Sunday, July 26, 2015

महिलाएं और आज का दौर


निर्भया केस के बाद सड़कों पर उमड़े जनता के सैलाब के चलते , सरकार को दबाव में जस्टिस वर्मा की अध्यक्षता में कमेटी का गठन किया गया। इस कमेटी की सिफारिसों के आधार पर महिलाओं पर होने वाली हिंसाओं को रोकने , खत्म करने या कम करने के लिए कानूनों को और भी कठोर बनाया गया हालांकि कमेटी की सभी सिफारिसों को नहीं माना गया । परन्तु हालात अभी भी न केवल जस के तस हैं, बल्कि स्थिति और भी भयानक बनती जा रही है। महिलाओं , युवा लड़कियों और बच्चियों पर हो रही हिंसा का दायरा व तीव्रता लगातार बढ़ रही है। वे कहीं भी अपने सम्मान व सुरक्षा के लिये आश्वस्त नहीं हैं। महिलाओं के साथ हो रहे बलात्कार और उनके बाद बेरहमी से हत्या की अनेकों घटनाओं को सुनकर थोड़ी देर के लिए तो गुस्सा और विरोध दिखाई देता है परन्तु महिलाओं के नाम पर गाली देने , पीछा करने, घूरने , छींटाकसी करने , पिटाई व तेजाब फैंकने जैसी बहुत सी ऐसी अनेक तरह की हिंसा बदस्तूर जारी है। पुत्र लालसा के चलते छांटकर कन्या भु्रण हत्या या गर्भ से पहले ही बच्चे के सैक्श का चुनाव करने को मजबूर करने , घूंघट में पांच में से चार ज्ञान्न्द्रियों को घोंट कर रखने , दहेज के लिए सीधे या परोक्ष रुप से तंग करने की हिंसा की बाढ़ सी आा गई लगती है। आजकल बसों में अनियन्त्रित भीड़ के चलते महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की अभद्र घटनाएं एक तरह से आम बात की तरह हो रही हैं। बच्चियों पर भी हिंसा होने के जघन्य अपराध के मामले सामने आ रहे हैं। इन सब बातों को चुपचाप सहन नहीं किया जा सकता । हिंसा के खिलाफ पीड़ितों की और से प्रतिरोध बढ़ रहा है। समाज के संवेदनशील तबकों ने भी विरोध की आावाजें उठाई हैं। इस बढ़ती सामाजिक असुरक्षा ने भी लिंग अनुपात के बिगड़नें में एक भूमिका निभाई लगती है।
आाशा राम बापू और भी कई तथाकथित बाबाओं की काली करतूतें भी पिछले दिनों सामने आई हैं और पूरा समाज किसी न किसी तरह आहत हुआ है। हरियाणा में भी बरवाला के आश्रम का बबाल और डेरा सच्चा सौदा की शर्मनाक करतूतें किसी से छिपी हुई नहीं हैं और इन सब को किसी न किसी रंग का राजनैतिक संरक्षण भी मिलता रहा बताते हैं और सामने आता भी रहा है।कुछ इलाकों में खाप पंचायतों का फिर से उभार और राजनैतिक संरक्षण भी खतरे की घण्टी बजा रहा है। मगर कानून दूध का दूध और पानी का पानी कब छांटेगा इसका पूरे समाज को बेसब्री से इन्तजार है। मगर फिर भी इन बाबाओं की गिनती और इनके पीछे की भीड़ क्यों बढ़ती जा रही हैं यह सोचने का विषय है। 
हमारे समाज की बुन्तर में ही इन जघन्य अपराधों की जडें हैं जिन्हें समझना बहुत जरुरी है। सामाजिक लिंग भेद को जैंडर का नाम दिया गया है। महिलाओं को आज भी दूसरे दर्जे का नागरिक मानने की मानसिकता प्रचलित है और और अधिक मजबूती पकड़ती जा रही है। यदि किसी महिला के साथ हिंसा होती है या वे अपराधों का शिकार होती हैं तो अपराधियों को कटघरे में खड़ा करने की बजाय पीड़ित में ही कसूर ढूंढ़ने के कुतर्क सामने रख दिये जाते हैं। ऐसी मानसिकता आम समाज के साथ साथ प्रशासन , सरकार व कई संस्थाओं में भी व्याप्त है जिसका खामियाजा पीड़ितों को भुगतना पड़ता है और अपराधी न केवल बच निकलते हैं बल्कि उनके होसले बुलन्द हो रहे हैं। समाज द्वारा आरोपित यह सामाजिक लिंगभेद न तो सार्वभौमिक है और न ही स्थाई है। काल संस्कृ्ति के बीच ये बदलता रहता है। आज इस महिला विरोधी वातावरण को चुनौती दिये जाने की बहुत सख्त जरुरत है। इस सामाजिक लिंग भेद पर सांस्कृृतिक , पर्यावरण , आर्थिक व राजनैतिक घटकों का प्रभाव भी पड़ता है। आर्थिक तौर पर हरित क्रान्ति के माध्यम से पूरे भारत में अग्रणी हरियाणा और पंजाब सामाजिक सूचकांकों में पिछड़ गये हैं । लिंग अनुपात का स्तर चिन्ताजनक है। क्या ऐसे विकास को आदर्श विकास कहा जा सकता है? सामाजिक लिेग भेद हर जगह हर क्षेत्र में जा सकता है। मतलब मौत की दर में भी खास तरह की असमानता हैं। मूल भूत सुविधाओं के क्षेत्र में असमानता है। खास मौकों की उपलब्धता में असमानता , प्रोफैसनल क्षेत्र में असमानता , घर के अन्दर की असमानता , सांस्कृृतिक स्तर पर असमानता , मालिकाना हक में असमानता आादि। इन सामाजिक लैंगिक असमानताओं के बढ़ती सामाजिक असुरक्षा के अलावा और भी कई मुख्य कारण हैं। हमारे सभी धर्मों में महिलाओं को दोयम दर्जे का स्थान मिला है। दूसरा हमारा समाज पितृृसतात्मक समाज यानि पुरुष प्रधान समाज है जो महिला के बराबरी के हक के खिलाफ है। कानूनी संस्थाओं में भी सामाजिक लिंग भेद देखा जा सकता है। हमारी राजनैतिक पार्टियों में भी इसे बखूबी ढूंढ़ा जा सकता है। हमारी आर्थिक इकाईयों में तो बहुत ही साफतौर पर इसे देखा परखा जा सकता है। इसी प्रकार प्रिंट और इलैक्ट्रोनिक मीडिया में भी यही हालात नजर आते हैं।शिक्षण संस्थाओं का यही हाल है। हमारी रोजाना के जीवन की मान्यताओं में भी इसकी पूरी झलक देखी जा सकती है। हमारी ज्यादातर कल्चरल प्रैक्टिसिस सामाजिक लिंग भेद को पैदा करने वाली और इसे बराबर बनाए रखने वाली हैं। महिला पूछती है समाज से-
देह मेरी ,हल्दी तुम्हारे नाम की
हथेली मेरी, मेंहदी तुम्हारे नाम की
सिर मेरा , चुनरी तुम्हारे नाम की
मांग मेरी, सिन्दूर तुम्हारे नाम की
माथा मेरा, बिन्दिया तुम्हारे नाम की
नाक मेरी, नथनी तुम्हारे नाम की
गला मेरा, मंगल सूत्र तुम्हारे नाम की
कलाई मेरी, चुड़ियां तुम्हारे नाम की
उंगलियां मेरी, बिछुए तुम्हारे नाम के
बड़ों की चरएा वणदना मैं करुं 
और सदा‘सुहागन का आशीष तुम्हारे नाम का
कोख मेरी, खून मेरा, दूध मेरा
और बच्चा तुम्हारे नाम का
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नम्रता से पूछती हूं आाखिर तुम्हारे पास
क्या है मेरे नाम का? 
हमारी परम्पराओं में ये दुभांत भरी पड़ी हैं। महिला सबको खाना खिलाकर सबसे बाद में खाना खायेगी । वंश चालक तो लड़का ही हो सकता है। बिना लड़के के वंश कैसे चलेगा? पति परमेश्वर होता है चाहे वह कोढ़ी हो, चाहे शराबी हो, चाहे जुआरी और जारी हो। कन्यादान का रिवाज सबसे अधिक दुभान्त वाली परम्परा रही है और अभी भी जारी है। एक विधवा महिला का जीवन दुभान्त का जीता जागता उदाहरण है। महिला दोबारा शादी नहीं कर सकती लेकिन पुरुष कर सकता है। कहते हैं लड़का तो बुढ़ापे का सहारा है। ‘‘पुत्र लालसा’’ लड़की की कीमत पर खड़ी फल फूल रही है। हमारे ज्यादातर लोक गीतों व रागनियों में भी यह दुभान्त दिखाई देती है। हमारे मालिकाना हकों में , व्यवहार में हद दर्जे की नाबराबरी है। महिला के इलाज में भी असमानता नजर आाती है।  लड़के को इलाज के लिए तुरन्त अस्पताल ले जाया जाता है। लड़की के इलाज में यह तत्परता जयादा बार गायब होती है। शर्तिया लड़के की दवाई देने वालों के नुस्खे हर दस बीस मील पर किसी न किसी के पास होंगे। ज्यादातर गर्भवती महिलाएं गर्भ के पहले 3 महीने में लड़का होने की दवाईयों का सेवन करती हैं। और कुछ इनमें से जन्म जात बीमारियों से ग्रस्त बच्चों को जन्म देती हैं। जब लड़का पैदा होता है तो खुशी मनाई जाती है और थाली बजाई जाती है और जब लड़की पैदा होती है तो ठीकरा फोड़ कर मातम मनाया जाता है। लड़के के जन्म पर मिठाई बांटी जाती है। लड़के की छठ मनाई जाती है लड़की की नहीं। लड़के का नामकरण संस्कार किया जाता है मगर लड़की का नहीं । लड़का पैदा होता है तो जच्चा को 10 किलो देशी घी दिया जाता है और लड़की पैदा होती है तो जच्चा को 5 किलो घी दिया जाता है । मरने के बाद शमशान घाट में अग्नि भी पुरुष ही देगा महिला नहीं। अलग अलग पहरावे हैं दोनों के। अलग अलग हेयर स्टायल हैं। घर में तो बहुत बड़ी खानशामा है मगर ताजमहल जैसे होटलों के खानशामा पुरुष ही होंगे। हलवाई भी पुरुष होते हैं। मंगल सूत्र भी वही पहनेगी। वैसे सही मायनों में बायलॉजिकली पुरुष से ज्यादा ताकतवर है महिला। 
सब असमानताओं के चलते समाज में काफी दिक्कतें बढ़ी हैं। नतीजतन लिंग अनुपात चिन्ता जनक स्तर पर पहंुच गया है। महिलाओं पर पूरे भारत में हिंसा बढ़ रही है। यदि क्र्राईम ब्यूरो के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2011 में बलात्कार के मामलों में 2010 के मुकाबले 9.2 फीसदी की हुई और कुल 24,206 मामले सामने आये । इसी प्रकार हरियाणा विधान सभा में रखी गई एक रिपोर्ट के मुताबिक 2011 के मुकाबले महिला पर अत्याचार के केसों में 2012 में बढ़ोतरी हुई। मोलेस्टेसन के 2011 में 474 केस थे जबकि 2012 में 521 केस हुए। इसी प्रकार ईव टीजिंग के 2011 में 490 केस रजिस्टर किये गये जबकि 2012 में 534 केस हुए। महिला क्राईम के 2011 में कुल केस 5374 हुए मगर 2012 में केस 5955 हुए । इसके साथ ही कन्वाक्शन रेट हरियाणा में 23.4 प्रतिशत थी जबकि उतर प्रदेश में यह 55.50 प्रतिशत थी। बिना ब्याहे लोगों की संख्या बढ़ी है। दूसरे प्रान्तों से खरीदी बहुओं की संख्या बढ़ रही है और इस संदर्भ में बहुत ही अमानवीय घटनाएं भी सामने आा रही हैं।अदला बदली का नया खेल सामने आ रहा है। महिला का अमानवीयकरण बढ़ा है जिसके चलते पूरे समाज का अमानवीयकरण हो रहा है। पिछड़ी सोच की संस्थाओं के  फतवे बढ़ रहे हैं । डरैस कोड का बाजार गर्म है। महिलाओं को लेकर तरह तरह के मिथों का प्रचार प्रसार किया जा रहा है। 
हरियाणा में गावों में दारु से कोई घर नहीं बचा यह अलग बात है कि घर में एकाध आदमी दारु न पीता हो। पंजाब में भी दारु और नशे का प्रचलन घर घर हो गया है। दारु और नशा महिला पर हिंसा बढ़ाता ही बढ़ाता है। इन सब असमानताओं के चलते समाज में अस्थिरता आई है और अब चूंकि महिलाओं और दलितों ने अपने हकों के लिए असरट करना शुरु कर दिया है इसलिए प्रतिक्रियावादी ताकतों को और भी ज्यादा परेशानी हो रही है ओर उनके हमले भी तेज हो रहे हैं। इस माहौल में कानूनों का सही और वक्त रहते क्रियान्वन करवाने की जरुरत है। साथ ही एक जैंडर फैं्रडली , ईको फै्रडली, सर्वसमावेशी विकास की परिकल्पना के साथ नये नवजागरण के जरिये ही गिरते समाज को बचाने का, महिलाओं पर बढ़ते अत्याचारों का विरोध करते हुए एक नागरिक समाज बनाने का समाज सुधार आन्दोलन चलाया जाना जरुरी हो गया है।
गाव के स्तर पर-
गांव की ईकाई द्वारा की जाने वाली गतिविधियां
1. पुस्तकालयः

