Saturday, February 4, 2023

गाम के गाम मैं ब्याह का मामला

गाम के गाम मैं ब्याह का मामला 
आजकल लोगां नै समाज की बहोत चिन्ता होरी सै। रमलू, ठमलू, नफे, सते, फते, सरिता, सविता, बबीता अर ताई धमलो पाछै क्यों रहवैं थे। रमलू बोल्या—आजकल गिहूं की पैदावार किल्लेवार कम होगी। मजे की बात कोन्या रही खेती मैं। बस धिंगताना सा होरया सै। ठमलू बोल्या—सही कहवै सै रमलू। पैदावार कम होगी, खेती मैं इस्तेमाल होवण आली चीजां की कीमत दस गुणा बधगी। जीना मुश्किल होग्या। गाभरु छोरे अर बहू सल्फास की गोली खा-खा कै मरण लागरे सैं। सरिता बोली—या सल्फास की गोली तो बनावनी ए बन्द कर देनी चाहिए। नफे बोल्या—म्हारी कौण सुनै सै। सविता बोली—बिना बात की बातां पर काटकड़ उतरया रहवै सै। अर सल्फास की गोली की कान्ही किसे का ध्यानै कोन्या जात्ता। सते बीच मैं बोल पडय़ा—समाज का सत्यानाश होण मैं कसर तो किमै रही नहीं। सरिता बोली—समाज शब्द का इस्तेमाल बहोत होरया सै आजकल। समाज तै तेरा के मतलब सै? नफे बोल्या—समाज का मतलब म्हारा समाज। म्हारे का मतलब ईब तम लाल्यो। सते—के मतलब लावां? समाज का मतलब हरियाणे का समाज? नफे—हां न्यों बी कहया जा सकै सै। पर…। सविता बोली—पर के खोल कै बता के कहना चाहवै सै। सरिता बोली—मैं जानूं सूं इस नफे नै सारी हान घुमा फिरा कै बात करैगा। नफे बोल्या—अरै क्यूं मेरा मुंह खुलवाओ सो। हरियाणा मैं समाज का मतलब जाट समाज तै न्यारा और के हो सकै सै? सरिता बोली—फेर म्हारा बाहमनां का समाज कित जागा? फते बोल्या—म्हारे दलितां के समाज की तो पहलमैं जागां कोन्या गांव के समाज मैं रही सही कसर नफे नै पूरी करदी। बबीता बोली—म्हारे पंजाबियों के तो कई गांव हैं हरियाणा में, हमारे रीति-रिवाजों का क्या होगा? रमलू बी कहने लाग्या—भाई गोत की गोत मैं ब्याह तो कति बी गले तै तलै कोन्या उतरै। नफे  बोल्या --पर यो आसन गाम का मसला तो गोत की गोत का  कोन्या।  सत्ते  बोल्या -- गाम की  गाम का मामला सै । 
              रमलू  बोल्या --गांव की गांव मैं ब्याह क्यूकर पुगैगा? सीम कै लागते भाईचारे का हिसाब बी देखना पडैग़ा। सरिता बोली—तूं बी रमलू इन खापियां की भाषा बोलता दीखै सै। मनै न्यूं बता कितने के ब्याह होलिए गोत की गोत मैं? रमलू—घणे तो हुए कोन्या एकाध हुआ सै। फेर ये तो लीख गेरण लागरे सैं। इनका इन्तजाम तो पहलमैं करना होगा। सरिता—आच्छा रमलू न्यूं बता इन खापां का असर कितने के जिल्यां मैं होगा? रमलू गिनावण लाग्या—रोहतक, जीन्द, कैथल, पानीपत, करनाल, कुरुक्षेत्र, सोनीपत अर झज्जर। फेर अटकग्या। सरिता—ये तो आठ हुए। बेरा सै कितने जिले सैं हरियाणा मैं? रमलू —19 । सरिता बोली—कौन-सी दुनिया मैं रहवै सै। 21  जिले सैं हरियाणा मैं। बाकी जिले तो शामिल कोन्या थारे इस अभियान मैं। अर इन आठ जिल्यां मैं भी ना तो पंडितां की या समस्या, ना बनिया की या समस्या,ना पंजाबियां की या समस्या। ना दलितां की या समस्या। फेर तो नफे की बात सही लागै सै अक या जाट समुदाय की समस्या सै। पूरे हरियाणा  वासियां की समस्या तो सै कोन्या इनके रीति रिवाजां के हिसाब तैं। नफे बोल्या—हरियाणा इज नॉट इक्वल टू पंजाबी,बनिया और दलित—हरियाणा इज इक्वल टू जाट। नहीं मानै जो बात जाट की, बस तैयारी करल्यो बाईकाट की। जाट ईब कानून गेल्यां फाईट करै, साथ ना दे जो ढिबरी इसकी टाइट करैं। विरोधी का बहिष्कार डे नाइट करै, लैफ्ट के समझै सै इसनै बी राईट करै। चुन्नी उढ़ा बहु बनाल्यां चलै दस्तूर म्हारा, सात फेरे बी उकाल्यां के करले वेद थारा। सरिता बोली—नफे तूं तो इतना बावला ना था जितनी बावली बात तूं आज करण लागरया सै। मान लिया हरियाणा मैं जाट मैजोरिटी मैं सैं फेर इसका मतलब यो तो कोन्या एक सब पर अपना लंगोट घुमाओगे।
            सरिता  फेर  बोली ---हरियाणा मैं बी इसे कई गांव सैं जित गांव की गांव मैं ब्याह हो सैं। हरियाणा मैं बी कई समुदाय सैं जित मामा-बुआ के बालकां मैं ब्याह होंसैं। बनिया अर बाहमनां के के गोत की गोत मैं ब्याह के अपवाद के नहीं होत्ते? होसैं फेर उनमैं बालकां नै मारण का रिवाज कोन्या। लचीलापन सै। बालकां का ब्याह करवादें सैं। नफे बोल्या—फेर तो उनकै तो गोत की गोत मैं शादियां की ग्लेट-सी लागती होंगी। सरिता बोली—तेरे गाम के बाहमनां मैं अर बनियां मैं के हाल सै? तनै बेरा सै। बात का बतंगड़ मत बनाओ इस गोत के गोत मैं ब्याह नै अर इसनै अपवाद मानकै दूसरी कौमां की ढालां लचीलापन ल्याओ। बख्त की मांग तो याहे सै नफे सिंह बाकी तूं जानै अर थारे नेता जानैं। जनता की आवाज तो याहे सै जो मैं कहरी सं। फेर थारी समझ मैं कोन्या आवै। नफे तेरी बुद्धि पर तरस आवै सै मनै ।  अर  गाम की गाम मैं  दो जात्यां के बीच मैं तो रोला कति  ऐ नहीं होना चाहिए बाकि थाम के मानो सो विवेक की बात नै । 

कश्मीर फ़िल्म बारे

 प्रेमसिंह सियाग जी की वाल से-

कश्मीर फाइल्स के नाम पर बनी फिल्म आजकल चर्चाओं में है।

मेरे आज तक यह समझ नहीं आया कि कोई बिना संघर्ष के कैसे  अपनी विरासत छोड़कर भाग सकता है!

किसानों की जमीनों पर आंच आई तो 13 महीने तक सब कुछ त्यागकर दिल्ली के बॉर्डर पर पड़े रहे।

कश्मीर घाटी में आज भी जाट-गुर्जर खेती कर रहे है।पीड़ित होने का रोना-धोना आजतक दिल्ली जंतर/मंतर आकर नहीं किया है।

1967 के बाद देश के बारह राज्यों में आदिवासियों को चुन-चुनकर मारा जा रहा है और कारण इतना ही बताया जाता है कि विकास के रास्ते में रोड़ा बनने वाले नक्सली लोगों को निपटाया जा रहा है।

आदिवासियों का नरसंहार कभी चर्चा का विषय नहीं बनता है।उनके विस्थापन का दर्द,पुनर्वास की योजनाओं पर कोई विमर्श नहीं होता।

सुविधा के लिए बता दूँ कि 1989 तक कश्मीरी पंडित बहुत खुश थे और हर क्षेत्र में महाजन बने हुए थे।

अचानक दिल्ली में बीजेपी समर्थित सरकार आती है और राज्य सरकार को बर्खास्त करके जगमोहन को राज्यपाल बना दिया जाता है।

कश्मीरी पंडितों पर जुल्म हुए और दिल्ली की तरफ प्रस्थान किया गया!

उसके बाद बीजेपी ने कश्मीरी पंडितों का मुद्दा मुसलमानों को विलेन साबित करने के लिए राष्ट्रीय मुद्दा बना लिया!

कांग्रेस सरकार ने जमकर इस मुद्दे को निपटाने के लिए सालाना खरबों के पैकेज दिए और जितने भी कश्मीरी पंडित पलायन करके आये उनको एलीट क्लास में स्थापित कर दिया।

साल में एक बार जंतर-मंतर पर आते,बीजेपी के सहयोग से ब्लैकमेल करते और हफ्ता वसूली लेकर निकल लेते थे।

8 साल से केंद्र में बीजेपी की प्रचंड बहुमत की सरकार है व कश्मीर से धारा 370 हटा चुके है लेकिन कश्मीरी पंडित वापिस कश्मीर में स्थापित नहीं हो पा रहे है!

धरने-प्रदर्शन से निकलकर हफ्तावसूली की गैंग फिल्में बनाकर पूरे देश को इमोशनल ब्लैकमेल करके वसूली का नया तरीका ईजाद कर चुकी है!

आदिवासी रोज अपनी विरासत को बचाने के लिए चूहों की तरह मारे जा रहे है लेकिन कभी संज्ञान नहीं लिया जाता।आज किसान कौमों को विभिन्न तरीकों से मारा जा रहा है लेकिन कोई चर्चा नहीं होती।

1995 के बाद आज तक तकरीबन 4लाख किसान व्यवस्था की दरिंदगी से तंग आकर आत्महत्या कर चुके है लेकिन पिछले 25 सालों में एक भी बार जंतर-मंतर पर कोई धरना नहीं हुआ,राष्ट्रीय मीडिया में विमर्श का विषय नहीं बना और केंद्र सरकार की तरफ से चवन्नी भी राहत पैकेज के रूप में नहीं मिली।

भागलपुर,पूर्णिया,गोदरा के दंगों से भी पलायन हुआ व देश के सैंकड़ों नागरिक मारे गए।मुजफरनगर नगर फाइल्स या हरियाणा जाट आरक्षण पर हरियाणा फाइल्स भी बननी चाहिए!

हर नागरिक की मौत का संज्ञान लिया जाना चाहिए।एक नागरिक की जान अडानी-अंबानी की संपदा से 100 गुणा कीमती है।हफ्ता-वसूली की यह मंडी अब खत्म होनी चाहिए।भावुक अत्याचारों का धंधा कब तक चलाया जाएगा?

किसान कौम के बच्चे बंदूक लेकर इनके घरों की सुरक्षा के लिए खड़े हो तब ये लोग बंगलों में जाएंगे!क्यों देश इनका नहीं है क्या?ये नागरिक के बजाय राष्ट्रीय दामाद क्यों बनना चाहते है?

भारत सरकार संसाधन दे रही है आर्मी तैनात है तो डर किससे है?जिससे खतरा है उनके खिलाफ लड़ो!जाट-गुज्जर कश्मीर घाटी में आज भी रह-रहे है उन्होंने कभी असुरक्षा को लेकर रोना-धोना नहीं किया है।

शहीद यादगार समिति हरियाणा

 आज़ादी की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर ’साझी विरासत बचाओ’ अभियान सफल बनाओ!


