through GST and hike in petroleum prices from indirect taxes  levied  upon  common people.
         However  the growth of expenditure is far short from the growth of revenue receipts and in real terms is even  less  than  what  it  was  in  last  year’s revised estimates. The  squeeze  on  expenditure  is not merely in the central government expenditure. By squeezing the  transfer of resources to states, the state governments are also being forced to do the same.
         These transfers are to  come down from 6.91 per cent of GDP in RE  2021-22  to  6.25  per  cent  in  2022-23. Allocations  to  all  major  schemes for farmers have seen a budget cut. The allocation for procurement to FCI and under decentralisation procurement scheme  has  been  reduced  by  about  28 per cent at a time when farmers are struggling for a legally guaranteed  MSP.
     Allocation of funds for fertilizer subsidy has been reduced by 25 per cent.  Under PM-KISAN, 12.5 crore farmer households are supposed to be provided Rs 6000 each which requires  an allocation of Rs 75,000 crores.  However,  only  Rs  68,000  crores  have been allocated. Allocation for the crop insurance scheme has also fallen by about Rs 500 crores.
        In all the recent years, government has not spent even the meagre allocation for welfare of children. The revised estimates for expenditure on welfare of children is Rs 5,700 crores less than what was budgeted. Nothing has been done to help children cope with the devastating impact of closure of schools and anganwadis.
    Allocation of funds for the welfare of Scheduled Castes and Scheduled Tribes shows a marginal increase in absolute figures but factoring inflation it has come down in real terms.
       Similarly, the renaming of mid-day meal scheme as PM Poshan could not raise the  allocation from Rs 10,234 crores  despite of 35 per cent of children not receiving MDM during the last year.
    The finance minister talked about Narishakti upgrading two lakh anganwadis but the allocation is frozen at the revised estimates at Rs 20,000 crores. Over the last two years, there has been a huge cut in LPG subsidy. Last year, allocation was cut by 60 per cent and another 60 per cent cut has been inflicted in the budget for 2022-23.
        No new allocation has been budgeted for the unorganised workers who were registered through e-shram portals. During the last two years of  pandemic, the rich have become richer.  According to Oxfam, wealth of India’s richest families reached a record high in 2021. 
       The top ten people in India  hold 57 per cent of the wealth.  Yet, there is no proposal to impose tax on these super profits and use these resources to provide relief to the vast majority of suffering people. Therefore, the budget 2022-23 has completely failed in identifying the priorities to provide relief for the common people.  It is a betrayal.
         The Polit Bureau of the CPI(M) calls upon the people to protest against this anti-people, pro-corporate budget demanding direct cash transfer of Rs 7,500 per month to all families outside the income tax bracket and distribution of free food kits. Budget 2022-23 ... contd from front pg