*जरूरत के हिसाब से, रूचिकर, सूचना देने वाली तथा साहित्यिक किताबें जुटाई जाएं तथा गांव का एक पुस्तकालय अवश्य होना चाहिए।
* कुछ बड़े गांव में बड़ा पुस्तकालय हो सकता है जहां से छोटे गांव के छोटे पुस्तकालयों को किताबों का आदान-प्रदान किया जा सके।
* प्रत्येक गांव में एक चलती-फिरती लायब्रेरी भी होनी चाहिए।
* शुरुआत के तौर पर कुछ गांव में महिला पुस्तकालयों का गठन किया जा सकता है।
* पुस्तकालय का काम सम्भालने के लिए एक कमेटी का गठन किया जाना बहुत जरूरी है। कमेटी के लोगों में पुस्तकें पढ़ने की आदत को बढ़ावा देने के लिए रचनात्मक कदम उठाएगी। इस कमेटी में 50 प्रतिशत महिलाएं अवश्य हों। गांव के अध्यापकों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।
* दीवारी अखबार का विकास भी यह कमेटी कर सकती है।
* स्थानीय पत्रिका की योजना भी बनाई जा सकती है।
* स्कूल की लाइब्रेरी से तालमेल किया जा सकता है।
* कम कीमत की अच्छी/जनतांत्रिक व धर्म निरपेक्षता तथा राष्ट्रीय एकता की भावनाओं को बढ़ावा देने वाली पुस्तकें भी जरूरी होनी चाहिएं।
* मुंशी प्रेमचन्द, शरत चन्द्र जैसे प्रसिद्ध लेखकों का साहित्य रहे।


2. खेल-कूद प्रतियोगिताओं का आयोजनः हरियाणा, पंजाब में खेल-कूद प्रतियोगिताओं की अपनी एक परम्परा रही है। इस पर जन चेतना केंद्र को खास ध्यान देना चाहिए। इसके लिए लोगों से चन्दा इकट्ठा किया जा सकता है। कुश्ती, कबड्डी प्रतियोगिता, वालीवाल प्रतियोगिता, दौड़ प्रतियोगिता, कुर्सी दौड़, हल चलाने की प्रतियोगिता, साफ-सुथरे घर की प्रतियोगिता, साफ गलियों की प्रतियोगिता, ओढ़नी कढ़ाई प्रतियोगिता और चाट्टी दौड़। खेल-कूद प्रतियोगिताएंः- पुरुषों के लिए व महिलाओं के लिए तथा अलग-अलग उम्र के पुरुषों व महिलाओं में होनी चाहिए।
3. हाथ से बनाई चीजों की प्रतियोगिताः बुनाई, कढ़ाई, सिलाई, रंगाई, छपाई की प्रतियोगिता, कपड़े पर, लकड़ी पर, फैवीकोल पर, शीशे पर या किसी और चीज पर। साक्षरता अनुभव बताता है कि इस प्रतियोगिता के माध्यम से गांव की ईकाई को आत्म निर्भर बनाने की तरफ ले जाया जा सकता है।
4. कर सेवाः नाली साफ करना, स्कूल में सफेदी करना, स्कूल में शौचालय का निर्माण, गली की सफाई। चौपाल का रख-रखाव व उसकी मरम्मत, कुएं की देखभाल, मीठे पानी के नलकों की देखभाल, लाइब्रेरी के लिए कमरा बनाना, खड़े पानी में मच्छरों को मारने के उपाय करना, स्वास्थ्य कैम्पों का आयोजन करना।
5. सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजनः चन्द्र शेखर आजाद, भगत सिंह, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, मुंशी प्रेम चन्द के जन्म दिन, 26 जनवरी, 15 अगस्त पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन अवश्य किया जाना चाहिए। साक्षरता सांग, नाटकों का आयोजन किया जाए। महिलाओं का साक्षरता सत्संग किया जा सकता है जिसमें वे गीत गाएं। स्थानीय त्यौहारों या स्वतन्त्रता सेनानियों या गांव की जानी-मानी हस्तियों की याद में सांस्कृतिक कार्यक्रम किए जाने चाहिएं।
6. गांव में गांव की ईकाई की देख-रेख में महिलाओं का प्रोवीजन स्टोर खुलवाया जा सकता है। जींद, सिरसा, हिसार में जिला स्तर पर इस प्रकार के को-ओपरेटिव प्रोवीजन स्टोर के प्रयास किये गये थे।
7. वाशिंग पाउडर बनाने की टेªनिंग लेकर गांव के लिए वाशिंग पाउडर, साबुन बनाने का काम शुरू किया जा सकता है। मोखरा, डीघल आदि जगह पर इस अनुभव के अच्छे नतीजे सामने आये थे।
8. अचार तथा चटनी बनाने की टेªनिंग, गांव  के कार्यकर्ताओं तथा नव साक्षरों को दी जा सकती है। रोहतक में ऐसा किया गया। इसके उत्साहवर्धक परिणाम रहे हैं।
9. साक्षरता कक्षाएंः 
-गांव की ईकाई की देख-देख में निरक्षरों की कक्षा लगाई जानी चाहिए।
- जो तीन कायदे पढ़ गये वे हफ्ते में दो-तीन बार अवश्य लाईब्रेरी में आकर उत्तर साक्षरता कायदा/अखबार/नव साक्षर कहानी माला अवश्य पढ़े ताकि उनकी कमजोर साक्षरता को और अधिक ताकतवर बनाया जा सके।
- दो साक्षरता की मॉडल कक्षाएं हरेक गांव के स्तर पर अवश्य लगाएं।
10. पठन-पाठन संस्कृति का विकास करनाः
ऽ जन वाचन आन्दोलन के माध्यम से यह बखूबी किया जा सकता है।
ऽ लोगों को पढ़कर किताबें सुनाई जाएं और पढ़ने को प्रेरित किया जाए।
ऽ किताबों के मेले लगाए जाएं।
ऽ प्रत्येक गांव में किताब उत्सवों का आयोजन किया जाए
ऽ भेंट में किताबें देने का प्रचलन बढ़ाया जाए।
ऽ लेगों को किताबें खरीदने के लिए प्रेरित किया जाए।
ऽ इस सारे काम में गांव के लोगों की सक्रिय हिस्सेदारी होना बहुत जरूरी है।
10. चर्चा मण्डल/चर्चा समूह/विचार गोष्ठीः
+ चर्चा समूहों का गठन किया जाए।
+ महिला चर्चा मण्डल अलग से गठित किए जा सकते हैं। अच्छा हो यदि महिला व पुरुषों के इकट्ठे ग्रूपों का भी विकास किया जा सके।
+चर्चा का विषय एवं वक्ता ये समूह खुद तय किया करेंगे।
+ विषय विशेषज्ञों को बुला कर चर्चा की शुरुआत उनसे करवाई जा सकती है।
+ कुछ लोगों को चर्चा समूहों के संचालन में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। उनके पास चर्चा को संचालित करने व दिशा देने के लिए पर्याप्त सामग्री होनी चाहिए।
+ बहस बढ़ाने के लिए अनौपचारिक तौर-तरीकों का भी इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
11. प्रशिक्षण कार्यक्रमः
ऽ साधारण तथा कम समय के ओरियेन्टेशन कार्यक्रमों का, भिन्न-भिन्न विषयों पर मसलन स्वास्थ्य, कृषि, पशु पालन, भोजन पकाना, अचार बनाना आदि का आयोजन किया जाना चाहिए।
ऽ विकास से जुड़े विभागों के साथ मिलकर वोकेशनल ट्रेनिंग का कार्यक्रम किया जा सकता है।
ऽ ट्रेनिंग लेने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए स्वस्थ बेबी कार्यक्रम, अच्छी गृहणी कार्यक्रम या अच्छा किसान कार्यक्रमों का आयोजन किया जा सकता है।
12. सूचना व ज्ञान की खिड़की
ऽ नवसाक्षरों को विभिन्न विभागों की गतिविधियों से परिचित करवाना। जरूरी सूचना उन तक पहुंचाने का प्रयास करना।
ऽ गांव के कन्वीनर  को इस प्रकार की किताब या पम्फलेट मुहैया करवाना ताकि सूचना आगे जा सके।
ऽ स्ूचना सामग्री को सरल भाषा में विकसित करना तथा सम्प्रेशन के अलग-अलग तरीकों भाषण, चर्चा, स्लाइड शो, नाटक, गीत, स्वांग, आल्हा आदि से लोगों तक लेकर जाना।
ऽ अलग-अलग विभागों के विशेषज्ञों व नवसाक्षरों का विचार-विमर्श
13. वैज्ञानिक रूझान पैदा करनाः
ऽ विज्ञान का लोकप्रियकरण करना
ऽ चमत्कारों का पर्दाफाश करना
ऽ अन्धविश्वास को दूर करना
ऽ तर्क और विश्लेषण की क्षमता पैदा करना।
ऽ महिलाओं के घर के काम के बोझ को उपयुक्त टेक्नोलॉजी का ज्ञान देकर कम करना ताकि उनकी हिस्सेदारी सामाजिक विषयों पर बढ़ सके। उदाहरण के लिए बिना धुएं वाला चुल्हा, सोलर कूकर, साइकिल आदि।
14. महिला सशक्तिकरण पर विशेष ध्यान देनाः
ऽ आंगनबाड़ी
ऽ पंचायत स्तर पर
ऽ जन चेतना केंद्र में
ऽ महिला स्वास्थ्य संघ में
ऽ महिला मण्डल में
ऽ बचत समूह-बचत की भावना
ऽ डवाकरा समूह
ऽ महिला और शिक्षा
ऽ महिला और कानून
ऽ महिला का उत्पीड़न
ऽ महिला और समता
15. स्कूल जाने वाले बच्चों को स्कूल पहुंचाना
ऽ गाँव  के स्कूल की उम्र के सभी बच्चों को स्कूल में भर्ती करवाना
ऽ भर्ती हुए बच्चों को स्कूल न छोड़ने के लिए प्रेरित करते रहना
ऽ जो स्कूल नहीं जा सके उनको अनौपचारिक शिक्षा के माध्यम से औपचारिक शिक्षा तक पहुंचने में सहायता करना।
ऽ ग्राम शिक्षा कमेटी महीने में एक बार मिलकर इस समस्या पर अवश्य बातचीत करे।
ऽ खेल-खेल में शिक्षा आदि कार्यक्रमों का फोलोअप करना।
16. कानूनी साक्षरता तथा सामाजिक मुद्देः
इस सन्दर्भ में नवसाक्षरकों को सूचना तो दी ही जानी चाहिए ताकि वे अपने हकों, कर्त्तव्यों तथा सामाजिक मुद्दों पर अपनी राय कायम कर सकें तथा अपनी भूमिका तय कर सकें।
17. पानी एवं भूमि प्रबन्धन योजनाः
इसमें हिस्सेदारी करने के लिए गांव के लोगों को प्रेरित करना। विकास कार्यों में लगे विभागों के साथ तारतम्य स्थापित करना।
18. गांव में 40 साल से कम उम्र की बांझ महिलाओं को चिन्हित करना तथा उनका इलाज।
19. गांव में स्वास्थ्य रजिस्टर का रख-रखाव पूरी जानकारी के साथ करना।
20. गांव में शौचालयों के बारे जागरुकता पैदा करना। 
इसके अलावा खण्ड स्तर या जिला स्तर पर कुछ काम-
1. हिंसा  से उजड़ी महिलाओं के पुनर्वास के लिए उन्हें पर्याप्त आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करवाना
2.  राज्य में न केवल पारिवारिक अदालतों का गठन हो बल्कि उनके कामकाज की देखरेख के लिए भी आवश्यक कदम उठाए जाएं।
3. महिलाओं को कानूनी सहायता देने के केंद्रों का विस्तृत नेटवर्क बनाना तथा पर्याप्त संख्या में महिला आश्रमगृहों की स्थापना करना।
4. महिलाओं के लिए सभी सरकारी गृहों तथा बच्चों के लिए बाल गृहों की निगरानी समितियों में महिला संगठनों के प्रति प्रतिनिधियों को शामिल करना।
5. लिंग परीक्षण पर रोक लगाना।
6. संचार माध्यमों तथा फिल्मों में महिलाओं को उपभोक्ता वस्तु के रूप् में प्रस्तुत किए जाने पर कड़ा सेंसर लागू करना, दूरदर्शन के लिए निगरानी समिति का गठन करना।
7. महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के विरोध में जन अभियान चलाना। पितृसत्तात्मक व सवर्णवादी विचारधारा में निहित महिलाओं की गैरबराबरी के खिलाफ लोगों को जारूक व संवेदनशील बनाना।
8. सभी कॉलेजों व यूनिवर्सिटीज में ‘महिला विकास केंद्रों’ की स्थापना ताकि छात्राओं को शुरू से ही विभिन्न सामाजिक मुद्दों व समस्याओं के प्रति जागरूक बनाया जा सके।
9. राज्य महिला आयोग की स्थापना जो स्वतंत्र रूप से महिलाओं के विरुद्ध हिंसा और अन्य समस्याओं की सुनवाई कर सके और महिलाओं के हक की नीतियों को लागू करवाने में मदद कर सकें।
10. जहां है देवदासी प्रथा है व वेश्यावृत्ति का चलन है वहां इसकी समाप्ति तथा इनके पुनर्वास के लिए ठोस कदम उठाना।
11. नेशनल सेम्पल सर्वे द्वारा कराए जा रहे सर्वेक्षण के एक अभिन्न अंग के रूप में महिलाओं द्वारा किए गए अवैतनिक कामों के घंटों तथा उसके अनुरूप दाम का अनुमान लगाना।
12. बलात्कार को ठीक से परिभाषित किया जाए, वैवाहित बलात्कार यानि पति द्वारा जबरन शारीरिक सम्बन्ध बनाने को अपराध की तरह माना जाए।
13. हिंसा व बलात्कार सम्बन्धी कानूनों का कड़ाई से पालन हो।
रणबीर सिंह दहिया 