बहनो और भाइयो,
हम भारतवासी आज़ादी का 75वां साल मना रहे है। यह साल आज़ादी के आंदोलन को खासतौर पर याद करने का है।
आप जानते है कि अंग्रेज़ी हुकूमत से देश को आज़ाद करवाने के लिए भारतवासियों को लगभग 200 वर्ष लग गए। आज़ादी के लिए लड़े गए महासंग्राम में असंख्य लोगों ने कुर्बानियां दीं। देश के सभी इलाकों में तमाम भाषाभाषी, विभिन्न संस्कृतियों तथा अलग-अलग धर्मों के लोगों ने देश के मुक्ति आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। किसान, मज़दूर, छात्र, नौजवान, महिला, दलित इत्यादि सब वर्गों और तबकों से लोग अंग्रेज़ों के खिलाफ़ लड़ रहे थे। आज़ादी के आंदोलन की विभिन्न धाराओं और नेताओं के बीच वैचारिक-राजनीतिक संघर्ष और मंथन के साथ-साथ आज़ाद हिन्दुस्तान का खाका भी तैयार हो रहा था। अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद की लूट और फूट की राजनीति के खिलाफ़ तमाम विविधताओं के साथ पूरे देश को एकजुट करते हुए आंदोलन के नेताओं ने भारत को आधुनिक राष्ट्र बनाने का संकल्प पेश किया। जनता के इन महान संघर्षों से ही भारतीय राष्ट्रवाद का जन्म हुआ। अंग्रेज़ी साम्राज्य से मुक्ति हासिल कर आज़ाद भारत अस्तित्व में आया। साथ ही यह भी कड़वी ऐतिहासिक सच्चाई है कि आज़ादी के साथ देश का विभाजन भी हुआ और दोनों तरफ़ की आबादियों को भयंकर साम्प्रदायिक विभीषिका का शिकार होना पड़ा जिसके परिणाम आज भी हमें भुगतने पड़ रहे हैं .
तमाम तरह के विवादों और बाधाओं से निपटते हुए आज़ाद भारत ने संवैधानिक रूप से अपने आप को धर्मनिरपेक्ष, जनतांत्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित करने की शपथ ली। राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक न्याय तथा समानता और बंधुत्व कायम करने की महत्त्वपूर्ण उद्घोषणाएं की र्गइं लेकिन आज़ादी के बाद बीते इन 75 वर्षों के अनुभव ने साबित किया है कि इन्हें व्यवहार में लागू करने में हम विफल रहे हैं। नतीजतन आज एक ऐसी विडम्बनापूर्ण स्थिति उत्पन्न हुई है कि भारतीय राष्ट्रवाद के सार और संवैधानिक बुनियाद के ही ध्वस्त होने की चुनौती खड़ी हो गई है।
आज देश में वे ताकतें सत्ता पर काबिज़ हुई हैं जो न सिर्फ़ आज़ादी के आंदोलन से दूर रहीं बल्कि जिनका साम्राज्यवाद के साथ नाभिनाल का रिश्ता रहा और वे उनकी सहयोगी रहीं। 
इसमंे कोई शक नहीं कि कांग्रेस के पूंजीपरस्त, अवसरवादी और भ्रष्ट शासन के दलदल में ही भाजपा का कमल खिला है। पिछले 8 साल से भाजपा नेतृत्व की सरकार कायम है। भारतीय राष्ट्रवाद साम्राज्यवाद-विरोध की बुनियाद पर खड़ा हुआ था लेकिन आज देश साम्राज्यवाद का पिछलग्गू बन चुका है। हम साम्राज्यवादी सरगना अमेरिका के जूनियर रणनीतिक साझेदार बने हैं। स्वतंत्र विदेश नीति छोड़कर अमेरिकन साम्राज्यवाद के दबाव में ही नीतियां अपनाई जा रही हैं। साम्राज्यवादी पूंजी के सामने संवैधानिक राष्ट्रीय सम्प्रभुता का समर्पण करते हुए देश की प्राकृतिक एवं सार्वजनिक सम्पत्तियों तथा संसाधनों को देश-विदेश की बड़ी पूंजी के हवाले किया जा रहा है। नेशनल मोनेटाइज़ेशन पाइपलाइन पॉलिसी अथवा देश की तमाम परिसम्पत्तियों को देशी-विदेशी पूंजीपतियों के पास गिरवी रखने की नीति इसका जीता-जागता उदाहरण है। ऐतिहासिक किसान आंदोलन ने इस सरकार को कॉरपोरेट पूंजीपतियों की सरकार के रूप में बेनकाब किया है। भ्रष्टाचार को कानूनी जामा पहनाया गया है। चुनावी बॉण्ड के नाम पर देश-विदेश के पूंजीपतियों के सफ़ेद-काले धन को राजनीतिक चंदे के तौर पर मान्यता देते हुए भाजपा दुनिया की सबसे अमीर पार्टियों में शामिल हो गई है। कोरोना काल में आपदा प्रबंधन कोष की जगह प्रधानमंत्री केयर फ़ंड के नाम से प्राइवेट ट्रस्ट की स्थापना भी इसी का हिस्सा है। मुख्यधारा के मीडिया को आज गोदी मीडिया के नाम से जाना जाने लगा है। थोक में एमएलए और एमपी खरीदे गए हैं। सत्ता पक्ष द्वारा चुनावों में धांधलियां और बेशुमार दौलत का प्रयोग किया जा रहा है। चुनाव आयोग की पक्षपाती भूमिका तथा साम्प्रदायिक नफ़रत और ध्रुवीकरण के ज़रिये चुनाव आचार संहिताओं की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। हिन्दू महापंचायत और धर्मसंसदों के नाम पर जमावड़े इकट्ठे करके अल्पसंख्यकों की हत्याओं को जायज़ ठहराने और नरसंहार के आह्वान किए जा रहे हैं। यहां तक कि गांधी जी के हत्यारों का महिमामंडन करके उन्हें राष्ट्रनायकों के रूप में स्थापित करने की कुचेष्टा की जा रही है। इन तमाम कार्रवाइयों को शासक दल से प्रोत्साहन और संरक्षण प्राप्त है। गौहत्या, धर्म परिवर्तन, लव जिहाद आदि के नाम पर अफ़वाहें फैला कर संगठित आपराधिक गिरोहों द्वारा हमले और मॉबलिंचिंग की अनेक घटनाएं हुई हैं। महिलाओं, दलितों और आदिवासियों पर हिंसा और अपराध की घटनाओं में ज़बरदस्त बढ़ोत्तरी हुई है। ईडी, सीबीआई जैसी संस्थाओं का विपक्ष के खिलाफ़ दुरुपयोग, पैगासस जैसे जासूसी उपकरणों का न्यायधीशों, विपक्षी नेताओं, पत्रकारों, चुनाव आयुक्तों, बुद्धिजीवियों इत्यादि के खिलाफ़ दुरुपयोग किया गया है। बेकसूर और मासूम लोगों को यूएपीए और देशद्रोह के झूठे केसों में जेलों में ठूंसा गया है।
आज स्थिति यह है कि देश की तमाम प्रशासनिक संस्थाओं पर आरएसएस अपना वर्चस्व कायम कर चुका है। यहां तक कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर भी प्रश्नचिह्न लगाए गए है। यह एक अभूतपूर्व स्थिति है। इस स्थिति की गंभीरता को समझते हुए हरियाणा की जनता के मेहनतकश तबकों, जनतांत्रिक सोच के तमाम संगठनों और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों में विश्वास रखने वाले सभी बुद्धिजीवियों, नागरिकों  जनसंगठनों, यूनियनों इत्यादि को एकजुट होकर भारत के राष्ट्रीय आंदोलन की साझी विरासत, अनेकता में एकता की मज़बूत इमारत को ढहने से बचाने के लिए प्रतिबद्ध होकर काम करने की ज़रूरत है। आज़ादी के इस 75वें साल में साझी विरासत और साझे संघर्षों को आगे बढ़ाने की ज़रूरत है। इसके लिए इस ’साझी विरासत बचाओ’ अभियान का हिस्सा बनें। यह अभियान 23 मार्च 2022 से 26 जनवरी 2023 तक प्रांत-भर में चलाया जाएगा। अपने गांवों, शहरों और कस्बों में अभियान में शामिल होकर इसे सफल बनाएं। अपने स्वतंत्रता सेनानी पुरखों के साझा संघर्षों से उपजी साझा विरासत तथा भारतीय राष्ट्र की अवधारणा की रक्षा के साथ उनके सपनों के भारत के निर्माण में अपना योगदान दें।
यूं ही हमेशा उलझती रही है जुल्म से खल्क,
न उनकी रस्म नई है, न अपनी रीत नई।
यूं ही हमेशा खिलाए हैं हमने आग में फूल,
न उनकी हार नई है, न अपनी जीत नई।

  निवेदक,
शहीद यादगार समिति, हरियाणा।

होली के बारे में

 *आप मानते हैं कि आज होली है और कल फ़ाग है इसलिए आप बहुत खुश हैं और अपनी खुशी में मुझे शरीफ करना चाहते हैं इसलिए आपने होली-फाग की मुबारकबाद दी हैं, आपकी खुशियों की कदर करते हुए मैं भी आपको होली की मुबारकबाद देता हूं*


*कल फाग है आज और कल दोनों दिन समाज का बहुत बड़ा तबका अपने-अपने ढंग से खुशियों का जश्न मना रहा है इसलिए सभी को इन खुशियों की मुबारकबाद*


*हमारे पुरखे इस मौके पर चने जिसको *छोले* भी कहते हैं की फसल पकने के करीब होती है। चने का फल है जिस आवरण में होता है उसको *टाट* बोलते हैं और चने के पौधे को *बूटा* बोलते हैं। दिन के समय खेतों में काम से फुर्सत मिलते ही खेत से कुछ *बूटों* को उखाड़कर सुखी झाड़ियों पर रखकर आग जलाकर टाटों को भून लिया करते थे। भूनी हुई टाटों को *होळ* बोलते हैं इसी के नाम पर इस दिन को होली बोल कर, खुश होकर *होळ* बना कर खेत से घर आते थे।

होली से अगले दिन *फाग* मनाया जाता था इस दिन बैलों की, पाळीयों की, हाळीयों की कंप्लीट छुट्टी होती थी और सबसे बड़ी बात यह होती थी की औरतों को *कपड़ा अथवा रस्सी से बने कोरड़े इसको कोड़ा भी कह सकते हो* से अपने पति व उसके समान नाते वाले सभी पुरुषों को मनमर्जी से पीटने का अधिकार था। मर्द कपड़े लाठी से अपना बचाव कर सकते थे, भागकर बच सकते थे, लेकिन विरोध नहीं कर सकते थे। 

*यानी मर्दों पर औरत की पूर्ण हकूमत का दिन*


हमारे इलाके के इस त्योहार में फंडी एक कहानी को घुसेड़ते हैं जिसमें हिरनाकश्यप एक नास्तिक राजा बताया गया है और उसकी बहन होलिका को इस कदर काबिल बताया गया है कि वो जलती हुई आग में भी अपने आप को बचा सकती है उसी हिरणाकश्यप का बेटा प्रह्लाद परिवार से विद्रोह करके तथाकथित भगवान की भक्ति करता है। यानी हकीकत को छोड़कर पाखंड की गर्त में चला जाता है। प्रह्लाद को सुधारा नहीं जा सकता इसलिए उसको आग में जलाने के लिए उसकी बुआ होलिका अपनी गोद में लेकर बैठ जाती है। फिर होता है *चमत्कार जिसको आग में बचने का हुनर बताया गया है वह जल जाती है और जिसको हुनर नहीं था वह प्रह्लाद बच जाता है। चमत्कार को नमस्कार है* इसलिए यह चमत्कारिक कहानी बनाई गई, जो कुछ सवाल पैदा करती है।


होलिका एक औरत थी कहानी के मुताबिक उसको प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठने की ड्यूटी दी गई थी अपने ड्यूटी करते हुए वह जलके मर गई अच्छी थी या बुरी थी। अगर वह हकीकत में थी भी तो उसको हर साल जलाने का जश्न किया जाना औरत को किसी भी गुनाह के लिए जिंदा जलाने को न्यायोचित ठहराने के समान है, जिसे कोई भी सभ्य व न्याय प्रिय समाज स्वीकार नहीं कर सकता जश्न मनाना तो दूर की बात है।


एक असहाय लड़की को जला देना, लड़के को जलने से बचा लेना, फिर जल जाने के बाद चारों तरफ फेरी लगाना और घर आकर के खुशियां मनाना, महिलाओं द्वारा गीत गाना और घर आकर अच्छा खाना खाना यह करके क्या संदेश दिया जा रहा है।


जिस औरत को आग में जलाया जाता हो वह कैसे *हैप्पी हो सकती है?* जब आप होलीका को जलाने की बात करते हो तो *हैप्पी होली* बोलना अपने आप में अपनी ही बात का उपहास उड़ाना है होली को रात के समय जलाया जाता है वैसे किसी संस्कृति में रात्रि में शवदाह की परम्परा किसी  नहीं है और अगले दिन सुबह फ़ाग खेला जाता है यानी एक समाज जो एक औरत को जलाकर जश्न मना रहा था उसके लगभग 12 घंटे बाद वही समाज औरत को इंसानों को पीटने की पूरी छूट देता है, दोनों बातें अपने आप में विरोधाभासी हैं


*अगर काल्पनिक प्रह्लाद की जीत ही हुई थी एक औरत होलिका पर तो हैप्पी होली क्यों बोला जाता है? हैप्पी प्रह्लाद क्यों नही बोला जाता? होली हमारा त्यौहार नहीं है, हमारी धरती का त्योहार फ़ाग है, उसी फ़ाग को पाखंडी होली का नाम दे रहे हैं। हमें इस को समझना चाहिए होली का नाम देकर होली के पाखंड इसमें शामिल किए जाएंगे।*


आज हम शहीदे आजम भगत सिंह को जब अपना आदर्श मानते हैं तो हिरणकश्यप भी हमारा आदर्श क्योंकि वह भगतसिंह की तरह नास्तिक है। जबकि प्रह्लाद फंडियो का मानसिक गुलाम।


हिरण्यकश्यप, होलिका व पहलाद की कहानी भले ही काल्पनिक हो लेकिन ऐसी कहानियां समाज के नौनिहालों के दिमाग में समाज के प्रति एक नजरिया तैयार करती हैं गलत कहानियां गलत नजरिया तैयार करती हैं इसलिए *होळ-होळा-फाग मनाइए, किसी लुगाई को जला के नहीं अपितु आपके पुरखों की भांति आपके खेतों में पकने को आई चणे की फसल के कच्चे दानों को आग में भून के बनने वाले "होळ" खा के, रंग-गुलाल-मिटटी-गारा (कीचड़ नहीं) लगा के; भाभियों संग फाग खेल के।*


औरतों को भी अपनी हकूमत के दिन को हिरण्यकश्यप-होलिका-प्रहलाद की काल्पनिक कहानी से कलंकित नहीं करना चाहिए। फंडियों की कुबुद्धि व् आपकी गैर-जिम्मेदारी ने एक अच्छे-खासे त्यौहार का क्या कुरूप बना दिया है।


*होळ की होली*

*रंग-गुलाल-मिटटी-गारा का फ़ाग*

*आप सबको मुबारक हो*

🙏

*मनीराम मोर*

बाजे भगत

 बाजे भगत जी

श्री हरदेवा जैसे प्रतिभा संपन्न गुरु की शरण में बाजे राम जी ने 'बाजे भगत' की उपाधि प्राप्त की थी। उनकी विलक्षण प्रतिभा तथा मधुर गायकी का उल्लेख एक लोक प्रचलित पद में इस प्रकार मिलता है -
'बाजे कैसी बोली कौन्या, झम्मन कैसी झौली कोन्या।'
   डॉक्टर पूर्णचंद शर्मा के अनुसार- बाजे भगत जी ने अपनी रंग भरी रागनियों से  हरियाणा के जनमानस को बीन बजाने वाले सपेरे की तरह मंत्र -कीलित-सा  कर दिया । उनके सांगों में श्रृंगार की चास गहरी होती थी ।
  वर्ष दिसंबर 2000 ई. में श्री रामपाल सिंह चहल व श्री अशोक कुमार ने 'बाजे भगत व्यक्तित्व एवं कृतित्व' नामक पुस्तक लिखकर प्रकाशित कराई है, जिसमें उनके कुछ सांगों का संकरण क्या है । ये संकलित सांग हैं- शकुंतला- दुष्यंत, कृष्ण जन्म, गोपीचंद, नल- दमयंती , राजा रघबीर, महाभारत और पद्मावत आदि।  इस पुस्तक में श्री रामपाल सिंह चहल के द्वारा बाजे भगत के जीवन वृत्त पर सारगर्भित लेख भी लिखा गया है । यह पुस्तक हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत है।   
    जिला सोनीपत के गांव सिसाना में वि.सं. 1855 श्रावन की शिवरात्रि को सनातन धर्मी गायक श्री बदलूराम के घर जेष्ठ पुत्र के रूप में बाजेराम जी का जन्म हुआ। इनकी माता का नाम श्रीमती बदामो देवी था। बाजे भगत जी तीखे नैन -नक्श ,सावला कृष्ण रंग, गठीला बदन,घुंडीदार मूछें और 6 फुट का कद, एक आकर्षक व्यक्तित्व के धनी थे।

BIODIVERSITY

 Will the 30 Percent More Multilateral Fund Over 4 Years Fulfill the Requirements of Biodiversity Problems This Time?


June 25, 2022Shalini Jena

Humankind and its dependence on the environment

Humankind always needs to protect the environment because the environment allows for the survival of the Homo sapiens. But in the long run, have we forgotten the importance of the environment? Every year the Global Environment Facility which is the only multilateral fund focused on biodiversity allocates some amount of funds for the problems related to worldwide biodiversity. Currently, it has promised to provide $5.33 billion for the next four years. This was discussed and announced at an information session of the ongoing preparatory meeting on the Post-2020 Global Biodiversity Framework meeting in Nairobi.

Are the GEF funds gathered enough to meet the goals?

In comparison to the last four years, the amount has gone up to 30 percent more. It said that biodiversity would be the area of focus during these years and that at least 60% of the pledges would be related to biodiversity. The main focus area of the GEF funds is to enhance the management of chemicals and trash, ecosystem restoration, clean and healthy oceans, and improvise the food systems.

The exact picture is to allocate $1 million to each nation for work done locally and $9 million for international technical support to help acquire the goals. The question here arises is “How much will be enough?” According to the estimation done by Campaign for Nature (a non-profit), it is much less than what is required. The organization estimated that at least $60 billion is required each year.

Countries like Argentina, Brazil, and Gabon called for developed countries to allocate a minimum of $100 billion each year making it rise up to $700 billion per year by 2030. The lack of financial investment in this has been a serious concern for years now because the world continuously failed to acquire the Aichi Biodiversity goals set for 2011-2020.

Resources and their accessibility

 Accessibility to the resources still does not provide a clear picture and raises serious questions. Campaign for Nature urged industrialized nations to donate money rather than take on debt and to make sure that local populations and indigenous peoples have direct access to these resources.

The need for a proper financial investment

A properly structured and planned investment is what the world needs right now because it is very important to understand that the money invested today in favour of the environment will bring about massive positive changes, where humankind does not have to face any loss in the account of nature.