यह बजट किसका बजट

        यह बजट किसका बजट

वित्त मंत्री ने आर्थिक परिदृश्य की पृष्ठभूमि में 2022 का बजट पेश किया, जब अधिकांश लोगों को नौकरी छूटने और वास्तविक आय में भारी कटौती का सामना करना पड़ रहा है।
वर्तमान में सकल घरेलू उत्पाद वित्तीय वर्ष पूर्व महामारी के स्तर को मामूली रूप से पार करने का अनुमान है। निजी उपभोग व्यय अभी भी पूर्व-महामारी के स्तर से कम है और उद्योगों को कम क्षमता उपयोग और बढ़ती सूची का सामना करना पड़ रहा है, जिसका मुख्य कारण अर्थव्यवस्था में बहुत कम मांग है।
     ऐसे परिदृश्य में बजट में जिस चीज की जरूरत थी, वह थी रोजगार सृजन की दिशा में एक बड़ा धक्का और घरेलू मांग में वृद्धि। बजट इन मुद्दों को हल करने में पूरी तरह विफल है। शहरी रोजगार गारंटी योजना शुरू करने की आवश्यकता थी।
    इसके विपरीत, इसने मनरेगा में 25,000 करोड़ रुपये की कटौती की है और खाद्य, ईंधन और उर्वरक सब्सिडी और स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास में आवंटन में भी कमी की है।
     बजट ने 2021-22 के संशोधित अनुमानों से कुल व्यय में 1,74,909 करोड़ रुपये की वृद्धि का प्रस्ताव किया है, लेकिन सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के रूप में कुल व्यय 2020-21 में 17.8 प्रतिशत से घटकर 2022-23 बजट अनुमानों में 15.3 प्रतिशत हो गया है।
         राजस्व प्राप्तियों की वृद्धि मुख्य रूप से बढ़ी है क्योंकि कॉरपोरेट कर की वसूली में वृद्धि के माध्यम से परिलक्षित महामारी के दौरान कॉरपोरेट मुनाफा जमा करने में सक्षम थे और जीएसटी के माध्यम से और आम लोगों पर लगाए गए अप्रत्यक्ष करों से पेट्रोलियम की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण भी।
        हालांकि व्यय की वृद्धि राजस्व प्राप्तियों की वृद्धि से बहुत कम है और वास्तविक रूप में पिछले वर्ष के संशोधित अनुमानों की तुलना में भी कम है। खर्च पर निचोड़ केवल केंद्र सरकार के खर्च में नहीं है। राज्यों को संसाधनों के हस्तांतरण को निचोड़ कर राज्य सरकारों को भी ऐसा करने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
      ये हस्तांतरण आरई 2021-22 में सकल घरेलू उत्पाद के 6.91 प्रतिशत से कम होकर 2022-23 में 6.25 प्रतिशत होना है। किसानों के लिए सभी प्रमुख योजनाओं के आवंटन में बजट में कटौती हुई है। एफसीआई और विकेंद्रीकरण खरीद योजना के तहत खरीद के लिए आवंटन में लगभग 28 प्रतिशत की कमी की गई है, ऐसे समय में जब किसान कानूनी रूप से गारंटीकृत एमएसपी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
     उर्वरक सब्सिडी के लिए धन आवंटन में 25 प्रतिशत की कमी की गई है। PM-KISAN के तहत, 12.5 करोड़ किसान परिवारों को प्रत्येक को 6000 रुपये प्रदान किए जाने चाहिए, जिसके लिए 75,000 करोड़ रुपये के आवंटन की आवश्यकता है। हालांकि, केवल 68,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। फसल बीमा योजना के आवंटन में भी करीब 500 करोड़ रुपये की गिरावट आई है।
      हाल के सभी वर्षों में, सरकार ने बच्चों के कल्याण के लिए मामूली आवंटन भी खर्च नहीं किया है। बच्चों के कल्याण पर खर्च का संशोधित अनुमान बजट से 5,700 करोड़ रुपये कम है। स्कूलों और आंगनबाड़ियों को बंद करने के विनाशकारी प्रभाव से निपटने में बच्चों की मदद करने के लिए कुछ भी नहीं किया गया है।
   अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के लिए धन का आवंटन निरपेक्ष आंकड़ों में मामूली वृद्धि दर्शाता है लेकिन मुद्रास्फीति को ध्यान में रखते हुए यह वास्तविक रूप से नीचे आ गया है।
     इसी तरह, पिछले वर्ष के दौरान एमडीएम प्राप्त न करने वाले 35 प्रतिशत बच्चों के बावजूद, मध्याह्न भोजन योजना का नाम बदलकर पीएम पोषण 10,234 करोड़ रुपये से आवंटन नहीं बढ़ा सका।
     वित्त मंत्री ने नारी शक्ति को दो लाख आंगनबाड़ियों के उन्नयन की बात कही, लेकिन आवंटन संशोधित अनुमानों पर 20,000 करोड़ रुपये पर रुका हुआ है। पिछले दो वर्षों में एलपीजी सब्सिडी में भारी कटौती की गई है। पिछले साल, आवंटन में 60 प्रतिशत की कटौती की गई थी और 2022-23 के बजट में एक और 60 प्रतिशत की कटौती की गई थी।
    ई-श्रम पोर्टल के माध्यम से पंजीकृत असंगठित श्रमिकों के लिए कोई नया आवंटन बजट नहीं किया गया है। महामारी के पिछले दो वर्षों के दौरान, अमीर और अमीर हो गए हैं। ऑक्सफैम के मुताबिक, भारत के सबसे अमीर परिवारों की संपत्ति 2021 में रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई।
      भारत में शीर्ष दस लोगों के पास 57 प्रतिशत संपत्ति है। फिर भी, इन अत्यधिक लाभ पर कर लगाने और पीड़ित लोगों के विशाल बहुमत को राहत प्रदान करने के लिए इन संसाधनों का उपयोग करने का कोई प्रस्ताव नहीं है। इसलिए बजट 2022-23 आम लोगों को राहत देने की प्राथमिकताओं की पहचान करने में पूरी तरह विफल रहा है। यह एक विश्वासघात है।
    
 
    
  
  
         
      
      
   
     

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