महिलाएं और आज का दौर


निर्भया केस के बाद सड़कों पर उमड़े जनता के सैलाब के चलते , सरकार को दबाव में जस्टिस वर्मा की अध्यक्षता में कमेटी का गठन किया गया। इस कमेटी की सिफारिसों के आधार पर महिलाओं पर होने वाली हिंसाओं को रोकने , खत्म करने या कम करने के लिए कानूनों को और भी कठोर बनाया गया हालांकि कमेटी की सभी सिफारिसों को नहीं माना गया । परन्तु हालात अभी भी न केवल जस के तस हैं, बल्कि स्थिति और भी भयानक बनती जा रही है। महिलाओं , युवा लड़कियों और बच्चियों पर हो रही हिंसा का दायरा व तीव्रता लगातार बढ़ रही है। वे कहीं भी अपने सम्मान व सुरक्षा के लिये आश्वस्त नहीं हैं। महिलाओं के साथ हो रहे बलात्कार और उनके बाद बेरहमी से हत्या की अनेकों घटनाओं को सुनकर थोड़ी देर के लिए तो गुस्सा और विरोध दिखाई देता है परन्तु महिलाओं के नाम पर गाली देने , पीछा करने, घूरने , छींटाकसी करने , पिटाई व तेजाब फैंकने जैसी बहुत सी ऐसी अनेक तरह की हिंसा बदस्तूर जारी है। पुत्र लालसा के चलते छांटकर कन्या भु्रण हत्या या गर्भ से पहले ही बच्चे के सैक्श का चुनाव करने को मजबूर करने , घूंघट में पांच में से चार ज्ञान्न्द्रियों को घोंट कर रखने , दहेज के लिए सीधे या परोक्ष रुप से तंग करने की हिंसा की बाढ़ सी आा गई लगती है। आजकल बसों में अनियन्त्रित भीड़ के चलते महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की अभद्र घटनाएं एक तरह से आम बात की तरह हो रही हैं। बच्चियों पर भी हिंसा होने के जघन्य अपराध के मामले सामने आ रहे हैं। इन सब बातों को चुपचाप सहन नहीं किया जा सकता । हिंसा के खिलाफ पीड़ितों की और से प्रतिरोध बढ़ रहा है। समाज के संवेदनशील तबकों ने भी विरोध की आावाजें उठाई हैं। इस बढ़ती सामाजिक असुरक्षा ने भी लिंग अनुपात के बिगड़नें में एक भूमिका निभाई लगती है।
आाशा राम बापू और भी कई तथाकथित बाबाओं की काली करतूतें भी पिछले दिनों सामने आई हैं और पूरा समाज किसी न किसी तरह आहत हुआ है। हरियाणा में भी बरवाला के आश्रम का बबाल और डेरा सच्चा सौदा की शर्मनाक करतूतें किसी से छिपी हुई नहीं हैं और इन सब को किसी न किसी रंग का राजनैतिक संरक्षण भी मिलता रहा बताते हैं और सामने आता भी रहा है।कुछ इलाकों में खाप पंचायतों का फिर से उभार और राजनैतिक संरक्षण भी खतरे की घण्टी बजा रहा है। मगर कानून दूध का दूध और पानी का पानी कब छांटेगा इसका पूरे समाज को बेसब्री से इन्तजार है। मगर फिर भी इन बाबाओं की गिनती और इनके पीछे की भीड़ क्यों बढ़ती जा रही हैं यह सोचने का विषय है। 
हमारे समाज की बुन्तर में ही इन जघन्य अपराधों की जडें हैं जिन्हें समझना बहुत जरुरी है। सामाजिक लिंग भेद को जैंडर का नाम दिया गया है। महिलाओं को आज भी दूसरे दर्जे का नागरिक मानने की मानसिकता प्रचलित है और और अधिक मजबूती पकड़ती जा रही है। यदि किसी महिला के साथ हिंसा होती है या वे अपराधों का शिकार होती हैं तो अपराधियों को कटघरे में खड़ा करने की बजाय पीड़ित में ही कसूर ढूंढ़ने के कुतर्क सामने रख दिये जाते हैं। ऐसी मानसिकता आम समाज के साथ साथ प्रशासन , सरकार व कई संस्थाओं में भी व्याप्त है जिसका खामियाजा पीड़ितों को भुगतना पड़ता है और अपराधी न केवल बच निकलते हैं बल्कि उनके होसले बुलन्द हो रहे हैं। समाज द्वारा आरोपित यह सामाजिक लिंगभेद न तो सार्वभौमिक है और न ही स्थाई है। काल संस्कृ्ति के बीच ये बदलता रहता है। आज इस महिला विरोधी वातावरण को चुनौती दिये जाने की बहुत सख्त जरुरत है। इस सामाजिक लिंग भेद पर सांस्कृृतिक , पर्यावरण , आर्थिक व राजनैतिक घटकों का प्रभाव भी पड़ता है। आर्थिक तौर पर हरित क्रान्ति के माध्यम से पूरे भारत में अग्रणी हरियाणा और पंजाब सामाजिक सूचकांकों में पिछड़ गये हैं । लिंग अनुपात का स्तर चिन्ताजनक है। क्या ऐसे विकास को आदर्श विकास कहा जा सकता है? सामाजिक लिेग भेद हर जगह हर क्षेत्र में जा सकता है। मतलब मौत की दर में भी खास तरह की असमानता हैं। मूल भूत सुविधाओं के क्षेत्र में असमानता है। खास मौकों की उपलब्धता में असमानता , प्रोफैसनल क्षेत्र में असमानता , घर के अन्दर की असमानता , सांस्कृृतिक स्तर पर असमानता , मालिकाना हक में असमानता आादि। इन सामाजिक लैंगिक असमानताओं के बढ़ती सामाजिक असुरक्षा के अलावा और भी कई मुख्य कारण हैं। हमारे सभी धर्मों में महिलाओं को दोयम दर्जे का स्थान मिला है। दूसरा हमारा समाज पितृृसतात्मक समाज यानि पुरुष प्रधान समाज है जो महिला के बराबरी के हक के खिलाफ है। कानूनी संस्थाओं में भी सामाजिक लिंग भेद देखा जा सकता है। हमारी राजनैतिक पार्टियों में भी इसे बखूबी ढूंढ़ा जा सकता है। हमारी आर्थिक इकाईयों में तो बहुत ही साफतौर पर इसे देखा परखा जा सकता है। इसी प्रकार प्रिंट और इलैक्ट्रोनिक मीडिया में भी यही हालात नजर आते हैं।शिक्षण संस्थाओं का यही हाल है। हमारी रोजाना के जीवन की मान्यताओं में भी इसकी पूरी झलक देखी जा सकती है। हमारी ज्यादातर कल्चरल प्रैक्टिसिस सामाजिक लिंग भेद को पैदा करने वाली और इसे बराबर बनाए रखने वाली हैं। महिला पूछती है समाज से-
देह मेरी ,हल्दी तुम्हारे नाम की
हथेली मेरी, मेंहदी तुम्हारे नाम की
सिर मेरा , चुनरी तुम्हारे नाम की
मांग मेरी, सिन्दूर तुम्हारे नाम की
माथा मेरा, बिन्दिया तुम्हारे नाम की
नाक मेरी, नथनी तुम्हारे नाम की
गला मेरा, मंगल सूत्र तुम्हारे नाम की
कलाई मेरी, चुड़ियां तुम्हारे नाम की
उंगलियां मेरी, बिछुए तुम्हारे नाम के
बड़ों की चरएा वणदना मैं करुं 
और सदा‘सुहागन का आशीष तुम्हारे नाम का
कोख मेरी, खून मेरा, दूध मेरा
और बच्चा तुम्हारे नाम का
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नम्रता से पूछती हूं आाखिर तुम्हारे पास
क्या है मेरे नाम का? 
हमारी परम्पराओं में ये दुभांत भरी पड़ी हैं। महिला सबको खाना खिलाकर सबसे बाद में खाना खायेगी । वंश चालक तो लड़का ही हो सकता है। बिना लड़के के वंश कैसे चलेगा? पति परमेश्वर होता है चाहे वह कोढ़ी हो, चाहे शराबी हो, चाहे जुआरी और जारी हो। कन्यादान का रिवाज सबसे अधिक दुभान्त वाली परम्परा रही है और अभी भी जारी है। एक विधवा महिला का जीवन दुभान्त का जीता जागता उदाहरण है। महिला दोबारा शादी नहीं कर सकती लेकिन पुरुष कर सकता है। कहते हैं लड़का तो बुढ़ापे का सहारा है। ‘‘पुत्र लालसा’’ लड़की की कीमत पर खड़ी फल फूल रही है। हमारे ज्यादातर लोक गीतों व रागनियों में भी यह दुभान्त दिखाई देती है। हमारे मालिकाना हकों में , व्यवहार में हद दर्जे की नाबराबरी है। महिला के इलाज में भी असमानता नजर आाती है।  लड़के को इलाज के लिए तुरन्त अस्पताल ले जाया जाता है। लड़की के इलाज में यह तत्परता जयादा बार गायब होती है। शर्तिया लड़के की दवाई देने वालों के नुस्खे हर दस बीस मील पर किसी न किसी के पास होंगे। ज्यादातर गर्भवती महिलाएं गर्भ के पहले 3 महीने में लड़का होने की दवाईयों का सेवन करती हैं। और कुछ इनमें से जन्म जात बीमारियों से ग्रस्त बच्चों को जन्म देती हैं। जब लड़का पैदा होता है तो खुशी मनाई जाती है और थाली बजाई जाती है और जब लड़की पैदा होती है तो ठीकरा फोड़ कर मातम मनाया जाता है। लड़के के जन्म पर मिठाई बांटी जाती है। लड़के की छठ मनाई जाती है लड़की की नहीं। लड़के का नामकरण संस्कार किया जाता है मगर लड़की का नहीं । लड़का पैदा होता है तो जच्चा को 10 किलो देशी घी दिया जाता है और लड़की पैदा होती है तो जच्चा को 5 किलो घी दिया जाता है । मरने के बाद शमशान घाट में अग्नि भी पुरुष ही देगा महिला नहीं। अलग अलग पहरावे हैं दोनों के। अलग अलग हेयर स्टायल हैं। घर में तो बहुत बड़ी खानशामा है मगर ताजमहल जैसे होटलों के खानशामा पुरुष ही होंगे। हलवाई भी पुरुष होते हैं। मंगल सूत्र भी वही पहनेगी। वैसे सही मायनों में बायलॉजिकली पुरुष से ज्यादा ताकतवर है महिला। 
सब असमानताओं के चलते समाज में काफी दिक्कतें बढ़ी हैं। नतीजतन लिंग अनुपात चिन्ता जनक स्तर पर पहंुच गया है। महिलाओं पर पूरे भारत में हिंसा बढ़ रही है। यदि क्र्राईम ब्यूरो के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2011 में बलात्कार के मामलों में 2010 के मुकाबले 9.2 फीसदी की हुई और कुल 24,206 मामले सामने आये । इसी प्रकार हरियाणा विधान सभा में रखी गई एक रिपोर्ट के मुताबिक 2011 के मुकाबले महिला पर अत्याचार के केसों में 2012 में बढ़ोतरी हुई। मोलेस्टेसन के 2011 में 474 केस थे जबकि 2012 में 521 केस हुए। इसी प्रकार ईव टीजिंग के 2011 में 490 केस रजिस्टर किये गये जबकि 2012 में 534 केस हुए। महिला क्राईम के 2011 में कुल केस 5374 हुए मगर 2012 में केस 5955 हुए । इसके साथ ही कन्वाक्शन रेट हरियाणा में 23.4 प्रतिशत थी जबकि उतर प्रदेश में यह 55.50 प्रतिशत थी। बिना ब्याहे लोगों की संख्या बढ़ी है। दूसरे प्रान्तों से खरीदी बहुओं की संख्या बढ़ रही है और इस संदर्भ में बहुत ही अमानवीय घटनाएं भी सामने आा रही हैं।अदला बदली का नया खेल सामने आ रहा है। महिला का अमानवीयकरण बढ़ा है जिसके चलते पूरे समाज का अमानवीयकरण हो रहा है। पिछड़ी सोच की संस्थाओं के  फतवे बढ़ रहे हैं । डरैस कोड का बाजार गर्म है। महिलाओं को लेकर तरह तरह के मिथों का प्रचार प्रसार किया जा रहा है। 
हरियाणा में गावों में दारु से कोई घर नहीं बचा यह अलग बात है कि घर में एकाध आदमी दारु न पीता हो। पंजाब में भी दारु और नशे का प्रचलन घर घर हो गया है। दारु और नशा महिला पर हिंसा बढ़ाता ही बढ़ाता है। इन सब असमानताओं के चलते समाज में अस्थिरता आई है और अब चूंकि महिलाओं और दलितों ने अपने हकों के लिए असरट करना शुरु कर दिया है इसलिए प्रतिक्रियावादी ताकतों को और भी ज्यादा परेशानी हो रही है ओर उनके हमले भी तेज हो रहे हैं। इस माहौल में कानूनों का सही और वक्त रहते क्रियान्वन करवाने की जरुरत है। साथ ही एक जैंडर फैं्रडली , ईको फै्रडली, सर्वसमावेशी विकास की परिकल्पना के साथ नये नवजागरण के जरिये ही गिरते समाज को बचाने का, महिलाओं पर बढ़ते अत्याचारों का विरोध करते हुए एक नागरिक समाज बनाने का समाज सुधार आन्दोलन चलाया जाना जरुरी हो गया है।
गाव के स्तर पर-
गांव की ईकाई द्वारा की जाने वाली गतिविधियां
1. पुस्तकालयः

*जरूरत के हिसाब से, रूचिकर, सूचना देने वाली तथा साहित्यिक किताबें जुटाई जाएं तथा गांव का एक पुस्तकालय अवश्य होना चाहिए।
* कुछ बड़े गांव में बड़ा पुस्तकालय हो सकता है जहां से छोटे गांव के छोटे पुस्तकालयों को किताबों का आदान-प्रदान किया जा सके।
* प्रत्येक गांव में एक चलती-फिरती लायब्रेरी भी होनी चाहिए।
* शुरुआत के तौर पर कुछ गांव में महिला पुस्तकालयों का गठन किया जा सकता है।
* पुस्तकालय का काम सम्भालने के लिए एक कमेटी का गठन किया जाना बहुत जरूरी है। कमेटी के लोगों में पुस्तकें पढ़ने की आदत को बढ़ावा देने के लिए रचनात्मक कदम उठाएगी। इस कमेटी में 50 प्रतिशत महिलाएं अवश्य हों। गांव के अध्यापकों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।
* दीवारी अखबार का विकास भी यह कमेटी कर सकती है।
* स्थानीय पत्रिका की योजना भी बनाई जा सकती है।
* स्कूल की लाइब्रेरी से तालमेल किया जा सकता है।
* कम कीमत की अच्छी/जनतांत्रिक व धर्म निरपेक्षता तथा राष्ट्रीय एकता की भावनाओं को बढ़ावा देने वाली पुस्तकें भी जरूरी होनी चाहिएं।
* मुंशी प्रेमचन्द, शरत चन्द्र जैसे प्रसिद्ध लेखकों का साहित्य रहे।


