Tuesday, April 30, 2019

आज का हरियाणा-बहस के लिए

आज का हरियाणा.बहस के लिए
रणबीर दहिया

1857 की आजादी की पहली जंग में हरियाणा वासियों की काफी महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रही। मगर उसके बाद विभाजन कारी ताकतों का सहारा लेकर अंग्रेजो ने हरियाणा की एकता को काफी चोट पहुंचाई। बाद में हरियाणा में यह कहावत चली कि ष्साहब की अगाड़ी और घोड़े की पिछाड़ी नहीं  होना चाहिये . नवजागरण के दौर में हरियाणा में आर्य समाज भी काफी लेट आया। महिला शिक्षा पर बहुत जोर लगाया आर्य समाज ने मगर सहशिक्षा का डटकर विरोध किया। एक और कहावत का चलन भी हुआ म्हारे  हरियाणा की बताई सै या विद्या की कमजोरी- बांडी बैल की के पार बसावै जब जुआ डालदे धोरी।
        आज का साम्राज्यवाद पहले के किसी भी समय के मुकाबले ज्यादा संगठित,ज्यादा हथियारबन्द और ज्यादा विध्वंसक है। नवस्वतंत्र या विकासशील  देशों  की खेतियों, देसी उद्योग धन्धों और सामाजिक संस्कृतियों को तबाह करने पर लगा है।दुनिया भर में साम्राज्यवादी वैश्वीवीकरण की यही विध्वंसलीला हम देख रहे हैं। नव सांमन्तवाद और नवउदारीकरण का दौर हरियाणा में पूरे यौवन पर नजर आता है। जहां एक तरफ हरियाणा ने आर्थिक तौर पर किसानों और कामगरों तथा मध्यमवर्ग  के लोगों  के अथक प्रयासों से पूरे भारत में  दूसरा स्थान ग्रहण किया है वहीं दूसरी तरफ हरियाणा के ग्रामीण समाज का संकट शहरों के मुकाबले ज्यादा तेजी से गहराता जा रहा है। सामाजिक सूचकांक चिन्ताजनक स्थिति की तरफ इशारा करते नजर आते हैं।भूखी, नंगी, अपमानित और बदहाल आाबादी के बीच छदम सम्पन्नता के जगमग द्वीपों जैसे गुड़गांव पर जश्न  मनाते इन नये दौलतमंदों का सफरिंग हरियाणा से कोई वासता नजर नहीं आता।  कुछ भ्रष्ट  राजनितिज्ञों, भ्रष्ट पुलिस अफसरों, भ्रष्ट नौकरशाहों तथा भ्रष्ट कानून के रखवालों , गुण्डों के टोलों के पचगड्डे ने काले धन और काली संस्कृति को हरियाणा के प्रत्येक स्तर पर बढ़ाया है। फिलहाल देश  के और हरियाणा के दौलतमंदों का बड़ा हिस्सा साम्राज्यवादी वैश्वीकरण  का पैरोकार बना हुआ नजर आता है। वह सुख भ्रान्ति का शिकार है या समर्पण कर चुका है। वह पूरे हरियाणा या पूरे देश  के बारे में नहीं महज अपने बारे में सोचता है। फसलों की जमीन के बढ़ते बांझपन के कारण पैदावार कम से कमतर होती जा रही है। तालाबों पर नाजायज कब्जे कर लिये गये जिनके चलते उनकी संख्या कम हो गई और जो बचे उनके आकार छोटे होते गये। अन्धाधुन्ध कैमिकल खादों और कीट नाशकों और घास फूसी नाशिकों के इस्तेमाल के कारण जमीन के नीचे का पानी प्रदूशित होता जा रहा है। गांव की शामलात जमीनों पर दबंग लोगों   ने कब्जे जमा लिए हैं। सरकारी पानी की डिगियों की बुरी हालत है। पीने के पानी का व्यवसायिकरण बहुत से गावों में टयूबवैलों के माध्यम से हो गया। ।पानी के नलकों की टूटियां गायब हैं | पानी की वेस्टेज बहुत ज्यादा है | इसीलिये  गलियों का बुरा हाल है |  यदि पक्की भी हो गई हैं तो भी पानी की निकासी का कोई भी उचित प्रबन्ध न होने के कारण जगह जगह पानी के चब्बचे बन गये हैं जो बहुत सी बीमारियों के जनक हैं। बिजली ज्यादातर समय गुल रहती है। बैल आमतौर से कहीं कहीं बचे हैं।भैंसो का पालन बढ़ा है |  भैंसों के सुआ लगा कर दूध निकालने की कुरीति बढ़ती जा रही है। सब्जियों में भी सुआ लगाने का चलन बहुत बढ़ता जा रहा है। खेती की जोत का आकार कम से कमतर हुआ है और दो एकड़ या इससे कम जोत के किसानों की संख्या किसी भी गांव में कुल किसानों की संख्या में सबसे जयादा है।किसानों और खेती के तरीकों में कई बदलाव दिखाई देते हैं |  गांव के सरकारी स्कूलों का माहौल काफी खराब हो रहा है। इन स्कूलों में खाते पीते व दबंग परिवारों के बच्चे नहीं जाते। इसलिए उनकी देखभाल भी नहीं बची है। दलित और बहुत गरीब किसान परिवार के बच्चे ही इन स्कूलों में जाते हैं। उपर से सैमैस्टर सिस्टम और बहुत दूसरी नीतिगत खामियों के चलते माहौल और खराब हो रहा है।इस सबके चलते प्राइवेट स्कूलों की बाढ़ सी आ गई है। उंची फीसें इन प्राइवेट स्कूलों का फैशन बन गया है। बीएड के कालेजों की एक बार बाढ़ आई, फिर नर्सिंग कालेजो की और फिर डैंटल कालेजों की। ज्यादातर प्राईवेट सैक्टर में हैं। बी एड कालेजों में से ज्यादातर बन्द होने के कगार पर हैं। प्राईवेट सैक्टर में दुकानदारी बढ़ी है और शिक्षा की गुणवता काफी कम हुई है। प्राइवेट विश्व विद्यालयों की सांख्य में भी काफी बढ़त दिखाई दे रही है | इन की समीक्षा अपने आप में एक लेख की मांग करती  है। स्वास्थ्य के क्षे़त्र में 90 के बाद प्राईवेट सैक्टर 57 प्रतिशत हो गया है। गांव के सबसैंटर में,प्राईमरी स्वास्थ्य केन्द्र में या सामुदायिक स्वास्थय  केन्द्र में क्या हो रहा है यह गांव के दबंगों की चिन्ता का मसला कतई नहीं है। बल्कि इनमें काम करने वाले कुछ भ्र्ष्ट कर्मचारियों के साथ सांठगांठ करके ठीक काम करने वाले डाक्टरों व दूसरे कर्मचारियों को परेशान किया जाता है। कहने को संस्थागत प्रसव का प्रतिशत बढ़ा है | गांव में सरकार द्वारा बनाई गई डिगियों का इस्तेमाल न के बराबर हो रहा है जिसके चलते प्राइवेट ट्यूबवैलों  से पानी खरीदना पड़ रहा है । अब भी पीने के पानी के कुंए अलग अलग जातियों के अलग अलग हैं। बहुत कम गांव हैं जहां सर्वजातीय कुँए  हैं। खेती में ट्रैक्टर का इस्तेमाल बहुत बढ़ गया है। आज ट्रैक्टर से एक एकड़ की बुआही के रेट 500  से 550 रुपये हो गये हैं। ट्यूबवैल से एक एकड़ की सिंचाई के रेट 80 रुपये घण्टा हो गये हैं। थ्रैशर से गिहूं निकालने के रेट1500रुपये प्रति एकड़ हो गये हैं। हारवैस्टर कारबाईन से गिहूं कटवाने के 1400 रुपये प्रति एकड़ और निकलवाने के रैपर के रेट 1200 प्रति एकड़ हो गये हैं। बड़ी बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का सामान हरेक गांव की छोटी से छोटी दुकानों पर आम मिल जाता है। 8.10 दुकानों से लेकर 40.50 दुकानों का बाजार छोटे बड़े सभी गांव में मौजूद है। छोटी छोटी किरयाने की दुकानों पर दारु के प्लास्टिक के पाउच आसानी से उपलब्ध हैं। पहले का डंगवारा जिसमें एक एक बैल वाले दो किसान मिलकर खेती कर लेते थे बिल्कुल खत्म हो गया है। पहले दो एकड़ वाला 10 एकड़ वाले की जमीन बाधे पर लेकर बोता रहा है और काम चलाता रहा है। साथ एक दो भैंस भी रखता रहा है जिसका दूध बेचकर रोजाना के खर्चे पूरे करता है। पहले कहावत थी "दूध  बेच दिया इसा पूत बेच दिया"। आज दूध भी बेचना पड़ता है और बेटा भी बेचना पड़ता है। मगर आज 10 किल्ले वाला भी दो किल्ले वाले की जमीन बाधे पर लेकर बोता है। खेती में मशीनीकरण तेजी से हुआ और हरित क्रांन्ति का दौर शुरु हुआ। हरित क्रान्ति ने बहुत नुकसान किये हैं जो अपने आप में एक बहस और रिसर्च का विषय है। मगर किसानी के एक हिस्से को लाभ भी बहुत हुआ है। एक नया नवधनाढ़य वर्ग पैदा हुआ है हरियाणा में जिसका हरियाणा के हरेक पक्ष पर पूरा कब्जा है। इन्ही के दायरों में अलग अलग जातों के नेताओं का उभरना समझ में आता हैं । मसलन चौधरी देवीलाल जाटों के नेता, चौधरी चान्द राम दलितों के नेता. उनमें भी एक हिस्से के.। पंडित भगवतदयाल शर्मा पंडितों के नेता , राव बिरेन्द्र सिंह अहीरों के नेता आदि। आज इन जाटों के नेताओं में भी एक ही जात में प्रतिष्पर्धा बढ़ी है। इस धनाढ़य वर्ग का एक हिस्सा आढ़तियों में शामिल हो गया है। सब आढ़तिये  कम जमीन वाले किसान की कई तरह से खाल उतार रहे  हैं । पुराने दौर के परिवारों में से डी एल एफ ग्रूप और जिन्दल ग्रूपों ने राष्ट्रीय  स्तर पर पहचान बनाई है। इसी धनाढ़य वर्ग में से कुछ भठ्ठों के मालिक हो गये हैं | दारु के ठेकों के ठेकेदार हैं, प्राप्रटी डीलर बन गये हैं। नेताओं के बस्ता ठाउ भी इन्ही में से हैं। हरेक विभाग के दलाल भी इन्हीं लोगों में से पैदा हुए हैं। इन ज्यादातरों के और भी कई तरह के बिजिनैश हैं। इनका जीवन ए सी  जीवन में  बदल गया है चाहे शहर में रहते हों या गांव में। हर तरह के दांव पेच लगाने में यह तबका बहुत माहिर हो गया है। जिन लोगों  की हाल में  जमीने बिकी हैं उन्होंने पैसा इन्वैस्ट करने का मन बनाया मगर पैसा लगाने की उपयुक्त जगह न पाकर वापिस गांव में आकर मकान का चेहरा ठीक ठ्याक कर लिया और एक 8.10 लाख की गाड्डी कार ले ली। एक मंहगा सा मोबाइल ले लिया। जिनके पास कई एकड़ जमीन थी और संयुक्त परिवार था उन्होंने सिरसा की तरफ या कांशीपुर में या मध्यप्रदेश  में खेती की जमीनों में यह पैसा लगा दिया। कुछ लोगों ने 200 से 300 गज का प्लॉट शहर में लेकर सारा पैसा वहां मकान बनाने पर खर्च कर दिया। आगे क्या होगा उनका  कुछ नहीं कहा जा सकता। इन बिकी जमीनों पर जीवन यापन करने वाले खेत मजदूर और बाकी के तबकों का जीना मुहाल हो गया है।बड़ी मुश्किल में है इनका जीवन यापन। ऊपर से दारू का चलन भी इन तबकों में भी बढ़ा है।  यह दबंगों और मौकापरस्तों के समूह हरेक कौम में पैदा हुए हैं। इनका वजूद जातीय , गोत्रों और ठोले पाने की राजनिति पर ही टिका है। ज्यादातर गांव में सड़कें पहुंच गई हैं बेशक खस्ता हालत में हों बहुत सी सड़कें। किसी भी गांव में चार पहियों के वाहनों की संख्या भी बढ़ी है। बहुराष्ट्रीय  कम्पनियों के प्रोडक्ट ज्यादातर गावों में मिलने लगे हैं। टी वी अखबार का चलन भी गांव के स्तर पर बढ़ा है। सीडी  प्लेयर तो बहुत सें घरों में मिल जाएगा। मोबाइल फोन गरीब तबकों के भी खासा हिस्से के पास मिल जाएगा। संप्रेषन के साघन के रुप में प्रोग्रेसिव ताकतों को इसके बारे में सोचना होगा। माइग्रेटिड लेबर की संख्या ग्रामीण क्षेत्र में भी बढ़ रही है। किसानी के एक हिस्से में अहदीपन बढ़ रहा है।गाँव में कई परतें बन गई लगती हैं आर्थिक समानताओं के बढ़ते जाने क्र कारण।  गांव की चौपालों की जर्जर हालत हमारे सामूहिक जीवन के पतन की तरफ इशारा करती है। नशा , दारु और बढ़ता संगठित सैक्स  माफिया सब मिलकर गांव की संस्कृति को कुसंस्कृति के अन्धेरों में धकेलने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।पुरुष  प्रघान परिवार व्यवस्था में छांटकर महिला भ्रूण हत्या के चलते ज्यादातर गांव में लड़कियों की संख्या काफी कम हो रही है। बाहर से खरीद कर लाई गई बंहुओं की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। पुत्र लालसा बहुत प्रबल दिखाई देती है यहां के माईडं सैट में। हर 10 किलो मीटर पर शर्तिया  छोरा के लिए गर्भवती महिला को दवाई देने वाले मिल जाएंगे। उंची से उंची पढ़ाई भी हमारे दकियानूसी विचारों में सेंध लगाने में असफल रही लगती है।बल्कि अंधविश्वासों को बढ़ावा भी दिया जा रहा लगता है।  जैंडर बलाइन्ड और साइंटिफिक टेम्पपर रहित  उच्च शिक्षा ने महिला विरोधी सामन्ती सोच को ही पाला पोसा लगता है। हमारे आपस के झगड़े बढ़े हैं। इस सबके चलते महिलाओं पर घरेलू हिंसा में बढ़ोतरी हुई  है। महिलाओं पर बलात्कार के केस बढ़े हैं। महिलाओं के साथ छेड़छाड़ आदि के केस बढ़े हैं जिनमें से ज्यादातर केस दर्ज ही नहीं हो पाते। कचहरियों में तलाक के केसिज की संख्या बेतहासा बढ़ रही है। सल्फास की गोली खाकर हर रोज 1 या 2 नौजवान मैडीकल पंहुच जाते हैं। 30. से 40 ट्रक ड्राईवर ज्यादातर  गांव में मिल जाएंगे । एडस की बीमारी के इनमें से ज्यादातर वाहक हैं। सुबह से लेकर शाम  तक ताश  खेलने वाली मंडलियों की संख्या बढ़ती जा रही है। युवा लड़कियों का यौन शोषण संगठित ढ़ंग से किया जा रहा है तथा सैक्स  रैकेटियर बहुत से  गांवों  तक फैल गये लगते  हैं। इसके अलावा युवा लड़कियों में शादी से पहले गर्भ की तादाद बढ़ रही है। मौखिक तौर पर कुछ डाक्टरों का कहना है कि इस प्रकार के केसिज में 50 प्रतिशत से ज्यादा परिवार के सदस्य, रिस्तेदार या  पड़ौसी ही होते है जो यौन षोशण करते हैं । महिला न घर के अन्दर सुरक्षित  रही है न घर से बाहर। युवा लड़कियों का गांव की गांव में यौण उत्पीड़न हरियाणवी ग्रामीण समाज की भयंकर तसवीर पेश  करता है। गांव के युवाओं .लड़के लड़कियों . को अपनी स्थगित ऊर्जा का सकारात्मक इस्तेमाल करने का कोई अवसर हमारी दिनचर्या में नहीं है। इस सब के बावजूद बहुत सी लड़कियों व महिलाओं ने खेलों में हरियाणा का नाम रोशन किया है। केबल टीवी  ज्यादातर बड़े गांव में पहुंच गया है। टी वी में आ रही बहुत सी अच्छी बातों के साथ साथ देर रात बहुत सी जगह बल्यू फिल्में दिखाई जाती हैं। युवाओं में आत्म हत्या के केसिज बढ़ रहे हैं। महिलाओं के दुख सुख की अभिव्यक्ति महिला लोक गीतों में साफ झलकती दिखाई देती है। हमारे सांगों में पितृसतात्मक मूल्यों का बोलबाला दिखाई देता है। इसके साथ साथ महिला विरोधी और दलित विरोधी रुझान भी साफ झलकते हैं। मूल्यों के संदर्भ में हमारा साहित्य दबंग के हित की संस्कृति का ही निर्वाह करता नजर आता है खासकर  ज्यादातर सांगों के कथानक में। पूरे हरियाणवी चुटकलों के भण्डार में एक सेकुलर चुटकुला मिलना मुश्किल।  झगड़ों में इन्होंने समझौते करवाये उनमें 100 में से 99 फैंसले दबंग के हक में और पीड़ित के खिलाफ किये गये। बहोत बार बलात्कारी के केस के समझौतों में बलात्कारी को ही राहत दिलवाई गई। कत्ल के केस में जेल में बन्द कुछ कातिलोन  को ही राहत दिलवाई जाती है  । तरीके अलग अलग हो सकते हैं मगर नतीजे हमेशा  पीड़ित के खिलाफ ही हुए। कमजोर के हक में न्यायकारी फैंसला शायद ही कोई हों। इसी प्रकार ब्याह शादी के मामलों में गांव की गांव और गोत की गोत का केस एक मनोज बबली का ही केस है। बाकी सारे के सारे केस दो गौतों के बीच के हैं जिनमें ज्यादातर में बच्चों के माता पिताओं को बहन भाई बन कर रहने के फतवे जारी किए गये हैं और प्रेमियों के कत्ल किये गये हैं। या दूसरी तरह के उत्पीड़न किये गये हैं। राई का पहाड़ बनाया जा रहा है। असली मुद्दों से युवाओं का ध्यान बांटा जा रहा है। भावनात्मक स्तर पर लोगों  की भावनाओं से खिलवाड़ किया जा रहा है। किसानी के संकट से किसानों को दिशा  भ्रमित किया जा रहा है। गांव के युवा लड़के और लड़की जिन्दगी के चौराहे पर खड़े हैं। एक तरफ नवसामन्तवादी और नवउदारवादी अपसंस्कृति का बाजार उन्हें अपनी ओर खींच रहा है। दूसरी ओर बेरोजगारी युवाओं के सिर पर चढ़ कर इनके जीवन को नरक बनाए है। नशा  , दारु, सैक्स व  पोर्नोग्राफी उसको दिशा भ्रमित करने के कारगर औजारों के रुप में इस्तेमाल किए जा रहे हैं। साथ ही समाज में व्याप्त पिछड़े विचारों और रुढ़ियों को भी इस्तेमाल करके इनका भावनात्मक शोषण किया जा रहा है। हरियाणा में खाते पीते मध्यमवर्ग और अन्य साधन सम्पन्न तबकों का साम्राज्यवादी वैष्वीकरण को समर्थन किसी हद तक सरलता से समझ में आ सकता है जिनके हित इस बात में हैं कि स्त्रियां,दलित,अल्पसंख्यक और करोड़ों निर्धन जनता नागरिक समाज के निर्माण के संघर्ष  से अलग रहें।  लेकिन साधारण जनता अगर फासीवादी मुहिम में शरीक कर ली जाती है तो वह अपनी भयानक असहायता, अकेलेपन, हताषा, अवरुद्ध  चेतना , पूर्व ग्रहों, उदभ्रांत कामनाओं के कारण शरीक होती है। फासीवाद के कीड़े जनवाद से वंचित ओर उसके व्यवहार से अपरिचित, रिक्त, लम्पट और घोर अमानुशिक जीवन स्थितियों में रहने वाले जनसमूहों के बीच आसानी से पनपते हैं। यह भूलना नहीं चाहिये कि हिन्दुस्तान की आधी से अधिक आबादी ने जितना जनतन्त्र को बरता है उससे कहीं ज्यादा फासीवादी परिस्थितियों  में रहने का अभ्यास किया है। इसमें कोई शक नहीं कि हरियाणा में जहां आज अनैतिक ताकत की पूजा की संस्कृति का गलबा है वहीं अच्छी बात यह है कि शहीद भगत सिंह से प्रेरणा लेते हुए युवा लड़के लड़कियों का एक हिस्सा इस अपसंस्कृति के खिलाफ एक सुसंस्कृत सभ्य समाज बनाने के काम में सकारात्मक सोच के साथ जुटा हुआ है। साधुवाद इन युवा लड़के लड़कियों को। इतने बडे़ संकट को कोई भी  अपनी अपनी जात के स्तर पर हल करने की सोचे तो मुझे संभव नहीं लगता । कैसे सामना किया जाए इसके लिए विभिन्न विचारकों के विचार आमन्त्रित हैं।
कुछ विचारणीय बिन्दू इस प्रकार हो सकते हैं.