Additionally, incentives that affect the environment must be removed. These include support for fossil fuels or incentives for fisheries. The Nairobi gathering serves as a warm-up for the 15th Conference of the Parties to the Convention on Biological Diversity (CoP15), which will take place in Montreal, Canada, later this year.

Shalini Jena

Drinking Water

 How will Mankind Ever Survive Without Drinking Water


June 23, 2022Riddhika Chakrabarti

Water scarcity in the country

Have you ever thought that how will mankind ever survive without water? India, the country which known for its hundreds of rivers. Rivers that include Ganga, Godavari, Krishna, Yamuna, Narmada, and Indus where fresh water used to flow so abundantly, now faces the huge and crippling challenge of water scarcity. 16% of the world’s population is taken up by India, but India holds only 4% of the world’s freshwater resources, and lately even that 4% is under immense pressure. Reports from the Central Ground Water Board have stated that many districts in India have already reported overused or over exploited ground water levels, which has led to severe issues with water in their day-to-day lives and commercial uses too.

What are the reasons for water scarcity?

Water has been a scarce resource in India for quite a few years due to extreme over usage and exploitation. That’s a fact. What is a loophole that India has which further adds to this scarcity? The answer is inequality. Distribution of water and hygiene have always been unequal amongst the many other things. People who are better off, like people in urban areas, have better access to water for day-to-day use. It is a sad fact that the issue of inequality in India is so strong that it even tampers with the distribution of basic resources that have kept the human race alive for all these years.

Change in the usage of water resources

There are many reasons which lead to this situation of extreme water scarcity. One of the very prominent reasons being the change in how water is used now in comparison to how it was used a few years back. India has made remarkable economic growth in the past few decades but that has clearly come at the brunt of water scarcity which is too big a price to pay. There has been immense pressure on water usage due to rapid industrialization and urbanization. Due to economic the lifestyles of people have also changed starting from food consumptions, patterns in the usage of land, lifestyle etc. Due to the rapid change in the country’s development and population which is increasing manifold, the water resources are not keeping up with that. India has abundant ground water resources but in states like Rajasthan, Haryana, Uttar Pradesh those ground water resources have been used to such an extent that they are scarce now as well.

How water scarcity causes severe hardships? And way forward

It might be hard to believe, but this water scarcity directly affects the lives of more people than we’d think. Let’s take the instance of the women in villages. Since ages unknown, the job of fetching water has been a women’s-oriented job, but as ponds, wells, and tanks dry up, this job becomes more and more of a challenge to them. They now have to walk much longer distances just to fetch water for their day-to-day usage. In a country like India, with a huge population, the crisis of drinking water is scarier. However, finding a solution is not impossible yet. We can fight the problem of water scarcity only if we as citizens, come together and find ways to save water and use it judiciously. The humans do not have any other option left with, because in the end, how will mankind ever survive without its most important resource?

Riddhika Chakrabarti

चमत्कारों की वैज्ञानिक व्याख्या

 चमत्कारों की वैज्ञानिक व्याख्या क्यों जरूरी है?

एक वैज्ञानिक प्रयोगशाला में कोई प्रयोग करता है तो उसके सामने एक स्पष्ट लक्ष्य होता है, कुछ नया सीखने का या कुछ नया खोजने का। इससे उसे जानकारी रूपी नई संपत्ति मिलती है। वह इस संपत्ति को पाने के बाद इसके प्रयोग करने के बारे में सोचता है ।वह इसको तकनीक में ढालकर व्यवसाय कर सकता है। इससे और आगे बढ़े हुए ज्ञान की ओर जा सकता है। इसके प्रयोग का प्रकार चाहे कैसा भी हो यह जानकारी सार्वजनिक होती है।यह और आगे ज्ञान का आधार बनती है। यह बच्चों के लिए शिक्षा का पाठ्यक्रम बनती है। यह जानकारी मानवजाति की धरोहर बन जाती है। इससे मानव सभ्यता व संस्कृति आगे बढ़ती है।
जब कोई जादूगर इन्हीं जानकारियों के आधार पर स्टेज पर कोई प्रयोग करता है तो वह इस प्रयोग को प्रत्यक्ष नहीं करता। वह इसे रूपांतरित करता है। इसमें अपनी कला का पुट देता है। वह इसमें सौंदर्यशास्त्र के रंग भरता है ।इनमें ध्वनि, प्रकाश, संगीत व साज-सज्जा की चासनी डालता है ।वह जनमानस का मनोरंजन करता है ।इससे वह अपनी रोजी-रोटी भी देखता है। वह एक प्रयोग की नाना प्रकार की प्रस्तुतियां देता है ।वह अपनी कल्पना के मिश्रण से कला को नई उच्चाइयाँ प्रदान करता है। इतना ही नहीं ,कई बार जादूगरों ने कुछ बड़े काम भी किए हैं। उन्होंने वैज्ञानिकों की सहायता भी की है। जब प्रसिद्ध भौतिकविद नरसिंहमैया ,साईं बाबा की चालाकी को समझने में असमर्थ रहे तो उन्होंने जादूगर पीसी सरकार की सहायता से ही इन्हें समझा था। यूरी गैलरी की Psycho Kinetic Power पीके पावर का पर्दाफाश भी जादूगर जेम्स रैंडी ने ही किया था, जबकि बहुत से वैज्ञानिक इसे समझने में असमर्थ रहे थे।
लेकिन जब कोई स्वयम्भू देव पुरुष इसी प्रकार का कोई प्रयोग करता है तो उसके अपने लक्ष्य भी स्पष्ट होते हैं ।वह इनकी रहस्यमयी व्याख्या करता है। इनके पीछे के कारण को दिव्य शक्ति या कोई सिद्धि बताता है। वह हमारी आस्था का दोहन करता है और इस प्रकार व्यक्तियों का ब्लैकमेल करता है। वह अपने स्वार्थ सिद्ध करता है। वह शोषण करता है ।वह अपने भक्त बनाता है ।वह आमजन को ज्यादा अंधविश्वासी बनाता है। वह मानवजाति की तरक्की में इस प्रकार बड़ी बाधा बनता है। आम आदमी इन्हें समझते नहीं । वे इनसे भय खाते हैं ।इन्हें जांचने या पड़ताल करने की उनकी हिम्मत नहीं होती और न ही उनकी क्षमता कि वे ऐसा कर सकें ।अज्ञानता उनके आड़े आती है ।
ऐसा वातावरण हम अपने आसपास बहुधा देखते हैं। यहाँ कभी गणेश जी दूध पीते हैं तो कहीं मूर्तियां रोती हैं ।कहीं चोटियां कटती है तो कहीं घरों में आग लगने की घटनाएं घटती हैं। कहीं देवियां प्रकट होती हैं तो कहीं ओपरी -पराई के साए मंडराते हैं ।कहीं कोई भभूत बाँटता होता है तो कहीं कोई तिलस्मी ताबीज देता है ।कहीं कोई समाधि लेता फिरता है तो कहीं कोई नबज़ बंद कर दिखाता है ।।
हमारा समाज इन सब घटनाओं का गवाह है ।हमारा समाज कम पढ़ा- लिखा है ।हमारी शासन व्यवस्था सामाजिक सुरक्षा की गारंटी कम देती है ।रूढ़िवाद की जड़े मजबूत हैं। यह सब ऐसे चमत्कारों को फलने -फूलने के लिए उर्वरा जमीन तैयार करते हैं। इनसे मनुष्य अपना आत्मविश्वास खो बैठता है ।व्यक्ति का विवेक जाता रहता है ।वह स्वयं  को अदृश्य शक्ति के हाथों कठपुतली मान बैठता है ।वह और दरिद्रता में धंसता चला जाता है।
ऐसे में वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी जिम्मेवारी बनती है कि वे ऐसी घटनाओं पर अधिक ध्यान दें।वे इनके पीछे छिपे विज्ञान से जनता को अवगत कराएं ।यदि वैज्ञानिक ऐसा नहीं करते हैं तो अधिकांश लोग इस बात को मूक सहमति मान बैठते हैं ।वैज्ञानिकों की यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वे ऐसी घटनाओं से होने वाले नुकसान से जनता को बचाएं ।यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो जालसाजों के और हौसले बुलंद होते हैं ।हम प्राय देखते हैं कि अधिकांश पढ़े- लिखे व्यक्ति चुप रहना पसंद करते हैं जोखिम उठाना नहीं चाहते ।हम रणनीतिक तरीके से काम कर सकते हैं। हम विज्ञान संप्रेषण के और तौर तरीके प्रयोग कर सकते हैं ।ऐसा करके हम वैज्ञानिक मानसिकता का प्रचार- प्रसार करने का अपना संवैधानिक और नैतिक दायित्व ही निभाते हैं, हम किसी पर एहसान नहीं करते हैं। यदि कोई जानकार व्यक्ति यह कहकर चुप रहता है कि मैं ही क्यों, तो यह उसका पलायनवादी नजरिया है ।अंधविश्वास एक भयंकर जंगल की आग है। यह समाज के लिए हानिकारक है। आज नहीं तो कल इसकी तपन को सब महसूस करेंगे और कर भी रहे हैं ।
इसलिए चमत्कारों का पर्दाफाश करना एक माननीय जिम्मेवारी है। इस क्षेत्र से जुड़े कार्यकर्ताओं और स्रोत व्यक्तियों को चाहिए कि वे सब कुछ स्पष्ट करें जैसे ,कब ,किसने और कहां -कहां किन चमत्कारों से कितनी जनता को ठगा या बेवकूफ बनाया ।किस वैज्ञानिक ने कब और  कैसे उनका पर्दाफाश किया। ऐसा करने में उन्हें किस- किस प्रकार की दिक्कतें आई आदि -आदि ।कई बार हमारे साथी आधी -अधूरी जानकारी ही सामने रखते हैं ।इससे यह गतिविधि सस्ता मनोरंजन बन कर रह जाती है और गंभीर बहस नहीं बनती।

रचनाकार

 *लेखक और रचनात्मकता बारे कुछ चर्चा*

संवेदना जो सबसे ज्यादा मूल रचनात्मकता की होती है, वह आवश्यक है। सामाजिकता,
सामुदायिकता और संवेदना अगर समाज की को संवेदनशील नहीं बना सकते हैं तो वह रचनात्मकता चाहे कितनी ही विचारधाराओं से लैस क्यों नै हो किस मतलब की होगी ?
    रचनात्मकता की यह सबसे बड़ी भूमिका होनी चाहिए। किसी भी समाज को और खासतौर से जब समाज निष्ठुर और हिंसक लगातार होता जा रहा हो, उस समाज को संवेदनशील बनाने का कार्यभार रचनात्मक रचनात्मकता का सबसे बड़ा कार्यभार है। हम आप देखते हैं कि कोई चिड़िया है, चिड़िया भूखी है, भूखी है वह किसी कीड़े को खाएगी ही, चिड़िया के पास एक आवाज भी है, लेकिन कीड़े के पास कोई आवाज नहीं है। यानी अगर हमारी रचनाशीलता चिड़िया की भूख को देखती है तो जिस कीड़े को वह खा रही है अगर उस कीड़े की छटपटाहट को , उसकी जिंदगी को भी वह देख पाती है यानी मूक को भी अगर वाणी देने में सक्षम है तो वह यह रचना शीलता, संवेदनशीलता हमारे काम की होती है । कभी-कभी तमाम जोड़े नए जोड़े खासतौर से बाइक से जाते हैं । इस बीच लोग बाइक बहुत तेज चलाते हैं, जहाज से भी ज्यादा तेज चलाते हैं। अगर उनके पीछे मान लो उनकी प्रियतमा बैठी है और उसकी गोद में दो-तीन महीने का बच्चा हो। अगर कोई लगातार इस दृश्य को देखता है तो उसे लगता है कि उसकी साड़ी या उसका दुपट्टा या उसकी सलवार कहीं बाइक के पहिये में ना फंस जाए और और कहीं बच्चा गिर ना जाए। देखने वाला जरूर लगातार इससे बेचैन रहेगा । यह बेचैनी, यह संवेदनशीलता जो रचनात्मक होने के मायने हैं , उसे चार शब्दों में निरूपित किया जा सकता है।  एक तो प्रेम, व्यक्ति-व्यक्ति के बीच प्रेम, समाज समाज के बीच में प्रेम और इस तरह से इस विश्व प्रेम की अवधारणा बनती है। दूसरे, पीड़ा की अभी बात हो रही थी जिसके लिए सबसे बड़ी जरूरी है करुणा। अगर करुणा का तत्व नहीं है तो दिक्कत है और चौथा शब्द है प्रतिरोध। इन चार बातों पर और ज्यादा विस्तार से विचार किया जा सकता है। एक उदाहरण है कि-
एक पक्षी है ,पक्षी का जोड़ा है और पक्षी का जोड़ा अपने एकांत के समय में प्रेम में मशगूल है। उसे दुनिया की कोई खबर नहीं है। ऐसे में एक शिकारी आता है। और  जोड़े में से एक को मार देता है। प्रेम जीवन का सर्वाधिक अनिवार्य है और घनिष्ठतम क्षण है। ऐसे में एक बहेलिया निशाना लगाता है और उस जोड़े में से एक की जान चली जाती है। यहां कई दृश्य उपस्थित हैं। एक तो यह हुआ कि एक मारा गया हत्या हुई। दूसरा जो बचा हुआ है ऐसे में उसकी क्या स्थिति होगी? उसकी पीड़ा को, उसके दुख को जिस करूणा की जरूरत हो सकती है वह भी एक मुख्य क्षेत्र हो जाता है।

Tuesday, January 10, 2023

शराब आदत नहीं, जानलेवा बीमारी है।’

 ‘सप्तरंग’ कार्यक्रम रिपोर्ट

‘शराब आदत नहीं, जानलेवा बीमारी है।’


ऐल्कहौलिक्स एनौनिमस संस्था से जुड़े एक समय के पुराने शराबियों परन्तु अब उस से मुक्ति

पा चुके प्रतिनिधियों ने रोहतक के अनजान लोगों के सामने इस इतवार (8 जनवरी 2023) अपने दिल

खोल कर रख दिए। ‘सप्तरंग’ द्वारा आयोजित गोष्ठी में इन चार वक्ताओं ने शौक़िया यदा-कदा शराब

का सेवन करने की शुरुआत से ले कर शराबी हो जाने और फिर शराब से निजात पाने की अपनी कहानी

सुनाई। उन का कहना था कि शराब कोई आदत नहीं, लाइलाज बीमारी है - मधुमेह (डायबीटीज़/शूगर) की

तरह जीवनभर चलने वाली बीमारी। जिस तरह मधुमेह का मरीज़ कुछ सावधानियाँ रख कर बीमारी से

निपट सकता है, उसी तरह एक शराबी भी अपनी इस बीमारी से निपट सकता है। इस से निपटने में एक

समय के शराबी परन्तु अब उसे छोड़ चुके लोग उस की काफ़ी सहायता कर सकते हैं क्योंकि वह एक

शराबी की मन: स्थिति को भली-भाँति समझते हैं। यह संस्था नियमित ऑनलाइन एवं आमने-सामने,

दोनों तरह की बैठकों के माध्यम से शराबी को मानसिक रूप से शराब छोड़ने के लिए तैयार करती है।

संस्था के सदस्य कोई दवाई नहीं देते।

वक्ताओं में कोई 25 साल की उम्र तक आते-आते ही शराबी हो गया था तो कोई 32 की उम्र में।