2. खेल-कूद प्रतियोगिताओं का आयोजनः हरियाणा, पंजाब में खेल-कूद प्रतियोगिताओं की अपनी एक परम्परा रही है। इस पर जन चेतना केंद्र को खास ध्यान देना चाहिए। इसके लिए लोगों से चन्दा इकट्ठा किया जा सकता है। कुश्ती, कबड्डी प्रतियोगिता, वालीवाल प्रतियोगिता, दौड़ प्रतियोगिता, कुर्सी दौड़, हल चलाने की प्रतियोगिता, साफ-सुथरे घर की प्रतियोगिता, साफ गलियों की प्रतियोगिता, ओढ़नी कढ़ाई प्रतियोगिता और चाट्टी दौड़। खेल-कूद प्रतियोगिताएंः- पुरुषों के लिए व महिलाओं के लिए तथा अलग-अलग उम्र के पुरुषों व महिलाओं में होनी चाहिए।
3. हाथ से बनाई चीजों की प्रतियोगिताः बुनाई, कढ़ाई, सिलाई, रंगाई, छपाई की प्रतियोगिता, कपड़े पर, लकड़ी पर, फैवीकोल पर, शीशे पर या किसी और चीज पर। साक्षरता अनुभव बताता है कि इस प्रतियोगिता के माध्यम से गांव की ईकाई को आत्म निर्भर बनाने की तरफ ले जाया जा सकता है।
4. कर सेवाः नाली साफ करना, स्कूल में सफेदी करना, स्कूल में शौचालय का निर्माण, गली की सफाई। चौपाल का रख-रखाव व उसकी मरम्मत, कुएं की देखभाल, मीठे पानी के नलकों की देखभाल, लाइब्रेरी के लिए कमरा बनाना, खड़े पानी में मच्छरों को मारने के उपाय करना, स्वास्थ्य कैम्पों का आयोजन करना।
5. सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजनः चन्द्र शेखर आजाद, भगत सिंह, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, मुंशी प्रेम चन्द के जन्म दिन, 26 जनवरी, 15 अगस्त पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन अवश्य किया जाना चाहिए। साक्षरता सांग, नाटकों का आयोजन किया जाए। महिलाओं का साक्षरता सत्संग किया जा सकता है जिसमें वे गीत गाएं। स्थानीय त्यौहारों या स्वतन्त्रता सेनानियों या गांव की जानी-मानी हस्तियों की याद में सांस्कृतिक कार्यक्रम किए जाने चाहिएं।
6. गांव में गांव की ईकाई की देख-रेख में महिलाओं का प्रोवीजन स्टोर खुलवाया जा सकता है। जींद, सिरसा, हिसार में जिला स्तर पर इस प्रकार के को-ओपरेटिव प्रोवीजन स्टोर के प्रयास किये गये थे।
7. वाशिंग पाउडर बनाने की टेªनिंग लेकर गांव के लिए वाशिंग पाउडर, साबुन बनाने का काम शुरू किया जा सकता है। मोखरा, डीघल आदि जगह पर इस अनुभव के अच्छे नतीजे सामने आये थे।
8. अचार तथा चटनी बनाने की टेªनिंग, गांव  के कार्यकर्ताओं तथा नव साक्षरों को दी जा सकती है। रोहतक में ऐसा किया गया। इसके उत्साहवर्धक परिणाम रहे हैं।
9. साक्षरता कक्षाएंः 
-गांव की ईकाई की देख-देख में निरक्षरों की कक्षा लगाई जानी चाहिए।
- जो तीन कायदे पढ़ गये वे हफ्ते में दो-तीन बार अवश्य लाईब्रेरी में आकर उत्तर साक्षरता कायदा/अखबार/नव साक्षर कहानी माला अवश्य पढ़े ताकि उनकी कमजोर साक्षरता को और अधिक ताकतवर बनाया जा सके।
- दो साक्षरता की मॉडल कक्षाएं हरेक गांव के स्तर पर अवश्य लगाएं।
10. पठन-पाठन संस्कृति का विकास करनाः
ऽ जन वाचन आन्दोलन के माध्यम से यह बखूबी किया जा सकता है।
ऽ लोगों को पढ़कर किताबें सुनाई जाएं और पढ़ने को प्रेरित किया जाए।
ऽ किताबों के मेले लगाए जाएं।
ऽ प्रत्येक गांव में किताब उत्सवों का आयोजन किया जाए
ऽ भेंट में किताबें देने का प्रचलन बढ़ाया जाए।
ऽ लेगों को किताबें खरीदने के लिए प्रेरित किया जाए।
ऽ इस सारे काम में गांव के लोगों की सक्रिय हिस्सेदारी होना बहुत जरूरी है।
10. चर्चा मण्डल/चर्चा समूह/विचार गोष्ठीः
+ चर्चा समूहों का गठन किया जाए।
+ महिला चर्चा मण्डल अलग से गठित किए जा सकते हैं। अच्छा हो यदि महिला व पुरुषों के इकट्ठे ग्रूपों का भी विकास किया जा सके।
+चर्चा का विषय एवं वक्ता ये समूह खुद तय किया करेंगे।
+ विषय विशेषज्ञों को बुला कर चर्चा की शुरुआत उनसे करवाई जा सकती है।
+ कुछ लोगों को चर्चा समूहों के संचालन में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। उनके पास चर्चा को संचालित करने व दिशा देने के लिए पर्याप्त सामग्री होनी चाहिए।
+ बहस बढ़ाने के लिए अनौपचारिक तौर-तरीकों का भी इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
11. प्रशिक्षण कार्यक्रमः
ऽ साधारण तथा कम समय के ओरियेन्टेशन कार्यक्रमों का, भिन्न-भिन्न विषयों पर मसलन स्वास्थ्य, कृषि, पशु पालन, भोजन पकाना, अचार बनाना आदि का आयोजन किया जाना चाहिए।
ऽ विकास से जुड़े विभागों के साथ मिलकर वोकेशनल ट्रेनिंग का कार्यक्रम किया जा सकता है।
ऽ ट्रेनिंग लेने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए स्वस्थ बेबी कार्यक्रम, अच्छी गृहणी कार्यक्रम या अच्छा किसान कार्यक्रमों का आयोजन किया जा सकता है।
12. सूचना व ज्ञान की खिड़की
ऽ नवसाक्षरों को विभिन्न विभागों की गतिविधियों से परिचित करवाना। जरूरी सूचना उन तक पहुंचाने का प्रयास करना।
ऽ गांव के कन्वीनर  को इस प्रकार की किताब या पम्फलेट मुहैया करवाना ताकि सूचना आगे जा सके।
ऽ स्ूचना सामग्री को सरल भाषा में विकसित करना तथा सम्प्रेशन के अलग-अलग तरीकों भाषण, चर्चा, स्लाइड शो, नाटक, गीत, स्वांग, आल्हा आदि से लोगों तक लेकर जाना।
ऽ अलग-अलग विभागों के विशेषज्ञों व नवसाक्षरों का विचार-विमर्श
13. वैज्ञानिक रूझान पैदा करनाः
ऽ विज्ञान का लोकप्रियकरण करना
ऽ चमत्कारों का पर्दाफाश करना
ऽ अन्धविश्वास को दूर करना
ऽ तर्क और विश्लेषण की क्षमता पैदा करना।
ऽ महिलाओं के घर के काम के बोझ को उपयुक्त टेक्नोलॉजी का ज्ञान देकर कम करना ताकि उनकी हिस्सेदारी सामाजिक विषयों पर बढ़ सके। उदाहरण के लिए बिना धुएं वाला चुल्हा, सोलर कूकर, साइकिल आदि।
14. महिला सशक्तिकरण पर विशेष ध्यान देनाः
ऽ आंगनबाड़ी
ऽ पंचायत स्तर पर
ऽ जन चेतना केंद्र में
ऽ महिला स्वास्थ्य संघ में
ऽ महिला मण्डल में
ऽ बचत समूह-बचत की भावना
ऽ डवाकरा समूह
ऽ महिला और शिक्षा
ऽ महिला और कानून
ऽ महिला का उत्पीड़न
ऽ महिला और समता
15. स्कूल जाने वाले बच्चों को स्कूल पहुंचाना
ऽ गाँव  के स्कूल की उम्र के सभी बच्चों को स्कूल में भर्ती करवाना
ऽ भर्ती हुए बच्चों को स्कूल न छोड़ने के लिए प्रेरित करते रहना
ऽ जो स्कूल नहीं जा सके उनको अनौपचारिक शिक्षा के माध्यम से औपचारिक शिक्षा तक पहुंचने में सहायता करना।
ऽ ग्राम शिक्षा कमेटी महीने में एक बार मिलकर इस समस्या पर अवश्य बातचीत करे।
ऽ खेल-खेल में शिक्षा आदि कार्यक्रमों का फोलोअप करना।
16. कानूनी साक्षरता तथा सामाजिक मुद्देः
इस सन्दर्भ में नवसाक्षरकों को सूचना तो दी ही जानी चाहिए ताकि वे अपने हकों, कर्त्तव्यों तथा सामाजिक मुद्दों पर अपनी राय कायम कर सकें तथा अपनी भूमिका तय कर सकें।
17. पानी एवं भूमि प्रबन्धन योजनाः
इसमें हिस्सेदारी करने के लिए गांव के लोगों को प्रेरित करना। विकास कार्यों में लगे विभागों के साथ तारतम्य स्थापित करना।
18. गांव में 40 साल से कम उम्र की बांझ महिलाओं को चिन्हित करना तथा उनका इलाज।
19. गांव में स्वास्थ्य रजिस्टर का रख-रखाव पूरी जानकारी के साथ करना।
20. गांव में शौचालयों के बारे जागरुकता पैदा करना। 
इसके अलावा खण्ड स्तर या जिला स्तर पर कुछ काम-
1. हिंसा  से उजड़ी महिलाओं के पुनर्वास के लिए उन्हें पर्याप्त आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करवाना
2.  राज्य में न केवल पारिवारिक अदालतों का गठन हो बल्कि उनके कामकाज की देखरेख के लिए भी आवश्यक कदम उठाए जाएं।
3. महिलाओं को कानूनी सहायता देने के केंद्रों का विस्तृत नेटवर्क बनाना तथा पर्याप्त संख्या में महिला आश्रमगृहों की स्थापना करना।
4. महिलाओं के लिए सभी सरकारी गृहों तथा बच्चों के लिए बाल गृहों की निगरानी समितियों में महिला संगठनों के प्रति प्रतिनिधियों को शामिल करना।
5. लिंग परीक्षण पर रोक लगाना।
6. संचार माध्यमों तथा फिल्मों में महिलाओं को उपभोक्ता वस्तु के रूप् में प्रस्तुत किए जाने पर कड़ा सेंसर लागू करना, दूरदर्शन के लिए निगरानी समिति का गठन करना।
7. महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के विरोध में जन अभियान चलाना। पितृसत्तात्मक व सवर्णवादी विचारधारा में निहित महिलाओं की गैरबराबरी के खिलाफ लोगों को जारूक व संवेदनशील बनाना।
8. सभी कॉलेजों व यूनिवर्सिटीज में ‘महिला विकास केंद्रों’ की स्थापना ताकि छात्राओं को शुरू से ही विभिन्न सामाजिक मुद्दों व समस्याओं के प्रति जागरूक बनाया जा सके।
9. राज्य महिला आयोग की स्थापना जो स्वतंत्र रूप से महिलाओं के विरुद्ध हिंसा और अन्य समस्याओं की सुनवाई कर सके और महिलाओं के हक की नीतियों को लागू करवाने में मदद कर सकें।
10. जहां है देवदासी प्रथा है व वेश्यावृत्ति का चलन है वहां इसकी समाप्ति तथा इनके पुनर्वास के लिए ठोस कदम उठाना।
11. नेशनल सेम्पल सर्वे द्वारा कराए जा रहे सर्वेक्षण के एक अभिन्न अंग के रूप में महिलाओं द्वारा किए गए अवैतनिक कामों के घंटों तथा उसके अनुरूप दाम का अनुमान लगाना।
12. बलात्कार को ठीक से परिभाषित किया जाए, वैवाहित बलात्कार यानि पति द्वारा जबरन शारीरिक सम्बन्ध बनाने को अपराध की तरह माना जाए।
13. हिंसा व बलात्कार सम्बन्धी कानूनों का कड़ाई से पालन हो।
रणबीर सिंह दहिया 