1-  भेड़ों कि तरह बेघर लोगों का शहरों के ख़राब से ख़राब घरों में बढ़ता जमावड़ा
2-   सभी सामाजिक नैतिक बन्धनों का तनाव ग्रस्त होना तथा टूटते जाना
3-   परिवार के पितरी स्तात्मक   ढांचे में अधीनताए ;परतंत्रता , का तीखा होना
4-   पारिवारिक रिश्ते नाते ढहते जाना ... युवाओं के सामने गंभीर चुनौतीयाँ
5-    परिवारों में बुजुर्गों की असुरक्षा
6-   महिलाओं और बच्चों पर काम का बोझ बढ़ते जाना, असंगठित क्षेत्र में सुविधाओं का भी काफी अभाव है
7-   मजदूर वर्ग को पूर्ण रूपेण ठेकेदारी प्रथा में धकेला जाना
8-   गरीब लोगों के जीने के आधार संकुचित होना
9-    गाँव से शहर को पलायन बढ़ना तथा लम्पन तत्वों की बढ़ोतरी , शहरों के विकास में,अराजकता,ठेकेदारों  और प्रापर्टी डीलरों का बोलबाला
10- जमीन की  उत्पादकता में खड़ोत , पानी कि समस्या , सेम कि समस्या
11-  कृषि से अधिक उद्योग कि तरफ व व्यापार की तरफ जयादा ध्यान 
12- स्थाई हालत से अस्थायी हालातों पर जिन्दा रहने का दौर
13- अंध विश्वासों को बढ़ावा दिया जाना , हर दो किलोमीटर पर मंदिर का उपजाया जाना
14- अन्याय का बढ़ते जाना
15- कुछ लोगों के प्रिविलिज बढ़ रहे है
16-  मारूति से सैंट्रो कार की तरफ रूझान, आसान काला धन काफी इकठ्ठा किया गया है
17- उत्पीडन अपनी सीमायें लांघता जा रहा है , रूचिका कांड ज्वलंत उदाहरण है ,
18- व्यापार धोखा धड़ी  में बदल चुका  है
19- शोषण उत्पीडन और भ्रष्टाचार की तिग्गी भयंकर रूप धार रही है
20- प्रतिस्पर्धा ने दुश्मनी का रूप धार लिया है
21- तलवार कि जगह सोने ने ले ली है
22-  वेश्यावृति दिनोंदिन बढ़ती जा रही है
23-  भ्रम व अराजकता का माहौल बढ़ रहा है , धिगामस्ती बढ़ रही है
24- संस्थानों की स्वायतता पर हमले बढ़ रहे हैं
25- लोग मुनाफा कमा कर रातों रात करोड़ पति से अरब पति बनने के सपने देख रहे हैं और किसी भी                   हद तक अपने को गिराने को तैयार हैं
26- खेती में मशीनीकरण तथा औद्योगिकीकरण  मुठ्ठी भर लोगों को मालामाल कर गया तथा लोक जन को गुलामी व दरिद्रता में धकेलता जा रहा है
27- बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का शिकंजा कसता जा रहा है
28- वैश्वीकरण को जरूरी बताया जा रहा है जो असमानता पूर्ण विश्व व्यवस्था को मजबूत करता जा रहा है
29- पब्लिक सेक्टर की मुनाफा कमाने वाली कम्पनीयों को भी बेचा जा रहा है
30- हमारी आत्म  निर्भरता  खत्म करने की भरसक नापाक साजिश की जा रही हैं
31- साम्प्रदायिक ताकतें देश के अमन चैन के माहौल को धाराशाई करती जा रही हैं
32- गुट निरपेक्षता की विदेश निति से खिलवाड़ किया जा रहा है
33- युद्ध व सैनिक खर्चे में बेइंतहा बढ़ोतरी की जा रही है
34-  परमाणू हथियारों की होड़ में शामिल होकर अपनी समस्याएँ और अधिक  बढ़ा ली हैं
35- सभी संस्थाओं का जनतांत्रिक माहौल खत्म किया जा रहा है
36-  बाहुबल, पैसे , जान पहचान , मुन्नाभाई , ऊपर कि पहुँच वालों के लिए ही नौकरी के थोड़े बहुत अवसर बचे हैं 
 मैं इस पक्ष पर अभी जान बूझ कर कुछ नहीं कह रहा ताकि हिड्डन अजैंडे की समस्या से बचा जा सके। संस्कृति को भी  सांझी संस्कृति के रुप में ही बचाया जा सकता है न कि संकुचित दायरों में बांधकर।


रणबीर सिह

Wednesday, October 26, 2016

MANMOHAN

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Tuesday, April 12, 2016

ARYAN MYTH

Ancient Civilisations and the Aryan Myth By Prabir Purkayastha
The belief of Aryan superiority and identifying Aryans with white skin and blue eyes was a strong component of Nazi Germany’s racial beliefs. It was intimately connected to the larger racial construction underlying imperialism. A number of scientists used the emerging disciplines of anthropology, linguistics and biology to justify brutal colonial oppression and even genocide with evolutionary arguments of survival of the fittest. It is not surprising that the RSS, with their admiration for Hitler, should seek to use the superior Aryan race theory for its reconstruction of Indian history. In this exercise, it is helped by a set of “academics”, largely Non Resident Indian (NRI) engineers turned historians, who attempt to use a little history and science with very large doses of “magical” thinking to substantiate the RSS view of history. These are the “revisionist” historians who believe that India is being denied its “rightful” place in world history due to machinations of establishment “western” historians.
Before we examine the RSS view of history, it is important to understand the terms of the debate. In any serious scholarship today, nobody talks about Aryans in the racial sense. It is now referred to as Indo-European language group with the understanding that the Indo-European languages have a common origin. The common origin of Indo-European language does not mean that one group of people -- the Aryans -- speaking this language spread physically all over the Europe and South Asia. All it signifies is that their language spread, probably by conquest and repeated migrations, with the people thus conquered adopting the language of the victors. This does not necessitate large-scale demographic changes along with the conquest nor does it mean large-scale invasion by Aryans in the past of all lands today speaking the Indo-European languages.
The Aryan race theory fell into disrepute as the racial stereotypes constructed in 19th early 20th century were found to have little validity with advances in knowledge. It is now clear that genetic differences between races are small compared to genetic variations within any population group and that skin colour co-relates poorly to any such genetic difference. Particularly damning for racism is the discovery that Homo sapiens or modern human beings evolved first in Africa only about 200,000 years back, leaving Africa for Middle East and Europe only 50,000-70,000 years back. Genetic mapping and linguistic studies have been used to examine the diffusion of Homo sapiens across the globe. The picture that emerges is one of fairly late diffusion out of Africa and therefore explains the relatively low genetic variation between races.
The belief in racial myths dies slowly as they are constructed to legitimise existing social and economic relations. That is why Aryan supremacists and neo-Nazis still continue to hold to their beliefs of a superior white or the Aryan race. The IQ debate on the inferior IQ of African Americans compared to white Americans are all a part of this superior white race theory. The RSS shares not only a fascination for fascism along with the neo Nazis of today, they also share this common core of belief with them about superior Aryans, preferably white skinned and looking an upper caste North-Indian.
The problem that both RSS ideologues and the European racist scholarship faced was the manifest superiority of the non-Aryan civilisation in ancient times. Egypt and Babylon predate the Greek civilisation just as the Harappan civilisation predates the commonly held chronology of Vedic Indians in India. The European scholars did initially try and argue of an older Indian Aryan civilisation which helped develop Egyptian and Babylonian civilisations. However, they give up this theory faced with the difficulty of finding an early enough date for the Indian civilisation. Instead, they concentrated on terming all other civilisations as primitive in various ways while extolling the Greaco-Roman one -- termed classical -- as the first truly developed civilisation. A few scholars have tried to argue that the Harappan civilisation was “Aryan”, using dubious astronomical claims from the Rig-Veda. However, once it was found that ancient Egypt predates Harappa, this was not pursued further. Martin Bernal’s remarkable work in which he showed the Egyptian and Phoenician roots of Greek civilisation has now shown up the arguments regarding superior classical civilisation as a racist construction, created largely in the 19th and early 20th century.
The RSS not only have the problem of an inferior non-Aryan race building the superior Harappan civilisation; they also have the problem of the Vedic people coming from outside India. If the Vedic Aryans came from outside India, Vedic Hinduism, like Islam, is essentially non-indigenous and therefore foreign. What happens then to the Savarkar thesis, the ideological bedrock of the RSS that Bharat is not only Pitribhumi (fatherland) but also Punyabhumi (Holy Land)? That Hinduism is older than Islam does not particularly strengthen their case against Muslims (and Christians) as aliens. After all Islam is in India for more than a 1000 years. Therefore, the RSS ideology demands a completely indigenous origin for Vedic Hinduism and the Aryans.
It is to get around this problem that the current crop of RSS ideologues and their allies -- some of them old fashioned Aryanists -- want to rework the original Aryan paradigm. In their view, the Rig-Veda originated in India well before the Harappan civilisation or is at least co-terminus with it. The Harappan script is sought to be related to Brahmi and claimed to be a written form of Sanskrit. In this view, Sanskrit subsumes all the Indian languages: the Dravidian group of languages is derived from southern Prakrit while the North Indian ones from northern Prakrit. The internal evidence of Rig-Veda regarding a largely pastoral and nomadic people is discarded to argue for an urbanised Vedic civilisation. A wily Subhash Kak claims not to recognise Aryans as a valid category but his American colleague and co-author David Frawley has no hesitation in calling the Vedic people Aryan. For Kak, it is enough to place the origin of Vedas in hoary antiquity and make Vedic Hinduism indigenous.
Interestingly, relatively mediocre NRI engineers are crafting the bulk of these so-called revisionist histories. Two of the main protagonists: Subhash Kak and S.Rajaram are in obscure computer science departments in the US. The other actor is David Frawley, whose claim to historical knowledge stems from a short stint in Varanasi where he “discovered” Hinduism. In the quest for antiquity, not only “creative” exercises in interpretations are being carried out, even outright fraud is being used. N.S. Rajaram recently co-authored a book with N.Jha (The Deciphered Indus Script: Methodology, readings, interpretation) and claimed to have deciphered the Harappan script as a variant of Brahmi and the Harappan language as late Vedic Sanskrit. While Jha had produced a monograph on this about five years back, it made little impact then amongst scholars as its methodology was too “flexible”; using such methods the Harappan script can be “recognised even as Old English! The peculiar twist that Rajaram imparts is his discovery of horse in one of the Harappan seals and a host of “references” to horses in the deciphered Harappan inscriptions.
Unfortunately for Rajaram, his “horse seal” was found to be an outright fraud: it was a computer enhanced image of a cracked seal in which the horse head is allegedly visible in the portion of the seal that was cracked and broken in the original seal. Even worse, Rajaram failed to mention where he had found this evidence. It was finally tracked down after a detailed search of various archival materials to a 1937 photograph when it became clear that the image that Rajaram produced in his book was not the same one in the photograph. This led to Rajaram’s admission that he had “enhanced” the image using a computer. He still fails to explain how the computer was able to extract an image from a portion of the seal that is missing in the original. A detailed description of the fraud can be found in the latest edition of Frontline where two scholars -- Michael Witzel and Steve Farmer  -- give details of the fraud (Horseplay in Harappa: the Indus Valley decipherment Hoax, Frontline, October 13).
Why was it so important for Rajaram to discover the horse in Harappa? The horse is obvious in its importance to the Vedic way of life. There are numerous references to it in Vedic literature. Its lack in the Harappan seals and not finding its remains in India before 2000 BC, therefore queers the pitch for the Hindutva ideologues who claim that the Harappan civilisation was Aryan. It matters little to serious historians who came from where. If the Indo-Europeans originated from India it is a matter of revising our current notions of the past; it does not make the Indians either superior or inferior to others. Nobody is arguing that the Asian steppe region, currently held as the origin of the Indo-European speakers, produced a superior race or a superior culture. However, if Aryan superiority is accepted, then the need to claim a glorious Aryan past and also the need to appropriate this for Hinduism.
Historians can dialogue differences if they accept a common method: careful sifting of all evidence – archaeological, linguistic, textual, etc. -- in order to evaluate contesting theories. The RSS ideologues of history have no such criteria. In their bar, only positive evidence counts. Thus, old and discredited astronomical theories of Jacobi regarding the Rig-Veda are paraded as new findings by Kak. Uncomfortable facts such as linguistic structures and philological differences between Dravidian and Indo-European group of languages are not even mentioned. This has very little to do with history: it is prejudice, dressed up to masquerade as scholarship.
Why is there a need to impose such a schema on the past? The contentions are not about history: History is merely the terrain on which current political battles are being fought. If we want a monolithic homogenised Hindu India, projecting this back into the past would considerably strengthen this idea. Thus, the attempt is to create a past that reflects the RSS image of a future India. In such a scheme, the Muslims will be Mohmadiya Hindus, Christians Ahemdeiya Hindus and Dravidian group of languages will be considered a derivative of Sanskrit (or Indo-European Prakrit) and therefore the Dravidian movement and people can be Aryanised. Once they are Aryanised, they are unlikely to object to the RSS appropriation of the Harappan civilisation for the Aryans. The historical contortions can only be understood if we look at the RSS project of a homogeneous Hindu India.
The project of “revising” history then has little to do with a scientific examination of the past. It is to do with the project of creating a homogenised Hindu India, and demanding that other religious groups: Muslims and Christians accept Hindu suzerainty. This is why Sudershan is calling for Christians to severe link with churches abroad. Homogenising the future demands a homogeneous past: spoilt only by recent alien incursions of Islam and Christianity. This is the driving force of the current crop of “revisionist” historians. The battle for the future is being fought in the terrain of the past; and true to the RSS style, it is being fought with deceit, half-truths and outright fraud.