कोई 20 साल शराबी रहने के बाद शराब छोड़ पाया था, किसी को शराब छोड़े 10 बरस हुए थे तो कोई

5 साल की कोशिश के बाद अभी मात्र 2 महीने से ही शराब से बचा हुआ था। वक्ताओं ने बताया कि

शराबी होने (यानी शराब के नशे की गिरफ़्त में आ चुके) एवं यदा-कदा शराब पीने वाले के बीच तीन

अन्तर होते हैं जिन के आधार पर व्यक्ति ख़ुद पहचान सकता है कि वह शराबी है या नहीं। एक शराबी

भले ही पीये केवल शाम को परन्तु वह 24 घण्टे शराब के बारे में सोचता रहता है - कि कब, कहाँ, कैसे

मिलेगी। वह एक तरह का मानसिक खिंचाव महसूस करता है। दूसरा, शराब पीने पर उस के शरीर की

ऐसी प्रतिक्रिया होती है कि वह शारीरिक तौर पर इस की और अधिक ज़रूरत महसूस करता है और शराब

अन्दर जाते ही वह अपना नियंत्रण खो बैठता है। तीसरा, वह नैतिक/मानसिक तौर पर खोखला हो जाता

है। यहाँ तक कि वह माँ के दाह संस्कार के एक घण्टे बाद ठेके पर हो सकता है और फिर शर्म तथा

आत्म-ग्लानि के चलते दोबारा पी सकता है। इन तीनों में से कोई एक लक्षण भी आप में है, तो आप

शराबी बन चुके हैं।

इस बीमारी की पहचान के उपरोक्त तीन तत्वों के अलावा, इस के प्रभाव भी चिह्नित किये गए।

पहला, इस से बचने के लिए पूरा जीवन प्रयास करने होंगे। अगर उपाय न किये जाएँ तो यह रोग बढ़ता

जाता है। और यह जानलेवा है - न केवल जानलेवा बल्कि दर्दनाक रूप से जानलेवा रोग, जिस का चरम

लिवर (कलेजा/जिगर) इस हद तक ख़राब होने के रूप में सामने आता है कि ‘पी लो या जी लो’ की

स्थिति आ पहुँचती है। यह बीमारी केवल शराबी को ही नहीं, पूरे परिवार को तबाह करती है। सब से

दर्दनाक पक्ष यह है कि व्यक्ति इस के होने को स्वीकार ही नहीं करता। उसे लगता ही नहीं कि उसे कोई

रोग है, कि वह इस के सामने लाचार हो चुका है। व्यक्ति को लगता है कि वह दो पैग तक सीमित रह


सकता है परन्तु शराब का एक घूँट अन्दर जाते ही वह अपना नियंत्रण खो बैठता है। इस लिए

ऐल्कहौलिक्स एनौनिमस का पहला प्रयास शराबी को यह एहसास दिलाने का रहता है कि वह इसे रोग के

रूप में स्वीकार करे। बिना इस तथ्य को स्वीकार किए आगे प्रगति करना मुश्किल है। उसे यह स्वीकार

करना होगा कि उस के लिए पहला घूँट अंतिम घूँट नहीं हो सकता। इस लिए उसे पहला घूँट ही नहीं

लेना।

वक्ताओं के मुताबिक़ शराब छोड़ने की प्रक्रिया में ‘HALT’ प्रक्रिया प्रभावी पाई गई है। H से

हंगरी यानी भूखा न रहना। ऐल्कहौलिक्स एनौनिमस का अनुभव है कि पेट भरा होने पर शराब पीने की

सम्भावना कुछ कम हो जाती है। A से ऐंग्रि यानी ग़ुस्सा नहीं होना। ग़ुस्सा/झगड़ा शराब पीने की

सम्भावना को बढ़ा देता है। इस लिए शराब छोड़ने के इच्छुक व्यक्ति को ग़ुस्से और लड़ाई-झगड़े की

स्थिति से बचना चाहिए। L से लोनली, यानी अकेले रहने से बचें। शराब न पीने वाले दोस्तों/परिजनों के

साथ रहें। आख़िर में, T से टायर्ड नहीं होना यानी बहुत ज़्यादा मशक्कत/थकने से बचना चाहिए (क्योंकि

थकान के बाद शराब की ज़रूरत महसूस होगी)। मीठा खाने से भी शराब की तलब कुछ कम होती है।

इस के अलावा, शराबी को शराब छोड़ने के लिए छोटे लक्ष्य रखने चाहिएँ; यह कोशिश करनी चाहिए कि

कम से कम आज शराब नहीं पीनी। उन की सलाह थी कि जो भी आप का इष्ट हो, उस से सुबह उठते

ही प्रार्थना करें कि कम से कम आज का दिन बिना पीये गुज़र जाए। इसी तरह एक-एक दिन कर के

शराब से दूरी बनाए रखी जा सकती है। साथ ही, होली-दीवाली जैसे मौक़ों पर विशेष सावधानी बरतनी

चाहिए।

वक्ताओं ने बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार पूरी दुनिया में यह मृत्यु का तीसरा

सब से बड़ा कारण है। अगर दुर्घटना और चोट इत्यादि को शामिल कर लें तो पहला सब से बड़ा कारण

बन जाता है। उन्होंने यह भी बताया कि आंकड़े दिखाते हैं कि शराब का सेवन करने वालों में से 10-

15% लोग शराबी हो जाते हैं। युवतियों में भी यह समस्या बढ़ती जा रही है, यहाँ तक कि दिल्ली में उन

के सदस्यों में लगभग 20% महिलाएँ हैं।

ऐल्कहौलिक्स एनौनिमस का अनुभव यह है कि शराब केवल व्यक्ति नहीं बल्कि पूरे परिवार के

लिए बीमारी है। इस लिए उन का पहला प्रयास परिवार को इस के प्रभाव से निकाल कर जितना सम्भव

हो, सामान्य जीवन जीने के लिए तैयार करने का रहता है। इसी लिए शराब- पीड़ित परिवारों के लिए

काम करने वाली भी एक संस्था है जिस का नाम ALANON (सम्पर्क सूत्र - https://al-anon.org या

9871970664) है। यह नियमित बैठक के माध्यम से परिवारों को शराबी की शराब छुटवाने या कम से

कम परिवार पर उस के असर को कम करने में सहायता करती है। शराब के अलावा अन्य नशों से बचने

के लिए नार्कोटिक्स एनौनिमस नामक एक नयी संस्था शुरू की गई है ( https://nadelhi.org/ या

https://na.org/ )। ये सभी संस्थाएँ पूरी तरह से नि:शुल्क सहायता प्रदान करती हैं। इन से

9811908707 एवं 9810912534 या www.aagsoindia.in के माध्यम से सम्पर्क किया जा सकता है।

वक्ताओं ने बताया कि क्योंकि वे स्वयं भुक्तभोगी रहे हैं, इस लिए वे शराब छोड़ने के इच्छुक लोगों की

सहायता करना अपना फ़र्ज़ समझते हैं। देश भर में उन के सदस्य/समूह हैं एवं पीड़ित व्यक्ति या परिवार

द्वारा सम्पर्क करने पर उन की संस्था के सदस्य फ़ोन पर या व्यक्तिगत तौर पर मिल कर सहायता


करते हैं और यह सहायता पूरी तरह नि:शुल्क होती है। संस्था का सब साहित्य भी उन के वेबसाइट पर

मुफ़्त उपलब्ध है।

बैठक में ‘सप्तरंग’ के नियमित प्रतिभागी कम थे परन्तु नए प्रतिभागी काफ़ी थे। 30 के लगभग

लोगों ने बैठक में भाग लिया जिन में बड़ी संख्या नए लोगों की थी। इस से इस समस्या की भयावहता

का एहसास होता है। इस चर्चा में प्रतिभागियों ने यह भी रेखांकित किया कि शराब केवल व्यक्ति या

परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि समाज के लिए भी एक बीमारी है। न केवल इस के प्रभाव सामाजिक हैं,

इस के सामाजिक कारण भी हैं। इसलिए इस से निपटने के लिए व्यक्तिगत या पारिवारिक उपायों के

साथ-साथ सामाजिक स्तर के उपाय भी आवश्यक हैं। हालाँकि कार्यक्रम में सामाजिक पक्ष पर चर्चा नहीं

हुई परन्तु इस को नज़रअंदाज़ करना सही नहीं होगा।

ऐल्कहौलिक्स एनौनिमस के प्रतिनिधियों की पीड़ा के साथ-साथ शराब छोड़ पाने का गौरव उन के

चेहरों से साफ़ झलक रहा था। आशा है कि हम सब लोग मिल कर पीड़ित व्यक्तियों/परिवारों तक यह

जानकारी पहुँचाएँगे ताकि कल को उन के चेहरे भी गर्व भरे दिखाई दें। ‘सप्तरंग’ ऐल्कहौलिक्स एनौनिमस

के प्रतिनिधियों के प्रति दिल से आभारी है।

कार्यक्रम के फ़ोटो संलग्न हैं। ऐल्कहौलिक्स एनौनिमस के नियमों के चलते कार्यक्रम की

वीडियो/ऑडियो रिकार्डिंग नहीं की गई एवं प्रतिनिधियों की पहचान भी ज़ाहिर नहीं की गई है।  


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Sunday, January 8, 2023

फातिमा शेख़

 क्या आप फ़ातिमा शेख को जानते हैं?


फ़ातिमा शेख भारत की पहली मुस्लिम शिक्षिका थीं. वह सावित्रीबाई फुले की सखी थीं. ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई फुले ने 19वीं सदी में शिक्षा की जो अलख जलाई थी उसकी आग को प्रसारित करने में फ़ातिमा शेख ने बराबरी से हिस्सेदारी की. 

फ़ातिमा शेख (9 जनवरी 1831 – अक्टूबर 1900) ज्योतिबा फुले (1827-1890) और सावित्रीबाई फुले (1831-1897) के समकालीन थीं. उनके भाई उस्मान शेख ज्योतिबा के मित्र थे. ज्योतिबा फुले ने जब सावित्रीबाई फुले को पढ़ाने का फैसला किया तो रूढ़िवादी समाज की भृकुटियाँ तनने लगीं. फिर जब सावित्रीबाई फुले ज्योतिबा के साथ मिल कर शूद्रों और अतिशूद्रों के लिए स्कूल में पढ़ाने लगीं तो समाज के दबाव में उन्हें घर छोड़ना पड़ा. ऐसे मुश्किल समय में उस्मान शेख ने न केवल अपने घर में रहने की जगह दी बल्कि ज्योतिबा को स्कूल खोलने के लिए अपना घर भी दे दिया. 1 जनवरी 1848 में ज्योतिबा ने लड़कियों का स्कूल खोला तब फ़ातिमा शेख उसमें पहली छात्रा बनीं. वे स्कूल में मराठी भाषा की पढ़ाई करने लगीं. सावित्रीबाई उसी स्कूल में पढ़ाती थीं. आगे चल कर उसी स्कूल में वह शिक्षिका बन गईं. इस तरह वह आधुनिक भारत की पहली मुस्लिम शिक्षिका बनीं. 

यही नहीं, फ़ातिमा शेख ने सावित्रीबाई फुले के साथ अहमदनगर के एक मिशनरी स्कूल में टीचर्स ट्रेनिंग ली. फ़ातिमा शेख और सावित्री बाई को स्कूल में सिर्फ़ पढ़ना ही नहीं होता था, बल्कि वह घूम-घूम कर लोगों को इस बात के लिए जागरूक करती थीं कि वे अपनी बेटियों को स्कूल भेजें. इस काम के दौरान उन्हें समाज के लोगों ख़ास तौर पर ऊंची जाति के लोगों के गुस्से का सामना भी करना पड़ा. 

कहते हैं सावित्रीबाई और ज्योतिबा ने जब बाल विधवाओं के प्रसव के लिए एक आश्रम ‘बालहत्या प्रतिबंधक गृह’ खोला तो फ़ातिमा शेख ने सावित्री के साथ प्रसव कराना सीखा. 

1856 में सावित्रीबाई के बीमार पड़ने पर फ़ातिमा शेख ने स्कूल के प्रबंधन की ज़िम्मेदारी भी उठाई और स्कूल की प्रधानाचार्या भी बन गई. इस बात का उल्लेख सावित्रीबाई ने ज्योतिबा को लिखे एक पत्र में किया है.

इस तरह फ़ातिमा शेख आधुनिक भारत की पहली मुस्लिम महिला एक्टिविस्ट शिक्षिका, प्रधानाचार्या थीं.

फ़ातिमा शेख को सलाम!

Monday, January 2, 2023

Sahkari Samitiyon Dinesh Abrol

 डेयरी क्षेत्र में सामाजिक सहकारी समितियों को बनाए रखना


 सहकारी समितियों की सफलता के लिए पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रारंभिक अवलोकन


 दिनेश अबरोल



 1 परिचय


 पशुधन क्षेत्र कृषि क्षेत्र के उत्पादन में लगभग एक-चौथाई योगदान देता है।  दुग्ध विपणन और अन्य प्रकार की सहकारी एमविपणन समितियों में सहकारी समितियों की भूमिका और योगदान को डेयरी क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दे के रूप में चिन्हित करने की आवश्यकता है।  2000 के दशक की शुरुआत में दुग्ध आपूर्ति समितियों की सदस्यता (73 लाख) सभी विपणन समितियों (54 लाख) की संयुक्त सदस्यता से अधिक थी।  यहां तक ​​कि दुग्ध आपूर्ति सहकारी समितियों के व्यवसाय संचालन भी कुल विपणन समितियों का लगभग 80 प्रतिशत थे।  इस प्रकार की आरामदायक स्थिति निश्चित रूप से बदल गई है। और यह उभर कर आता है कि देश नियमित आधार पर आपूर्ति और मांग के बेमेल का सामना करता है।  व्यापार संगठन के एक रूप के रूप में निगम प्रभुत्व पर है।  केंद्र सरकार पर दबाव डाला जाना चाहिए कि वह असमान व्यापार समझौते न करे।  मुक्त व्यापार समझौतों और द्विपक्षीय व्यापार और निवेश समझौतों सहित केंद्र सरकार की व्यापार और निवेश नीतियां अंततः निजी क्षेत्र और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सक्षम कर रही हैं।

सदस्यों को लाभ के स्रोत


 अध्ययनों से पता चला है कि सहकारी और उत्पादक कंपनियों जैसे किसान सामूहिक संगठन स्थानीय गाय और भैंस दोनों के दूध उत्पादन के मामले में और छोटे (1-3) और मध्यम (3-6) झुंड-आकार की श्रेणी (में) के लिए भी लाभदायक हैं।  किसानों की मानक पशु इकाइयां या (एसएयू)। कुल औसत फ़ीड लागत और कुल परिवर्तनीय लागत (टीवीसी) दोनों प्रति पशु प्रति दिन सदस्यों द्वारा क्रमशः गैर-सदस्यों की तुलना में 12 प्रतिशत और 11 प्रतिशत कम है। के सदस्य  सहकारी वार्षिक बोनस प्राप्त करते हैं और निर्माता कंपनी के सदस्य वार्षिक लाभांश और नकद प्रोत्साहन प्राप्त करते हैं, सदस्यों द्वारा प्राप्त इस अतिरिक्त लाभ के साथ, उनका प्रति लीटर कुल रिटर्न गैर-सदस्यों की तुलना में 25 प्रतिशत अधिक है। कुल औसत वार्षिक  गैर-सदस्यों के 3955/- रुपये के रिटर्न की तुलना में सदस्यों के लिए प्रति परिवार डेयरी से शुद्ध रिटर्न 11,641/- रुपये अधिक है। किसान सामूहिक संगठनों की पहुंच का विस्तार करने से डेयरी उनके लिए अधिक लाभदायक उद्यम बन जाएगी।