Saturday, July 25, 2015

media

देश में पहली बार पूर्ण बहुमत हासिल करने वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार बन चुकी है और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्राी पद पर क़ाबिज़ हो चुके हैं। ये कोई मामूली घटना नहीं है और इसे चुनाव में सिर्फ़ एक दल की हार और दूसरे की जीत के रूप में देखना ठीक नहीं होगा, क्योंकि इसने देश को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है जो उसे फासीवाद की आरे भी ढकले सकता है और  पूंजीवाद के नग्नतम रूप से उसका सामना भी करवा सकता है। अति दक्षिणपंथी राजनीति का इतना ताक़तवर होकर उभरना ख़तरनाक संकेत तो देता ही है, मगर ये इस बात का भी सबूत है कि बहुत सारी शक्तियां भी उसके साथ हैं जो उसे मज़बूती प्रदान कर रही हैं। इन शक्तियों में से एक मीडिया है और अब ये कोई छिपी हुई बात नहीं है। मीडिया ने इस आम चुनाव में एक अत्यधिक पक्षपातपूर्ण भूमिका निभाई और बड़ी निर्लज्जता के साथ निभाई। लेकिन मीडिया को अर्थव्यवस्था से अलग इकाई मानकर उसे कोसना तर्कसंगत नहीं है। ये ज़रूरी है कि उन शक्तियों की पहचान की जाये जो पीछे से उसका नियंत्रित -संचालित कर रही हैं  ताकि असली गुनाहगारों की शिनाख़्त की जा सके और उनसे ध्यान न हटे। वास्तव में सन् 2014 के चुनाव मीडिया के लिए कई तरह से महत्वपूर्ण रहे। पहली बार उसका चुनाव पर इतना व्यापक प्रभाव दिखा। ऐसा लगा मानो वही तय कर रहा हो कि किसकी सरकार बनेगी और कौन प्रधानमंत्राी होगा। चुनाव परिणाम साबित करते हैं कि सचमुच में उसकी भूमिका काफ़ी हद तक निर्णायक रही और उसने सबको अपना लोहा  मानने के लिए विवश कर दिया। ये मीडिया युग के आने आरै छा जाने का पम्राण है  लेिकन इससे भी बड़ी सर्चाइ यह है कि वह अब लोकतंत्र  के चौथे स्तंभ के रूप में, जैसा कि अकसर प्रचारित किया जाता है, जनता की इच्छाओं-आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करने वाला उपकरण ही नहीं रह गया बल्कि जनमत के निर्माण का हथियार बन चुका है। उसने इतनी शक्ति प्राप्त कर ली है कि वह अब भावी प्रधानमंत्राी के निर्माण और स्थापना तक में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने लगा है। लेकिन उसकी ये बढ़ती ताक़त ढेर सारे प्रश्नों और आरोपों से घिरी हुई है। ये सवाल उसके चरित्रा और उदेश्यों  के सबंध  में उठे आरै पूरी  शिद्दत के साथ एक नही, सब तरफ़ से  उठाया गया है ।  इस बात का पम्राण ये है कि पहले सिर्फ़ कम्युनिस्ट पार्टियां ही मीडिया के पूंजीवादी शक्तियों के हाथों में खेलने और उनके पक्ष में पच्रारक की भूिमका निभाने का आरापे लगाती थी, जबकि इस बार लगभग सभी राजनीतिक दलों  ने उन्हीं की भाषा में मीडिया पर तीखे हमले किये। नवोदित आम आदमी पार्टी ने सबसे आक्रामक ढंग से मीडिया पर हमले करते हएु कहा कि वह कापार्रेटे जगत की कठपतुली  है ।  मीडिया के पक्षपाती व्यवहार से प्रभावित दूसरे दलों की भी यही शिकायत रही कि वह पैसे की ताक़त के सामने नतमस्तक हो गया है। जनता दल (यू) का तो यहां तक कहना था कि मीडिया अब पत्राकार नहीं, मालिक चला रहे हैं। आरै तो आरै कागंस्रे आरै बीजपेी ने भी, जो कि इस मीडिया का इस्तमेाल करके लाभ उठाती रही हैं  उस पर पक्षपात के आरोप जड़ दिये। बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्राी पद के दावेदार नरेंद्र मोदी ने तो एक नया जुमला ही उछाल दिया न्यूज़ ट्रेडर का। उन्होंने अपने इंटरव्यू में पत्राकारों को सीधे-सीधे न्यूजट्रेडर यानी ख़बरों का कारोबारी कहा, जिसका एक मतलब तो ये है कि मीडिया बिकाऊ है और उसे ख़रीदा जा सकता है ।  निश्चय ही इस पदावली को उन्हानें  अपने अनुभव से  ही गढ़ा हागेा आरै उसका इस्तमेाल वे पत्राकारों का मुंह बंद करने के लिए कर रहे थे। लेकिन असली बात ये नहीं है बल्कि ये है कि मीडिया की न साख है आरै न धार, क्योंकि  वह न्यूज ट्रेडर  शब्द के इस्तमेाल पर र्काइे आपत्ति तक दर्ज नहैं करवा सका। ये उसके घटते आत्मविश्वास और गुलाम तथा आतंकित मानसिकता का भी परिचायक था। सवाल उठता है कि आखि़र ये नौबत क्यों आयी। उसकी हालत सड़क पर पड़े उस कुत्ते की तरह क्यों हो गयी जिसे हर आता-जाता लात मारकर आगे बढ़ जाता है। इसका जवाब जब हम ढूंढ़ने जायेंगे तो पायेंगे कि कहीं न कहीं इसकी तह में मीडिया का बदलता स्वामित्व है। मीडिया को चलानेवाली पूंजी और उस पूंजी को नियंत्रित करने वाले लोग तय कर रहे हैं कि मीडिया की भूमिका क्या होगी। अगर आम चनुाव का ही उदाहरण लें तो सोचना  चाहिए कि क्यों मीडिआ  की मोदी -भक्ति के  सदंर्भ में बार-बार कापार्रेटे जगत का नाम लिया जा रहा था। क्यों  यह कहा जा रहा था कि मीडिया अगर  मोदी  के अभियान का सक्रिय सहयोगी बन गया था तो इसकी वजह ये थी कि पूरा कार्पोरेट जगत चाहता था कि वे प्रधानमंत्राी बनें। वह कार्पोरेट जगत के एजेंडे को आगे बढ़ा रहा था, क्योंकि उसकी लगाम उसके हाथों में थी। अगर पिछले छह महीनों के मीडिया कंटेंट का अध्ययन किया जायेगा तो साफ़ हो जायेगा कि वह किस कदर मोदी के पक्ष में झुका हुआ था। सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज़ (सीएमएस) द्वारा जारी किये गये आकड़े  इसकी बानगी पेश  करते हैं ।  सीएमएस ने पाचं चनैला ंेक ेपा्रइम टाइम क ेकवरजे म ंेविभिन्न नतेाआ ंेकी हिस्सदेारी क ेआकंड़ ेदते ेहएु बताया कि राहलु गाध्ंाी क ेमकु़ाबल ेमादेी का ेपाचं गनुा अधिक कवरेज मिला जबकि अरविंद केजरीवाल की तुलना में ये अनुपात सात गुना था। हालांकि इन आंकड़ों में कंटेंट का रूप-रंग नज़र नहीं आता। अगर वह देखा जा सकता तो पता चलता कि मोदी का कवरेज किस कदर महिमागान से सराबोर था और उनके प्रतिद्वंद्वियों का दुराग्रहों से भरा हुआ। यही नहीं, इन पांच चैनलों में हिंदी के वे तीन कुख्यात चैनल शामिल ही नहीं थे जिन्होंने निर्लज्जता की तमाम सीमाएं लांघते हुए मोदी के प्रोपेगंडा का काम किया।