BABA BHIM RAO AMBEDEKAR


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प्रश्न 1- डॉ अम्बेडकर का जन्म कब हुआ था
उत्तर- 14 अप्रैल 1891
प्रश्न 2- डॉ अम्बेडकर का जन्म कहां हुआ था
उत्तर- मध्य प्रदेश इंदौर के महू छावनी में हुआ था
प्रश्न 3- डॉ अम्बेडकर के पिता का नाम क्या था
उत्तर- रामजी मोलाजी सकपाल था
प्रश्न 4- डॉ अम्बेडकर की माता का नाम क्या था
उत्तर- भीमा बाई
प्रश्न5- डॉ अम्बेडकर के पिता का क्या करते थे
उत्तर- सेना मैं सूबेदार थे
प्रश्न 6- डॉ अम्बेडकर की माता का देहांत कब हुआ था
उत्तर-1896
प्रश्न 7- डॉ अम्बेडकर की माता के देहांत के वक्त उन कि आयु क्या थी
उत्तर- 5 वर्ष
प्रश्न8- डॉ अम्बेडकर किस जाती से थे
उत्तर- महार जाती
प्रश्न 9- महार जाती को कैसा माना जाता था
उत्तर- अछूत (निम्न वर्ग )
प्रश्न10- डॉ अम्बेडकर को स्कूल मैं कहां बिठाया जाता था
उत्तर- क्लास के बहार
प्रश्न 11- डॉ अम्बेडकर को स्कूल मैं पानी कैसे पिलाया जाता था
उत्तर- ऊँची जाति का व्यक्ति ऊँचाई से पानी उनके हाथों परडालता था
प्रश्न12- बाबा साहब का विवाह कब और किस से हुआ
उत्तर- 1906 में रमाबाई से
प्रश्न 13- बाबा साहब ने मैट्रिक परीक्षा कब पास की
उत्तर- 1907 में
प्रश्न 14- डॉ अम्बेडकर के बंबई विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने से क्या हुवा
उत्तर- भारत में कॉलेज में प्रवेश लेने वाले पहले अस्पृश्य बन गये
प्रश्न 15- गायकवाड़ के महाराज ने डॉ अंबेडकर को पढ़ने कहां भेजा
उत्तर- कोलंबिया विश्व विद्यालय न्यूयॉर्क अमेरिका भेजा
प्रश्न 16- बैरिस्टर के अध्ययन के लिए बाबा साहब कहां और कब गए
उत्तर- 11 नवंबर 1917 लंदन में
प्रश्न 17- बड़ौदा के महाराजा ने डॉ आंबेडकर को अपने यहां किस पद पर रखा
उत्तर- सैन्य सचिव पद पर
प्रश्न 18- बाबा साहब ने सैन्य सचिव पद को क्यों छोड़ा
उत्तर- छुआ छात के कारण
प्रश्न 19- बड़ौदा रियासत में बाबा साहब कहां ठहरे थे
उत्तर- पारसी सराय में
प्रश्न 20- डॉ अंबेडकर ने क्या संकल्प लिया
उत्तर- जब तक इस अछूत समाज की कठिनाइयों को समाप्त ने कर दूं तब तक चैन से नहीं बैठूंगा
प्रश्न 21- डॉ अंबेडकर ने कौनसी पत्रिका निकाली
उत्तर- मूक नायक
प्रश्न 22- बाबासाहेब वकील कब बने
उत्तर- 1923 में
प्रश्न 23- डॉ अंबेडकर ने वकालत कहां शुरु की
उत्तर- मुंबई के हाई कोर्ट से
प्रश्न 24- अंबेडकर ने अपने अनुयायियों को क्या संदेश दिया
उत्तर- शिक्षित बनो संघर्ष करो संगठित रहो
प्रश्न 25- बाबा साहब ने बहिष्कृत भारत का प्रकाशन कब आरंभकिया
उत्तर- 3 अप्रैल 1927
प्रश्न 26- बाबासाहेब लॉ कॉलेज के प्रोफ़ेसर कब बने
उत्तर- 1928 में
प्रश्न 27- बाबासाहेब मुंबई में साइमन कमीशन के सदस्य कब बने
उत्तर- 1928 में
प्रश्न 28- बाबा साहेब द्वारा विधानसभा में माहर वेतन बिल पेश कब हुआ
उत्तर- 14 मार्च 1929
प्रश्न 29- काला राम मंदिर मैं अछुतो के प्रवेश के लिए आंदोलन कब किया
उत्तर- 03 मार्च 1930
प्रश्न 30- पूना पैक्ट किस किस के बीच हुआ
उत्तर- डॉ आंबेडकर और महात्मा गांधी
प्रश्न 31- महात्मा गांधी के जीवन की भीख मांगने बाबा साहब के पास कौनआया
उत्तर- कस्तूरबा गांधी
प्रश्न 32- डॉ अम्बेडकर को गोल मेज कॉन्फ्रंस का निमंत्रण कब मिला
उत्तर- 6 अगस्त 1930
प्रश्न 33- डॉ अम्बेडकर ने पूना समझौता कब किया
उत्तर- 1932
प्रश्न 34- अम्बेडकर को सरकारी लॉ कॉलेज का प्रधानचार्य नियुक्त कियागया
उत्तर- 13 अक्टूबर 1935 को,
प्रश्न 35- मुझे पढे लिखे लोगोँ ने धोखा दिया ये शब्द बाबा साहेब ने कहां कहे थे उत्तर- आगरा मे 18 मार्च 1956
प्रश्न 36- बाबा साहेब के पि. ए. कोन थे
उत्तर- नानकचंद रत्तु
प्रश्न 37- बाबा साहेब ने अपने अनुयाइयों से क्या कहा था
उत्तर- इस करवा को मै बड़ी मुस्किल से यहाँ तक लाया हु !
इसे आगे नहीं ले जा सकते तो पीछे मत जाने देना
प्रश्न 38- देश के पहले कानून मंत्री कौन थे
उत्तर- डॉ अम्बेडकर
प्रश्न 39- स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना किस ने की
उत्तर- डॉ अम्बेडकर
प्रश्न 40- डॉ अंबेडकर ने भारतीय संविधान कितने समय में लिखा
उत्तर- 2 साल 11 महीने 18 दिन
प्रश्न 41- डा बी.आर. अम्बेडकर ने बौद्ध धर्मं कब और कहा अपनाया
उत्तर- 14 अक्टूबर 1956, दीक्षा भूमि, नागपुर
प्रश्न 42- डा बी.आर. अम्बेडकर ने बौद्ध धर्मं कितने लोगों के साथ अपनाया
उत्तर- लगभग 10 लाख
प्रश्न 43- राजा बनने के लिए रानी के पेट की जरूरत नहीं,
तुम्हारे वोट की जरूरत है ये शब्द किस के है
उत्तर- डा बी.आर. अम्बेडकर
प्रश्न 44- डा बी.आर. अम्बेडकर के दुवारा लिखित महान पुस्तक का क्या नाम है
उत्तर- दी बुद्ध एंड हिज धम्मा
प्रश्न 45- बाबा साहेब को किस पुरस्कार से सम्मानित किया गया
उत्तर- भारत रत्‍न (1990)
प्रश्न 46- बाबा साहेब ने किस राजनैतिक पार्टी का गठन किया
उत्तर- रिपब्लिकन पार्टी
प्रश्न 47- बाबा साहब ने कितनी प्रतिज्ञाएं की
उत्तर- 22
प्रश्न 48- संविधान निर्माता किसे माना जाता है
उत्तर- डॉ भीमराव अंबेडकर
प्रश्न 49- डॉ आंबेडकर ने कौन कौन सी डिग्री हासिल की
उत्तर- एम. ए , पी.एच.डी.,(कोलम्बिया ) डी.एस.सी.,(लंदन) एल. एल. डी., (कोलम्बिया)
डी.लिट.(उस्मानिया ) बार. अंट. ला.(लंदन)
प्रश्न 50- बाबा साहब ने किस राजनैतिक पार्टी का गठन किया
उत्तर- रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया
प्रश्न 51- बाबा साहेब का महा परीनिर्वाण कब हुआ
उत्तर- 6 दिसंबर 1956
प्रश्न 52 डा बी.आर. अम्बेडकर ने अंतिम सांस कहा ली
उत्तर- 26,अलीपुर रोड दिल्ली
आप से निवेदन है की यदि कोई गलती है तो उसे सही करे या बताये
बात उस वक़्त की है जब बाबासाहब अपनी अंतिम पुस्तक "बुद्ध और उनका धम्म" लिख रहे थे। उस वक़्तवो बंगला न. 26, अलीपुर रोड, दिल्ली में रहते थे। एक शाम खाना खाने के बाद लगभग 8 बजे के आसपास वो अपने अध्धयन कक्ष में गए
और लिखना शुरू कर दिया। उनके निजी सहयोगी 'नानकचन्द रत्तू ' जरूरी काम निबटा कर उनकी कुर्सी के पास खड़े हो गए और उनके आदेश
की प्रतीक्षा करने लगे। कुछ देर बाद बाबा साहब ने हल्की सी नज़रें ऊपर उठाई और रत्तू जी से कहा कि तुम जाकर सो जाओ, सुबह आ जाना।
अपने साहब का आदेश पाकर वो चले गए। रोज़ाना की तरह सुबह लगभग 8 बजे ही रत्तू बाबासाहब के पास पहुँचे।
उन्होंने देखा कि जिस अवस्था मे वो बाबा साहब को छोड़कर गए थे ठीक उसी अवस्था में बाबा साहब अपनी कुर्सी पर बैठकर लिख रहे थे।
उन्हें लिखते लिखते लगभग 12 घण्टे हो चुके थे। रत्तू जी चुपचाप उनकी कुर्सी के बराबर में खड़े हो गए।
उन्हें खड़े हुए बहुत देर ही गयी लेकिन बाबा साहब ने ऊपर नज़र उठाकर ही नही देखा। वो अपने लेखन में इतने व्यस्त थे कि उन्हें किसी बात का होश
नही था।
किसी साधक की साधना को भंग करना हर किसी के बस की बात नही होती। वो बाबा साहब की साधना ही थी। रत्तू जी, बाबा साहब का ध्यान अपनी तरफ लाने के लिए मेज पर रखी कुछ किताबो को उठाकर ठीक ढंग से रखने लगे।
तब बाबासाहब ने हल्की सी नज़र उठाई और रत्तू जी से कहा - रत्तू तुम अभी गए नही। रत्तू जी उनके पैरोँ के पास बैठ गए और आँखों में आंसू भरकर कहने लगे - बाबासाहब सुबह के 8:30 बज चुके है। आपको 12 घण्टे हो चुके है। आखिर आप इतनी महनत क्यों कर रहे हो? बाबासाहब ने कहा - रत्तू, मेरा समाज अभी बहुत पीछे है। मेरे लोग अभी दिशाहीन है। मेरे मरने के बाद मेरी ये किताबे ही तो उनको राह
दिखाएंगी। अब मै पूरे देश में, हर घर में तो नही जा सकता लेकिन मेरा साहित्य जरूर जायेगा। लोग मेरे
विचारो को समझ पाएंगे। मेरे सिद्धांत, विचार, दर्शन और आदर्श मेरी किताबो में ही मिलेंगे। इसलिए मै
इतनी मेहनत कर रहा हूँ।
( नानकचन्द रत्तू जी द्वारा लिखित पुस्तक - डॉ. अम्बेडकर, कुछ अनछुए पहलू से)