राज्यों से कुछ महत्वपूर्ण iInsights


 स्वच्छ प्रथाओं, बेहतर चारा और अधिक उपज देने वाले पशुधन के रूप में उन्नत प्रौद्योगिकी अपनाने में महत्वपूर्ण क्षेत्रीय अंतर हैं।  उदाहरण के लिए, सामान्य तौर पर, आंध्र प्रदेश की तुलना में पंजाब में प्रौद्योगिकी अपनाने की दर बहुत अधिक थी।


 4.1


 आंध्र प्रदेश


 लगभग 50% प्रतिशत किसानों ने पंजाब में यौगिक/मिश्रित सांद्रित फ़ीड का उपयोग किया, लेकिन आंध्र प्रदेश में 10 प्रतिशत से कम।  हालांकि सर्वेक्षण से पहले के वर्षों में गायों और भैंसों में महत्वपूर्ण निवेश किया गया था, फिर भी आंध्र प्रदेश में डेयरी पशुओं में कम उपज देने वाले पशुओं की संख्या लगभग 70 प्रतिशत थी, जबकि पंजाब में 10 प्रतिशत से कम थी।  सर्वेक्षण (2008/2010) के समय डेयरी फार्मों द्वारा प्रौद्योगिकी अपनाने को प्रोत्साहित करने में मूल्य श्रृंखलाओं ने प्रमुख भूमिका नहीं निभाई थी।  डेयरी कंपनियों ने दूध निकालने और ठंडा करने के बीच के समय को कम करने के लिए गांवों में संग्रह केंद्रों में निवेश किया था, लेकिन किसानों की स्वच्छता प्रथाओं में सुधार के लिए प्रशिक्षण या विस्तार कार्यक्रमों में या खेत-स्तर के निरीक्षणों में शायद ही कुछ निवेश किया था।  जबकि आंध्र प्रदेश में डेयरी कंपनियों ने दावा किया कि वे अपने किसानों को अक्सर रियायती कीमतों पर बेहतर फ़ीड प्रदान कर रहे थे, हमारे सर्वेक्षण में बहुत कम किसान कंपनियों से निजी क्षेत्र द्वारा प्रदान किए गए मिश्रित फ़ीड को खरीदते और उपयोग करते हैं।  इसके अलावा, और बेहतर यौगिक/मिश्रित केंद्रित फ़ीड के संभावित लाभों पर वास्तव में कोई प्रशिक्षण या जानकारी नहीं दी जा रही थी।


 अनुसंधानआंध्र प्रदेश की स्थिति पर शोधकर्ताओं द्वारा प्रकाशित इन निष्कर्षों से संकेत मिलता है कि दूध की बढ़ती मांग के बावजूद, इसने (अभी तक) मूल्य श्रृंखलाओं में महत्वपूर्ण संस्थागत नवाचारों को गति नहीं दी थी।  शोध निष्कर्ष बताते हैं कि आंध्र प्रदेश में बढ़ी हुई मांग ज्यादातर मौजूदा डेयरी उत्पादों के लिए थी, जिसके लिए महत्वपूर्ण गुणवत्ता निवेश की आवश्यकता नहीं थी, जिसने बदले में अधिक व्यापक गुणवत्ता निगरानी (बेहतर और व्यक्तिगत गुणवत्ता परीक्षण में निवेश सहित) को प्रेरित नहीं किया था।  उत्तरार्द्ध ऑन-फ़ार्म निवेश और नज़दीकी फ़ार्म-प्रोसेसर लिंक के लिए मजबूत माँगों को ट्रिगर कर सकता है।  प्रदान की गई एक अन्य व्याख्या बताती है कि मौजूदा बुनियादी ढाँचा (और परीक्षण के लिए संस्थानों और बुनियादी ढाँचे की अनुपस्थिति) से डेयरी कंपनियों के लिए आपूर्ति प्रणालियों के उन्नयन में निवेश करना बहुत महंगा हो सकता है।  इसके अलावा, किसानों के लिए कई दूध बिक्री चैनल विकल्पों की उपलब्धता (औपचारिक और अनौपचारिक दोनों) ने संभावित आपूर्तिकर्ता अनुबंधों को लागू करना बहुत महंगा बना दिया।


[02/01, 1:48 pm] Dharam Singh. Hisar: बिहार


 भारत में उत्पादित कुल दूध में बिहार का हिस्सा 2001-02 में 3.2 प्रतिशत% से बढ़कर 2018-19 में 5.2 प्रतिशत% हो गया, लेकिन इसके डेयरी क्षेत्र की उत्पादकता राष्ट्रीय औसत से कम है।  पैमाने की निम्न मितव्ययिता, संस्थागत समर्थन की कमी और छोटे और सीमांत किसानों के प्रभुत्व ने क्षेत्र की दक्षता को बाधित किया है।  डेयरी किसानों की तकनीकी दक्षता - एक किसान के झुंड के आकार, खेती की भूमि, शिक्षा और अनुभव के आकार के आधार पर निर्धारित - कौशल विकास और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण द्वारा सुधार किया जाएगा।


 4.4 राजस्थान


 डेयरी एक प्रमुख उत्पादक गतिविधि है जो राजस्थान में छोटे और सीमांत किसानों, भूमिहीन मजदूरों को पूरक सहायता और स्थिर आय प्रदान करती है।  खेती से आय का समर्थन करने के लिए, डेयरी क्षेत्र किसान को पूरे वर्ष के लिए पारिवारिक आय का एक नियमित स्रोत उत्पन्न करता है।  डेयरी उद्योग को लाभदायक गतिविधि बनाने के लिए दूध उत्पादन की लागत और प्रतिफल के क्षेत्रों में अपेक्षित ध्यान ने राजस्थान के किसानों की आय में अंतर डाला है।  जयपुर दुग्ध उत्पाद सहकारी संघ लिमिटेड, राजस्थान राज्य का प्रमुख दूध संघ, अब भारत में दूध के शीर्ष उत्पादकों में से एक है।  कुल मिलाकर, यह अध्ययन से स्पष्ट रूप से स्पष्ट है कि डेयरी सहकारी समितियों ने बेहतर गुणवत्ता वाले पशुओं की अधिक संख्या प्राप्त करने में अपने सदस्यों का समर्थन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और सदस्यों को अपने दुधारू पशुओं को इष्टतम के साथ प्रबंधित और बनाए रखने के लिए प्रासंगिक वैज्ञानिक ज्ञान के प्रसार में सहायता की है।  मुनाफे का अंतर।  डेयरी सहकारी समितियों के इन सभी प्रयासों ने सदस्य परिवारों के बेहतर सामाजिक आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्त किया।

[02/01, 1:49 pm] Dharam Singh. Hisar: पंजाब


 भारत के भीतर, पंजाब में प्रति व्यक्ति दूध उत्पादन सबसे अधिक है (2017 (एनडीडीबी, 2018) में राष्ट्रीय औसत 0.355 किलोग्राम प्रति व्यक्ति प्रति दिन के मुकाबले प्रति दिन 1.075 किलोग्राम) और उत्पादन मात्रा के साथ छठा सबसे बड़ा दूध उत्पादक राज्य है  2017 में 11.3 मिलियन टन। इसे कई कारकों के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है: (1) अनुकूल कृषि-जलवायु परिस्थितियां, (2) एक अच्छी तरह से विकसित परिवहन बुनियादी ढांचा जो डेयरी व्यावसायीकरण का समर्थन करता है, (3) अपेक्षाकृत उच्च जीवन स्तर स्थानीय मांग को बढ़ाता है।  और (4) डेयरी क्षेत्र को व्यापक सरकारी सहायता।  ग्रामीण पंजाब में गोजातीय झुंड मुख्य रूप से भैंसों के होते हैं, हालांकि पिछले दशकों में, कुल झुंड में क्रॉसब्रीड गायों, उच्च उपज वाली विदेशी गाय की नस्ल के साथ स्थानीय गायों का हिस्सा बढ़ गया है।  घरेलू स्तर पर श्रम और भूमि की उपलब्धता विकास से सकारात्मक रूप से संबंधित है और डेयरी से बाहर निकलने की संभावना को कम करती है।  पंजाब में किसानों को चारे तक पहुंच और प्रवासी बाहरी श्रम दोनों के संबंध में बाधाओं का सामना करना पड़ता है।  इन बाधाओं को देखते हुए, इनपुट उपलब्धता डेयरी किसानों के विकास और निकास निर्णय में एक महत्वपूर्ण विचार के रूप में उभरती है और दक्षता के प्रभाव को ओवरराइड कर सकती है।


 अध्ययनों से पता चलता है कि 2008 और 2015 के बीच पंजाब में सभी तीन प्रौद्योगिकी संकेतकों को अपनाने में प्रभावशाली वृद्धि हुई थी। 2015 तक स्वच्छता प्रथाओं में काफी सुधार हुआ, हमारे स्वच्छता सूचकांक पर स्कोर में औसतन 31% की वृद्धि हुई: 2008 में 0.53 से 2015 में 0.70  2008 में मिश्रित फ़ीड का उपयोग 53.3% से बढ़कर 2015 में 68.8% हो गया।  उनका कुल झुंड 29% तक बढ़ गया, 2008 से 45% परिवर्तन। दूसरा, छोटे किसानों द्वारा प्रौद्योगिकी अपनाने से संबंधित सूचना विस्तार में कंपनियों की भागीदारी की रिपोर्ट करने के बावजूद, मूल्य श्रृंखला (अभी भी) किसानों के लिए प्रौद्योगिकी अपनाने को प्रोत्साहित करने में एक प्रमुख भूमिका नहीं निभाती है।  हमारे नमूने में सभी खेत।


 हाल ही में, बड़े डेयरी फार्मों का एक नया वर्ग सामने आया है।  उनके पास अधिक भारवाही पशु, संकर नस्ल की गायें और भूमि थी और उन्होंने दुहने का मशीनीकरण किया था।  इसके अलावा, वे मूल्य श्रृंखलाओं से अधिक जुड़े हुए थे।  अधिक विशेष रूप से, डेयरी प्रोसेसर के प्रतिनिधि विभिन्न विषयों पर जानकारी प्रदान करते हुए नियमित रूप से डेयरी फार्मों का दौरा करते हैं।  बल्क मिल्क कूलर का प्रावधान, फीडिंग मशीन के लिए ऋण और क्रॉसब्रीड गायों की खरीद के दौरान सहायता, इन सभी कारकों ने फार्म स्तर पर प्रौद्योगिकी अपनाने की सुविधा प्रदान की।  दूध देने वाली मशीनों के लिए सब्सिडी और कर्ज का प्रावधान भी आम नजर आ रहा है।

[02/01, 1:49 pm] Dharam Singh. Hisar: हिमाचल प्रदेश


 हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी राज्य में आजीविका का एक प्रमुख स्रोत होने के बावजूद, डेयरी फार्मिंग को अक्सर दूध के लिए कम कीमत की प्राप्ति जैसे कई मुद्दों का सामना करना पड़ता है।  राज्य का संगठित दुग्ध विपणन ढांचा देश में सबसे कमजोर है।  कम पारिश्रमिक रिटर्न ने डेयरी फार्मिंग के प्रति किसानों के रवैये को प्रभावित किया है।  ऐसी ही समस्याओं के समाधान के रूप में राज्य में नवोन्मेषी किसान संगठन प्रगति कर रहे हैं।  ये संगठन किसानों के दरवाजे पर कम कीमत पर इनपुट सेवाएं प्रदान करते हैं।  वे प्रचलित दरों से अधिक कीमतों पर दूध भी खरीदते हैं।  किसान उत्पादक संगठनों के माध्यम से डेयरी हस्तक्षेपों के कथित प्रमाण अभी भी इस क्षेत्र से न्यूनतम हैं।  इन संगठनों के सदस्यों द्वारा अर्जित लाभ में इनपुट उपलब्धता, विस्तार परामर्श, ऋण सहायता और पशु चिकित्सा सेवाएं शामिल हैं।


 4.7 हरियाणा


 हरियाणा में, बछड़े के दौरान उच्च उपज देने वाली गायों में कैल्शियम की कमी "दूध बुखार" का कारण बनती है, जिससे प्रति वर्ष लगभग 1,000 करोड़ रुपये (137 मिलियन अमेरिकी डॉलर) का आर्थिक नुकसान होता है।  दूध उत्पादन बढ़ने के साथ मिल्क फीवर का खतरा लगातार बढ़ रहा है।  यह सर्वविदित है कि दुग्ध ज्वर की घटना पर एक निवारक स्वास्थ्य उत्पाद (आयनिक खनिज मिश्रण (एएमएम)) का प्रभाव दूध उत्पादकता और किसानों की आय पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।  पशु चिकित्सा सहायता और इनपुट आपूर्ति और किसानों के बीच जागरूकता एक महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।  उपचारित पशुओं में दुग्ध ज्वर की घटनाएं बेसलाइन पर 21% से घटकर 2% हो गईं।  इसके अलावा, एएमएम प्रशासन ने क्रमशः दूध की उपज और किसानों की शुद्ध आय में 12% और 38% की वृद्धि की।  दूध बुखार की रोकथाम के कारण अर्जित लाभ [₹ 16,000 (यूएस $ 218.7)] दूध बुखार से होने वाले नुकसान से अधिक है [₹ INR 4,000 (यूएस $ 54.7)];  इस प्रकार, एएमएम का प्रयोग रोकथाम इलाज से बेहतर है।

[02/01, 1:50 pm] Dharam Singh. Hisar: गुजरात


 कृषि मंत्रालय के पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन विभाग के अनुसार वर्ष 2018-19 में गुजरात राज्य में कपास की खेती पद्धति के लिए सतत डेयरी फार्मिंग एक प्रमुख विकल्प के रूप में उभर रहा है, जो पहले से ही लगभग 14.493 मिलियन टन दूध का उत्पादन करता है।  किसान कल्याण, भारत सरकार।  20वीं पशुधन जनगणना के अनुसार, गुजरात में गायों और भैंसों (दूध में और सूखे) में दुधारू पशुओं की कुल संख्या 125.34 मिलियन है, जो पिछली जनगणना यानी 2012 की तुलना में 6.0% अधिक है। पशुधन पूंजी को मानवता का सबसे पुराना धन संसाधन माना जाता है।  और यह क्षेत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आजीविका में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।  दुग्ध उत्पादन के विकास में सहायता के लिए दुग्ध उत्पादन के लिए गुजरात सरकार द्वारा घोषित गुजरात में डेयरी फार्मिंग की नीतियों और योजनाओं ने एक प्रमुख भूमिका निभाई है।  यदि दूध के मूल्य में वृद्धि करना अपरिहार्य है, यदि क्षेत्र की लाभप्रदता में सुधार करना है, तो सबक यह है कि सहकारी नेतृत्व वाले संरचित बाजार ने सफलता में योगदान दिया है।  अमूल का त्रि-स्तरीय मॉडल आज भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।  आगामी वर्षों में दुग्ध अनुमानों की मांग इंगित करती है कि दूध की मांग दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है।  अनुमानों से पता चलता है कि राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी), दूध की मांग 2022 में 180 मिलियन टन के आंकड़े को पार करने की उम्मीद है।