देश में पहली बार पूर्ण बहुमत हासिल करने वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार बन चुकी है और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्राी पद पर क़ाबिज़ हो चुके हैं। ये कोई मामूली घटना नहीं है और इसे चुनाव में सिर्फ़ एक दल की हार और दूसरे की जीत के रूप में देखना ठीक नहीं होगा, क्योंकि इसने देश को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है जो उस ेफासीवाद की आरे भी ढकले सकता ह ैआरै पजंूीवाद क ेनग्नतम रूप स ेउसका सामना भी करवा सकता है। अति दक्षिणपंथी राजनीति का इतना ताक़तवर होकर उभरना ख़तरनाक संकेत तो देता ही है, मगर ये इस बात का भी सबूत है कि बहुत सारी शक्तियां भी उसके साथ हैं जो उसे मज़बूती प्रदान कर रही हैं। इन शक्तियों में से एक मीडिया है और अब ये कोई छिपी हुई बात नहीं है। मीडिया ने इस आम चुनाव में एक अत्यधिक पक्षपातपूर्ण भूमिका निभाई और बड़ी निर्लज्जता के साथ निभाई। लेकिन मीडिया को अर्थव्यवस्था से अलग इकाई मानकर उसे कोसना तर्कसंगत नहीं है। ये ज़रूरी है कि उन शक्तियों की पहचान की जाये जो पीछे से उसका ेनियंित्रात-सचंालित कर रही ह,ैं ताकि असली गुनाहगारा ंेकी शिनाख़्त की जा सके और उनसे ध्यान न हटे। वास्तव में सन् 2014 के चुनाव मीडिया के लिए कई तरह से महत्वपूर्ण रहे। पहली बार उसका चुनाव पर इतना व्यापक प्रभाव दिखा। ऐसा लगा मानो वही तय कर रहा हो कि किसकी सरकार बनेगी और कौन प्रधानमंत्राी होगा। चुनाव परिणाम साबित करते हैं कि सचमुच में उसकी भूमिका काफ़ी हद तक निर्णायक रही और उसन ेसबका ेअपना लाहेा मानन ेक ेलिए विवश कर दिया। य ेमीडिया युग क ेआने आरै छा जान ेका पम्राण ह।ै लेिकन इसस ेभी बड़ी सर्चाइ य ेह ैकि वह अब लाकेतत्रंा के चौथे स्तंभ के रूप में, जैसा कि अकसर प्रचारित किया जाता है, जनता की इच्छाओं-आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करने वाला उपकरण ही नहीं रह गया बल्कि जनमत के निर्माण का हथियार बन चुका है। उसने इतनी शक्ति प्राप्त कर ली है
नया पथ ❖ अप्रैल-सितंबर (संयुक्तांक): 2014 / 13
कि वह अब भावी प्रधानमंत्राी के निर्माण और स्थापना तक में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने लगा है। लेकिन उसकी ये बढ़ती ताक़त ढेर सारे प्रश्नों और आरोपों से घिरी हुई है। ये सवाल उसके चरित्रा और उद्दश्ेया ंेक ेसबंध्ंा म ंेउठ ेआरै परूी शिद्दत क ेसाथ एक नही,ं सब तरफ़ स ेउठाय ेगय।े इस बात का पम्राण ये है कि पहले सिर्फ़ कम्युनिस्ट पार्टियां ही मीडिया के पूंजीवादी शक्तियों के हाथों में खेलने और उनके पक्ष म ंेपच्रारक की भूिमका निभान ेका आरापे लगाती थी,ं जबकि इस बार लगभग सभी राजनीतिक दलांे ने उन्हीं की भाषा में मीडिया पर तीखे हमले किये। नवोदित आम आदमी पार्टी ने सबसे आक्रामक ढंग स ेमीडिया पर हमल ेकरत ेहएु कहा कि वह कापार्रेटे जगत की कठपतुली ह।ै मीडिया क ेपक्षपाती व्यवहार से प्रभावित दूसरे दलों की भी यही शिकायत रही कि वह पैसे की ताक़त के सामने नतमस्तक हो गया है। जनता दल (यू) का तो यहां तक कहना था कि मीडिया अब पत्राकार नहीं, मालिक चला रहे हैं। आरै ता ेआरै कागंस्रे आरै बीजपेी न ेभी, जा ेकि इस मीडिया का इस्तमेाल करक ेलाभ उठाती रही ह,ैं उस पर पक्षपात के आरोप जड़ दिये। बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्राी पद के दावेदार नरेंद्र मोदी ने तो एक नया जुमला ही उछाल दिया न्यूज़ ट्रेडर का। उन्होंने अपने इंटरव्यू में पत्राकारों को सीधे-सीधे न्यूजट्रेडर यानी ख़बरों का कारोबारी कहा, जिसका एक मतलब तो ये है कि मीडिया बिकाऊ है और उसे ख़रीदा जा सकता ह।ै निश्चय ही इस पदावली का ेउन्हानंे ेअपन ेअनभ्ुावा ंेस ेही गढ़ा हागेा आरै उसका इस्तमेाल वे पत्राकारों का मुंह बंद करने के लिए कर रहे थे। लेकिन असली बात ये नहीं है बल्कि ये है कि मीडिया की न साख ह ैआरै न धार, क्यांिेक वह न्यजूटडेªर शब्द क ेइस्तमेाल पर र्काइे आपत्ति तक दर्ज नही ंकरवा सका। ये उसके घटते आत्मविश्वास और गुलाम तथा आतंकित मानसिकता का भी परिचायक था। सवाल उठता है कि आखि़र ये नौबत क्यों आयी। उसकी हालत सड़क पर पड़े उस कुत्ते की तरह क्यों हो गयी जिसे हर आता-जाता लात मारकर आगे बढ़ जाता है। इसका जवाब जब हम ढूंढ़ने जायेंगे तो पायेंगे कि कहीं न कहीं इसकी तह में मीडिया का बदलता स्वामित्व है। मीडिया को चलानेवाली पूंजी और उस पूंजी को नियंत्रित करने वाले लोग तय कर रहे हैं कि मीडिया की भूमिका क्या होगी। अगर आम चनुाव का ही उदाहरण ल ंेता ेसाचेना चाहिए कि क्या ंेमीडिया की मादेी-भक्ति क ेसदंर्भ म ंेबार-बार कापार्रेटे जगत का नाम लिया जा रहा था। क्या ंेय ेकहा जा रहा था कि मीडिया अगर मादेी क ेअभियान का सक्रिय सहयोगी बन गया था तो इसकी वजह ये थी कि पूरा कार्पोरेट जगत चाहता था कि वे प्रधानमंत्राी बनें। वह कार्पोरेट जगत के एजेंडे को आगे बढ़ा रहा था, क्योंकि उसकी लगाम उसके हाथों में थी। अगर पिछले छह महीनों के मीडिया कंटेंट का अध्ययन किया जायेगा तो साफ़ हो जायेगा कि वह किस कदर मोदी के पक्ष में झुका हुआ था। सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज़ (सीएमएस) द्वारा जारी किये गय ेआकंड़ ेइसकी बानगी पश्ेा करत ेह।ैं सीएमएस न ेपाचं चनैला ंेक ेपा्रइम टाइम क ेकवरजे म ंेविभिन्न नतेाआ ंेकी हिस्सदेारी क ेआकंड़ ेदते ेहएु बताया कि राहलु गाध्ंाी क ेमकु़ाबल ेमादेी का ेपाचं गनुा अधिक कवरेज मिला जबकि अरविंद केजरीवाल की तुलना में ये अनुपात सात गुना था। हालांकि इन आंकड़ों में कंटेंट का रूप-रंग नज़र नहीं आता। अगर वह देखा जा सकता तो पता चलता कि मोदी का कवरेज किस कदर महिमागान से सराबोर था और उनके प्रतिद्वंद्वियों का दुराग्रहों से भरा हुआ। यही नहीं, इन पांच चैनलों में हिंदी के वे तीन कुख्यात चैनल शामिल ही नहीं थे जिन्होंने निर्लज्जता की तमाम सीमाएं लांघते हुए मोदी के प्रोपेगंडा का काम किया।