Wednesday, July 29, 2015

The Science Movement in India- A note

The Science Movement in India- A note
K.N.Ganesh, KSSP,
The All India People’s Science Network, the premier science movement in India is completing twenty five years of its existence. We have several creditable achievements during this period, including initiating the Total Literacy Campaign, pursuing post-literacy work through the BGVS, conducting science communication campaigns through the Kalajathas and popular classes,   intervening in several key issues related to science and development and so on. The network emerged as a platform for progressive scientists and science workers of left and democratic persuasion, and drew its inspiration from the experience of a number of science organizations, including Kerala Shastra Sahitya Parishad and Delhi Science Forum.
Since its inception major changes have taken place in the practice of science and the definitions of the interface between science and society in India.  Making use of the setbacks to socialism as a result of the fall of the USSR, the Imperialism managed to wrench itself free from its own crisis, and appeared to provide itself an air of invincibility through slogans of globalization, liberalization as well as structural adjustment programmes. Despite having its own quota of bubbles and crises and finally plunging into a prolonged recession, the myth of globalization of the supremacy of the market has still remained dominant, at least in India.  This has resulted in a series of significant changes of importance to the functioning of the science of the movement. First, welfarism and support to public sector institutions have given way to open support to indigenous and foreign capital, brought in by strategies of infrastructural development, PPP,  liberalization of all public sector enterprises and banks, and FDI in all spheres; second, promotion of transfer of technology and expertise by the MNCs  resulting in the development of crony capitalism, and systematic downsizing and even destruction of indigenous efforts to develop science and technology; third, linking science and technology entirely to the capital a as an accessory to capital accumulation, thereby eliminating  their social functions of alleviation of poverty, degradation and exploitation; fourth, promoting the growth of techno-fetishism that separates technology from  its scientific basis and provides it with a mystique primarily related to its role in capital accumulation and thereby the  enrichment of a section of population and the destitution of the majority; fifth, a clear down grading of the principles of scientific temper, once accepted as state policy and the growth of an atmosphere of permissiveness that allows for the growth of every form of obscurantism, chauvinism and religious fundamentalism, sixth, the resulting growth of obscurantist, antiscience movements and sensibilities that easily accommodate themselves into the ideological framework of the neo-liberal capital. Finally, the logic of capital itself succeeds in destroying the secular, democratic foundations attempted to be built in Independent India, replacing them with the concepts of identity and community, often paraded as’ plurality’.
In order to confront these multiple challenges in the present context the AIPSN and the PSM in general will have to incorporate the following features.
1. Science popularization will continue to be central to the PSM.  However, there appears to be a need to change its emphasis. Presently, all the science popularization campaigns have concentrated on the popularization of the basic scientific concepts and our positions on various issues such as education, health,  technology, energy, environment and so on, which have either supplemented the official  science education , or taken over some aspects of the State Programmes themselves, such as the BGVS. Efforts to put the scientific concepts into practice, that is, the develop People’s Science as common sense have been comparatively less. There is a need to instill conviction among the people that most of their productive activity in agriculture, craft or Industry in fact has a scientific basis, and it is science that has made possible the sustenance of their daily lives. This would include encouragement of the people’s efforts to develop new concepts and technologies to improve their productive output and their living conditions, by using and incorporating existing scientific results. The use of smokeless Chulhas to save energy, use of solid waste management techniques, methods rainwater conservation and purification are examples. Apart from this, there are innumerable techniques and methods used by people themselves as a part of their livelihood, and many of them could be developed as durable devices through scientific input. This means that science population campaigns should be combined with longer programmes that would involve the practice of science. At present organizations like KSSP are only using practical work to demonstrate science at the school level, but the possibility of conducting people’s workshops in specific areas should be explored.
2. Fight against religious obscurantism will have to continue. Often such campaigns are conducted in a rationalist vein, which crate to create impact among the people. Also, the term obscurantism is itself a sort of misnomer, as identity politics has replaced obscurantism and masquerades itself as being ‘scientific’. Identity politics has little quarrel with science, particularly its present technological form, and it tries to bring about a healthy correlation between belief and science, by claiming scriptural authority for all the valid concepts of science. Identity politics is doubly dangerous not only because it claims itself as an autonomous knowledge system, but also it claims that the people following their knowledge system are different from others, thereby undermining secularism, egalitarianism and democracy. Thus the spread of identity politics means the destruction of science as common sense.  Fight against identity politics does not take place by fight against the belief system as such, but through the demonstrating that such a belief system itself is historically contingent and is subject to change and transformation and also by demonstrating the superiority of science as the source of valid knowledge, and its open, ecumenical character.  Such a campaign also will have to stress the secular, democratic conceptions that guide scientific discoveries and their role in the development of a just and egalitarian society. In this respect, there is a need to expose the irrational and unscientific concepts that govern caste divisions, as well as the unscientific, outmoded practices that control sexual relations, family and domesticity
3. In this context, the most important issue that has to be addressed is that of environment. Unfortunately, the entire debate in the science movement has been plagued by the duality of environment and development, stressing the antinomy of environmental and developmental concerns. It should be realized that this antinomy itself is the consequence of the bourgeois mode of development, which sustains by plundering natural resources and nature itself, and forcibly separating people from their means of livelihood. Instead, it is necessary to stress the dialectical unity of human beings with natural resources and energy in forms of labour and production process in general. Thus, conservation and development of natural resources is an essential ingredient in the development of productive forces. As against the short-term, predatory methods used by capital in their accumulation process that destruction of environment and destitution of vast masses of population, we have to stress the long- term strategies that ensure human development and sustenance of natural resources(One has to remember the remark the remark in the Critique of the Gotha programme that both human labour and nature are sources of wealth). Thus environmental issues will have to acquire central position in the PSM.
4. Here the links between scientific knowledge and development will have to be considered. The present bourgeois strategy is to transform scientific knowledge into an instrumental input into the process of capital accumulation. This is shown by the present day propaganda regarding a ‘knowledge society’, which is nothing but a metaphor for the spread of information technologies and network devices that have become convenient instruments in the capital accumulation process. This knowledge society also results in furthering the fragmentation of forms of labour, by separating one form of technical labour using mental, software devices, from other forms of technical labour. The same process can be seen in the spread of communication technologies also , where all forms of art, communication and even information on national and world affairs are filtered through  corporate controlled media giants, which results in the society featured by the ‘manufacture of consent’ to neoliberal Imperialism. Also, it results in the concept of knowledge as property to be owned by capital through patents, copyrights, PBRs etc, that prevent the democratic production and dissemination of knowledge This is not to criticize the technologies as such , but there is a need to turn the utilization of such technologies upside down , enabling them to serve the interests of dissemination of knowledge and information to the people for social transformation, that is, to advance their consciousness and develop their productive capabilities as well as finding new ways for their creative expression. Thus the organized knowledge of the corporate capital including the concept of knowledge as property will have to be contested by democratic forms of dissemination and utilization of knowledge, which will have to be the task of the PSM as well.
5. The rhetoric of ‘knowledge society’ has had significant impact on education.  While PSM has done excellent work in the field of literacy, post-literacy campaigns and have also contributed to the Right to Education legislation, it has been unable to formulate a meaningful position regarding neoliberal reforms being introduced to the system of education as a whole. It has now become clear that the present reforms are not only aimed at the commodification of educational institutions, but also forcing the educational process to serve the short-term needs of capital accumulation, thereby giving up the larger goals set by the educators during the years after Independence. This process of subjecting the entire education process in the country to needs of capital will have disastrous consequences not only for the education system, but to the knowledge dissemination process among the people. In the conditions of identity politics and caste and gender disparities already sweeping the country, this will only result in the consolidation of outmoded, revivalist and irrational knowledge forms and practices among the common people. Educated people will themselves form a population servile to capital with no inkling of scientific temper and the democratic, ecumenical character of science. PSM will have to work towards conceptions of a new scientific and democratic education system, where we treat education , including higher education as a composite whole, and not in fragments, as is done today, and as the bourgeoisie would expect us to do.
6. We initially made some advance in the work on health, through Jan Swasthya abhiyan and attempt to formulate the national health policy.  However, our perspective on health seems restricted to doctors, drugs and the intervention in various Government programmes. While all these are significant, there appears to be a case for viewing health in larger context, as the systematic destruction of generic capabilities of the laboring population through industrial and environmental pollution, solid and toxic wastes, malnutrition and abdominal living conditions, lethal microbes carried by migrating populations, destruction of facilities for clean food, air and water and internal degradation of the body through alcohol, narcotics and irrational sex practices.  Women’s health here acquires considerable importance as they have also to bear task of reproduction and postnatal care, besides being of secondary status with regard to utilization and consumption of resources within the household. Thus the health movement will have to be linked to the larger concerns of the science movement, and has a significant role to play in the practice of science as common sense, as that is the area where both scientific and unscientific practices have contested throughout history.
7. There is considerable interest in gender issues throughout India, particularly due to some recent incidents and that concern is reflected in the PSM also. We made a breakthrough in the work among women in the course of the literacy campaign, but the momentum has not been sustained.  There is also lack of clarity in the place of gender issues in the science movement and as a result, the positions of the activists have swung between materialist, feminist and bourgeois liberal perspectives.  The possibilities for gender activism within the science movement appear to be twofold, one woman as part of the entire society as a worker, producer and hence part of the oppressed or oppressing classes; and second, woman as a gender, whose roles of reproduction and post-natal care imposes on her several restrictions and taboos by the society. Unscientific and irrational concepts pervade both the roles of women, and   are cleverly used by the capital to render women as agency for reproduction, domestic labour and as playthings. Hence, there is need to disseminate the scientific perspective regarding sexuality, health, reproduction and postnatal care, domesticity and the social role of women and to fight against the   influence of both identity politics and the corporate ideology regarding women.
8. The tasks outlined above bring us to the crucial question of the role of the PSM in the production and dissemination of science and technology. At present, several PSMs have their technological centres, some of them do good work in the development and dissemination of people friendly technologies. There is, again, lack of clarity on the objectives and functions of technology dissemination. Some of the technologies, like smokeless Chulah are directed towards sustainable strategies of resource use, whereas others, like the homemade soap and detergent, are aimed at alternate production strategies.  The contribution of the PSM towards research and development should not be to replicate, in a people’s friendly fashion, whatever that are already being undertaken by Government and private agencies, butto facilitate the initiatives by people themselves to develop sustainable alternatives by providing them with adequate science and technology input. The technologies developed and research undertaken by PSM should be directed towards developing long term strategies of human development and resource use, which can be disseminated to develop new forms of production based on science in practice that can alleviate the present miserable conditions of the people and provide them with the necessary science and technology input that they can continue to develop and transform their lives.  The R&D outfits of the PSM have to work together and evolve a work strategy.
9.  There also some confusion regarding the organization and the tasks to be addressed by the PSM. There appears to two differing viewpoints. One is that PSM is the agency to [provide scientific perspectives on all the social issues and campaign on them, and other is that PSM should eschew the element of popular campaign and act as an advisory, consultative agency that undertakes research and dissemination of scientific knowledge. In effect, PSM undertakes popular campaigns and also acts as advisory body. However, there should be clarity regarding this dual role of the PSM both within PSM as well as the democratic movements and population to whom scientific ideas are disseminated.  All PSMs should undertake the fight against identity politics and unscientific, irrational and revivalist ideas prevailing on society, economy and gender, as well as neoliberal ideology and practice that perpetrate destitution, ignorance and misery among the people in all the spheres of activity outlined above. Fight against destructive policies in environment, education and health should assume priority. This is the sphere of activity that PSM should undertake along other fraternal democratic movements. At the same time, PSM should undertake study, research, and dissemination of forms of long term strategies of human development and sustainable use of natural resources that can be used as the basis for alternative development plans to be formulated the progressive and democratic movements all over the country.   Since science is open ended and ecumenical, directed towards the growth of long term strategies, scientific investigations and dissemination cannot be limited by tactical considerations and hence should proceed without restrictions.  Popular campaigns should be based on a broad consensus and unity of action among all concerned that would ensure mobilization of all sections of the people and also ensure maximum spread of science as practice and common s