[02/01, 1:50 pm] Dharam Singh. Hisar: केरल


 केरल में, MILMA, पशुपालन विभाग और डेयरी विकास विभाग जैसी संस्थागत एजेंसियां ​​डेयरी किसानों का समर्थन करने के लिए विभिन्न सहायता और प्रोत्साहन प्रदान कर रही हैं।  सहायता और प्रोत्साहन के प्रभाव का अध्ययन किया गया है।  उत्पादन, विपणन योग्य अधिशेष, सकल आय, लागत और शुद्ध आय जैसे पहचाने गए महत्वपूर्ण चरों पर तुलना की गई है।  लागत में कमी पर सहायता और समर्थन का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।  लेकिन यह केरल के डेयरी किसानों की शुद्ध आय में परिलक्षित नहीं हो रहा है, क्योंकि किसानों को विभिन्न प्रकार की सहायता और समर्थन का लाभ लेने के लिए संगठित नहीं किया जा रहा है।  जहां तक ​​एक डेयरी किसान का संबंध है, फ़ीड लागत प्रमुख खर्चों में से एक है।  इस लागत को कम करने में किसान को समर्थन देने में सहायता का उनकी आय और उनकी लाभप्रदता पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा।  ग्रीष्मकालीन प्रोत्साहन डेयरी किसान के लिए एक अन्य प्रमुख लाभप्रद सहायता है।  सूखे के मौसम में, चारे की अनुपलब्धता के कारण उत्पादन लागत में लगातार वृद्धि होती है जिससे किसान के लिए दूध की कीमत से इसकी भरपाई करना मुश्किल हो जाता है।


 प्रकाशित अध्ययन में पाया गया है कि सदस्य समूह के बीच ही, उनके लिए उपलब्ध विभिन्न योजनाओं के बारे में जागरूकता पैदा करने की आवश्यकता है।  अधिकांश डेयरी किसान केवल दूध डालने और अपनी उपज का स्थिर मूल्य प्राप्त करने के लिए समाज का लाभ उठा रहे हैं।  और वे उन विभिन्न सहायता और प्रोत्साहनों के बारे में सबसे कम चिंतित हैं जो उनके लिए उपलब्ध हैं।  कई किसानों ने बताया कि बढ़ी हुई प्रक्रियात्मक औपचारिकताएँ उन्हें कठिन बना देती हैं और इसे प्राप्त करने में उनकी रुचि कम होती है।  चूँकि डेयरी का काम चौबीसों घंटे चलता है, इसलिए डेयरी किसान इन मामलों में निवेश करने के लिए अपना अधिक समय नहीं दे पाते हैं।  वे मुख्य रूप से अपनी अज्ञानता और इसे समझने और इसे उपलब्ध कराने के लिए निवेश करने के लिए समय की कमी के कारण सहायता के बारे में कम से कम चिंतित या चिंतित हैं।  इन सहायता और प्रोत्साहनों को उपलब्ध कराकर यह डेयरी की व्यवहार्यता सुनिश्चित कर सकता है और इस प्रकार मौजूदा डेयरी किसानों को बनाए रख सकता है और नए किसानों को भी आकर्षित कर सकता है और इस तरह राज्य में निरंतर दूध उत्पादन सुनिश्चित कर सकता है।


 केरल में दूध उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले प्रमुख कारणों में से एक उनके मवेशियों में बीमारियों का होना है।  इससे डेयरी किसान को बड़ी मात्रा में रुपये खर्च करने पड़ते हैं, जिसकी भरपाई वह अपने दैनिक दूध विक्रय मूल्य से नहीं कर सकता।  इसलिए, जब भी पशु चिकित्सा लागत बढ़ती है, तो यह उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव डालती है।  भले ही बीमा लागत सकारात्मक रूप से उत्पादन से संबंधित है, यह महत्वपूर्ण नहीं है।  और इसका कारण उन उत्तरदाताओं की संख्या में कमी है जिन्होंने अपने मवेशियों के लिए बीमा कवरेज लिया है।


 केरल के कोझिकोड जिले के 200 किसानों से एकत्र किए गए प्राथमिक आंकड़ों के आधार पर डेयरी किसानों पर कोविड-19 महामारी के बहुआयामी प्रभाव का आकलन करने वाले एक अन्य अध्ययन से संकेत मिलता है कि दूध की कीमतों में गिरावट और सूखे चारे की कमी प्रमुख समस्या के रूप में सामने आई है।  महामारी के दौरान।  डेयरी किसानों को प्रति दुधारू पशु पर 7175 रुपये की औसत हानि हुई।  किसान सीधे उपभोक्ता परिवारों को दूध बेच रहे थे, और बड़े आकार के झुंड वाले किसानों को तुलनात्मक रूप से अधिक नुकसान हुआ।  नए उपभोक्ताओं की तलाश, अधिशेष दूध को घी में बदलना और घर पर चारा मिश्रण तैयार करना किसानों द्वारा अपनाई जाने वाली मुख्य मुकाबला रणनीतियाँ थीं।

[02/01, 1:51 pm] Dharam Singh. Hisar: दूध बाजार और कीमतों में उतार-चढ़ाव


 दुग्ध उत्पादन में वृद्धि दर को बढ़ाने, दूध और दुग्ध उत्पादों के बढ़ते घरेलू बाजार को पूरा करने और  यह सुनिश्चित करने की तत्काल आवश्यकता है कि भारत दूध में आत्मनिर्भर बना रहे।  IIMB के राजेश्वरन और गोपाल नाइक लिखते हैं कि भारत में दूध का उत्पादन बढ़ा है, और यह वृद्धि एक वरदान होगी यदि इसे बनाए रखा जा सकता है।  IIMB के राजेश्वरन और गोपाल नाइक लिखते हैं कि भारत में दूध का उत्पादन बढ़ा है, और यह वृद्धि एक वरदान होगी यदि इसे बनाए रखा जा सकता है।  उनका सुझाव है कि हालांकि यह हाल की उच्च वृद्धिशील विकास दर केवल तीन राज्यों तक सीमित थी, जबकि सबसे बड़े दूध उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश ने विकास के राष्ट्रीय स्तर से नीचे स्थिर लेकिन नीचे दिखाया।  इसके अलावा, प्रति पशु उत्पादकता में बहुत कम वृद्धि के साथ वयस्क मादा गोवंश की आबादी में वृद्धि कम होती दिख रही है।


 उनका सुझाव है कि आपूर्ति, मांग और दूध की कीमत के साथ-साथ स्किम मिल्क पाउडर की कीमत और बफर स्टॉक और उपभोक्ता और किसान स्तर पर कीमत बनाए रखने में इसकी भूमिका के संदर्भ में वृद्धि का विश्लेषण करने की आवश्यकता है।  अल्पावधि में, भारत के भीतर या बाहर वृद्धिशील मात्रा के लिए कोई तत्काल बाजार नहीं होने के कारण, अधिकांश वृद्धिशील मात्रा को स्किम मिल्क पाउडर और मक्खन के रूप में संसाधित और संग्रहीत किया जा रहा है।  इससे दूध खरीदने वालों पर आर्थिक दबाव पड़ रहा है और वे ताजा दूध की मांग और कीमत कम करने को मजबूर हैं।  नतीजतन, यह

[02/01, 1:51 pm] Dharam Singh. Hisar: वे यह भी सुझाव देते हैं कि उपभोक्ता मूल्य में निरंतर वृद्धि भी उत्पादक को हस्तांतरित होने की उम्मीद नहीं है, जैसा कि एक पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाजार में है।  वे बताते हैं कि फार्म गेट की कीमतें न केवल कम हो गई हैं, बल्कि अत्यधिक अस्थिर भी हो गई हैं, जिससे डेयरी पशु पालन उच्च जोखिम वाला उद्यम बन गया है, और यह अल्पावधि में एक अभिशाप है।  आय के स्तर में वृद्धि और स्किम मिल्क पाउडर के निर्यात पर प्रतिबंध हटाने के कारण भारत में दूध बाजार मांग आधारित विकास के चरण में है।  इसके परिणामस्वरूप घरेलू दूध की कीमत में अभूतपूर्व और लगातार वृद्धि हुई है, जिससे उपभोक्ताओं को चिंता हो रही है।  यह खाद्य मुद्रास्फीति से निपटने वाले नीति निर्माताओं के लिए भी एक प्रमुख चिंता का विषय बन गया है क्योंकि दूध भारतीय आहार का एक अभिन्न अंग है।

[02/01, 1:52 pm] Dharam Singh. Hisar: इस मूल्य वृद्धि का अध्ययन करना महत्वपूर्ण है क्योंकि दूध के दो दीर्घकालिक आपूर्ति पक्ष निर्धारक हैं जो मादा गोजातीय पशु आबादी और प्रति पशु दूध उत्पादन 2007 के बाद से वृद्धि की प्रवृत्ति में उलट प्रदर्शन कर रहे हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि स्किम मिल्क पाउडर, मक्खन और प्रति व्यक्ति आय  लंबी और छोटी अवधि में दूध की कीमत पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।  बीफ की कीमत का महत्वपूर्ण दीर्घकालिक प्रभाव पाया जाता है।  भारत में दुग्ध उत्पादन की वर्तमान विकास दर बढ़ती घरेलू आवश्यकता को पूरा करने के लिए अपर्याप्त मानी जाती है।  हाल के वर्षों में दूध की कीमत में तीव्र और निरंतर वृद्धि मांग और आपूर्ति के बीच बेमेल का संकेत है।  शून्य निर्यात शुल्क के साथ मिल्क पाउडर और मक्खन के निर्यात की अनुमति देने से दूध की कीमत को स्थिर करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले स्किम मिल्क पाउडर और मक्खन के घरेलू बफर स्टॉक पर भी असर पड़ सकता है।


 दुग्ध उत्पादन में वृद्धि उन नीतियों से बाधित होती है जो उत्पादन के कारकों को प्रभावित करती हैं।  दुग्ध बाजार के लिए अल्पाधिकार बाजार संरचना के कारण दूध के उपभोक्ता मूल्य और उत्पादन प्रणाली के संदर्भ में दूध के मांग संकेतों के बीच "डिस्कनेक्ट" का मुद्दा है।  इस संरचना के कारण उपभोक्ता मूल्य में रैखिक वृद्धि हुई है, जबकि बढ़ती भिन्नता के साथ फार्म गेट मूल्य अधिक अनिश्चित हो गया है।  कर्नाटक राज्य में दूध मूल्य प्रोत्साहन नीति के प्रभाव की जांच करते हुए यह महत्वपूर्ण अध्ययन अनुमान लगाता है कि फार्म गेट दूध की कीमत और पशु चारा बिक्री का डेयरी सहकारी को दूध की आपूर्ति के साथ दीर्घकालिक संबंध है लेकिन महत्वपूर्ण नहीं है।  राज्य सरकार के प्रत्यक्ष हस्तक्षेप से दुग्ध बाजार की स्थापित ईको-सिस्टम बाधित होने की दिशा में सहायक नहीं रहा है।  इसके परिणामस्वरूप किसानों को दूध के भुगतान में देरी हुई और डेयरी सहकारी को डेयरी किसानों के लिए प्रोत्साहन के हिस्से को अवशोषित करने के लिए मजबूर होना पड़ा।  अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि अपर्याप्त भोजन और खराब प्रबंधन के कारण जानवर इष्टतम मात्रा से कम दूध दे रहे थे।

[02/01, 1:53 pm] Dharam Singh. Hisar: जनवरी 2010 से अप्रैल 2014 तक की अवधि के लिए स्किम्ड मिल्क पाउडर (एसएमपी), मक्खन और बीफ की कीमत और प्रति व्यक्ति आय के साथ दूध की कीमत के मासिक पैनल डेटा का विश्लेषण, संक्षेप में प्रत्यक्ष प्रभावों के माध्यम से दूध की घरेलू कीमत की महत्वपूर्ण भूमिका को प्रकट करता है।  दीर्घावधि में -टर्म और अप्रत्यक्ष प्रभाव।  हम यह भी पाते हैं कि इस अवधि के दौरान स्किम मिल्क पाउडर और मक्खन के घरेलू बफर स्टॉक पर भारत सरकार के नीतिगत हस्तक्षेप से दूध की कीमतों में वृद्धि पर अंकुश नहीं लगा।  इसलिए, दुग्ध उत्पादन और उत्पादकता वृद्धि कार्यक्रम के बारे में नीतियों को इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए उत्पादन कारकों के एक नए सेट के तहत देश भर में लागू करने की आवश्यकता है कि पशु आबादी में वृद्धि में गिरावट आ रही है।  नीतियों को किसानों को भैंसों और गायों की संख्या में वृद्धि करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए, विशेष रूप से औसत दूध क्षमता से अधिक, नस्ल के अनुसार।  नए उत्साह के साथ जिन विशिष्ट क्षेत्रों को नए सिरे से संबोधित करने की आवश्यकता है, वे हैं पशुधन के लिए ऋण, बीमा और बाजार के साथ-साथ निवारक स्वास्थ्य कवर के साथ-साथ छोटे किसानों को लक्षित करना।  तभी भारत दूध के संबंध में अपने नागरिकों के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है।  यदि भारत कृषि उत्पादकता वृद्धि को बढ़ावा देना चाहता है, तो उसे प्रमुख आदानों तक पहुंच में सुधार करना चाहिए।  डेयरी में यह विशेष रूप से फ़ीड और श्रम से संबंधित है।

[02/01, 1:53 pm] Dharam Singh. Hisar: सहकारी सदस्यता आय के लिए मायने रखती है


 यह अखिल भारतीय ग्रामीण ऋण समीक्षा समिति, 1969 का सुझाव था और 2019 की हाल ही में जारी रिपोर्ट ने फिर से किसानों को डेयरी फार्मिंग जैसे सहायक व्यवसाय के लिए कहीं अधिक ऋण सहायता प्रदान करने की आवश्यकता पर बल दिया है।  इसके अलावा देश का लगभग 35 प्रतिशत भोजन अभी भी लगभग 143mha के कुल कृषि योग्य क्षेत्र के 67 प्रतिशत से आता है।  खाद्य उत्पादन, जो अनियमित मानसून पर निर्भर करता है, अत्यंत अस्थिर हो गया है जिसके कारण खाद्यान्नों की कम कीमत और कमजोर विपणन मूल्य हो गया है।  कृषि और ग्रामीण गैर-कृषि उद्यम अल्प रोजगार, मौसमी रोजगार और प्रच्छन्न बेरोजगारी की समस्याओं का अनुभव करते हैं;  वे अभी भी कुल आबादी के 70 प्रतिशत के करीब लोगों को क्रॉल करने के लिए गठित करते हैं।  ग्रामीण क्षेत्रों के युवा लोग काम के लिए कस्बों या शहरों की ओर पलायन करते हैं क्योंकि भारत में जलवायु परिवर्तन के कारण ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा गई है।  डेयरी उद्यम ऐसी समस्याओं को दूर करने का एक समाधान है और भारत में किसानों की सामाजिक आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए एक प्रभावी उपकरण होने के अलावा।