Friday, July 24, 2015

नहले पै दहला


एक बार रमलू अर कमलू , किसी बियर बार में बियर पीने गये। जब वह पीने लगे तो रमलू बोला, "लगता है बाहर बारिश हो रही है। तुम ऐसा करो घर जाकर जल्दी से छतरी ले आओ।"

कमलू  गुर्राया: मुझे पता है मेरे जाने पर तुम मेरी सारी बियर पी जाओगे।

रमलू  ने उसे यकीन दिलाया कि वो उसकी बियर नहीं पियेगा। उसके हिस्से की बियर ज्यों की त्यों रखी रहेगी।

संता यह सुनकर मान गया और छतरी लेने चला गया।

जब रात गहराने लगी पर कमलू  छतरी लेकर नहीं लौटा तो रमलू  ने सोचा शायद कमलू  घर पर ही रुक गया है और अब नहीं आएगा। यही सोच कर उसने कमलू  का बियर वाला गिलास उठाया ही था कि बार के एक कोने की छोटी सी खिड़की से तेज आवाज आई, "अगर पीओगे तो मैं छतरी लेने नहीं जाऊंगा।"

Saturday, December 13, 2014

लड़कियों को विलेन बनाने पर तुले दबंग


लड़कियों के साथ बस  स्टैंड पर क्या हुआ यह बीच में नहीं आ रहा है
बस की भी आधी सच सामने आ रही है। उनका    बस  से बाहर फेंका जाना सामने नहीं आया ।
हुड्डा पार्क में बनी विडिओ किसने बनाई यह सच सामने नहीं आया । लड़कियां कहती हैं की उन्होंने नहीं बनाई ।
इंडियन एक्सप्रेस में सिसाना के सुमित की तरफ से पैसे की कोई बात  गयी बताते हैं । पैसे की बात बाद में घड़ी गयी ।
लड़कियों से था णे में आसान के लड़कों  ने माफी क्यों मांगी थी ?
गोयनका स्कूल  के  चपड़ासी  वर्सन सामने  क्यों नहीं  आने दिया और किसने नहीं  आने  दिया ?
लड़कियों को ब्लैकमेलर और उनके बारे हल्की बात करने वालों के खिलाफ कार्यवाही  क्यूँ नहीं की  जा रही ?

सोशल मीडिया पर बहुत भद्दी कॉमेंट्स उनके बारे में किये जाने वालों पर साइबर क्राइम के तहत केस दर्ज क्यों नहीं किया जा रहा ?
लड़कों और affidavit  देने वालों का  नार्को टेस्ट क्यों नहीं करवाया जा रहा ।
लड़कियों को सुरक्षा  प्रदान करके पुलिस ने ठीक काम किया है ।

Friday, December 5, 2014

बस का मामला



दूसरी वीडियो का भी (बस स्टैंड के सामने वाले पार्क )अब  तोड़ खुलासा हो रहा है ।  उसमें एक सिसाने का लड़का है जो कहता है की 20 हजार देकर समझौता किया । जबकि लड़कियां पैसे की बात को ख़ारिज कर रही हैं ।  इसमें कई बिंदु हैं जिनपर क्लैरिटी होना बहुत जरूरी है और वह एक हद तक कल के तहलका विशेष में आई भी हैं  पक्ष हैं जिनको निष्पक्ष जाँच  निष्पक्षता के साथ ही सामने ल सकती है । लड़कियों के साहस को दुस्शाहस के रूप में देखा जाने लगा है यह कितना दुर्भाग्य पूर्ण है ?