इस्लाम के नाम पर

Posted: 26 Jul 2015 05:48 AM PDT


इस्लाम के नाम पर
पिछले कई सालों में विश्व ने इस्लाम के नाम पर हिंसा और आतंकवाद की असंख्य अमानवीय घटनाएं झेली हैं। इनमें से कई तो इतनी क्रूरतापूर्ण और पागलपन से भरी थीं कि उन्हें न तो भुलाया जा सकता है और ना ही माफ किया जा सकता है। इनमें शामिल हैं ओसामा.बिन.लादेन द्वारा औचित्यपूर्ण ठहराए गए 9/11 के हमले में 3,000 निर्दोष व्यक्तियों की मृत्यु, पेशावर में स्कूली बच्चों पर हमला, बोकोहरम द्वारा स्कूली छात्राओं का अपहरणए चार्ली हेब्दो पर हमला व आईसिस द्वारा की गई घिनौनी हत्याएं। ये सभी घोर निंदा की पात्र हैं और सारे सभ्य समाज को शर्म से सिर झुकाने पर मजबूर करती हैं।
9/11 के बाद से एक नया शब्द समूह गढ़ा गया 'इस्लामिक आतंकवाद'। यह इस्लाम को सीधे आतंकवाद से जोड़ता है। यह सही है कि इस्लामवादी आतंक एक लंबे समय से जारी है और कैंसर की तरह पूरी दुनिया में फैल रहा है। इस्लाम के नाम पर लगातार हो रही हिंसक व आतंकी घटनाओं के चलते ऐसा प्रतीत होता है कि इनका संबंध इस्लाम से है। यही बात अमरीकी मीडिया लंबे समय से प्रचारित करता आ रहा है और धीरे.धीरे अन्य देशों के मीडिया ने भी यही राग अलापना शुरू कर दिया है। एक बड़ा साधारण.सा प्रश्न यह है कि अगर इन घटनाओं का संबंध इस्लाम से है, तो ये मुख्यतः तेल उत्पादक देशों में ही क्यों हो रही हैं?
समाज के व्याप्त भ्रम को और बढ़ाते हुएए कई लेखकों ने यह तर्क दिया है कि इस्लाम में सुधार से यह समस्या हल हो जायेगी। कुछ का कहना है कि इस्लाम को अतिवादी प्रवृत्तियों से मुक्ति दिलाने के लिए 'धार्मिक क्रांति' की आवश्यकता है। यह कहा जा रहा है कि इस्लाम पर उन कट्टरपंथी तत्वों का वर्चस्व स्थापित हो गया है जो हिंसा और आतंक में विश्वास रखते हैं। इसलिए इस्लाम में सुधार से हिंसा समाप्त हो जाएगी। सवाल यह है कि कट्टरपंथियों के पीछे वह कौनसी ताकत है, जिसके भरोसे वे इस्लाम की एक शांतिपूर्ण धर्म के रूप में व्याख्या को खारिज कर रहे हैं। क्या वह ताकत इस्लाम है? या इस्लाम का मुखौटा पहने कोई और राजनीति यह मानने में किसी को कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि इन दिनों दुनियाभर में इस्लाम के नाम पर जिस तरह की हिंसा हो रही हैए वह मानवता के इतिहास का एक कलंकपूर्ण अध्याय है और इसकी न केवल निंदा की जानी चाहिए वरन् इसे जड़ से उखाड़ने के प्रयास भी होने चाहिए।
इस्लामवादी आतंकी, मानवता के शत्रु बने हुए हैं। परंतु आवश्यकता इस बात की है कि हम इस पूरे मुद्दे को गहराई से समझने की कोशिश करें और केवल ऊपरी तौर पर जो नजर आ रहा है, उसके आधार पर अपनी राय न बनायें। हम यह समझने का प्रयास करें कि इसके पीछे कौनसी शक्तियां हैं। हमें इस बात पर भी विचार करने की आवश्यकता है कि क्या केवल सैंद्धान्तिक सुधार से 'तेल की राजनीति' से मुकाबला किया जा सकेगा.उस राजनीति सेए जिसे चोरीछुपे कुछ निहित स्वार्थ समर्थन दे रहें हैं क्योंकि वे किसी भी तरह अपने लक्ष्यों को हासिल करना चाहते हैं। जरूरत इस बात की है कि हम उस राजनीति को पहचानें और बेनकाब करेंए जिसने इस्लाम के नाम पर इस तरह की हिंसक प्रवत्तियों को जन्म दिया है।
मौलाना वहीदुद्दीन खान, असगर अली इंजीनियर और अन्यों ने उस दौर में इस्लाम का मानवतावादी चेहरा दुनिया के सामने रखा जब आतंकवाद, दुनिया के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में फैल रहा था और अत्यंत क्रूरतापूर्ण व कुत्सित आतंकी कार्यवाहियां अंजाम दी जा रही थीं। इस्लाम की मानवतावादी व्याख्याएं आखिर मुख्यधारा में क्यों नहीं आ पा रही हैं? क्या कारण है कि कट्टरपंथी तत्वए इस्लाम के अपने संस्करण का इस्तेमाल, हिंसा और अमानवीय कार्य करने के लिए कर रहे हैं और इस्लाम के उदारवादी.मानवतावादी संस्करण हाशिए पर खिसका दिए गए हैं? ऐसा नहीं है कि कुरान की अलग.अलग व्याख्याएं नहीं की जा रही हैं,ऐसा भी नहीं है कि तर्कवादी आंदोलन हैं ही नहीं। परंतु दुनिया के तेल के भंडारों पर कब्जा करने की राजनीति ने आतंकवादियों का उत्पादन करने वाली फैक्ट्रियां स्थापित कर दी हैं और उदारवादियों व मानवतावादियों की आवाज़ पूरी तरह से दबा दी गई है। आर्थिक.राजनैतिक कारकों के चलते, इस्लाम का मानवतावादी संस्करण कमजोर पड़ गया है।
वर्चस्वशाली राजनैतिक ताकतें, धर्म की उस व्याख्या को चुनती और बढ़ावा देती हैं जो उनके राजनैतिक.आर्थिक एजेंडे के अनुरूप होती हैं। कुरान की आयतों को संदर्भ से हटाकर उद्धृत किया जाता है और हम इस्लाम के मुखौटे के पीछे छुपे राजनीतिक उद्देश्यों को देख नहीं पाते। कुछ मुसलमान चाहें जो कहें परंतु सच यह है कि आतंकवाद और हिंसा,इस्लाम की समस्या नहीं है। समस्या है सत्ता और धन पाने के लिए इस्लाम का उपयोग किया जाना। हमें कट्टरवाद.आतंकवाद, जिसे इस्लाम के नाम पर औचित्यपूर्ण ठहराया जा रहा है, के उदय और उसके मजबूत होते जाने के पीछे के कारणों को समझना होगा। क्या कारण है कि जहां 'काफिरों को मार डाला जाना चाहिए' की चर्चा चारों ओर है वहीं'सभी मनुष्य एक दूसरे के भाई हैं' और 'इस्लाम का अर्थ शांति है' जैसी इस्लाम की शिक्षाओं को कोई महत्व ही नहीं मिल रहा है।
आतंकवाद की जड़ें पश्चिम एशिया के तेल भंडारों पर कब्जा करने की राजनीति में हैं। अमरीका ने अलकायदा को समर्थन और बढ़ावा दिया। पाकिस्तान में ऐसे मदरसे स्थापित हुए, जिनमें इस्लाम के वहाबी संस्करण का इस्तेमाल 'जिहादियों' की फौज तैयार करने के लिए किया गया ताकि अफगानिस्तान पर काबिज़ रूसी सेना से मुकाबला किया जा सके। अमरीका ने अलकायदा को 800 करोड़ डॉलर और 7,000 टन हथियार उपलब्ध करवाए,जिनमें स्टिंगर मिसाइलें शामिल थीं। व्हाईट हाउस में हुई एक प्रेस कान्फ्रेंस में अलकायदा के जन्मदाताओं को अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रेगन ने अमरीका के संस्थापकों के समकक्ष बताया। ईरान में प्रजातांत्रिक ढंग से निर्वाचित मोसाडेग सरकार को 1953 में उखाड़ फेंका गया। उसके साथ ही वह घटनाक्रम शुरू हुआ, जिसके चलते इस्लाम की हिंसक व्याख्याओं का बोलबाला बढ़ता गया और उसके उदारवादी.मानवतावादी चेहरे को भुला दिया गया। मौलाना रूमी ने 'शांति और प्रेम को इस्लाम के सूफी संस्करण का केंद्रीय तत्व निरूपित किया था।' फिर क्या हुआ कि आज वहाबी संस्करण दुनिया पर छाया हुआ है। इस्लाम का सलाफी संस्करण लगभग दो सदियों पहले अस्तित्व में आया था परंतु क्या कारण है कि उसे मदरसों में इस्तेमाल के लिए केवल कुछ दशकों पहले चुना गया। अकारण हिंसा और लोगों की जान लेने में लिप्त तत्वों ने जानते बूझते इस्लाम के इस संस्करण का इस्तेमाल किया ताकि उनके राजनीतिक लक्ष्य हासिल हो सकें।
इतिहास गवाह है कि धर्मों का इस्तेमाल हमेशा से सत्ता हासिल करने के लिए होता आया है। राजा और बादशाह क्रूसेड, जिहाद और धर्मयुद्ध के नाम पर अपने स्वार्थ सिद्ध करते आए हैं। भारत में अंग्रेजों के राज के दौरान अस्त होते जमींदारों व राजाओं ;दोनों हिंदू व मुस्लिम के वर्ग ने मिलकर सन 1888 में यूनाइटेड इंडिया पेट्रिआर्टिक एसोसिएशन का गठन किया और इसी संस्था से मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा उपजे। सांप्रदायिक शक्तियों ने घृणा फैलाई जिससे सांप्रदायिक हिंसा भड़की। यूनाइटेड इंडिया पेट्रिआर्टिक एसोसिएशन के संस्थापक थे ढाका के नवाब और काशी के राजा। फिर हम मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा जैसे सांप्रदायिक संगठनों के उभार के लिए हिंदू धर्म व इस्लाम को दोषी ठहरायें या उस राजनीति को, जिसके चलते अपने हितों की रक्षा के लिए इन राजाओं.जमींदारों ने इस्लाम व हिंदू धर्म का इस्तेमाल किया। इस समय हम दक्षिण एशिया में म्यान्मार और श्रीलंका में बौद्ध धर्म के नाम पर गठित हिंसक गुटों की कारगुजारियां देख रहे हैं।
अगर हम थोड़ा भी ध्यान से देखें तो हमें यह समझ में आएगा कि इस्लामवादी आतंकवाद मुख्यतः तेल उत्पादक क्षेत्र में उभरा है उन देशों.जैसे इंडोनेशिया.में नहीं जहां मुसलमानों की बड़ी आबादी है। आतंकवाद के बीज, तेल की भूखी महाशक्तियों ने बोये हैं न कि किसी धार्मिक नेता ने। मौलाना वहाबी की व्याख्याए जो सऊदी अरब के रेगिस्तानों में कहीं दबी पड़ी थी, को खोद निकाला गया और उसका इस्तेमाल वर्तमान माहौल बनाने के लिए किया गया। अगर हम आतंकवाद के पीछे की राजनीति को नहीं समझेंगे तो यह बहुत बड़ी भूल होगी। राजनीतिक ताकतें और निहित स्वार्थी तत्व,धर्म के उस संस्करण को चुनते हैं जो उनके हितों के अनुरूप हो। कुछ लोग लड़कियों के लिए स्कूल खोल रहे हैं और उनका कहना है कि वे ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि कुरान ज्ञान को बहुत महत्व देती है। दूसरी ओर, उसी कुरान और इस्लाम के नाम पर कुछ लोग स्कूल जाने वाली लड़कियों को गोली मार रहे हैं। आतंकवादी समूह तो धर्म के अपने संस्करण पर भी बहस नहीं करना चाहते और ना कर सकते हैं। उन्हें तो बस उन चंद जुमलों से मतलब है जो उनके दिमागों में ठूंस दिए गए हैं और जिनने उन्हें बंदूक और बम हाथ में लिए जानवर बना दिया है।
हिंदू धर्म के नाम पर गांधीजी ने अहिंसा को अपना प्रमुख आदर्श बनाया। उसी हिंदू धर्म के नाम पर गोडसे ने गांधीजी के सीने में गोलियां उतार दीं। इस सब में धर्म कहां है? वर्तमान में जो इस्लामवादी आतंकी दुनिया के लिए एक मुसीबत बने हुए हैं, उन्हें अमरीका द्वारा स्थापित मदरसों में प्रशिक्षण मिला है। ऐसी भी खबरें हैं कि आईसिस आतंकियों के पीछे भी अमरीका हो सकता है। साम्राज्यवादी काल में भी राजनीति पर अलग.अलग धर्मों के लेबिल लगे होते थे। साम्राज्यवादी ताकतें हमेशा सामंतों को जिंदा रखती थीं। अब चूंकि तेल उत्पादक क्षेत्रों के मुख्य रहवासी मुसलमान हैं इसलिए इस्लाम का उपयोग राजनैतिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए किया जा रहा है। यह विडंबना है कि मुसलमान अपनी ही संपदा.काले सोने.के शिकार बन रहे हैं।
 -राम पुनियानी
 

Sunday, July 26, 2015

पुस्तक संस्कृति विकसित करने की जरूरत है

पुस्तक संस्कृति  विकसित करने की जरूरत है
By कृष्ण कुमार | जुलाई 27, 2012
मैं एक ऐसी बात कहना चाहूँगा जो शायद आपको कुछ नागवार गुजरे। कोई भी इस बात से असहमत नहीं है कि स्कूलों में लाइब्रेरी होनी चाहिए और पढ़ने पर जोर होना चाहिए। बावजूद तमाम सहमति के स्कूलों में पुस्तकालय नहीं हैं या जो हैं भी वे ठीक से नहीं चल पा रहे हैं। पढ़ने की क्षमता का विकास करने वाली परिस्थितियाँ स्कूलों में क्या, शिक्षकों के प्रशिक्षण संस्थानों में भी नहीं हैं। और बहुत करके हमारे महाविद्यालयों में भी नहीं हैं तो शायद इसका एक कारण है कि आज हमारी शिक्षा व्यवस्था जिस भी स्थिति में है, इस शिक्षा व्यवस्था को दरअसल लाइब्रेरी की जरूरत नहीं है। और जिस चीज की जरूरत नहीं है अगर वह पैदा नहीं होती या पैदा की जाने पर भी अगर वह पल्लवित नहीं होती तो बहुत चकित और न ही बहुत निराश होना चाहिए। जिस चीज की जरूरत नहीं है वह अगर ठीक से काम नहीं कर रही है तो कौन सा आश्चर्य है। इस बात को कहते हुए मैं वास्तव में इस दृष्टिकोण से विचार करना चाहता हूँ कि क्या हमारी स्कूली व्यवस्था में लाइब्रेरी की आवश्यकता है?

मुदालियार आयोग, जो 1952-53 में स्थापित हुआ था, से लेकर कोठारी आयोग से गुजरते हुए राममूर्ति इत्यादि आयोगों से होते हुए और अभी जो राष्ट्रीय पाठयचर्चा की रूपरेखा यानी नैशनल करिकुलम फ्रेमवर्क-2005 बना है (और जो अब एक नीति बन चुकी है), वहाँ तक आएँगे तो आपको लगेगा कि भारत में आजादी के पहले से ही लगातार इस बात को लेकर सहमति रही है कि स्कूलों में लाइब्रेरी होनी चाहिए।

मुझे लगता है कि सबसे पहले इसकी पुरजोर वकालत मुदालियार आयोग ने शुरू में ही कर दी थी। अगर उसके भी पीछे जाएँ तो आजादी के बाद के पहले राधाकृष्णन आयोग ने भी विश्वविद्यालयी शिक्षा के सन्दर्भ में लाइब्रेरी के महत्व पर बहुत गहरा प्रकाश डाला था। तो हर दस्तावेज ने माना है कि लाइब्रेरी होनी चाहिए, ठीक से चलनी चाहिए। और जहाँ तक लाइब्रेरी चलाने के लिए विशेषज्ञों की जरूरत है या प्रशिक्षण की जरूरत है, उसके भी पर्याप्त साधन हमारे देश में विकसित हुए हैं।

हम देखते हैं कि बी.लिब., एम.लिब. कोर्सेज आजकल अनेक विश्वविद्यालयों में दिए जा रहे हैं। तो ऐसा नहीं है कि लाइब्रेरियन नाम का व्यक्ति बनाने की ओर ध्‍यान नहीं गया है। ये सब हुआ है और राष्ट्रीय और प्रान्तीय स्तर पर भी कुछ-कुछ प्रयास होता ही रहा है। राष्ट्रीय पुस्तकालय, कोलकाता एक राष्ट्रीय स्तर की संस्था है, सम्मानित है भले ही कई समस्याओं और दुविधाओं से ग्रस्त है लेकिन फिर भी इसका एक महत्‍व है। राजा राम मोहन राय नाम से एक न्यास यानी एक ट्रस्ट केन्द्र सरकार ने स्थापित किया था। यह देश भर में प्रान्तीय सरकारों और ग़ैर सरकारी संगठनों को पुस्तकालय चलाने के लिए अनुदान देने का भी काम कर रहा है और उसके अनुदान से कई पुस्तकें पहुँच भी रही हैं।

इस तरह से देखें तो ऐसा लगता है कि जहाँ तक दस्तावेजों और नीतियों का प्रश्न है, कोई भी इससे असहमत नहीं दिखता है कि लाइब्रेरी नहीं होनी चाहिए। फिर भी मैं यह बात आपसे कुछ जोर देकर और मजाक के तौर पर नहीं वास्तव में कहना चाहता हूँ कि हमारी व्यवस्था में दरअसल लाइब्रेरी की जरूरत नहीं है। इसका एक कारण है और मेरी इस बात का कारण दरअसल आपको मालूम है। अगर आप अपने इर्द-गिर्द बहुत अच्छे नम्बर पाने वाले लड़के-लड़कियों पर गौर करें जो कि दसवीं व बारहवीं की परीक्षा में ऊँचे अंक लेकर निकलते हैं तो आप पाएँगे कि उनकी इस उपलब्धि स्तर में पुस्तकालय का योगदान नाममात्र का या प्रतीक जैसा भी नहीं है।

अगर आप देखना चाहते हैं जमीन के स्तर पर, तो किसी आला से आला समझे जानेवाले स्कूल में पूरा दिन बिताइए। देखिए कि उस दिन का कितना हिस्सा अध्यापकों ने या बच्चों ने लाइब्रेरी में बिताया। अगर एक दिन से आपको बहुत सन्तुष्टि नहीं मिलती है और आप सोचते होंगे कि आज सोमवार हो सकता है या कोई विशिष्ट दिन, तो हम मंगलवार को चलते हैं। मेरा आपसे आग्रह है कि आप पूरा सप्ताह वहाँ बिताएँ। चाहे उदयपुर, जयपुर या दिल्ली में या ऐसी संस्था में जो अच्छी ख़ासी फीस लेती हो। अँग्रेजी माध्यम स्कूल हो, यह सब चीजें उसमें हों और आप पूरा सप्ताह वहाँ बिताएँ और देखें कि लाइब्रेरी का उपयोग कितने बच्चों ने किया? कितने अध्यापकों ने किया तो आप यह देखकर हैरान होंगे कि लाइब्रेरी का कोई विशेष इस्तेमाल पूरे सप्ताह में नहीं होता।

दरअसल अगर आप इस प्रश्न के थोड़ा और गहराई में जाएँगे तो आप पाएँगे कि ये कोई देखने लायक बात ही नहीं है। क्योंकि हमारी शिक्षा व्यवस्था में परीक्षा इतनी प्रमुख है कि उसके लिए शिक्षा के किसी भी मूल्य की बलि चढ़ाना, किसी भी मूल्य को एकदम छोड़ देना भी उपयोगी माना जाता है। मान लीजिए कि परीक्षा के विषय में आप जो पढ़ें ईमानदारी से पढ़ें, समझ कर पढ़ें और जितना आता है ईमानदारी से उतना बताएँ। अगर इन उसूलों पर कोई लड़का या लड़की चले तो वह शायद पास भी नहीं हो सकता। फर्स्ट क्लास या मेरिट लिस्ट में आना तो सम्भव ही नहीं होगा। बहुत ऊँचे अंक आप तभी लेकर आ सकते हैं परीक्षाओं में, जब आप उसूलों पर न चलें। यानी आप ज्यादा से ज्यादा ज्ञान रट लें, उसको समझने में ज्यादा ध्‍यान न दें। गणित हो चाहे विज्ञान हो, आप बार-बार अभ्यास करें। आप बगैर समझे हुए इतना अभ्यास करें कि प्रश्न क्या है, आप उसका उत्तर लिख सकें तो आप पाएँगे कि ऐसा करने पर आपके अंक बढ़ जाएँगे।