 दुग्ध सहकारी समितियों के सदस्य बनने के लिए डेयरी किसानों के निर्णयों को प्रभावित करने वाले कारक, और दूध की उपज पर सहकारी सदस्यता के प्रभाव, प्रति लीटर शुद्ध रिटर्न, और खाद्य सुरक्षा उपायों (एफएसएम) को अपनाने की राज्यवार पहचान करने की आवश्यकता है।  दूध की औसत उपज, प्रति लीटर शुद्ध रिटर्न और एफएसएम अपनाने की सरल तुलना से डेयरी सहकारी समितियों के सदस्यों और गैर-सदस्यों के बीच महत्वपूर्ण अंतर का पता चला।  परिणामों से पता चला कि सदस्यता निर्णय पर विचार किए बिना परिणाम विनिर्देशों का अनुमान लगाने पर नमूना चयन पूर्वाग्रह का परिणाम होगा।  अनुभवजन्य परिणामों ने डेयरी सहकारी सदस्यता और दूध की उपज, प्रति लीटर शुद्ध रिटर्न और एफएसएम को अपनाने के बीच एक सकारात्मक और महत्वपूर्ण संबंध दिखाया।  विशेष रूप से, एक डेयरी सहकारी समिति के सहयोग से दूध की उपज में 40 प्रतिशत की वृद्धि होती है, शुद्ध रिटर्न में 38 प्रतिशत की वृद्धि होती है, और एफएसएम को अपनाने में 10 प्रतिशत की वृद्धि होती है।  खेत के आकार के आधार पर अलग-अलग अनुमानों से पता चला है कि डेयरी सहकारी सदस्यता द्वारा आय लाभ छोटे पैमाने के किसानों के लिए अधिक था।  इस खोज से पता चलता है कि छोटे डेयरी किसानों की घरेलू आय बढ़ाने में डेयरी सहकारी समितियां महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।  अध्ययन से यह भी पता चला कि डेयरी सहकारी समितियों में दूध की उपज और शुद्ध रिटर्न बढ़ाने और एफएसएम के साथ किसानों के अनुपालन में सुधार करने की क्षमता है।

[02/01, 1:54 pm] Dharam Singh. Hisar: मिश्रित खेती से पशुपालन में मदद मिल सकती है


 भारत में जहां मिश्रित कृषि प्रणाली प्रचलित है, पशुधन उत्पादन और आय स्रोतों के विविधीकरण के माध्यम से जोखिम को कम करता है और इसलिए, तरल संपत्ति का प्रतिनिधित्व करने के लिए पशुधन की अधिक क्षमता होती है जिसे किसी भी समय महसूस किया जा सकता है, जिससे उत्पादन प्रणाली में और स्थिरता आती है।  कृषि स्तर पर आय के स्रोत के रूप में पशुधन का महत्व पारिस्थितिक क्षेत्रों और उत्पादन प्रणालियों में भिन्न होता है, जो बदले में उगाई गई प्रजातियों और उत्पादित उत्पादों और सेवाओं को निर्धारित करता है।  इस प्रकार, डेयरी उत्पाद सबसे नियमित आय जनक है और इसके परिणामस्वरूप डेयरी विकास ने भारत में किसानों की आय, रोजगार और चुकौती क्षमता में वृद्धि की है।  भारत में डेयरी बड़े पैमाने पर छोटे और असंगठित किसानों द्वारा प्रचलित है, जो कम नियोजित और बेरोजगार परिवार के श्रमिकों, विशेष रूप से महिला कार्यबल की मदद से एक या दो दुधारू पशुओं को फसल अवशेषों और उप-उत्पादों पर पालते हैं।  महिलाएं हरा चारा एकत्र करती हैं।  साथ ही डेयरी अब लाखों ग्रामीण परिवारों के लिए आय का एक महत्वपूर्ण माध्यमिक स्रोत बन गया है, मिश्रित खेती की प्रथा और विशेष रूप से सीमांत और महिला किसानों के लिए रोजगार और आय सृजन के अवसर प्रदान करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।  उपविभाजन और विखंडन और लगातार बढ़ती जनसंख्या के कारण घटती परिचालन भूमि जोत के संदर्भ में डेयरी की भूमिका ने महत्वपूर्ण आयाम ग्रहण किया है, क्योंकि हमारे देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से निर्वाह कृषि और सकल बेरोजगारी की विशेषता है।


 भारत-गंगा के मैदानों (आईजीपी) में चावल-गेहूं प्रणाली की एकल-फसल प्रणाली के परिणामस्वरूप प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण, कृषि लाभप्रदता में गिरावट, कारक उत्पादकता और पर्यावरण सुरक्षा में कमी आई है।  मोनो-क्रॉपिंग के विपरीत, जैव विविधता को कृषि स्थिरता के सूचकांक के रूप में माना जाता है।  तदनुसार, एकीकृत कृषि अनुसंधान संस्थान, मोदीपुरम में शोधकर्ताओं द्वारा 1 हेक्टेयर क्षेत्र में भूमि आधारित उद्यमों - फसलों, डेयरी, मत्स्य पालन, बत्तख पालन, मुर्गी पालन, बायोगैस संयंत्र और कृषि-वानिकी को शामिल करते हुए एक एकीकृत कृषि प्रणाली (IFS) मॉडल विकसित किया गया था।  वर्तमान अध्ययन का उनका उद्देश्य चावल-गेहूं प्रणाली को बदलने के लिए एक वैकल्पिक दृष्टिकोण खोजना और स्थायी रूप से किसान की आय में वृद्धि करना था।  आईएफएस मॉडल में चावल-गेहूं प्रणाली से 68,200 रुपये की तुलना में विभिन्न प्रकार की उपज, ऑन-फार्म संसाधन रीसाइक्लिंग और उनकी आय को 378,784 रुपये तक बढ़ाने के साथ किसानों की आजीविका में सुधार करने की क्षमता थी।  एक उद्यम के अपशिष्ट और उप-उत्पादों ने दूसरे के लिए एक इनपुट के रूप में कार्य किया, और गैर-कृषि आदानों पर निर्भरता काफी हद तक कम हो गई, जिससे पर्यावरणीय स्थिरता को मजबूत करने में मदद मिली।


 समापन टिप्पणी


 पशुपालन और डेयरी किसानों के इस संक्षिप्त सर्वेक्षण में यह स्पष्ट है कि एक सिस्टम दृष्टिकोण के माध्यम से डेयरी मूल्य श्रृंखला को संबोधित करने की तत्काल आवश्यकता है, और उनकी समस्याओं को हर तरफ से दूर करने की आवश्यकता है, जिसमें दूध बाजार में उनका समर्थन भी शामिल है।  वे अंततः डेयरी फार्मिंग से अपनी आय का एहसास करते हैं।

2023 to fight communalism

 DEC 26, 2022 - JAN 01, 2023 VOL. XLVII No. 01 PRICE Rs 10

THE WEEKLY PAPER OF THE COMMUNIST PARTY OF INDIA (MARXIST)

Tuesday, October 11, 2022

पुरानी यादें

 रिटायरमेंट

2014 अगस्त में रिटायरमेंट के टाइम पूरी यूनिट के डॉक्टर एक साथ अपनी पुरानी यादें, पुराने दुख सुख के दिन जो यूनिट में गुजरे थे उन्हें अपने अपने ढंग से याद कर रहे थे। एक सीनियर एस आर ने बताया कि एक बार एक unkown मरीज एक्सीडेंट के साथ आया । उसके पेट में चोट थी। उसको ऑपरेट करने की जरूरत थी मगर उसके ग्रुप का खून ब्लड बैंक में नहीं था । बताया कि सर आपका o पॉजिटिव ब्लड है जो पॉजिटिव दूसरे सभी ग्रुप्स को दिया जा सकता है। आप ब्लड बैंक गए वहां एक यूनिट ब्लड unkown मरीज के लिए दिया और वापिस आकर उसका आपरेशन किया। मरीज बचा लिया गया।
मैने बहुत कोशिश की पुरानी याद को याद करने की । मगर जब डेट आदि बताई तो मुझे भी यकीन हुआ कि ऐसा कुछ हुआ था।
और भी कई ना भुलाई जाने वाली पुरानी यादें साझा की गई। अब थोड़ा उम्र का असर होने लगा है तो सोचा सांझा कर लूँ सभी के साथ। मौके पर लिया गया फैंसला यदि एक ज्यान को भी बचा पाता है एक डॉक्टर के जीवन में तो एक एहसास और विश्वास बढ़ता है डॉक्टर का।
मेरे साथ के हमसफ़र सभी डॉक्टरों को याद करते हुए | मुझे गर्व है अपनी यूनिट के उन सभी डॉक्टरों पर जो मरीजों की सेवा में लग्न हैं।
डॉ रणबीर

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पुरानी यादें --मेरे बॉस डॉ सेखों
1976 -1977 का दौर
मेरी पोस्टिंग spm deptt की तरफ से सिविल अस्पताल बेरी में कर दी गई। सिविल अस्पताल के अलावा लेडीज का विंग भी था बाजार के अंदर जा कर । उसमें एक बुजुर्ग महिला फार्मासिस्ट की पोस्टिंग थी। designation दूसरा भी हो सकता है । वहां से सन्देश आया शाम के वक्त कि एक मुश्किल डिलीवरी है और डॉक्टर साहब को बुलाया है। मैं सोचता जा रहा था कि डेढ़ महीने की  maternity ड्यूटी में 5 या 6 डिलीवरी देखी थी। सोचते सोचते पहुंच कर देखा कि breech डिलीवरी थी। monaster था। चार टांगे , चार बाजू , धड़ एक और दो सिर वाला। चारों टांगे और दो बाजू डिलीवर हो चुकी थी। देख कर पसीने छूट गए। एक मिनट सोचा कि मेडिकल भेज दिया जाए। फिर सोचा इस हालत में कैसे भेजेंगे? अगले ही पल सोचा कोशिश करते हैं । मन ही मन Dr GS Sekhon मेरे बॉस याद आ गए। वे कहते थे कि कितना भी मुश्किल मामला हो अपनी कॉमन सैंस को मत भूलो और पक्के निश्चय के साथ शांत भाव से जुट जाओ । जुट गया । जल्दी लोकल लगाकर  episiotomy incision दिया और निरीक्षण किया। महिला का हौंसला बढ़ाया। बाकी के दो बाजू डिलीवर करने में 15 मिन्ट लगे । पसीने छूट रहे थे । खैर फिर मुश्किल से एक सिर और डिलीवर करवाया। फिर भी कुछ बाकी था । देखा अच्छी तरह तो एक सिर अभी बाकी था और पहले वाले सिर से कुछ बड़ा था । कोशिश की । episiotomy incision को extend किया । 15 से 20 मिन्ट की मश्शक्त के बाद दूसरा सिर भी डिलीवर हो गया । monaster था डेथ हो चुकी थी। मगर हम महिला को बचा पाए। पता लगता गया कि दो सिर चार बाजू चार टांगो वाला बच्चा पैदा हुआ है । कौतूहल वश बहुत लोग इकट्ठे हो गए थे। 6 महीने के बाद वापिस spm deptt में आ गया । 2-3 साल के बाद एक हैंड प्रोलैप्स का केस रेफ़ेर हुआ मेडिकल के लिए । रहडू पर लिटा कर बाजार के बीच से ले जा रहे थे तो किसी ने पूछा के बात कहां ले जा रहे हो। बताया कि एक हाथ बाहर आ गया । मेडिकल ले जा रहे हैं । तो अनजाने में उस बुजुर्ग ने कहा - एक बख्त वो था जिब चार चार हाथां आले की डिलीवरी करवा दी थी, आज एक हाथ काबू कोनी आया। किसी ने बताया था जब वह मरीज मेरे पास 6 वार्ड में दाखिल था । मेरे को मेरे बॉस Dr सेखों एक बार फिर याद आये। बहुत अलग किस्म की इंसानियत के धनी थे Dr सेखों।
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भुली बिसरी यादें 1956
सन 1956 की बात है की मेरे पिताजी चौधरी जागे राम सिरसा से बतोर इंस्पेक्टर एग्रीकल्चर की पोस्ट से  बतौर फार्म मैनेजर सरकारी एग्रीकल्चर फार्म रोहतक में तबादला हो कर आए। यह फार्म 100 एकड़ जमीन में बना सरकारी एग्रीकल्चर फार्म था , जिसमें हर तरह की खेती की जाती थी । चार जोड़ी हट्टे कट्टे बैल थे जो खेती करने में  बहुत कारगर रूप से इस्तेमाल किए जाते थे ।  पिताजी 1966 तक यहां पर रहे और यहीं से रिटायर हो गए।  आने वाले दिनों में यह फार्म नहीं रहा और जमीन कुछ बेच दी गई कुछ पर सरकारी दफ्तर खुलते गए और सरकारी अफसरों के रहने के लिये कोठियां और मकान बनते गए। सिरफ़ एग्रीकल्चर फार्म का मेन गेट बचा है जो कमिश्नर के  रेजिडेंस और दफ्तर दोनों यहां हैं, तक जाता है बाकि एग्रो मॉल इसकी जमीन में बना और कई कॉलोनी भी बन गई । बहुत से मकान हैं । दो पीपल के पेड़ आज भी पहचाने जा सकते हैं जो हमारे घर के सामने मौजूद थे। भूली बिसरी यादें हैं पूरे फॉर्म में घूमते थे। पिताजी बहुत सख्त मिजाज थे और फार्म के खेत से चूसने के लिए गन्ने भी नहीं लाने देते थे। बोहर वालों के खेतों से लेकर आते थे।  और चीजों का तो मतलब ही नहीं । यहीं से मैं बिल्कुल साथ लगता जाट स्कूल है वहां पर पढ़ने जाने लगा । पहले प्राइमरी स्कूल में पढ़ा  और फिर हाई स्कूल में छठी क्लास से हायर सेकेंडरी किया । बहुत सी यादें हैं उस दौर की जिन्हें याद करना इतना आसान नहीं है आज एक बार  कोशिश है उन पुरानी यादों को याद करने की।
प्राइमरी स्कूल में पहले एक ही टीचर थे मास्टर फतेह सिंह दलाल। तीसरी में हुए तो सूरजमुखी बहिनजी ने भी ज्वाइन कर लिया। पांचवी तक पहुंचे तो मास्टर दलजीत सिंह राठी जी भी क्लास लेने लगे।
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समस्त कर्मचारी व छात्र पीजीआईएमएस रोहतक द्वारा बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर के 131वें जन्म दिवस पर आयोजित कार्यक्रम ।
पीजीआईएमएस,रोहतक लेक्चर थिएटर -1 में।
इस 1 थियेटर में कभी 1967से 1971के  दौर में अपने गुरुओं से पढ़ा और बहुत कुछ सीखा और फिर 1983 से 2014 तक पढ़ाया भी। बहुत सी पुरानी यादें ताजा हो गयी। (42 साल का सफर) 14 अप्रैल, 2022।
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पुरानी यादें
24 -25 साल पहले की बात है । नार्थ जोन सर्जन कांफ्रेंस जम्मू में आयोजित की गई थी । रोहतक से 25-30 डॉक्टर थे । एक दिन सभी का मन वैष्णो देवी मंदिर की यात्रा का बना। मैने मना किया तो सभी ने अनुरोध किया कि चलें । हम चल दिये ।
       अर्ध कन्वारी से कुछ पहले 4-5 महिलाएं और 5-6 पुरुष परेशान से दिखाई दे रहे थे। हमारे में से किसी ने पूछा-क्या बात है क्या हुआ।
बताया- उनके एक बुजुर्ग पेशाब करने बैठे थे और वे नीचे खाई में लुढ़क गए हैं । उन्हें देखने गए हैं।
       हमने भी बुजुर्ग को ढूंढने की इच्छा बनाई और 5-6 डॉक्टर हम नीचे उतरते चले गए । 150 गज के करीब नीचे उतरने के बाद हमने आवाज लगाई कि क्या बुजुर्ग मिल गए। और नीचे से आवाज आई- हाँ मिल गए। हमने पूछा- कैसी तबियत है? जवाब आया- ठीक हैं। उप्पर रास्ते में खड़े लोगों ने सुना तो कुछ जय माता की बोलते चले गए।
         हमने फिर पूछा कि हम डॉक्टर हैं कोई चोट है तो हम आ जाते हैं मदद करने । बताओ कहाँ पर हो।
फिर आवाज आई थोड़ी धीमी - वो तो चल बसे । इतनी देर में हम भी वहां पहुंच गए थे। पूछा- पहले ठीक क्यों कहा ? जवाब था कि ऊपर वाले रिश्तेदारों में से किसी को सदमा न लग जाये इसलिए ।
        कुछ लोगों को तो लगा कि माता ने उस बुजुर्ग को बचा लिया। मगर सच्चाई यही थी कि माता उस बुजुर्ग को नहीं बचा पाई।
      मैने सभी डॉक्टर सहयोगियों से पूछा -- यदि बुजुर्ग जिंदा होते और चोटिल होते तो हम क्या फर्स्ट एड कर सकते थे । सब ने अपने अपने ढंग से बात रखी। मैने फिर कहा- बिना इमरजेंसी किट के शायद हम ज्यादा फर्स्ट एड करने की हालत में नहीं होते।
         हम सबने तय किया कि जब इस तरह के ग्रुप में कहीं जाएंगे तो इमरजेंसी किट जरूर साथ लेकर चलेंगे ।
बाकियों का तो पता नहीं मैने एक किट जरूर बना ली ।
तीन साल बाद वही कांफ्रेंस पी जी आई चंडीगढ़ में थी। कालेज की बस में गए थे हम सब । वापसी पर अम्बाला पहुंचने से पहले हमारे सामने ट्रैक्टर सड़क के किनारे पलट गया। हमने गाड़ी रुकवाई ।
    ड्राइवर ट्रैक्टर के पहिये के नीचे दबा था । हमने सबने मिलकर उसको निकाला और देखा तो वह शॉक में था । मैं ने इमरजेंसी किट से उसे मेफेंटीन इंजेक्शन दिया और एक वोवरान का inj दिया । कुछ संम्भल गया मरीज । हमने उसे अपनी गाड़ी में लिटाया और उसे अम्बाला सिविल अस्पताल में दाखिल करवाया । इलाज शुरू हुआ तो मरीज और इम्प्रूव हुआ ।
   3 साल तक लगता था यह किट खामखा उठाये फिरता हूँ मगर उस रोज लगा कि खामखा नहीं उठाई किट ।
शायद जो डॉक्टर साथी इन दोनों मौकों पर थे उनको याद हों ये दोनों घटनाएं ।
रणबीर दहिया
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वार्ड  6-- भूली बिसरी यादें
एक बार की बात की झरौट के बुजुर्ग अपनी घरवाली को लेकर आये । उसकी एक टांग में गैंग्रीन हो गई बायीं या दायीं याद नहीं। हमने सभी concerned विभागों की राय ली और यह तय हुआ कि amputation करनी होगी । ताऊ को समझाया। कटने की बात सुनकर दोनों घबरा गए । ताऊ मेरे कमरे में आया और हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया। मैने बिठाया और उसकी और देखा। " काटनी ए पड़ैगी डॉ साहब। और कोए राह कोण्या इसकी ज्यान नै खतरा करदेगी या गैंग्रीन -- मैंने जवाब दिया बहुत धीमे से। ताऊ बोल्या-- न्यों कहवै सैं अक गुड़गांव मैं शीतला माता की धोक मारकै ठीक होज्यां हैं। मैंने कहा-- मेरी जानकारी में नहीं। ताऊ-- एक बार जाना चाहवैं सैं। फेर आपके डॉ न्यों बोले-- LAMA होज्या । छुट्टी कोण्या देवें । और फिर हमारे वार्ड में दाखिला नहीं हो सकता। चाहूँ सू आप के वार्ड मैं इलाज करवाना। मैने कहा एक शर्त है-- जै इसकी टांग धोक मारकै ठीक होज्या तो भी लियाईये और नहीं ठीक हो तो भी। ठीक होगी तो मैं बाकी के इसे मरीज भी वहीं गुड़गांव भेज दिया करूंगा और ठीक न हो तो आप ये सारी बात एक पर्चे में लिखकर बांटना कि वहां मेरी घरवाली ठीक नहीं हुई। हम ने discharge on request कर दिया । दो दिन बाद वापिस आ गया । महिला की हालत ज्यादा खराब हुई थी। खैर amputation ortho विभाग  के सहयोग से की और महिला ठीक होकर चली गयी । बुजुर्ग जाने से पहले आया कमरे में और कहने लगा-- पर्चा छापना चाहूँ सूँ फेर गांव वाले कह रहे हैं शीतला माता
के खिलाफ पर्चा। बहोत दबाव सै मेरे पै डॉ साहब । पैरों की तरफ हाथ किये । मैने बुजुर्ग को छाती से लगा लिया और आशीर्वाद देने को कहा।