पहले लड़कों के समर्थन में जातीय संगठन सक्रीय होते नजर आये और आज  कुछ जातीय संगठनों ने लड़कियों के समर्थन में अपनी बात रखी है ।  इस सारे मामले को  शुरू से ही जातीय रंगत  से देखने के प्रयास नजर आ रहे हैं और यह  मामला इस रंगत में और रंगे जाने का भय बढ़ रहा है । 

Haryana Vishesh : Bahaduri Se Vivad Tak

उल्लू और हंस

एक बार एक हंस और हंसिनी हरिद्वार के सुरम्य वातावरण से भटकते हुए उजड़े, वीरान और रेगिस्तान के इलाके में आ गये! हंसिनी ने हंस को कहा कि ये किस उजड़े इलाके में आ गये हैं ?? यहाँ न तो जल है, न जंगल और न ही ठंडी हवाएं हैं! यहाँ तो हमारा जीना मुश्किल हो जायेगा! भटकते भटकते शाम हो गयी तो हंस ने हंसिनी से कहा कि किसी तरह आज कि रात बिता लो, सुबह हम लोग हरिद्वार लौट चलेंगे! रात हुई तो जिस पेड़ के नीचे हंस और हंसिनी रुके थे उस पर एक उल्लू बैठा था। वह जोर से चिल्लाने लगा। हंसिनी ने हंस से कहा, अरे यहाँ तो रात में सो भी नहीं सकते। ये उल्लू चिल्ला रहा है। हंस ने फिर हंसिनी को समझाया कि किसी तरह रात काट लो, मुझे अब समझ में आ गया है कि ये इलाका वीरान क्यूँ है ?? ऐसे उल्लू जिस इलाके में रहेंगे वो तो वीरान और उजड़ा रहेगा ही। पेड़ पर बैठा उल्लू दोनों कि बात सुन रहा था। सुबह हुई, उल्लू नीचे आया और उसने कहा कि हंस भाई मेरी वजह से आपको रात में तकलीफ हुई, मुझे माफ़ कर दो। हंस ने कहा, कोई बात नही भैया, आपका धन्यवाद! यह कहकर जैसे ही हंस अपनी हंसिनी को लेकर आगे बढ़ा, पीछे से उल्लू चिल्लाया, अरे हंस मेरी पत्नी को लेकर कहाँ जा रहे हो। हंस चौंका, उसने कहा, आपकी पत्नी ?? अरे भाई, यह हंसिनी है, मेरी पत्नी है, मेरे साथ आई थी, मेरे साथ जा रही है! उल्लू ने कहा, खामोश रहो, ये मेरी पत्नी है। दोनों के बीच विवाद बढ़ गया। पूरे इलाके के लोग इक्कठा हो गये। कई गावों की जनता बैठी। पंचायत बुलाई गयी। पंच लोग भी आ गये! बोले, भाई किस बात का विवाद है ?? लोगों ने बताया कि उल्लू कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है और हंस कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है! लम्बी बैठक और पंचायत के बाद पंच लोग किनारे हो गये और कहा कि भाई बात तो यह सही है कि हंसिनी हंस की ही पत्नी है, लेकिन ये हंस और हंसिनी तो अभी थोड़ी देर में इस गाँव से चले जायेंगे। हमारे बीच में तो उल्लू को ही रहना है। इसलिए फैसला उल्लू के ही हक़ में ही सुनाना है! फिर पंचों ने अपना फैसला सुनाया और कहा कि सारे तथ्यों और सबूतों कि जांच करने के बाद यह पंचायत इस नतीजे पर पहुंची है कि हंसिनी उल्लू की पत्नी है और हंस को तत्काल गाँव छोड़ने का हुक्म दिया जाता है! यह सुनते ही हंस हैरान हो गया और रोने, चीखने और चिल्लाने लगा कि पंचायत ने गलत फैसला सुनाया। उल्लू ने मेरी पत्नी ले ली! रोते- चीखते जब वह आगे बढ़ने लगा तो उल्लू ने आवाज लगाई - ऐ मित्र हंस, रुको! हंस ने रोते हुए कहा कि भैया, अब क्या करोगे ?? पत्नी तो तुमने ले ही ली, अब जान भी लोगे ? उल्लू ने कहा, नहीं मित्र, ये हंसिनी आपकी पत्नी थी, है और रहेगी! लेकिन कल रात जब मैं चिल्ला रहा था तो आपने अपनी पत्नी से कहा था कि यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ उल्लू रहता है! मित्र, ये इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए नहीं है कि यहाँ उल्लू रहता है। यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ पर ऐसे पंच रहते हैं जो उल्लुओं के हक़ में फैसला सुनाते हैं! शायद ६५ साल कि आजादी के बाद भी हमारे देश की दुर्दशा का मूल कारण यही है कि हमने हमेशा अपना फैसला उल्लुओं के ही पक्ष में सुनाया है। इस देश क़ी बदहाली और दुर्दशा के लिए कहीं न कहीं हम भी जिम्मेदार हैँ!

Wednesday, December 3, 2014

रेप काण्ड जो दबा दिया जाता है
हम खेताँ मैं न्यार लेवण तीन जणी चली
  

बिल्ली कै घंटी कौण बांधै

भेड़ों की  ढालां  बेघर लोगों का शहरां के ख़राब तैं  ख़राब घरां  में बढ़ता जमावड़ा आज के हरयाणा  की एक  कड़वी सच्चाई  सै ।
सारे  सामाजिक नैतिक बन्धनों का तनाव ग्रस्त होना तथा टूटते जाना  गहरे संकट की घंटी बजावण  सैं ।  बेर ना 
हमनै  सुनै   बी सै अक नहीं ? माहरे परिवार के  पितृ स्तात्मक  ढांचे में अधीनता (परतंत्रता ) का तीखा होना साफ  साफ  
देख्या जा  सकै  सै  । जिंघान  देखै  उँघानै पारिवारिक रिश्ते नाते ढहते जाना ।   युवाओं के  साहमी  पढ़ाई  लिखाई अर  रोजगार 
 की गंभीर चुनौतीयाँ  सैं ।   परिवारों में बुजुर्गों की असुरक्षा का बढ़ते जाना  जगहां  जगहाँ  देखन  मैं आवै सै ।  दारू नै रही सही 
कसर पूरी करदी , घर तो गामां  मैं  कोई बच नहीं रह्या  दारू तैं , मानस एकाध घर मैं बचरया  हो तो  न्यारी बात सै । ताश खेलण
तैं  फुरसत  नहीं ।  काम कै  हाथ लाकै  कोए  राज्जी  नहीं । बैलगाड्डी  की जागां  बुग्गी  नै   ले  ली  अर  बुग्गी  चलना  भी महिला 
के सिर  पै  आण  पड़या ।  ऐह्दी पणे  की हद होगी । महिलावाँ  पै और  बालकां  पै काम का बोझ बढ़ता जाण  लागरया  सै  | 
असंगठित क्षेत्र  बधग्या  अर  जन सुविधावां  मैं  घनी  कमी  आंती  जावै  सै |  एक नव धनाढ्य  वर्ग  पैदा होग्या  हरित क्रांति 
पाच्छै  उसकी  चांदी  होरी  सै  ।  उसका  निशाना  सै  पीस्से   कमाना  कुछ  भी  करकै   \ कठिन जीवन होता जा   सै । मजदूर वर्ग 
को पूर्ण रूपेण ठेकेदारी प्रथा में धकेल्या जाना आम बात की  ढा लां  देख्या  जा  सै  ।गरीब लोगों के जीने के आधार  कसूते  ढा ल  
सिकुड़ता  जान  लाग रया  सै \गाँव  तैं शहर को पलायन   का बढ़ना तथा लम्पन तत्वों की बढ़ोतरी होणा   चारों  कान्ही  दीखै  सै 
 | शहरां के विकास में अराजकता  छागी | ठेकेदारों  और प्रापर्टी डीलरों का बोलबाला  होग्या  चा रों तरफ ।
 जमीन की उत्पादकता में खडोत , पानी कि समस्या , सेम कि समस्या  तैं  किसानी का   संकट  गहरा ग्या ।  कीट नाशकां  के  
अंधाधुंध  इस्तेमाल  नै  पानी कसूता प्रदूषित कर दिया अर  कैंसर  जीसी  बीमारियां  के बधण  का   खतरा  पैदा  कर दिया । 
कृषि  तैं  फालतू  उद्योग कि तरफ  अर व्यापार की तरफ जयादा ध्यान  दिया  जावै  सै  इब  । 
स्थाई हालत से अस्थायी हालातों 
पर जिन्दा रहने का दौर आग्या  दीखै  सै ।   अंध विश्वासों को बढ़ावा दिया  जावण  लाग रया  सै  | हर दो किलोमीटर पर मंदिर 
का उपजाया जाना अर टी वी पर भरमार  सै  इसे  मैटर की ।
अन्याय  अर  असुरक्षा का बढ़ते जाण  की  साथ  साथ  कुछ लोगों के प्रिविलिज बढ़ रहे  सैं ।  मारूति से सैंट्रो कार की तरफ रूझान | आसान काला धन काफी इकठ्ठा किया गया सै । उत्पीडन अपनी सीमायें लांघता जा रया  सै  |गोहाना काण्ड  , मिर्चपुर कांड अर  रूचिका कांड ज्वलंत उदाहरण  सैं |
* व्यापार धोखा धडी में बदल  लिया  दीखै  सै । शोषण उत्पीडन और भ्रष्टाचार की तिग्गी भयंकर रूप धार रही  सै । भ्रष्ट नेता , 
भ्रष्ट अफसर और भ्रष्ट पुलिस   का  गठजोड़ पुख्ता हो  लिया  सै । प्रतिस्पर्धा ने दुश्मनी का रूप धार लिया ।  तलवार कि जगह 
सोने ने ले ली । वेश्यावृति दिनोंदिन बढ़ती जा सै  ।  भ्रम  अर  अराजकता का माहौल बढ़रया  सै  | धिगामस्ती बढ़ री  सै ।  
               संस्थानों की स्वायतता पर हमले बढे  पाछले  कुछ सालों  मैं । लोग मुनाफा कमा कर रातों रात करोड़ पति से अरब पति
 बनने के सपने देख रहे सैं  अर  किसी भी हद तक अपने  आप  नै गिराने को तैयार  सैं  । खेती में मशीनीकरण तथा औद्योगिकीकरण मुठ्ठी भर लोगों को मालामाल कर गया तथा लोक  जण को गुलामी व दरिद्रता में धकेलता जारया  सै । बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का शिकंजा कसता जावण  लाग रया  सै 
वैश्वीकरण को जरूरी बताया जारया  सै जो असमानता पूर्ण विश्व व्यवस्था को मजबूत करता जाण  लाग  रहया  सै । पब्लिक सेक्टर
 की मुनाफा कमाने वाली कम्पनीयों को भी बेच्या जा रया   सै ।  हमारी आत्म निर्भरता खत्म करने की भरसक नापाक साजिश 
की जा रही सै । साम्प्रदायिक ताकतें देश के अमन चैन के माहौल को धाराशाई करती जा रही  सैं  जिनतें  हरयाणा  भी  अछूता  
 कोणी   सकता ।  सभी संस्थाओं का जनतांत्रिक माहौल खत्म किया जा रया  है । बाहुबल, पैसे , जान पहचान , मुन्नाभाई , ऊपर
 कि पहुँच वालों के लिए ही नौकरी के थोड़े बहुत अवसर बचे  सैं ।  महिलाओं  में अपनी मांगों के हक़ में खडा  होने  का उभार 
दिखाई देवै  सै | सबसे ज्यादा वलनेरेबल भी समाज का यही हिस्सा दिखाई देसै  मग़र सबसे ज्यादा जनतांत्रिक मुद्दों पर , नागरिक 
समाज के मुद्दों पर , सभ्य समाज के मुद्दों पर संघर्ष करने कि सम्भावना भी यहीं ज्यादा दिखाई देसै ।  वर्तमान विकास प्रक्रिया
भारी सामाजिक व इंसानी कीमत मानगणे  आली   सै  | इसको संघर्ष के जरिये पल ट्या जाना बहुत जरूरी  सै । फेर  बिल्ली  कै 
घंटी  कौण  बांधै ?

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Will fail Fighting and not surrendering

I will rather die standing up, than live life on my knees:

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