यही कारण है कि इस तरह की ट्रेंनिंग देनेवाली संस्थाएँ इतना पैसा हमारे शहरी माता-पिताओं से कमा रही हैं। इन संस्थाओं को कोचिंग इन्स्टीटयूट बोलते हैं। नैशनल करिकुलम फ्रेमवर्क में इनको “स्कूल आउट साइड द स्कूल” की संज्ञा दी गई है। वो स्कूल जहाँ बच्चे स्कूल के बाहर जाते हैं। वहाँ उनको ऐसी दक्षताएँ दी जाती हैं जिससे कि वो इम्तहानों में अच्छे अंक पा सकें। सिर्फ इम्तहानों में ही नहीं वो हमारे देश की सर्वोच्च माने जानेवाली आई.आई.टी. और मेडीकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए होनेवाली परीक्षाओं मे भी अच्छे से अच्छे अंक लेकर अपनी प्रतियोगी हैसियत बना सकें। उस पूरी प्रक्रिया के लिए कहीं इस तरह की चीज का कोई महत्‍व नहीं है कि कोई लाइब्रेरी का इस्तेमाल करनेवाला हो या कि लाइब्रेरी जाकर किताबों में मशगूल रहनेवाला हो, तरह-तरह की किताबें पढ़ता हो। ऐसा बच्चा आज आई.आई.टी. में प्रवेश नहीं पा सकता, किसी मेडीकल कॉलेज में नहीं आ सकता। मेरा तो अन्दाज है कि वो दिल्ली विश्वविद्यालय में या कि और विश्वविद्यालयों में भी नहीं आ सकता क्योंकि इन विश्वविद्यालयों में एक सघन प्रतियोगिता से आप गुजरते हैं, तभी आप पहुँच पाते हैं। यह प्रतियोगिता पूरी तरह परीक्षा पर आधारित है। और आज की परीक्षा व्यवस्था में इस बात की गुंजाइश नहीं है कि वह इस बात पर ध्‍यान दे कि किसी बच्चे को लाइब्रेरी के केटलॉग का इस्तेमाल करना आता है कि नहीं। क्या उसने बगैर किसी के कहे हुए वर्ष में आठ-दस किताबें खुद अपनी रुचि से पढ़ीं या कि उसमें किताबें पढ़ने की रुचि है भी कि नहीं।

यह मुद्दा सिर्फ परीक्षा व्यवस्था का ही है, ऐसा मत सोचिए। आप किसी नामीगिरामी स्कूल के रिपोर्ट कार्ड पर विचार करें। अब तो सरकारी स्कूलों में भी ऐसे कार्ड बनने लगे हैं जिनसे हर महीने हर युनिट टेस्ट के बाद माता-पिताओं को बताया जाता है कि क्या-क्या चीजें उनके बच्चे में ठीक से चल रही हैं। तो आप पाएँगे कि उसमें अलग-अलग विषयों के नम्बर लिखे होंगे। साथ में कुछ और विशेषताएँ भी लिखी होंगी कि उसका व्यवहार कैसा है, उसमें नेतृत्व की क्षमता है कि नहीं, दूसरों से सहयोग करता है कि नहीं। एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टीविटीज में उसकी रुचि है कि नहीं। इससे आशय होता है कि कला में रुचि है कि नहीं इत्यादि। लेकिन आपको किसी कार्ड पर ऐसा नहीं मिलेगा कि इस वर्ष उसने कितने उपन्यास पढ़े। क्या उसकी बाल साहित्य में रुचि है? क्या वह अपने आप कुछ किताबें ढूँढ़ता है? अच्छे से अच्छे स्कूल में आपको प्राइमरी या अपर प्राइमरी स्तर पर, सैकण्डरी स्तर पर कहीं ऐसा कोई उल्लेख रिपोर्ट कार्ड में नहीं मिलेगा। इसलिए अगर किसी बच्चे की पढ़ने में रुचि जागृत हो गई है और वह पढ़ता है, व ढूँढ़कर किताबें पढ़ता है तो इसका कोई प्रतिबिम्ब आपको उसकी प्रगति पुस्तिका में नहीं मिलेगा।

इस पूरे दृष्टान्त से मैं यह सिद्ध करना चाहता था कि अगर आज स्कूल में पुस्तकालयों की दशा अच्छी नहीं है तो हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में पुस्तकालय की जरूरत कैसे पैदा की जाए? क्योंकि आज वह जरूरत नहीं है।
इस सब में आप यह भी जोड़ लें कि जिस सांस्कृतिक स्थिति में स्कूल चल रहा है, उसमें भी दरअसल बच्चों के लिए पुस्तकें पढ़ना कोई बहुत अच्छी बात नहीं मानी जाती है। एक बड़ा भारी फर्क हमारी व्यवस्था करती है। हमारी संस्कृति भी करती है। एक वो जिन्हें पाठ्यपुस्तक कहा जाता है - पढ़ने लायक किताब। और दूसरी पुस्तकें, दीन-हीन पुस्तकें, जो पाठ्य नहीं हैं। पाठ्यपुस्तक क्यों पाठ्य है? क्योंकि परीक्षा उससे जुडी हुई है। अगर पाठ्यपुस्तक कोई बच्चा कायदे से पढ़ेगा तो परीक्षा में उसके अच्छे अंक लेकर आने की सम्भावना बढ़ जाएगी। श्रेष्ठ बालक तो वो माना जाता है जो न केवल पाठ्यपुस्तक पढ़ता है बल्कि सिर्फ पाठ्यपुस्तक पढ़ता है और अन्य पुस्तकों की ओर देखता भी नहीं है। अगर आप माता-पिताओं का सर्वेक्षण करें (ऐसे सर्वेक्षण सन् 50 के दशक से ही लगातार होते रहे हैं) तो ऐसा विचार आपको आम तौर पर सुनने को मिलेगा कि बच्‍चा अनाप-शनाप किताबें पढ़ता रहता है। जो पढ़ने लायक हैं उस पर ध्‍यान नहीं देता है।

सामान्य किताबों को लेकर, खासकर साहित्य को लेकर लड़के और लड़क़ियों दोनों के सन्दर्भ में एक संशय हमारी संस्कृति में बहुत समय से विद्यमान रहा है। यह संशय लड़कियों के सन्दर्भ में विशेष इस्तेमाल किया जाता है। लड़कों के सन्दर्भ में कुछ कम, लेकिन दोनों के ही सन्दर्भ में इस्तेमाल होता है। यह संशय कुछ-कुछ उन्हीं रूपों में प्रकट होता है जिस तरह वो सिनेमा के सन्दर्भ में प्रकट होता है। हम लोगों की पीढ़ी में तो कहा ही जाता था कि सिनेमा देखोगे तो बरबाद हो जाओगे। सिनेमा भाग-भागकर देखना हमारी पीढ़ी के लिए एकमात्र विकल्प था। उस पीढ़ी में भी किसी शिक्षाविद् ने इस पर विचार नहीं किया कि क्या कारण है कि मार-मार कर तो बच्चा स्कूल जाता है लेकिन भाग-भाग कर सिनेमा जाता है? ऐसा क्या आकर्षण है सिनेमा में जो स्कूल में नहीं है? वह जीवन का कौन सा पक्ष है, जीवन के कौन से आयाम हैं जिनको स्कूल नहीं खोल पा रहा है? कुछ-कुछ यही हिस्सा साहित्य पर लागू होता है।

अनेक जीवनियों में आप ऐसे किस्से पढ़ेंगे कि जिन लोगों को साहित्य पढ़ने की इच्छा थी बचपन में उन्होंने भी में पाठ्यपुस्तक छिपाकर उपन्यास पढ़ा। ख़ासकर उपन्यास की विधा तो हमारी संस्कृति में बहुत समय से जब से इसका जन्म हुआ तभी से बदनाम रही है। क्योंकि उपन्यास को एक तो पढ़ने में समय लगता है और उसमें जीवन की कथा होती है। और बड़ों और बच्चों के बीच हमारे समाज में आधुनिक समय में रिश्ता ही कुछ ऐसा बना है कि बड़े यह नहीं चाहते हैं बच्चों को बचपन में ही जीवन के बारे में मालूम चल जाए। बहुत से प्रश्नों के उत्तर में बच्चों से बड़े कह भी देते हैं कि जब बड़े हो जाओगे तब सब समझ जाओगे। अभी तो नकाब पहनकर सिर्फ पढ़ाई करो।

कुछ बच्चों में येन-केन प्रकारेण किसी प्रकार रुचि हो भी जाती है बावजूद इसके कि हर व्यक्ति इस रुचि को तोड़ने की कोशिश करता है, हतोत्साहित करता है। पढ़ने की किताबों से वंचित रखने का प्रबन्ध हमारी संस्कृति - घरेलू भी, सामाजिक भी और स्कूल की संस्कृति भी - करती है, जिससे वह साहित्य की ओर कहीं प्रवृत्त न हो जाए। कविता भी कुछ इस तरह से काफी समय तक बदनाम रही है। कई बार मुझे लगता है कि आजकल जो हमारे समय में हिन्दी में कविता लिखी जाती है, जिसको आधुनिक कविता कहते हैं, वैसे ही लोकप्रिय नहीं है। उसके जन्म का संस्कार भी ऐसे ही पड़ा होगा कि अब यह कविता ऐसे लोगों को आकर्षित नहीं करेगी, तो कम से कम बदनाम तो नहीं होगी वरना पहले के समय में कविता के बारे में भी यही भावना थी कि इसमें जज्बात होते हैं, भावनाएँ होती हैं। कम से कम लड़कियों के लिए तो जज्बात उपयोगी नहीं माने जाते हैं। आजादी के आन्दोलन में ही यह बात विकसित होने लगी थी जब लगता था कि एक देशप्रेमी बनने के लिए जिस तरह का पौरुष जरूरी है साहित्य उस तरह के पौरुष को हटाएगा।

इस पूरे माहौल का कुछ-कुछ एहसास मुझको पहली बार अपनी एक ऐसी यात्रा में हुआ जिसमें एक बहुत ही अनोखी बात देखी। कुछ वर्ष पहले जब बर्लिन विश्वविद्यालय में एक दिन रहकर एक बहुत बड़ा आँगन देखने का मौका मिला। बहुत ही बड़ा आँगन! उस विशाल आँगन के बारे में हमें बताया गया था कि इस आँगन में 1930 के दशक के मध्‍य में बहुत बड़ी तादाद में विश्व साहित्य को जलाया गया था। इसको बुक बर्लिन ब्लास्ट के रूप में जाना जाता है। इसकी स्मृति में वहाँ बहुत खूबसूरत स्मारक बर्लिन विश्वविद्यालय ने बनवाया। हर वर्ष जिस दिन यहाँ किताबें बड़ी मात्रा में जलाई गई थीं, उस दिन बर्लिन विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों की ओर से एक बहुत बड़ा आयोजन होता है। उस मैदान को किताबों से भर दिया जाता है और उस मैदान पर उन हजारों लेखकों व कवियों के नाम भी लिखे जाते हैं जिनकी पुस्तकें वहाँ जलाई गई थीं। संयोग से मैं उस दिन वहाँ था जिस दिन यह आयोजन होना था। उन नामों से गुजरते हुए निगाहें एक नाम पर पड़ीं - टैगोर की ‘गीतांजलि’ पर। ‘गीतांजलि’ को भी वहाँ जलाया गया था।

मेरे एक मित्र जो कि वहाँ प्रोफेसर हैं, मैंने उनसे पूछा कि ये किताबें किस आधार पर चुनी गई थीं? उनकी संख्या दसियों हजार की तादाद में थी। तो उन्होंने बताया कि ये हिटलर के उत्कर्ष का युग था। नाजीवाद में मान्यता थी कि जो भी साहित्य मनुष्य की भावनाओं को जगाता है या भावनात्मक रूप से उसको गहराई देता है वो साहित्य जर्मनी को सबल नहीं बना सकता। अगर जर्मनी को एक मजबूत देश बनना है, एक पुरुषार्थी देश बनना है जो कि दुनियाभर पर हमला करके उसे जीत ले, तो ऐसा देश बनने के लिए ऐसे कमजोर लोगों से काम नहीं चल सकता है जिनकी भावनाएँ रह-रहकर  उमड़ती हों, इसलिए ऐसे सभी लेखकों को चुना गया था। ऐसे सभी कवियों को चुना गया था जो मनुष्य की भावनाओं को अभिव्यक्त करते हैं। भारत से यह गौरव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की मशहूर कृति ‘गीतांजलि’ को प्राप्त हुआ था जिसको नोबेल पुरस्कार मिला है। आँगन में उस दिन विश्व साहित्य का शायद ही कोई नाम होगा जो न लिखा हो। उस दिन की स्मृति में पूरे बर्लिन शहर में जगह-जगह किताबों को पढ़कर सुनाया जाता है। छोटे-छोटे बच्चों को लेकर दर्जनों की तादाद में माँएँ, पिता, आम लोग आते हैं। छोटे-छोटे कमरों में बैठकर रेस्तराओं मे बैठकर, चौराहों पर बैठकर, पार्क में बैठकर पूरे दिन पूरे शहर में देख सकते हैं कि लोग कोई किताब पढ़कर सुना रहे हैं। ऐसा माना जाता है कि नाजीवाद की तरह यह दिन भी जर्मनी के इतिहास का काला दिन था। इसलिए ऐसा दिन फिर कभी न आए, ऐसा करने के लिए इस दिन को एक महत्‍वपूर्ण तारीख मान लिया गया है।

बहुत सी ऐसी गुत्थियाँ हैं जो मेरे दिमाग में अपने देश को लेकर रही हैं और आज भी हैं। कुछ-कुछ उस दिन समझ में आईं कि हम लोग क्यों बच्चों के हाथ में किताब देने से संकोच करते हैं? क्यों सोचते हैं कि केवल मान्य पाठ्यपुस्तक जिसको सरकार ने लिखवाया हो, वही बच्चों के हाथ में जानी चाहिए। कोई अनाप-शनाप किताब उनके हाथ में न चली जाए। कौन-कौन सी शंकाएँ हमारे मन में हैं? कैसा संशय है किताब को लेकर? हमारे मन में इन संशयों ने आधुनिक समय में एक नया रूप भी हासिल किया है। आप देखते होंगे कि अक्सर शिक्षा व्यवस्था की आलोचना करते समय जिन जुमलों का, नारों का प्रयोग होता है उनमें से एक नारा यह भी होता है कि 'बुकिश लर्निंग’, क्या किताबी कीड़ा बन रहे हो, 'कुछ करके देखो।' मेरी प्रिय संस्था ‘किशोर भारती’ और ‘एकलव्य’ ने भी एक नारा इसी तरह दिया था ''लर्निंग बाइ डूइंग'',  जो कोई नया नारा नहीं है। उन्होंने हिन्दी में इसको प्रचारित किया और एक आन्दोलन खड़ा कर दिया, ''खुद करके देखो''। हालाँकि यह नारा विज्ञान के सन्दर्भ में था, पर यह कहीं न कहीं एक गहरे स्तर पर लोगों को किताब में दिए गए ज्ञान से कुछ-कुछ विरक्त और अपने हाथ से किए गए, अपने अनुभव से पैदा किए गए  ज्ञान के प्रति कुछ-कुछ अनुरक्त बनाने के लिए एक सूक्ष्म स्तर पर काम करता है। एक ऐसी संस्कृति में जहाँ किताब पहले ही दुर्लभ है, अगर प्रकट भी होती है तो प्राय: बदनाम हो जाती है। या बच्चों के हाथ तक नहीं पहुँचने दी जाती है। ऐसी संस्कृति में जो बुकिश लर्निंग या किताबी कीड़ा बनने से परहेज करनेवाली जो बातें हैं, ये भी कहीं न कहीं उस संस्कृति को उत्साहित करती है जिसमें किताब को सन्देह की दृष्टि से देखा जाता है।

सौ-डेढ़ सौ साल पहले आधुनिक शिक्षा की जो संस्कृति जन्मी उसमें भी तरह-तरह से आँख के काम या ज्यादा बारीकी से काम करने वाले विद्वान का मजाक उड़ाया जाता था। पहले इसलिए भी क्योंकि वो अँग्रेजी पढ़ लेता था लेकिन कुछ-कुछ इसलिए भी क्योंकि उससे हाथ से काम करने की प्रवृत्ति घट जाती थी। बहुत-सा आधुनिक शिक्षा-विज्ञान अगर आप इस दृष्टिकोण से देखें तो आपको लगेगा कि किताब को हटाकर हाथ के काम को प्रमुख बनाने का विज्ञान है। कोई आश्चर्य भी नहीं कि गाँधी को भी स्वयं यह काम करना पड़ा क्योंकि वास्तव में हमारे धर्म में यह बहुत महत्‍वपूर्ण हिस्सा था कि हम कैसे हाथ के अनुभव को महत्वपूर्ण बनाएँ। इसीलिए किताब की, किताबी आदमी की जिसकी आँख कमजोर हो गई है, जिसको चश्मा लग गया है, ऐसी चीजों की आलोचना करते हुए कुल मिलाकर हम किताबी संस्कृति की आलोचना करना उचित मानते हैं। भारतेन्दु ने 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में ही लिख दिया था कि ''घड़ी, छड़ी, चश्मा भये, छत्रिन के हथियार।'' ऐसी संस्कृति आई है कि नई शिक्षा  में क्षत्रियों ने तलवार की जगह अब चश्मा लगाना शुरू कर दिया है और कटार की जगह कलम इस्तेमाल करने लगे हैं। ये पूरा सन्दर्भ मैं इसलिए नहीं दे रहा हूँ जिससे कि कोई अनोखी, नई बात कही जाए बल्कि इसलिए दे रहा हूँ जिससे कि हम इस बात को समझें कि अगर पुस्तकालयों को, पुस्तक पढ़ने की संस्कृति को, वास्तव में एक जरूरत बनाना है समाज की, शिक्षा की, स्कूली व्यवस्था की, तो इसमें काम और सोच दोनों को ही काफ़ी गहराई से करना होगा।