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भूली बिसरी यादें
1978 में pgims Rohtak mein 98 days ki hadtaal hui ..उन दिनों चौधरी हरद्वारी लाल वाईस चांसलर थे। मेरे जीवन में बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई यह हड़ताल
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1978 में Haryana State Rural Medical Teachers Association बनी थी 98 दिन की डॉक्टर्स की हड़ताल के दौरान Haryana State Medical Teachers Association के सामने । इसका क्या हुआ आज है या नहीं कोई बता सके तो !!!
इसको revive न किया जाए । हालात बनाये जा रहे हैं । decisions मेरिट बेस्ड ही इस संकट को गहराने से रोक सकते हैं । मेरा अंदाज गलत हो सकता है मगर human एप्रोच वाले प्रशासको और डॉक्टरों को गंभीरता से विचार करना चाहिए वरना वक्त 1978 को दोहराने से नहीं चूकेगा भले ही किसी और भेष में ।
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Sunday, October 9, 2022

NEP 2020

 नई शिक्षा नीति 2020

समकालीन भारत में केंद्र सरकार उन सभी प्रकार की नीतियों को बुलडोजर कर रहा है जो विविधताओं, संघवाद के बारे हैं। नवउदार कॉर्पोरेट निकायों के नुस्खे का पालन करने के लिए वह जनता की अज्ञानता का, बड़े बहुमत  का , रीति-रिवाजों और विश्वास प्रणालियों का चतुराई से उपयोग कर रहा है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 पैकेज की ऐसी ही एक नीति है। इसकी कार्यान्वयन रणनीति भी चतुराई से तैयार की गई है क्योंकि  यह राज्य से दूसरे राज्य में भिन्न होती है। जब तक बड़े पैमाने पर प्रतिरोध का निर्माण नहीं किया जाता, तब तक एनईपी 2020 सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली का टर्मिनेटर बन जाएगा।
          आंध्र प्रदेश ने पहले ही एनईपी 2020 में सुझाए गए संरचनात्मक परिवर्तनों को लागू करना शुरू कर दिया है। कई राज्य सरकारों ने स्कूलों को विलय या बंद करके स्कूली शिक्षा सुविधाओं को कम करना शुरू कर दिया, जो अंततः बच्चों के पड़ोस के स्कूलों से सीखने के अधिकार को प्रभावित करता है। कई राज्यों ने पहले ही पाठ्य पुस्तकों से छेड़छाड़ करके सांप्रदायिक तत्वों को बढ़ावा देने की बात कही है और इस प्रकार सामग्री भार को कम करने के नाम पर सभी प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक सामग्री को समाप्त कर दिया है।
         कर्नाटक प्रतिरोध आंदोलनों ने साबित कर दिया कि हम राज्य को अपनी जनविरोधी स्थिति को वापस लेने के लिए मजबूर कर सकते हैं यदि हम मुद्दों पर आधारित समूहों को जुटाने और विकसित करने में सफल होते हैं और उन्हें सरकारी पदों और तदर्थ और मनमाने फैसलों के खिलाफ रैली करते हैं।
            हमें अपनी चिंताओं को लोगों की चिंताओं में बदलना होगा। हमें सभी समान विचारधारा वाले धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक आंदोलनों को एक साथ लाना और सुनिश्चित करना है और प्रतिरोध के लिए साझा मंच बनाना है।
             निम्नलिखित कार्यक्रम में स्वयं को लैस करने और संगठनों और समुदाय को संगठित करने की संभावनाएं हैं।
     1 उन संगठनों की भागीदारी सुनिश्चित करके राज्य स्तरीय कार्यशालाओं या सम्मेलनों का आयोजन करना, जो एनईपी के खिलाफ प्रतिरोधी कदम में सहयोग कर सकते हैं।
     2 सभी राज्यों में एक प्रेस नोट का विमोचन।
     3 एनईपी के कार्यान्वयन के संबंध में राज्य के भीतर वास्तविकताओं को उजागर करने वाले शिक्षा बुलेटिन / तथ्य पत्रक जारी करें।
   4 प्रेस कांफ्रेंस एनईपी के संबंध में केंद्र सरकार और राज्य विशिष्ट कार्यों के प्रतिगामी उपायों पर प्रकाश डालते हुए की जाएं।
5 छोटे समूहों के टाउनशिप में विरोध प्रदर्शन। 6 मुद्दे आधारित साझा मंच बनाने की संभावनाओं का पता लगाएं और इसे उस मंच का एक प्रमुख एजेंडा बनाएं।
7 इसे एक लोकप्रिय एजेंडा के रूप में बदलने के लिए  सेमिनार और संवाद।
8 सोशल मीडिया अभियान की संभावना का प्रयास करें।
9 जन प्रतिनिधियों को पत्र लिखें।
10 कोई अन्य संयुक्त कार्रवाई जो जनता का ध्यान आकर्षित कर सकती है।
11 संबंधित राज्यों में एनईपी के कार्यान्वयन के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीके की निगरानी के लिए प्रत्येक राज्य में एक छोटी टीम का गठन किया जाना है।
12 दीवार और पोस्टर लेखन की भी संभावनाएं हैं।
13 एनईपी या जनविरोधी नीतियों के खिलाफ लड़ने के लिए बनाए गए बड़े मंचों में हमारी भागीदारी सुनिश्चित करें।
14 लोगों की शिक्षा सभा: संयुक्त मंच की मदद से हमें पीपुल्स एजुकेशन असेंबली को डिजाइन, योजना और निष्पादित करना है, जो लोगों, राय बनाने वालों, शिक्षाविदों, छात्रों आदि के साथ बातचीत के लिए एक व्यापक योजना में परिवर्तित हो सकती है। हम कार्यक्रम की योजना बना सकते हैं 2022 सितंबर 5 से 2023 26 जनवरी स्वतंत्रता के 75 वें वर्ष की हमारी गतिविधि योजना के साथ मिलकर। लोगों की शिक्षा सभा को हमें सावधानीपूर्वक योजना बनानी होगी।
15 एक नोट तैयार कर जनरल सेक्रेटरी को प्रस्तुत कर दिया गया है। संपादकीय टीम इसे अंतिम रूप देकर राज्यों को भेज सकती है। राज्य विशिष्ट मुद्दों को जोड़ने के लिए राज्य नोट को संशोधित कर सकते हैं।
16 राज्य विभिन्न स्तरों पर आयोजित होने वाली शिक्षा सभाओं की अवधारणा और योजना बनाने और शिक्षा नोट में राज्य विशिष्ट मुद्दों को शामिल करने के लिए दो दिवसीय कार्यशाला की योजना बना सकते हैं।
          एआईपीएसएन की कार्यकारिणी ने लोगों से बातचीत करने का फैसला किया। और लोक शिक्षा सभा का सुझाव दिया ताकि स्थानीय स्तर या ग्राम स्तर की आवाज को राष्ट्रीय स्तर पर रखा जा सके। इस तरह के संवाद के लिए जमीन बनाने या माहौल बनाने के लिए सभी राज्य संगठनों को इसकी बड़े पैमाने पर जनसंपर्क कार्यक्रम की योजना बनानी होगी या खुद को तैयार करना होगा।
            हमें अपनी चिंताओं को लोगों की चिंताओं में बदलना होगा। हमें सभी समान विचारधारा वाले धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक आंदोलनों को एक साथ लाना और सुनिश्चित करना है और प्रतिरोध के लिए साझा मंच बनाना है।
         प्रत्येक संगठन अभियान शुरू करने के लिए नीचे दी गई संभावनाओं का पता लगा सकता है। निम्नलिखित कार्यक्रम के माध्यम से स्वयं को लैस करने और संगठनों और समुदाय को संगठित करने की संभावनाएं हैं।
   
          संभावित कार्यक्रम
ग्राम स्तर- 25 अक्टूबर से पहले
पंचायत स्तर -14 नवंबर से पहले
ब्लॉक स्तर - 30 नवंबर से पहले
जिला स्तर - 30 दिसंबर से पहले
राज्य स्तर- 30 दिसंबर से पहले
राष्ट्रीय स्तर- 2023 के बीच 26 जनवरी या 30 तारीख - आयोजन स्थल तय करना।

    • राज्यों में जो हो रहा है, उसके आसपास सामूहिक अभियान और मैदान पर लगातार निगरानी की योजना राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर बनाई जानी चाहिए। इस प्रयोजन के लिए टिप्पणियों, साक्ष्यों और आंकड़ों का मिलान किया जाना चाहिए।
  • जहां तक ​​संभव हो हमें समान विचारधारा वाले संगठनों के बड़े मंचों का हिस्सा बनने का प्रयास करना होगा।
• बड़े अभियानों की योजना बनाने के लिए हमें राज्य स्तरीय सम्मेलन आयोजित करने होंगे। यहां फिर से हमें समान विचारधारा वाले संगठनों को संगठित करने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करना होगा।
• उच्च शिक्षा के लिए हमें संस्थागत शिक्षा सभाओं के बारे में सोचना होगा।
• और छात्र सभाएं भी।
• शिक्षा के लिए गोलमेज सम्मेलन।
        एनईपी के लिए एक निगरानी दल या अभियान दल का गठन
       इसलिए इसे व्यापक टीम वर्क की जरूरत है। एक एकल डेस्क एनईपी के संबंध में गतिविधियों की निगरानी नहीं कर सका। हमें स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा डेस्क, संस्कृति डेस्क और अन्य डेस्क के बीच उचित समन्वय सुनिश्चित करना है, एक संगठनात्मक निगरानी मंदिर भी अनिवार्य है। संगठन को भी अभियान के कार्यान्वयन में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए।
   अभियान दल सुझाव:
1. राष्ट्रपति
2. महासचिव
3. कोषाध्यक्ष
4.संयुक्त सचिव
5.डॉ. D.रघुनंदनन
6.डॉ. एस कृष्णास्वामी
7. प्रो. अनीता रामपाली
8.कमला मेनन
9. बिप्लब घोष
10 डॉ काशीनाथ चटर्जी
11.संयोजक संस्कृति डेस्क
12. संयोजक उच्च शिक्षा डेस्क
13.सह-संयोजक उच्च शिक्षा डेस्क
14.सह-संयोजक स्कूल शिक्षा डेस्क 15.संयोजक स्कूल शिक्षा डेस्क
     हमें अभियान दल के लिए एक समन्वयक तय करना होगा

    

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