भारत लगातार एक बदलता हुआ देश है। इसने बहुत कम समय में, मुश्किल से 150-200 वर्ष में कई ऐसी यात्राएँ की हैं जिनको यूरोप ने 400-500 वर्षों में किया। कई ऐसी यात्राएँ अभी भी चालू हैं जो हमारे जीवन में पूरी नहीं होंगी बल्कि कई पीढ़ियाँ इन यात्राओं में निकल जाएँगी। इन्हीं में से एक यात्रा है पढ़ने-लिखने की। पढ़ने-लिखने की संस्कृति को सामान्य बनाने की, हर इन्सान को किताबों के प्रति आकर्षित करने की, और किताब को एक ऐसा माध्‍यम बनाने की जिससे समाज में एक-दूसरे की बात सुनने की, एक दूसरे की बात सहने की, अपनी बात आत्मविश्वास के साथ कहने की तहजीब पैदा हो, चिल्लाकर कहने की नौबत न आए। हथियार उठाने की नौबत न आए। शान्ति की संस्कृति जो कि अपनी बात कहती है लेकिन उससे जब कोई सहमत नहीं होता तो इतना गुस्सा नहीं करती कि दूसरे को लगे कि उसकी बात बिल्कुल व्यर्थ है। ये एक राजनीतिक मसला भी है। इसमें एक सांस्कृतिक अनुगूँज है, एक ऐतिहासिक मसला भी है, और इसकी राजनीति आज के समय में आप देख ही रहे होंगे जहाँ किताबों का चयन अपने आप में अक्सर एक राजनीतिक प्रश्न बन जाता है। फिर पाठ्यपुस्तकों का निर्माण ही नहीं बल्कि सामान्य पुस्तकों का चयन भी एक राजनैतिक प्रश्न बन जाता है क्योंकि ये डर लगता है कि हमारी किताबें आएँगी या उनकी किताबें आएँगी। अगर किताबें पहुँचनी हैं तो बच्चों के हाथ में किनकी किताबें पहुँचें? क्योंकि हमारे माहौल में बच्चों पर भरोसा नहीं है किसी का, हर आदमी सोचता है कि हम बच्चों को अपनी तरह का इन्सान बना दें। बच्चे खुद कैसे इन्सान बनेंगे, इस बात में हमारे यकीन नहीं हैं। इसलिए लगातार एक कशिश, एक तनाव, समाज में उठने वाली हिंसा - मतों को लेकर, विचारों को लेकर, बातों को लेकर - पैदा होती रहती है।

दरअसल दूसरा हिस्सा जो मुझे अपनी बात का कहना है, वह यह कि आप पुस्तकालय की संस्कृति बनाने निकले हैं। लाइब्रेरियों का निर्माण करने निकलते हैं, सोचते हैं कि हम हर स्कूल में लाइब्रेरी बनाएँगे। हर कक्षा में लाइब्रेरी बनाएँगे या कि नगर-नगर में, गाँवों में लाइब्रेरी होगी, तो किन समस्याओं से हम पेश आते हैं। उनमें से कुछ का नजारा, कुछ की बानगी आपको नजर आ गई होगी। और शायद इनमें दो समस्याएँ सबसे प्रमुख हैं जिनकी ओर मैं संक्षेप में इशारा करना चाहूँगा। दोनों ही ऐसी समस्याएँ हैं जिनसे उस हर शख्स को पेश आना पड़ेगा जो एक छोटी-सी भी लाइब्रेरी बनाने के लिए निकला है। इसलिए पेश आना पडेग़ा क्योंकि लाइब्रेरी एक सार्वजनिक संस्था है।

अगर आप अपने घर में लाइब्रेरी बना रहे हैं तो एक अलग मसला है। अगर लाइब्रेरी का अर्थ ही है कि वह जगह जहाँ चार अपरिचित लोग आएँगे, तो आपका वास्ता इन दो समस्याओं से जरूर पड़ेगा जिनकी ओर मैं इशारा करने जा रहा हूँ। इनमें से पहली समस्या है चयन की, जिसकी ओर थोड़ा सा इशारा मैंने आपसे पहले किया - कि कौन सी किताबें आएँगी यहाँ? कौन चुनेगा इन किताबों को? किस आधार पर चुनेगा इन किताबों को? कौन होता है वो चुननेवाला? ये चारों प्रश्न एक साथ प्रकट होंगे। जब ये प्रश्न सरकारी सन्दर्भों में प्रकट होते हैं तो प्राय: इतने प्रच्छन रूप से प्रकट होते हैं कि आम जन को दिखाई नहीं देते कि ये कितने गम्भीर प्रश्न हैं। क्योंकि किताबों का मसला ऐसा नहीं है कि आप जेब में पैसे लेकर निकलें और बाजार से कुछ किताबें खरीदकर लाएँ। किताबें मिठाइयाँ नहीं हैं जो पहले से पता हो कि फलाने की दुकान पर मिलती हैं। किताबों का मसला बहुत ही जटिल है। अव्वल तो इतनी किताबें हैं और उनमें से कुछ को ही खरीदने की हमारी कुव्वत है। दूसरे, किताबें जगह लेती हैं और जगह लेती हैं तो इस तरह से लेती हैं कि पसरकर बैठ जाती हैं। एक बार आपने कुछ किताबें खरीद लीं तो जो जगह आपके स्कूल में या आपकी संस्था में थी, वो आपने भर ली। अब अगर आपको कुछ वर्ष बाद ये दिव्य ज्ञान हो भी कि वो किताबें बहुत अच्छी नहीं थीं, तो उन किताबों से मुक्ति पाना बड़ा मुश्किल काम है। क्योंकि अगर आप किताबों को हटाते हैं तो चार लोग आपकी आलोचना करना शुरू कर देंगे कि देखो किताबें हटा रहे हैं। आप उनको फाड़ेंगे, जलाएँगे तो वही समस्या आएगी जो मैंने आपसे पहले बताई। आपके मन में भी एक प्रश्न होगा कि मैं भी किताबों को नष्ट करनेवाला बन गया। कैसा आदमी हूँ? आप सोचेंगे कि अच्छा होता किसी को दे देते। तो आपके मन में दो बार यह खयाल ज़रूर आएगा कि जिन किताबों को मैं नहीं रखना चाहता वो दूसरों को देना कोई अच्छी बात है क्या? अगर ये किताबें अच्छी होतीं तो मैं ही इनको रखता और हम इन्हें दूसरों को दे रहे हैं जिसके पास मेरी तुलना में भी कम किताबें हैं। तो मैं उसको ऐसी किताब दूँ जो कि कुछ बेहतर हो लेकिन मैं वो किताबें दे रहा हूँ जो कि मैं हटाना चाहता हूँ। ये सारे प्रश्न किताबों को लेकर आपके मन में आएँगे।

किताबों का चयन एक बहुत ही मुश्किल काम है। जब सरकारें ऐसी समिति बनाती हैं जिसको ये जिम्मा दिया जाता है कि भई कुछ किताबों की सूची बनाओ तो समिति के सामने बड़े इस तरह के पेचीदा सवाल उभरते हैं कि हम कैसे ये सूची बनाएँ? अव्वल तो कोई ऐसा इन्सान नहीं होता जिसको पता हो कि दुनिया में जितनी तमाम किताबें हैं उनमें से कौन सी लेने लायक हैं। अगर पता हो, तो भी यह प्रश्न उठता है कि उस समिति में हर व्यक्ति की राय किस तरह शामिल हो पाएगी? सरकारी समितियों के साथ जो सबसे बड़ी सीमा होती है, समय की होती है। समिति आज बनी और उससे कहा जाता है कि 25 तारीख तक सूची जमा कर दो। उस बीच दस हजार किताबों में से उसको आठ सौ चुननी हैं। अगर वो व्यक्ति अरस्तु भी हो तो भी उसके लिए बड़ा मुश्किल है कि वो दस हज़ार किताबें 25 तारीख तक पढ़कर उसमें से आठ सौ चुन ले। अगर चार-छह आदमी उसमें हैं तो आप समझिए कि यह असम्भव है। तो प्राय: किताबों को यूँ ही पलटकर देखकर कह देते हैं कि हाँ भाई ठीक है ले लो। यहाँ पर अनेक प्रकार की भावनाएँ, अनेक प्रकार के पूर्वाग्रह काम आते हैं। बहुत से लोगों को वो किताबें ठीक लगती हैं जो उन्होंने खुद पढ़ रखी हैं बचपन में। बहुत से लोगों को नागवार गुजरती हैं जो उनके शत्रुओं ने पढ़ी हों। बहुत से लोगों को किताबें देखकर एहसास हो जाता है कि ये लेने लायक हैं या नहीं। हमारी व्यवस्था में तो आप जानते हैं इम्तिहान की कॉपी देखकर ही बहुत से लोगों को पता चल जाता है कि इसको 'साठ' नम्बर मिलने चाहिएँ, इसको 'चालीस'। हमारे यहाँ  इस तरह की बुक रीडिंग बहुत होती है या नोट बुक रीडिंग। ऐसी स्थिति में ये बड़ा मुश्किल होता है कि किताबों का चयन दिए गए समय में कैसे किया जाए? चयन के लिए प्राय: पुस्तकें पर्याप्त मात्रा में एक जगह उपलब्ध भी नहीं होतीं। और यहाँ आता है दूसरा पहलू जो इसी सन्दर्भ में मुझे आपके सामने रखना है। वो पहलू है एक ऐसे बाजार का जिसके अपने कोई नियम नहीं हैं। किताबों का बाजार, किताबों के निर्माण का उद्योग।

आप बहुत ज्यादा बुरा न मानें। हो सकता है आपकी भावनाओं को मैं आहत करूँ, इसलिए मैं पहले से ही भूमिका दे रहा हूँ। किताबों का बाजार, किताबों का उद्योग, उद्योगों में अगर गिना जाए तो सबसे भ्रष्ट उद्योगों में से है। जिसमें आज एक प्रकार की ऐसी तलछट देखने को मिलती है जिसमें से कोई चीज कायदे से ढूँढ़कर निकालना बड़ा मुश्किल है। कौन-सी किताब छपेगी? कौन-सी नहीं छपेगी? इसके आधार अधिकांश प्रकाशकों के पास नहीं हैं। अनाप-शनाप सब कुछ छपता है। और क्यों छप रहा है इसके भी अनेक कारण होते हैं। बहुत से प्रकाशक अनेक नामों से पुस्तकें छापते हैं। बहुत से लेखक अनेक नामों से पुस्तकें लिखते हैं। इस पूरे जगत में कोई सामान्य इन्सान पहुँच जाए तो उसको वास्तव में लगेगा कि मैं कहाँ आ गया। इससे अच्छा तो मैं उस दुनिया में था जहाँ कोई किताब नहीं थी, जहाँ पेड़ ही थे, जानवर थे। वरना इस जगह पर यह तय करना कि ये किताब मेरे तक कैसे पहुँची, बड़ा मुश्किल काम है।

कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए हमको इस बात से कि अगर आप आज किसी डाइट के पुस्तकालय में जाएँ, सर्व शिक्षा अभियान के अन्तर्गत बहुत बड़ी मात्रा में किताबों की ख़रीद हुई है, गाँव-गाँव में पुस्तकें पहुँची हैं। ज्यादा नहीं, तीस-चालीस ही सही। पर आप वो स्कूल खुलवाकर उसकी लाइब्रेरी की अलमारी खुलवा कर गौर करें तो आप कुछ विलाप की मुद्रा में तुरन्त आ जाएँगे कि ये किताबें ली गई हैं। इन किताबों को कौन पढ़ेगा? बहुत-सी किताबें इसलिए ली गई हैं कि दिखने में कुछ शोख लग रही थीं, कुछ-कुछ इस तरह के उनके कवर थे जिस तरह से एक शादी का कार्ड होता है, चमकदार तेज रंग वाले चित्र उसमें थे। थोड़ा बारीकी से आप देखेंगे तो बड़े क्रूर चेहरे, अटपटी भाषा मिलेगी। किसी चीज़ पर कोई ध्‍यान नहीं दिया गया था फिर भी बिक गई क्योंकि मूल्य बहुत कम था। मूल्य इसलिए बहुत कम था क्योंकि असली मूल्य पहले ही दिया जा चुका था। तो जो छपा हुआ मूल्य है बहुत आकर्षक लगता है समिति को। नियम भी कुछ इस तरह के हैं कई बार, कि कोई किताब 8 रुपए में मिल रही है और उसके बरअक्‍स दूसरी किताब 48 रुपए में है, तो 8 रुपएवाली को प्राथमिकता मिलेगी। भले ही सबको पता हो कि 8 रुपए में आज कोई किताब नहीं छप सकती।

सरकार भी बहुत से संशय लेकर चलती है और कोशिश करती है कि भ्रष्टाचार कम से कम हो। पर किताबों का व्यवसाय ही ऐसा है कि जितने नियम भ्रष्टाचार को कम करने के लिए बनाए जाते हैं, ठीक उन्हीं नियमों की आड़ में भ्रष्टाचार बढ़ जाता है। और इस तरह से एक ऐसी परिस्थिति पैदा होती है जिसमें रह-रहकर बार-बार पैसा दिए जाने के बावजूद हमारी शिक्षण संस्थाओं में ऐसी किताबें नहीं पहुँच पाती हैं जो बच्चों को आकर्षित कर सकें, जो अध्यापकों को आकर्षित कर सकें। अगर आप पिछले 60-62 साल की कई योजनाओं पर विचार करें तो पाएँगे कि पहली योजना से लेकर आज 11वीं योजना तक शायद ही कोई पंचवर्षीय योजना रही हो जिसमें किताबों की खरीद के लिए प्रावधान न किया गया हो। एक-दो योजनाएँ तो बहुत बड़ी किताबों की खरीद लेकर आईं, जैसे कि ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड, जो कि नई शिक्षा नीति के सन्दर्भ में चला और उसमें भी ऐसे कई कांड हुए जिनमें से अभी भी कई का समाधान हो रहा है। किताबों की खरीद को लेकर बहुत बड़ी समस्याएँ उस पूरे ऑपरेशन में आईं। जब ये किताबें स्कूल पहुँचती हैं तो इनका चूँकि ऐसा कोई कारण स्कूल में इस्तेमाल का नहीं है, जैसा मैंने पहले भी कहा, तो ये किताबें पड़ी रहती हैं। इसलिए आनेवाले अधिकारियों को भी लगता है कि ये पैसा बरबाद हुआ। अब क्यों फिर से पैसा लगाया जाए।

तो मुझे आशा है कि आप में से बहुत से लोग इन प्रश्नों पर भी विचार करेंगे कि अगर हम अपनी स्कूली व्यवस्था में परीक्षा प्रणाली, अध्‍यापकों के प्रशिक्षण, इन तमाम चीजों पर अधिक ध्‍यान देकर और उन तमाम सांस्कृतिक, शैक्षणिक प्रश्नों से जूझ भी लें जिनकी ओर मैंने पहले इशारा किया और एक पढ़ने का माहौल और एक लाइब्रेरी की ज़रूरत पैदा कर भी दें, तो भी ये प्रश्न रहेगा कि इसमें किस प्रकार सामग्री पहुँचे। एक ऐसे बाज़ार से होकर इस सामग्री को पहुँचना है, जो बाज़ार अपने आप में बहुत नैतिक बाजार नहीं है। और इस वजह से उस पर निर्भर होना बहुत मुश्किल काम है।

तो एक तरह से जरूरत और समस्याओं के बाद मैं अपने तीसरे और अन्तिम हिस्से पर आता हूँ जहाँ में मुझे साधनों की बात करनी है। इस पूरे परिदृश्य में बदलाव लाने के क्या साधन हैं? खासकर दो साधनों की मुझे आपसे बात करनी है। एक तो शैक्षणिक साधन और दूसरे तकनीकी साधन। शैक्षणिक साधनों में सबसे महत्‍वपूर्ण साधन शायद वो साधन हैं जो कि पढ़ना सिखाने के शिक्षण को प्रभावित कर सकते हैं। ये एक ऐसा विषय है जिस पर एन.सी.ई.आर.टी. इस समय काफी गहराई से काम करने का प्रयास कर रही है। एन.सी.ई.आर.टी. ने एक रीडिंग डिवेलपमेंट सेल सर्व शिक्षा अभियान के अनुदान से खोला है। इस सेल में हमारी कोशिश है कि हम लोग नए तरह के पढ़ना सिखाने के कौशलों का प्रशिक्षण देश में प्रचारित कर सकें। इस सिलसिले में बाल साहित्य का इस्तेमाल, क्रमिक पुस्तकमाला का इस्तेमाल, नई तरह की सामग्री का इस्तेमाल हम देश के राज्यों में प्रसारित करने की कोशिश कर रहे हैं। इस पूरी परियोजना के पीछे पढ़ने को लेकर एक दृष्टि है। वो दृष्टि पढ़ने की स्थापित संस्कृति से विपरीत है या उसकी विपरीत दिशा में जाती है। पढ़ने की स्थापित संस्कृति आज पढ़ने को एक यांत्रिक कौशल के रूप में विकसित करती है। अगर आप जुलाई के आरम्‍भ में कक्षा 1 में जाएँ, तो अधिकांश सरकारी स्कूलों में और बहुत से प्रायव्हेट स्कूलों में भी आपको यही दृश्य देखने को मिलेगा कि बच्चे अक्षरों की आकृति से परिचित हो रहे हैं। उनके नाम याद कर रहे हैं और कुछ इस तरह की आवाज़ें आपको स्कूल से गुजरते समय आएँगी “क का कि की कु कू'' या कि ''अ आ इ ई'' या ''क पे उ की मात्रा कू। ग, पे, उ की मात्रा गू”। इस तरह से बच्चे रटते हुए आपको मिलेंगे जो कि अक्षरों और ध्‍वनियों के बीच सम्‍बन्ध बना रहे हैं। और ये सिलसिला कई महीनों तक चलेगा।

 शिक्षा विज्ञान की दृष्टि से देखें तो ये सिलसिला न केवल पूर्णत: अवैज्ञानिक है, इसलिए अमान्य है, बल्कि साथ में ये एक बहुत दु:ख भरा सिलसिला भी है क्योंकि बच्चों के बारे में हम जानते हैं कि अगर बच्चों में सबसे तीव्र किसी बात की इच्छा होती है तो वो यही होती है कि वो संसार को समझें। ऐसा कोई भी अनुभव जो उनकी समझने की इच्छा को प्रोत्साहित नहीं करता, उद्दीप्त नहीं करता, ऐसा अनुभव उनको नागवार गुजरता है। ऐसे अनुभव से पेश आते समय उनको बड़ा कष्ट होता है। ये जो अनुभव है अक्षरों की आकृतियाँ पहचानना, वर्णमाला याद करना, उसके क्रम को समझना और उसके बाद ध्‍वनियों को याद करना और फिर अक्षरों और ध्‍वनियों में सम्बन्ध बिठाना, फिर मात्राओं को याद करना और इसके बाद कहीं जाकर पहला शब्द पढ़ने का मौक़ा मिलना, जैसे कि ''क म ल'', कक्षा 1 के बच्चे के लिए बहुत-ही बड़ी त्रासदी है।

यह कोई आश्चर्य नहीं है कि हमारे अनेक अध्‍ययन यह सिद्ध करते हैं कि पढ़ना सिखाने की यह पारम्‍परिक विधियाँ बहुत बड़े पैमाने पर बच्चों को स्कूल में आते रहने को निरुत्साहित करती हैं। क्योंकि पढ़ना सिखाने की ऐसी पद्धति जो कि उबाऊ हो और जिसमें बार-बार प्रयास करने पर भी बच्चा पढ़ना न सीख पाए, अन्तत: बच्चे को न केवल निराश करती है बल्कि दूसरों की निगाह में बदनाम भी करती है। दो-तीन महीने, चार महीने बाद भी अगर बच्चा कुछ नहीं पढ़ पाता तो जो ऐसे माता-पिता हैं जिन्होंने स्वयं पढ़ना नहीं सीखा था, वो बच्चे से पूछते हैं कि तुम चार महीनों से जा रहे हो, पढ़ना नहीं सीख पाए? इसका मतलब? इसका मतलब वो यह नहीं समझते हैं कि स्कूल में कोई कमी है। इसका मतलब वो समझते हैं कि बच्चे में कोई कमी है। वो कहते हैं इसका मतलब तुम बुद्धू हो। और अगर वो बच्चा लड़की हुआ तो आप मानकर चलिए कि उसको इससे ज्यादा समय नहीं दिया जाएगा। ठीक है तुम बकरी चराओ, छोटे बच्चों को देखो, पढ़ने से तुम्हारा कोई वास्ता नहीं है। तुम्हारा इतना दिमाग नहीं है। कक्षा 1 से 5 के बीच में ये दुर्घटनाएँ लगातार होती हैं। बहुत से सन्दर्भों में आप कई जगह, कई इलाकों में देखेंगे कक्षा 5 का बच्चा भी स्वतन्त्र रूप से पढ़ नहीं सकता है। बहुत से लोग इसी को लेकर व्यवस्था पर पिल पड़ते हैं कि “फिर आपने पाँचवीं में पहुँचाया ही क्यों?”

इस तरह के प्रश्न तमाम उठते हैं और मुझे आशा है कि आप भी इस पर विचार करेंगे। लेकिन इस पूरी चर्चा को यहाँ लाने का मैंने इसलिए सोचा कि जब तक पढ़ना सिखाने की विधियों में और वो भी एकदम शैशव काल में, बचपन में विकास नहीं होगा, बदलाव नहीं होगा, तब तक हमारा ये जो अरमान है कि लाइब्रेरी स्कूल का अंग बने, उसकी जरूरत बने और बच्चों में पढ़ने की इच्छा हो ये अरमान भी हमारा पूरा नहीं होगा। हमारी आज की स्कूली शिक्षा व्यवस्था या तो परीक्षार्थी बनाती है या बहुत साक्षर बनाती है। वो पाठक नहीं बनाती किसी को। इसी कारण से हम अपनी भाषाओं में देखते हैं कि बहुत अच्छे लेखक की किताब की हज़ार दो हजार प्रतियाँ बिक पाती  हैं। बल्कि दो हजार प्रतियाँ अगर हिन्दी में किसी उपन्यास की बिक जाएँ तो बहुत माना जाता है। भले ही 47 करोड़ लोगों की भाषा वाला देश है ये। बड़ा भारी प्रश्न है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था इतना समय लगाती है फिर भी पाठक क्यों नहीं बना पाती। माँग-माँगकर पढ़ने वाले बच्चे क्यों नहीं आ पाते?

कुछेक प्रदेश हैं जैसे केरल, बंगाल जिनमें पाठक बनते हैं। शिक्षा व्यवस्था की वजह से बनते हैं या कोई और सांस्कृतिक कारण है क्योंकि इन प्रदेशों में अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में किताबें बिकती हैं? यहाँ सार्वजनिक प्रयास हुए हैं। जैसे कि केरल शास्त्र साहित्य परिषद् ने बहुत बड़े पैमाने पर पुस्तकों की संस्कृति को केरल में विकसित किया। सार्वजनिक पुस्तकालयों के लिए 1930 के दशक से ही केरल में एक आन्दोलन जैसा चला जिसकी वजह से आज वहाँ के गाँव-गाव में पुस्तकालय मिलते हैं। कई समस्याओं को जिनको हम हिन्दी प्रदेश में आज भी झेल रहे हैं, उन समस्याओं को केरल जीत चुका है। ऐसा नहीं है कि वो चयन के प्रश्न को जीत चुका है। नहीं जीता, बल्कि अभी आपने देखा कि पिछले दिनों केरल में एक पुस्तक को लेकर इतना झगड़ा हुआ कि एक हेडमास्टर की हत्या कर दी गई जबकि उस पुस्तक से उसका कोई लेना देना नहीं था। उस पुस्तक की प्रतियाँ जलाई गईं उस प्रदेश में जिसको देश का सबसे साक्षर प्रदेश कहते हैं। ज़ाहिर है वो साक्षर तो हो गया लेकिन किताबों की संस्कृति के मामले में अभी बहुत निरक्षर है या कि असहनशील है। वरना एक किताब को जलाने की नौबत नहीं आती। उस किताब में कुछ ऐसा लिखा जिससे लोग सहमत नहीं थे, तो वो दूसरी किताब लिखते क्योंकि अन्तत: किताब का जवाब तो किताब ही है। किताबों का जवाब तो हर बच्चे के पास है, हर नागरिक के पास है। क्योंकि वो अगर सचमुच एक जीवित लोकतंत्र का नागरिक है तो उसमें इतनी कुव्वत होगी कि कौन-सी किताब में बकवास लिखी है और कौन-सी किताब में कोई ढंग की बात लिखी है। ये निर्णय अन्तत: नागरिक का है, बच्चे का है। उसके हाथ से किताब छीनकर पहले ही जला देना या छिपा देना जिससे वो न पढ़ने पाए, ये दृष्टिकोण कुछ-कुछ वैसा ही है जैसा कि मैंने कुछ समय पहले जर्मनी का दृष्टांत देते हुए आपके सामने रखने की कोशिश की थी।

अन्त में वो दूसरा साधन जिसकी ओर आजकल बहुत लोग आशा के दृष्टिकोण से देखते हैं,  ये जो नई सूचना प्रोद्यौगिकी है जिसको आई.सी.टी. के नाम से जाना जाता है। क्या ये नई संस्कृति किताबों की संस्कृति को प्रोत्साहित कर सकती है? अगर किताबों को छोड़ भी दें, तो क्या यह पढ़ने की संस्कृति को प्रोत्साहित कर सकती है। बहुत पेचीदा प्रश्न है क्योंकि इसमें सन्देह नहीं कि इस टेक्नॉलॉजी की मदद से आज ये सम्भव हुआ है कि बहुत से लोग जो कि किताबों से वंचित रखे गए हैं, जिनके गाँव शहर तक किताबें नहीं पहुँचतीं, वो भी किसी प्रकार उन विचारों को खुद पढ़ सकें जिन विचारों को वो किताबों में नहीं पढ़ सकें। आज यह सम्भव हुआ है और इस दृष्टिकोण से देखें तो ये टेक्नॉलॉजी हमारे सामने एक ऐसा बिहान जगाती है, ऐसा लगता है कि एक ऐसी सुबह होने जा रही है जैसी सुबह कभी किसी ने देखी नहीं है। लेकिन परेशानियाँ भी हैं।

परेशानियाँ इस कारण हैं कि जो समस्याएँ किताबों के जंगल से किताबें बीनकर ख़रीदने में होती थी वो इंटरनेट के जंगल में भी वैसी ही हैं। क्योंकि इंटरनेट का जंगल भी कोई बहुत नैतिक जंगल नहीं है। डार्विन ने कहा था कि जंगल का मतलब ही यह है कि जहाँ शक्ति का बोलबाला हो, नीति का स्थान न हो। वो बात तो वहाँ भी लागू होती है और हर तरह की सूचना वहाँ उपलब्ध है। दुनिया में हज़ारों की मात्रा में गुमराह किए जाते हुए युवक भी इंटरनेट के विश्वविद्यालय से ही पढ़ रहे हैं। लाखों की मात्रा में निराश होते हुए विकृत मानसिकता की ओर बढ़ते हुए बच्चों के लिए भी इंटरनेट का रास्ता खुला हुआ है। इंटरनेट पर किसी का जोर नहीं है। अगर इंटरनेट को इस्तेमाल करना है, स्कूल की संस्कृति में पढ़ने-लिखने की जगह बनाने के लिए, सुनने-सुनाने की जगह बनाने के लिए, एक अहिंसक शांतिपूर्ण जगह बनाने के लिए, तो भी अंत में हमारे पास इसका कोई विकल्प नहीं होगा कि हम एक ऐसे जगत की कल्पना करें जिसमें क्या बकवास है और क्या नहीं है, यह निर्णय करने का अधिकार भी विद्यार्थी के पास हो और इस निर्णय को करने की क्षमता भी उसमें विकसित की जा चुकी हो।

 दूसरा मसला है, आई.सी.टी. के विद्वान भी बहुत स्पष्ट नहीं बता पा रहे हैं कि क्या आई.सी.टी. में वो क्षमता है या वो क्षमता उस पीढ़ी को दिखलाई दे रही है, जो किताबों की मदद से जिज्ञासा पैदा कर सकी, बनाए रख सकी? आज आई.सी.टी. की मदद से उसको पूरा किए ले रही है। लेकिन कल के दिन अगर सिर्फ आई.सी.टी. ही होगी और किताबें नहीं होंगी तो क्या वैसा माहौल पैदा हो पाएगा कि हम बच्चे से उम्मीद करें कि वो कोई प्रश्न लेकर मन में चले और उसका तुरन्त उत्तर न मिलने पर निराश न हो, महीनों तक उसकी खोज करता रहे, अनेक तरह की चीजें पढ़ता रहे, देखता रहे तब जाकर उसके मन में कोई विचार बने।

शिक्षा के बहुत महत्‍वपूर्ण मूल्यों में से एक है अनिश्चय में रहना, फिर भी सुखी रहना। आई.सी.टी. की संस्कृति में कहीं न कहीं समय का प्रबन्धन एक बहुत बड़ा प्रश्न है। जैसे कि पारम्‍परिक लाइब्रेरी के निर्माण में जगह का प्रबन्धन एक बहुत बड़ी समस्या थी वैसे ही आई.सी.टी. के संदर्भ में समय का प्रबन्धन बहुत मुश्किल है। क्योंकि ये जो नई टेक्नॉलॉजी है ये जगह तो नहीं माँगती लेकिन समय को लेकर एक नई समस्या पैदा करती है कि इनके आने के बाद किसी में धैर्य नहीं रहता। लोग तुरन्त अपने प्रश्न का उत्तर चाहते हैं और तुरन्त अगर कोई जवाब नहीं मिलता तो निराश हो जाते हैं। मैं देखता हूँ कि अगर आप किसी के ई-मेल का जवाब हफ्ता दो हफ्ता न दें तो वो सोचता है कि अब आप सचमुच सरकारी अधिकारी बन गए। यानी कि अब आप कुन्द हो गए। ई-मेल लिखने वाले को लगता है कि जितना समय मुझे इसको भेजने में लगा उतना ही समय आपको इसको समझने में लगना चाहिए। इतने ही समय में आपको इसका जवाब दे देना चाहिए। ई-मेल, इंटरनेट का एक पहलू भर है लेकिन वो इसकी सांस्कृतिक संरचना भी है। वो एक मानसिक संरचना भी है। किताबों की संस्कृति और आई.सी.टी. की संस्कृति में समय के प्रबन्धन को लेकर एक गहरी बहस छिपी हुई है, फंसी हुई है। मुझे आशा है आप इस बहस को आज शुरू करेंगे छोटे समूहों में। इससे जुड़े हुए प्रश्न उभारेंगे।

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नोट: प्रो. कृष्ण कुमार का यह व्‍याख्‍यान विद्याभवन सोसायटी द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘खोजबीन’ के अंक 5 में प्रकाशित हुआ था। यहाँ उसका सम्‍पादित रूप प्रस्‍तुत किया गया है।


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